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सर्वकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

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पृष्ठ 243

नवमस्तरङ्गः २०३
शुद्धहिंगुलस्य प्रयोगाः
बलिजातीफलाऽफूककणाविश्वसमन्वितम् ।
दरदं विनिहन्त्याशु वातं शुक्रसमाश्रितम् ॥२०॥
पिप्पलीविषसंयुक्तं दरदं परिशीलितम् ।
मध्वार्द्रकरसेनेह हन्ति वातज्वरं द्रुतम् ॥२१॥
भयोत्थितं ज्वरं वापि पित्तश्लेष्मोद्भवं ज्वरम् ।
नवज्वरायमाणं च त्वामवातोद्भवं ज्वरम् ॥२२॥
जातीफलाऽफूकमुस्तचन्द्रैन्द्रयवसंयुक्तम् ।
दरदं शीलितं हन्ति ह्यामातीसारमुल्बणम् ॥२३॥
जातीफललवङ्गेन्द्रयवटङ्गेन्दुसंयुक्तम् ।
दरदं विनिहन्त्याश रुजमामातिसारजाम् ॥२४॥
अथास्य रोगयोग्याः प्रयोगाः—बलिः गन्धः, आफूकम् अहिफेनम्, कणा
पिप्पली, विश्वं शुण्ठी, चन्द्रः कर्पूरम् । आमातिसारे पाचनौषधैः आमं सम्पाच्य
पश्चात् जातीफलाफूकादियोगस्य प्रयोगः कार्यः ॥२०–२४॥
भा.टी.—शुद्ध गन्धक, जायफल, शुद्ध अफीम, पिप्पलीचूर्ण और शुण्ठीचूर्ण
के साथ शुद्ध हिंगुल मिलाकर प्रयोग करने से शुक्रगत वातप्रकोप शान्त होता
है । वातज्वर में हिंगुल को पिप्पलीचूर्ण और शुद्ध वत्सनाभचूर्ण के साथ मिला
मधु और अदरखरस के साथ सेवन करना चाहिये । इसी प्रकार से इसको भय-
जन्यज्वर, पित्तश्लेष्मज्वर, आमवातिकज्वर में तथा तरुण नवीन ज्वर में भी
प्रयोग किया जाता है । भयंकर अतीसार में इसको जायफल, अफीम, इन्द्रजौ,
मोथा और कर्पूर मिलाकर प्रयोग किया जाता है । आम-अतीसार में हिंगुल
को जायफल, लौंग, इन्द्रजौ, सुहागाग्नील और कर्पूर के साथ मिलाकर प्रयोग
करना चाहिये ॥ २०–२४ ॥
हिङ्गुलाद्यमलहरः
सिक्थतैलं सुविमलं भानुत्तोलकसंमितम् ।
सिन्दूरं दरदञ्चैव तोलकार्द्धमितं क्षिपेत् ॥२५॥
विमद्ये मसृणे खल्वे काचकुप्यां तु विन्यसेत् ।
हिङ्गुलाद्यो मलहरः फिरङ्गव्रणरोपणः ॥२६।
भा.टी —स्वच्छ सिक्थतैल बारह तोला, सिन्दूर और हिंगुल आधा-आधातोला
लेकर सबको खरल में अच्छी तरह मिलाकर कांच की शीशी में रख लें । इसको
हिंगुलमलहर कहते हैं । यह फिरंग-व्रणों को भरने के काम आता है॥२५–२६॥