रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७ एकादशस्तरङ्गः २५७
विचर्चिकादद्रुकुष्ठपामाविस्फोटनाशनः ।
नाडीव्रणहरश्चैव समाख्यातो विशेषतः ॥८२॥
भा.टी.—सिक्यतैल तीस तोला, पेठे के रस में शुद्ध किया हुआ हरताल
दो तोला, पारद गन्धक की कज्जली, हरड़चूर्ण, कत्था, गेरू, सिन्दूर, एक-एक
तोला, शुद्ध मैनसिल आधा तोला लेकर सब को यथाविधि खरल में मिलाकर
काँच की शीशी में रख लें । इसको तालकमलहर कहते हैं । यह मरहम अनेक
प्रकार की खराबियों से उत्पन्न व्रणों को नष्ट करता है । विचर्चिका, दाद, कुष्ठ
पामा तथा विस्फोट नाशक है । नाड़ीव्रण के लिये विशेष रूप से लाभदायक
है ॥ ७८-८२ ॥
प्रथमं रसमाणिक्यम्
द्विकर्षं पत्रतालन्तु कूष्माण्डसाललेन वै ;
विभावयेत्सप्तवारं त्रिवारं वा विधानतः ॥ ८३ ॥
ततो दध्नाऽथवाम्लेन तथैव तु विभावयेत् ।
प्रक्षालयेत्तत्तस्तोयैः प्रतप्तैस्तु भिषग्वरः ॥ ८४ ॥
मध्येऽभ्रपत्रयोर्न्यस्य शरावे विन्यसेद्भिषक् ।
शरावेणापरेणोह च्छादयेद्यत्नतः पुनः ॥ ८५ ॥
बदरीपत्रकल्केन विदध्यात्सन्धिलेपनम् ।
आतपे चाथ संशोष्य बालुकायन्त्रगं पचेत् ॥ ८६ ॥
मध्यमेनाग्निना यत्नात् होरात्रितयसंमितम् ।
स्वांगशीतं समुद्धृत्य माणिक्याभं हरिद्रसम् ॥ ८७ ॥
मात्रा रक्तिद्वयमिता रसो माणिक्यसंज्ञितः ।
वातरक्तं हरेद् घोर फिरङ्गञ्चातिदारुणम् ॥ ८८ ॥
विविधानि च कुष्ठानि तथा नाडीव्रणं हरेत् ॥
नासास्यप्रभवान् रोगान् नाशयेन्नात्र संशयः ॥ ८९ ॥
रसमाणिक्यस्याद्यः प्रकारः—प्रतप्ततोयैः क्षालनं नैर्मल्यार्थम् । क्षालनानन्तरं
घर्मे शोषयित्वाभ्रपत्रयोः संस्थाप्यम् ॥ ८३-८६ ॥
भा.टी.—चार तोला बर्की हरताल को पेठे के स्वरस में सात बार या तीन
बार भावना देवें । इसके अनन्तर सात बार या तीन बार खट्टे दही की तीन
भावना देवें । भावना देने के बाद इसको गरम पानी से अच्छी तरह धोकर
साफ कर लें । अब इनको सुखा कर दो अभ्रक के चौड़े पात्रों के बीच में रख-