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सर्वकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

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पृष्ठ 359

चतुर्दशस्तरङ्गः ३३३
दूसरी और तीसरी बार इलायची के जल की भावना देकर सुखा के रख लें ।
इस प्रकार सोरा शुद्ध हो जाता है ॥ ३५ ॥
वक्तव्य—अन्तः प्रयोग के लिये सोरक का उक्त प्रकार से शोधन करने से
इसकी मूत्रल ( मूत्र लानेवाली ) शक्ति बढ़ जाती है । बाह्य प्रयोग के लिये
शोधन की आवश्यकता नहीं रहती है ।
शुद्धसोरकस्य गुणाः
सोरकः कटुकस्तीक्ष्णो विदग्धाजीर्णनाशनः ।
अश्मरीमूत्रकृच्छ्राग्निमान्द्यपाण्डुप्रमेहनुत् ॥ ३६ ॥
विदग्धाजीर्णे “विदग्धे भ्रमतृण्मूर्च्छाः पित्ताच्च विविधा रुजः । उद्गारश्च
सधूमाम्लः स्वेदो दाहश्च जायते ॥” इत्युक्तम् ॥ ३६ ॥
भा.टी.—शुद्ध सोरा स्वाद या रस में कटु (चरपरा), तीक्ष्ण ( मिर्च, पीपल
आदि की भाँति जीभ में लगनेवाला ) होता है । यह पित्तप्रकोप से उत्पन्न
विदग्धाजीर्ण को नष्ट करता है । इसके अतिरिक्त अश्मरी, मूत्रकृच्छ्र, अग्नि-
मान्द्य, पाण्डु, प्रमेह रोगों को भी नष्ट करता है ॥ ३६ ॥
वक्तव्य—बहिःप्रयोग में सोरा त्वचाके भीतर प्रवेश कर जाता है और
स्थानीय रक्तसंचार को रोक देता है । जिससे सब स्थान पर ठण्ढक पहुँचती है ।
अन्तःप्रयोग में यह आंतों और यकृत् की गति को तीव्र कर देता है जिससे यह
रेचक होता है । वृक्कों की क्रिया को भी उत्तेजित करने से यह मूत्र की मात्रा
को बढ़ा देता है, अतः मूत्रल कहा जाता है । मूत्रल होने के कारण ही इसका
प्रयोग मूत्ररोध या मूत्रकृच्छ्र में बहुधा किया जाता है ।
सोरकस्य मात्रा
द्विगुञ्जतः समारभ्य दशगुञ्जोन्मितं परम् ।
सोरकं विनियुञ्जीत बलकालाद्यपेक्षया ॥ ३७ ॥
मात्राप्रमाणं दशगुञ्जापर्य्यन्तम् ॥ ३७ ॥
भा.टी.—रोगी और रोग का बल-काल आदि का निर्णय करके दो रत्ती
से लेकर दस रत्ती तक सोरक की मात्रा अन्तःप्रयोग में दी जाती है ॥ ३७ ॥
सोरकस्य आमयिकः प्रयोगः
गोक्षुरस्य कषायेण शोधितः सोरकोऽशितः ।
मूत्रकृच्छ्रं निहन्त्याशु त्वश्मरीं दारुणामपि ॥ ३८ ॥
स्फटिकारिकयोपेतः सोरकः परिशीलितः ।
आध्मानं मूत्रकृच्छ्रं च नाशयेदाशु निर्भरम् ॥ ३९ ॥