सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

पृष्ठ 222, कुल 799 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 222

१८२ रसततरङ्गिणी
वाले विकारों तथा अशुद्ध नाग ( सीसा ) सेवन से होनेवाले शिरोदाह, आन्त्र
शूल आदि विकारों को शीघ्र नष्ट कर देता है ॥ ३६-३८ ॥
वक्तव्य—इसके अतिरिक्त शुद्ध गन्धक प्रयोग से प्रातःकाल विस्तरे से
उठते ही न सहन करने योग्य शौच के वेग अथवा रात्रि के पिछले पहर होने
वाले अतीसार में आराम आता है । गन्धक, पारद तथा सीसकविष का प्रतिविष
है । जहाँ पर पारद-विष या नाग-विष का सन्देह हो वहाँ पहिले गन्धक प्रयोग
कर फिर अन्य चिकित्सा करनी चाहिये ।
अथ शुद्धगन्धकस्य मात्रा
रक्तिकातः समारभ्य रक्तिकाष्टकसंमितम् ।
प्राणाचार्य्यः प्रयुञ्जीत गन्धकं तु विशोधितम् ॥३६॥
अथास्य मात्रा गुञ्जातो माषकं यावत् । मात्राधिक्येन सेवितन्तु पित्तकोपादि-
करमिति ध्येयम् ॥ ३६ ॥
भा.टी.—शुद्धगन्धक की मात्रा एक रत्ती से लेकर आठ रत्ती तक प्रयुक्त
की जा सकती है ॥ ३६.॥
अथ शुद्धगन्धकस्य आमयिकः प्रयोगः
विशोधितः सुगन्धिको निहन्ति बाह्यलेपतः ।
प्रकाममामवातकं चिरोत्थिताञ्च गृध्रसीम् ॥४०॥
सुगन्धिकः सुनिर्मलो वराकषायसंयुतः ।
हरेदिहोर्ध्वगान् गदान् तथाग्निमान्द्यनाशनः ॥४१॥
सिंहपर्णीकषायेण क्षयं हन्ति नवोत्थितम् ।
क्वाथेन कण्टकार्याश्च कासं श्वासं व्यपोहति ॥४२॥
रम्भापक्वफलेनेह चर्मदोषं विनाशयेत् ।
वह्निचूर्णेन सहितो निहन्ति बलहीनताम् ॥४३॥
विशोधितं गन्धकं तु तिलचूर्णेन शीलितम् ।
गुदामयोत्थं पायुस्थं विदरं नाशयत्यलम् ॥४४॥
यष्टी खण्डः स्वर्णपत्री मिश्रया च समं समम् ।
चूर्णानानेन वा युक्तः पायुस्थविदरान्तकः ॥४५॥
सकौशिकः सुगन्धिकः फलत्रिकेण संयुतः ।
द्विमासमात्रसेवितः कफोत्थरोगनाशनः ॥४६॥