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सर्वकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

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पृष्ठ 418

३६२ रसतरङ्गिणी
विशोधितं हिङ्गुलं तु क्षिपेत्तारमितं भिषक् ॥३३॥
तथैव सुमृतं ताप्यं क्षिप्त्वा सम्पेषयेद् बुधः ।
निम्बूकरसं दत्त्वा शुष्कचूर्णञ्च कारयेत् ॥३४॥
सम्पुटस्थं ततः कृत्वा पुटयेत्तु प्रयत्नतः ।
एवं स्वल्पपुटैरेव रजतं मृतिमाप्नुयात् ॥३५॥
द्वितीयादिपुटेष्वत्र रसतन्त्रविचक्षणः ।
माक्षिकं न प्रयुञ्जीत रहस्यमिह कीर्तितम् ॥३६॥
पञ्चमः प्रकारः माक्षिकभस्महिङ्गुलयोगजातसिद्धिः सुगमपाठः प्रायः ॥३३-३६॥
भा.टी.--शुद्ध रजत के पत्रों को कैंची से काटकर बहुत बारीक पतले टुकड़े
करलें । अब इनमें समभाग शुद्ध हिंगुल और स्वर्णमाक्षिकभस्म मिला निम्बू के
स्वरस में अच्छी तरह पाँच-छः घंटे तक घोटकर सुखा के चूर्ण करलें । अब इस
शुष्कचूर्ण को शरावसम्पुट में बन्द करके लघुपुट की अग्नि में फूँक दें । इस
प्रकार थोड़े पुटों में ही चाँदी की भस्म हो जाती है । इस विधि से रजत की
भस्म करने पर भी पहिले पुट में ही स्वर्णमाक्षिकभस्म डालनी चाहिये । इसके
बाद केवल हिंगुल और निम्बूरस में ही घोटकर पुट देने चाहिये ॥३३-३६॥
षष्ठो मारणप्रकारः
समाहरेत्सुविमलं तारपत्रकणाचयम् ।
निम्बूद्रवसंशुद्धं निरम्लीकृतहिङ्गुलम् ॥३७॥
तारद्विगुणितं दत्त्वा पिष्ट्वा चूर्णञ्च कारयेत् ।
ऊर्ध्वपातनयन्त्रेण पचेत्पाकविधानवित् ॥३८॥
भूयो भूयः पचेद्यावद्रजतं मृतिमाप्नुयात् ।
अधःस्थं सुमृतं तारं कृष्णाभमतिसुन्दरम् ॥३९॥
आहरेदूर्ध्वसंस्थन्तु रसेशञ्चातिनिर्मलम् ।
एवं मृतं चन्द्रलोहं तत्तद्योगेषु योजयेत् ॥४०॥
षष्ठः प्रकारः-हिङ्गुलसाध्यः प्रयत्नैक्येऽपि कार्यद्वयसाधकः सरलप्रायश्च ॥३७-४०।
भा.टी.—शुद्ध किये हुए चाँदी के पत्रों का बुरादा-सा चूर्ण लेकर उसमें
द्विगुण भाग निम्बू के रस में अच्छी तरह शुद्ध किया हुआ हिंगुलचूर्ण डालकर
पीस लें और चूर्ण-सा कर लें । अब इस चूर्ण को ऊर्ध्वपातन की निचली हाँडी
में रखकर इसके मुख पर एक दूसरी औंधा मुख टिकाकर दोनों की मुखसन्धि
को अच्छी तरह कपड़मिट्टी से पोत दें । अब ऊर्ध्वपातन यन्त्र को चूल्हे पर