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सर्वकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

पृष्ठ 365, कुल 799 में से

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पृष्ठ 365

चतुर्दशस्तरङ्गः ३३६
सामान्यतः द्विगुञ्जतः समारभ्य माषकं यावन्मात्रा ॥ ६४ ॥
भा.टी.—साधारणतः अन्तःप्रयोग में क्षारों को दो रत्ती प्रमाण से लेकर
आठ रत्ती तक की मात्रा में प्रयोग किया जाता है ॥ ६४ ॥
अथ अपामार्गक्षारस्य नामानि
अपामार्गक्षार उक्तो मयूरक्षारकस्तथा ।
खरमञ्जरिकाक्षारः किणि क्षारश्च कीर्तितः ॥ ६५ ॥
अपामार्गक्षार, मयूरक्षार, खरमञ्जरिकाक्षार और किणि क्षार ये नाम अपा-
मार्ग क्षार के हैं ॥ ६५ ॥
वक्तव्य—अपामार्गक्षार बनाने में अपामार्ग के पञ्चाङ्ग को लेकर सुखा
लेना चाहिये । इसको लेने के लिये आश्विन या कार्तिक मास अच्छे रहते हैं ।
इन दिनों अपामार्ग में पत्र-पुष्पादि सब अङ्ग उपस्थित होते हैं ।
अस्य गुणाः
खरमञ्जरिकाक्षारस्तीक्ष्णः श्वासनिवर्हणः ।
गुल्मशूलादिरोगघ्नः कामं बाधिर्यनाशनः ॥ ६६ ॥
भा.टी.—अपामार्ग का क्षार तीक्ष्णगुण होता है। यह विशेषतः श्वास रोग
को दूर करता है, इसके अतिरिक्त गुल्म शूल आदि रोगों को नष्ट करता है ।
कान के बहरेपन को दूर करने के लिए इसको अनेक तैल आदि के रूप में
प्रयोग किया जाता है ॥ ६६ ॥
अपामार्गक्षारस्य आमयिकः प्रयोगः
मयूरक्षारकः कामं मधुना परिशीलितः ।
विनाशयेच्चिरोद्भूतं श्वासं परमदारुणम् ॥ ६७ ॥
खरमञ्जरिकाक्षारचूर्णेन परिसाधितम् ।
तैलं कर्णे निषेकेण बाधिर्यं त्वाशु नाशयेत् ॥ ६८ ॥
सत्र्यूषणः किणि क्षारो यवानीचूर्णसंयुतः ।
निहन्ति शूलं त्वचिरादाध्मानञ्चातिदारुणम् ॥ ६९ ॥
खरमञ्जरिकाक्षारः सतालः परिलेपनात् ।
लिङ्गार्शसं निहन्त्याशु चिरोद्भूतं सुदारुणम् ॥ ७० ॥
अपामार्गक्षारचूर्णं सशिलं परिलेपितम् ।
गोमूत्रेणाचिरेणैव श्वित्रकुष्ठं विनाशयेत् ॥ ७१ ॥