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सर्वकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

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पृष्ठ 341

त्रयोदशस्तरङ्गः ३१५
सर्जिका मधुना लीढा वासासत्त्वसमन्विता ।
वातिकं श्लैष्मिकञ्चापि कासं श्वासञ्च नाशयेत् ॥५२॥
सर्जिक्षारश्चतुर्गुञ्जः शीलितः शीतवारिणा ।
अम्लपित्तं निहन्त्याशु त्वम्लोद्गारांश्च निर्भरम् ॥५३॥
यवानिकात्र्यूषणचूर्णयुक्ता सुवर्चिका वै त्रिदिनोपयुक्ता ।
आध्मानयुक्तान् गुदमार्गजातान् कृमीन्निहन्यात्कृमिजांश्च रोगान् ॥५४॥
केतकीक्षारसंयुक्ता सकुष्ठा खलु सर्जिका ।
तैलेन पीता त्वचिराद् वातगुल्मं विनाशयेत् ॥५५॥
सर्जिक्षारो गुडोपेतः शीलितस्तूष्णवारिणा ।
नाशयेदचिरादेव गुल्मपीडां नवोत्थिताम् ॥५६॥
बीजपूरद्रवोपेत स्वर्जिका स्वल्पमात्रया ।
कर्णाक्षिप्ता हन्ति कर्णस्रावं दाहं रुजादिकम् ॥५७॥
भा.टी.—पिप्पली और जीरा इनके चूर्ण में मिलाकर तीन रत्ती मात्रा में
सज्जीखार सेवन करने से दीपन और पाचन दोनों ही क्रियाएँ बढ़ने लगती हैं।
सज्जी को वासारसक्रिया और मधु के साथ सेवन करने से वातिक, श्लैष्मिक,
श्वास और कास में आराम आता है। अम्लपित्त तथा खट्टी डकारों के अधिक
आने पर सज्जीखार को चार रत्ती मात्रा में शीतल जल में घोलकर पिलाने से
तुरन्त ही छाती की जलन आदि पित्त की वृद्धि शान्त हो जाती है। अजवाइन,
त्रिकटुचूर्ण के साथ सज्जी मिलाकर तीन दिन तक सेवन करने से पेट में
आध्मानयुक्त गुदा के कृमिजन्य रोगों में आराम आता है। वातगुल्म में इसको
केतकी (केवड़ा) क्षार और कुष्ठचूर्ण में मिला तिलतैल के साथ सेवन करने
से वातगुल्म शान्त होता है। सज्जीखार को गुड़ मिलाकर गरम जल से सेवन
करने पर नवीन उत्पन्न हुए गुल्म की पीड़ा में शीघ्र ही आराम आता है।
सज्जीखार को बिजौरानींबू के रस में घोलकर इसे कान में डालने से कर्णस्राव,
दाह तथा पीड़ा आदि शान्त होते हैं ॥ ५१–५७ ॥
अथ निम्बूकाम्लीयसर्जिकाया निर्माणप्रकारः
विश्वब्धिभागप्रमितां सर्जिकान्तु समाहरेत् ।
द्विगुणे शीतसलिले द्रावयेद्भिषजां वरः ॥ ५८ ॥
खनेत्रभागप्रमितं निम्बूकाम्लं समाहरेत् ।
तुल्ये तोये चान्यपात्रे तथैव द्रावयेद्भिषक् ॥ ५६ ॥