रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकादशस्तरङ्गः २४७
अब इस पोटली को दोलायंत्र में नींबू का रस डालकर उसमें निरन्तर एक पहर
तक पकावें । इसी तरह घरके धुएँ के जल में भी एक पहर तक दोलायन्त्र में
पकावें । इसी विधि से शुद्ध किया हुआ हरताल निःशंक होकर रसयोगों में
प्रयोग किया जा सकता है ॥ १६-१८ ॥
द्वितीयः शोधनप्रकारः
तालकं चूर्णयित्वा तु पोट्टल्यां विनिधाय च ।
दोलायन्त्रे पचेद्यामं कूष्माण्डसलिले भिषक् ॥ १९ ॥
यामैकं चूर्णतोयेन त्रैफलेन जलेन वा ।
इत्थं यामद्वयेनैव शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् ॥ २० ॥
यामद्वयं कूष्माण्डसलिलादिषु स्वेदनाद् द्वितीयः प्रकारः । केचित्तु टङ्कण-
कणान् तालके मेलयित्वा दोलायन्त्रे शांभयन्ति कूष्माण्डसलिलादिभिः ॥ १६-२०॥
भा.टीं.—हरताल का मोटा चूर्ण करके पोटली में बाँधकर इसे दोलायन्त्र
में पेठे का स्वरस डाल उसमें एक पहर तक पकावें । इसके अनन्तर चूने के
जल में अथवा त्रिफलाक्वाथ में भी दो पहर पकाकर शुद्ध कर लें ॥ १६-२० ॥
तृतीयः शोधनप्रकारः
तालचूर्णंन्तु पोट्टल्यां न्यस्य दोलागतं पचेत् ।
तिलक्षारजलेनैव याममात्रं भिषग्वरः ॥ २१ ॥
यामैकं स्वेदनादेवं तालं शुद्धिमवाप्नुयात् ।
इत्थं विशोधितं तालं वीतशङ्कः प्रयोजयेत् ॥ २२ ॥
तालचूर्णं तिलक्षारजलेन स्वेदितं याममात्राच्छुध्यतीति तृतीयः सरलः प्रकारः
भा.टी.—हरतालचूर्ण को पोटली में बाँधकर तिलक्षारजल में दोलायन्त्र।
विधान द्वारा पकावें । इस प्रकार तिलक्षारजल में एक पहर स्वेदन करने से
हरताल शुद्ध हो जाता है, इसे निःशंक होकर प्रयोग कर सकते हैं ॥ २१-२२॥
चतुर्थः शोधनप्रकारः
पोट्टल्यां निहितं तालचूर्णं दोलागतं पचेत् ।
शाल्मलीमूलतोयेन याममेकं भिषग्वरः ॥ २३ ॥
यामैकं स्वेदनादेव तालकं शुद्धिमाप्नुयात् ।
अथवा तद्द्रवेणैव दिनसप्तकभावनात् ॥ २४ ॥
शाल्मलीमूलक्वाथेनैवमेव चतुर्थः ॥ २३-२४ ॥
भा.टी.--हरतालचूर्णं को पोटली में बाँधकर सेमल की जड़ के स्वरस में