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रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

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पृष्ठ 378

३५२ रसतरङ्गिणी
अथ विडलवणस्य नामानि
विडं कृत्रिमकञ्चैव सुपाक्यं द्राविडन्तथा ।
आसुरञ्च विटञ्चाथ धूर्त्तञ्च कृतकं मतम् ॥१४०॥
अथ विडलवणपरिचयः—कृत्रिमकं न स्वाभाविकमपि तु योगविशेषजात-
मित्यर्थः ॥ १४० ॥
भा.टी.—विडलवण को विड, कृत्रिमक ( बनावटी ), सुपाक्य, द्राविड,
आसुर, विट, धूर्त्त तथा कृतक नाम से व्यवहार किया जाता है ॥ १४० ॥
वक्तव्य—विडलवण सैन्धानमक की भाँति स्वाभाविक रूप से कहीं खान
आदि से प्राप्त नहीं होता है, किन्तु इसे बनाया जाता है, अतः इसको कृतक-
लवण या कृत्रिमकलवण कहा जाता है ।
अस्य गुणाः
विडं रुच्यञ्च तीक्ष्णोष्णं सूक्ष्मं लघु च दीपनम् ।
सक्षारं हृद्यमूर्ध्वाधः कफवातानुलोमनम् ॥१४१॥
अजीर्णानाहविष्टम्भहरं शूलविबन्धजित् ।
हृद्गौरवप्रशमनं वातघ्नञ्च प्रकीर्त्तितम् ॥१४२॥
कफवातयोरुपर्य्यधो यथामार्गप्रवर्त्तनात् अनुलोमकम् । वातघ्नञ्च प्रकीर्त्तितं
पूर्वतनैरिति शेषः ॥ १४०–१४२ ॥
भा.टी.—विडलवण खाने में अच्छा लगता है और अन्न में रुचि उत्पन्न
करता है । तीक्ष्ण तथा उष्ण गुण युक्त, सूक्ष्म (क्षार के समान सूक्ष्म भाग व
स्थानों मे सरलता से प्रवेश करनेवाला ), लघु ( शीघ्र पच जानेवाला या
हल्कापन करनेवाला ) अग्निदीपक और क्षारीय रसयुक्त होता है । इसके अन्तः-
प्रयोग से ऊपर की तरफ कफ प्रवृत्ति ( निकला ) और नीचे गुदा की तरफ
अपानवायु की प्रवृत्ति होती है । अजीर्ण, आध्मान, विष्टब्धाजीर्ण मिट जाते हैं ।
इसके प्रयोग से साधारण उदरशूल, मलबन्ध, अजीर्णजन्य हृदय रोग और
वायु का शमन होता है ॥ २४१, १४२ ॥
बिडलवणस्य प्रथमो निर्माणप्रकारः
वस्वृत्तिसेरकमितं लवणं रोमकाभिधम् ।
पञ्चाशत्तोलकमितं चूर्णमामलकोद्भवम् ॥ १३ ॥
समादाय भिषग्वर्य्यस्ततः सम्मेलयेद् भृशम् ।
ततः खल्वस्य चूर्णस्य चतुर्थांशं विधानवित् ॥ १४४ ॥