रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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स्वर्णबीजं कणा शुण्ठी पृथङ् माषद्वयोन्मितम् ।
आदाय खल्वे संमर्द्य त्रिदिनं निम्बुकाम्बुना ॥१६४॥
निर्मापयेन्निजान्वक्षं वटिका रक्तिकोन्मिताः ।
एकैकां वटिकां दद्याद् द्विवारं दिवसे भिषक् ॥१६५॥
नामतस्तु समाख्यातो रसः शङ्खविषोदयः ।
भूतज्वरहरः कामं सन्निपातकुलान्तकः ॥१६६॥
अथ शङ्खविषोदयः—स्वर्णबीजं धत्तूरबीजम्, निजान्वक्षं स्वप्रत्यक्षम्, वटि-
कानिर्माणं परिचारकसावधानतार्ज्ञार्थम् । भूतज्वरो विषमज्वरः ॥ १६६ ॥
भा.टी.—शुद्ध सोमल एक रत्ती, कालीमिर्चचूर्ण तीन मासा, रससिन्दूर
तीन मासा, शुद्ध धतूराबीज, पिप्पलीचूर्ण प्रत्येक दो-दो मासा लेकर सब को
खरल में एकत्र करके निम्बू के स्वरस में तीन दिन तक अच्छी तरह मर्दन करके
एक-एक रत्ती की गोलियाँ बना लें । इनमें से एक गोली सुबह और एक गोली
शाम को सेवन करायें । इसको शंखविषोदय-रस कहते हैं । यह रस विषमज्वर
तथा सन्निपातज्वर को नष्ट करता है ॥ १६३-१६६ ॥
अथ चण्डेश्वरो रसः
गुञ्जोन्मितं शङ्खविषं यत्नतो विमलीकृतम्
अमृतं सुमृतं ताम्रं पृथङ् माषद्वयोन्मितम् ॥१६७॥
श्लक्ष्णपिष्टा कज्जलिका कलामाषकसंमिता ।
भावयेत्सप्तवारं तु शृङ्गवेरोत्थवारिणा ॥१६८॥
निर्गुण्डीस्वरसेनाथ तथैव खलु भावयेत् ।
निर्मापयेन्निजान्वक्षं वटिका रक्तिकोन्मिता ॥१६९॥
रसज्ञैः कीर्तितोऽयं तु नाम्ना चण्डेश्वरो रसः ।
विशेषतः समाख्यातो विविधज्वरनाशनः ॥१७०॥
अथ चण्डेश्वरः—अमृतं वत्सनाभः । कजली १६ माषप्रमिता ॥१६७-१७०॥
भा.टी.—अच्छी तरह शुद्ध किया हुआ संखिया एक रत्ती, शुद्धवत्सना-
भविष और शुद्धताम्रभस्म दो-दो मासे, पारदगन्धक की समभाग कजली सोलह
मासे लेकर इनको एकत्र खरल में अदरखरस की सात भावना और निर्गुण्डी
( सम्भालु ) स्वरस की सात भावना देकर एक-एक रत्ती की गोली बना लें ।
यह योग चण्डेश्वररस नाम से कहा जाता है । यह रस अनेक प्रकार के ज्वरों
को नष्ट करता है ॥ १६७-१७० ॥