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सर्वकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

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पृष्ठ 429

षोडशस्तरङ्गः ४०३
चूर्णीकृतं प्रयत्नेन काचकूप्यां तु विन्यसेत् ।
त्रिपादिकायां विन्यस्य कूपीं कूपीमुखे ततः ॥१०२॥
मेलयेत्काचनलिकामुखमेकं प्रयत्नतः ।
अपरं च मुखं त्वस्या विन्यसेज्जलपूरिते ॥१०३॥
अन्यस्मिन्काचकूपे तु तोयमज्जनपूर्वकम् ।
ततस्त्रिपादिकाधस्तात्सुरादीपं प्रदीपयेत् ॥१०४॥
रसायनविधानज्ञस्तावन्मन्दाग्निना पचेत् ।
नृसारबाष्पं द्रवतां याति यावज्जले भृशम् ॥१०५॥
संजायते स्वच्छजलप्रकाशो द्रवः सुतीव्रः खलु चातिरम्यः ।
समीरितोऽयं भिषजां वरेण्यैर्नृसारबाष्पद्रवनामधेयः ॥१०६॥
प्रसङ्गान्नवसादरबाष्पद्रवस्य निर्माणप्रकारः—वारा जलेन । स्पष्टप्रायमन्यत् ।
काचनलिकामुखमन्यस्यां जलपूर्णायां काचकूप्यां जलनिमग्नं विधेयम् । एवं
सति बाष्पं जललीनमेव भवतीति । सुतीव्रः आघ्राणादिना परिचेयः । अतिरम्यः
स्वच्छत्वात् ॥१०१-१०६॥
भा. टी.—अच्छे चूने के पत्थर को आग में खूब पकाकर जब वह पककर
फटने लगे तो उसे जल में बुझा दें और इसका चूर्ण खुश्क करके दो भाग ले
लें । अब इस चूने के चूर्ण में एक भाग नौसादर का सूक्ष्म चूर्ण मिला एक
काँच की शीशी में भर दें । अब इस शीशी को त्रिपादिका पर रखकर इस
शीशी के मुख में एक काचनल्लिका का मुख अच्छी तरह जोड़ दें । इस नली
के दूसरे मुख को एक दूसरी जल से भरी हुई और जल में ही रखी हुई काँच
की शीशी के मुख से अच्छी तरह जोड़ दें । अब त्रिपादिका के नीचे सुराप्रदीप
जलाकर मन्द-मन्द अग्नि जलायें, जिससे नौसादर की वाष्प उड़कर दूसरी
कूपी के जल में मिल जाय । इस प्रकार नौसादर बाष्प उड़कर प्राप्त होनेवाला
द्रव स्वच्छजल के सदृश सुन्दर और सूँघने में तीव्र होता है । इसी को वैद्य
लोग नृसारवाष्पद्रव नाम से कहते हैं ॥१०१-१०६॥
नवसादरबाष्पद्रवस्य गुणाः
नवसादरबाष्पोत्थद्रवोऽयमतिशोभनः ।
वरटीवृश्चिकादीनां विशेषाद्विषनाशनः ॥१०७॥
संमेल्य प्रचुरं तोयं रसायनपरीक्षणे ।
द्रवोऽयं विनियोक्तव्यो रसायनविशारदैः ॥१०८॥