रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदशमस्तरङ्गः २२७
को सुखाकर अभ्रक को भस्म करने के लिये पुट में पकावें ॥ २६-२८ ॥
अभ्रकमारणे पुटसंख्यानियमः
विंशत्यादिः शतान्तस्तु पुटो रोगनिवृत्तये ।
शतादिस्तु सहस्रान्तः प्रशस्तश्च रसायने ॥ २६ ॥
पुटसंख्यानियमः गुणव्यवस्थाहेतुः। विंशत्यादिरिति-एतेन दशपुटैकपुटितादि-
मारणप्रकाराणां जघन्यता सूचिता । तस्मादुपेक्षितप्रायोऽयं मार्ग आचाय्यैः ॥ ६ ॥
भा.टी. - साधारण रोगों के नष्ट करने के लिये अभ्रकभस्म बनानी हो तो
उसे बीस से लेकर सौ तक पुट देने चाहिये । किन्तु रसायन के रूप में सेवन
करने के लिये इसे सौ से लेकर हजार तक पुट देने चाहिये ॥ २६ ॥
अभ्रकस्य प्रथमो मारणप्रकारः
धान्याभ्रकं समादाय कासमर्दभवैर्द्रवैः ।
दिनैकं पेषयित्वाथ चक्रिकाकारतां नयेत् ॥ ३० ॥
ततो गजपुटं दद्यात् दशवारं विधानतः ।
रविक्षीरैस्ततो दद्यात्तद्वदेव पुटानि तु ॥ ३१ ॥
एवं तु विंशतिपुटैरेवाभ्रस्य मृतर्भवेत् ।
सिन्दूरसदृशं भस्म जायते नात्र संशयः ॥३२॥
तत्रायं तावत् प्रथमो गगनमारणप्रकारः - कासमर्दरसैर्दश पुटानि अर्क-
दुग्धैश्च ततो दशेति विंशतिपुटानि । स्पष्टमन्यत् ॥ ३०-३२ ॥
भा.टी. - धान्याभ्रक को कसौंजी के स्वरस या क्वाथ में एक दिन तक
मर्दन कर उसकी टिकिया बना सुखा करके सम्पुट में बन्द करें और गजपुट में
फूँक दें । इस प्रकार दस पुट कसौंजी के स्वरस से दें । इसके अनन्तर उसी
विधि से आक के दूध में भी दशपुट दें तो बीस पुटों में अभ्रक की रससिन्दूर
के सदृश लाल भस्म बन जाती है ॥३०-३२ ॥
द्वितीयो मारणप्रकारः
धान्याभ्रकं समादाय नागिनीदलजैर्द्रवैः ।
तद्वद्भासारसेनापि मीनाक्ष्याः स्वरसेन च ॥ ३३ ॥
न्यग्रोधपयसा चापि तद्वदेव पुटेद्भिषक् ।
एवं विंशतिवारेण गगनं पञ्चतां व्रजेत् ॥ ३४ ॥
अपरः प्रकारः-नागिनीदलादीनां चतुर्णां द्रव्याणां रसैः प्रत्येकं पञ्चपुटानि,
एवं विंशतिपुटानि । नागिनीदलं ताम्बूलपत्रम् ॥ ३३, ३४ ॥