सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

पृष्ठ 231, कुल 799 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 231

अष्टमस्तरङ्गः १६१
नवमो गन्धककल्पः
रुबूकतैलसंयुक्तः सकौशिको वरान्वितः ।
विशुद्धपारदान्वितः सुगन्धिको निषेवितः ॥ ८६ ॥
निहन्ति मासमात्रतो भृशं कफोत्थितान् गदान् ।
समीरजांश्च पैत्तिकान् चिरोत्थितानपि द्रुतम् ॥ ९० ॥
दृशा खगेश्वरोपमो बलेन भीमसंनिभः ।
रविप्रभस्तु तेजसा भवेत् स वज्रविग्रहः ॥ ९१ ॥
रुबूकतैलमेरण्डतैलम् । खगेश्वरो गरुडः । वज्रविग्रह इति कठिनदेहः
॥ ८६–६१ ॥
भा.टी.—शुद्धगन्धक में समभाग शुद्धपारद, शुद्धगूगल, त्रिफलाचूर्ण
मिलाकर इसको एरण्डतैल में अच्छी तरह मर्दन करके गोली अवलेह-सा
बना लें, अब इसको उचित मात्रा में एक मास तक सेवन कराने से पुराने से
पुराने कफजन्य, वातप्रकोपजन्य तथा पित्तप्रकोपजन्य रोग शीघ्र ही नष्ट हो जाते
हैं । इस योग के सेवन से मनुष्य दृष्टि में गरुड़ के समान, बल में भीम के
समान, तेज में सूर्य के समान और दृढ़ देहवाला हो जाता है ॥ ८६–६१ ॥
वक्तव्य—पहिले पारद गन्धक की कजली बनाकर उसमें गूगल आदि
द्रव्य मिला लें, फिर मर्दन करने के लिये त्रिफलाक्वाथ ( गरम ) डालकर
मर्दन करें जब गूगल के चिपकने से मर्दन करना कठिन हो जाय तो उसमें
एरण्डतैल डालकर कूटना चाहिये ।
दशमो गन्धककल्पः
फलत्रिकं भृङ्गराजो विमलश्च सुगन्धिकः ।
त्रयमेतत्समं ग्राह्यं श्लक्ष्णचूर्णं प्रकल्पयेत् ॥ ९२ ॥
दिव्यदृष्टिर्वज्रकायो मासेनेकेन जायते ।
षण्मासमात्रयोगाच्च वलीपलितनाशनः ॥ ९३ ॥
भा. टी.—त्रिफलाचूर्ण, भृंगराजचूर्ण और शुद्ध गन्धक; इन तीनों को
समभाग लेकर एकत्र अच्छी तरह बारीक चूर्ण कर लें । इस चूर्ण को दो मासे
मात्रा में एक मास तक प्रतिदिन प्रयोग करने से शरीर की वलि ( झुर्री ) तथा
पलित ( बालों की सफेदी ) दूर हो जाता है ॥ ९२, ९३ ॥
अथ गन्धकतैलम्
आवर्तमाने पयसि क्षिपेद्वै विशुद्धसौगन्धिकजं हि चूर्णम् ।
तदुद्भवक्षीरसमुत्थमाज्यं गन्धस्य तैलं वितरेत्प्रतप्तम् ॥ ९४ ॥