रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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.सूर्यावर्तंरस के नाम से कहा जाता है । यह रस श्वास-व्याधि पर विशेष रूप से
लाभकारी है ॥ १०८-१११ ॥
शूलेभकेशरी-रसः-
पलैकप्रमितं ताम्रं पारदं विमलं समम् ।
द्विपलं गन्धपाषाणं त्रिपलं शुद्धतालकम् ॥ ११२.॥
सम्मेल्य सर्वं यत्नेन पेषयेदहरद्वयम् ।
विशोष्य धर्मे च ततः सम्पुटस्थं तु कारयेत् ॥ ११३ ॥
अजापयःपिष्टटङ्कपिष्ट्या सन्धिं प्रलेपयेत् ।
ऊर्ध्वाधो लवणं दत्त्वा हण्डिकायां तु विन्यसेत् ॥ ११४ ॥
प्रखरेणानलेनाथ वारणाख्यपुटे पुटेत् ।
एवमेकपुटेनैव म्रियते रविलोहकम् ॥ ११५ ॥
समाख्यातो रसोऽयं तु ना ना शूलेभकेशरी ।
अमोघास्त्रमिदं ख्यातं मूलनिर्मूलने परम् ॥ ११६ ॥
शूलेभकेशरीरसः—वारणाख्यं पुटं गजपुटम् ॥ ११२-११६ ॥
भा.टी.—शुद्ध ताम्र का चूर्ण एक पल, शुद्धगन्धक दो पल, शुद्ध-
हरताल तीन पल लेकर, सबको एकत्र खरल में किसी द्रव के साथ पीसकर धूप
में सुखा लें । पश्चात् इसको संपुट में बन्द करके संपुट की सन्धि की सुहागा
और बकरी के दूध की पीठी से अच्छी तरह लेप करके सुखा लें । अब एक बड़ी
हाँड़ी में आधे भाग तक लवण भर उस पर उक्त संपुट को रख दें । और हाँड़ी
के अवशिष्ट भाग को फिर लवण से ऊपर गले तक अच्छी तरह भर दें और
हाँड़ी के मुख में एक सकोरा रखकर उसको सन्धिलेप कर दें । अब लवणयुक्त
हाँड़ी को गजपुट के बीच में रखकर फूँक दें । इस प्रकार एक ही पुट से ताम्र
की भस्म हो जाती है । इस ताम्रभस्म को शूलेभकेशरीरस कहा जाता है । शूल
को शान्त करने में यह कभी व्यर्थ न जानेवाला रस है । अर्थात् इसके सेवन
से अवश्य ही शूल नष्ट हो जाता है ॥ ११२-११६ ॥
वक्तव्य—शूलेभकेशरी रस बनाने में पहिले पारद गन्धक की कज्जली बना
लेनी चाहिये, फिर अन्य द्रव्य मिलाकर उसको नींबू के रस से मर्दन करना
चाहिये । कई बार एक ही गजपुट से इसकी उत्तमभस्म नहीं होने पाती है ।
अतः दो या तीन गजपुट देने चाहिये ।