रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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हरतालभस्म को निकाल खरल में पीसकर कांच की शीशी में भर लें । इस
प्रकार बनायी हुई हरताल की भस्म विषम ज्वर को नष्ट करती है । विषम ज्वर
को रोकने के लिये इसको एक चावल भर मात्रा में दिन में एक ही बार देना
चाहिये । इसको मेरे गुरुप्रवर नरेन्द्रनाथ जी ने आविष्कार एवं अनुभव किया
था । मैं इसे प्रकाशित कर रहा हूँ ॥ ४५-५१ ॥
वक्तव्य—समुद्रफेन के चूर्ण में रखकर भस्म बनाने में हरताल की भस्म
पृथक् नहीं बनती है, किन्तु समुद्रफेन चूर्ण के साथ पिंडाकार में मिली हुई होती
है । परन्तु इसे जलते हुए कोयलों पर रखने पर धुंयाँ नहीं उठता है ।
मृततालकस्य गुणाः
मृतं तालं हरेद् घोरं फिरङ्गं सुचिरोत्थितम् ।
वातरक्तं विसर्पञ्च विपादीञ्च विचर्चिकाम् ॥ ५२ ॥
विविधानि च कुष्ठानि ह्यर्शांसि विषमज्वरम् ।
रोगं फिरङ्गजं हन्यादपस्मारं भगन्दरम् ॥ ५३ ॥
व्रणं नाडीव्रणञ्चापि विस्फोटमतिदारुणम् ।
वातरक्तभवान् रोगानन्यानपि हरेद् भृशम् ॥ ५४ ॥
फिरङ्गं उपदंशविशेषम् । तस्योपद्रवांश्च ॥ ५२-५४ ॥
भा.टी.—हरताल की भस्म भयंकर और पुराने फिरङ्ग रोग को नष्ट करती
है । इसके अतिरिक्त यह भस्म वातरक्त, वीसर्प, विपादिका, विचर्चिका तथा अनेक
प्रकार के कुष्ठ रोग और विषमज्वर को नष्ट करती है । फिरंगजन्य रोग, अपस्मार
और भगन्दर रोग को नष्ट करती है । इसी तरह पुराने व्रण, नाड़ीव्रण, भयंकर
विस्फोट और वातरक्त प्रकोपजन्य अन्यान्य विकारों को भी दूर करती है॥५२-५४॥
शुद्धतालकस्य गुणाः
विमलं तालकं स्निग्धं भूतज्वरविनाशनम् ।
त्वच्यं कुष्ठादिशमनं कथितं च रसायनम् ॥५५॥
भूतज्वरो जीवाणुसम्पर्कजो विषमज्वरः । त्वच्यं त्वग्रोगनाशनमित्यर्थः ।
रसायनं जराव्याधिहरम् ॥ ५५ ॥
भा.टी.—शुद्धहरताल स्निग्ध होती है, कृमिजन्य संक्रामक-ज्वरों को नष्ट
करती है । इसे त्वचा की सब विकृतियाँ दूर होकर वह शुद्ध निर्मल हो जाती
है । शुद्ध हरताल कुष्ठ आदि रोगों को शान्त करती है और रसायन है ॥५५॥
वक्तव्य—इसके अतिरिक्त हरताल को दो विधियों से सेवन करने का