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सर्वकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

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३३६ | रसतरङ्गिणी
परिश्रुतञ्च सलिलं पञ्चविंशतिभागिकम् ।
सजलः सोरकद्रावो जायते खलु शोभनः ॥ ५२ ॥
भा.टी.—एक साफ कांच के पात्र में छः भाग सोरकद्राव डाल कर
उसके ऊपर धीरे-धीरे पच्चीस भाग शुद्ध परिश्रुत जल डालकर मिला लें । इस
प्रकार उत्तम सजल (हल्का) सोरकद्राव तय्यार हो जाता है ॥५१-५२॥
सजलसोरकद्रावस्य गुणाः
सोरकद्रावकः प्रोक्तो वह्निवीर्यः प्रदाहकः ।
विभिन्नदुष्टविक्ल्निन्नव्रणशोधनरोपणः ॥ ५३ ॥
फिरङ्गस्यादिमे घोरे व्रणे च परिशस्यते ।
सर्पकुक्कुरकादीनां विषदोषनिबर्हणः ॥ ५४ ॥
सोरकद्रावकगुणाः—वह्निवीर्यः दाहकत्वेन वह्निसमानः । फिरङ्गस्यादिमं व्रणं
तृणाग्रेण परिस्पृष्टः हन्ति । विषदोषनिबर्हणः दाहकत्वाद् दंशस्थानस्य ॥५३-५४॥
भा.टी.—सोरकद्राव किसी स्थान ( शरीर प्रदेश ) में लगने पर अग्नि के
समान प्रदाहक (जलानेवाला) है। अनेक प्रकार के खराब और बिगड़े हुए व्रणों
को शुद्धकरने और भरने के काम में आता है । फिरंग के प्राथमिक भयंकर व्रण
(पेट या मूत्रेन्द्रिय में बटन के समान कठोर व्रण ) को जलाने के लिये बहुत
उत्तम द्रव्य है । इसी तरह के सर्पदंश, पागल कुत्ते के काटने पर उनके विषको
जलाने या मारने के लिये यह सर्वोत्तम द्रव्य माना जाता है ॥ ५३-५४ ॥
सजलसोरकद्रावस्य गुणाः
सोरकद्रावको बल्यो यकृद्दोषनिबर्हणः ।
वह्निमान्द्यहरः कामं मूत्रदोषनिषूदनः ॥ ५५ ॥
मधुमेहे प्लीहवृद्धौ चोपदांशिकविकृतौ ।
कामलायां पाण्डुरोगे विशेषेण प्रशस्यते ॥ ५६ ॥
विनाशयेच्चिरोद्भूतं कासं सातिकफोद्गमम् ।
अतीसारहरश्चैव पित्तघ्नश्च प्रकीर्तितः ॥ ५७ ॥
सजलसोरकद्रावः पानेन यकृद्दोषादीन् हन्ति । सातिकफोद्गमं अत्यन्तकफ-
निर्गमयुक्तम् ॥ ५५-५७ ॥
भा.टी.—जलयुक्त (हल्का ) सोरकद्राव बलवर्धक और यकृत्दोष को दूर
करनेवाला और अग्निमान्द्यहर है। इसके प्रयोग से मूत्र में होने वाली अनेक