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सर्वकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

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पृष्ठ 187

षष्ठस्तरङ्गः १४७
त्रिफलाक्वाथ के साथ प्रयोग करना चाहिये । मूर्च्छा रोग में रससिन्दूर को एक
रत्ती मात्रा में लेकर दो रत्ती पिप्पलीचूर्ण मिला शहद के साथ सेवन करावें
और रोगी को शीत जल के टब में सर्वांग स्नान करावें । वमन अधिक होने
पर इसको बड़ी इलायचीक्वाथ से अथवा मधु के साथ देना चाहिये । सर्वांग-
शोथ होने पर रससिन्दूर को पुनर्नवाकषाय के साथ देना चाहिये । भयंकर
विस्फोट रोग में एक रत्ती रससिन्दूर को चार रत्ती चातुर्जातकचूर्ण ( छोटी
इलायचीबीज, दालचीनी, तेजपत्र तथा नागकेशर ) के साथ मिलाकर गिलोय,
नीम, खैर की छाल, इन्द्रजौ के क्वाथ के अनुपान से देना चाहिये । गर्भाशय
रोग में रससिन्दूर में एक माशा काकोलीचूर्ण मिला इसको नारियल
के तेल के साथ सेवन कराना चाहिये । पुराने प्रमेह में इसको वंग-
भस्म मिलाकर शहद के साथ कुछ काल तक सेवन करना चाहिये । भयंकर
वमन को रोकने के लिए रससिन्दूर में त्रिकटुचूर्ण तथा धनिया, जीरा का चूर्ण
मिला शहद के साथ थोड़ा-थोड़ा करके कई बार चटाना चाहिये । अपस्मार
रोग में इसको ब्राह्मी, वच, शंखपुष्पी, कूठ, इलायचीकषाय के साथ दो रत्ती
की मात्रा में सेवन करना चाहिये । भगंदर रोग के लिए इसको आँवला, हरड़
तथा बहेड़ा और वायविडंगक्वाथ के साथ कुछ काल तक निरन्तर सेवन करना
चाहिये । गुल्म में इसका सौंफ और छोटी हरड़ के क्वाथ के साथ अथवा अज-
वाइन चूर्ण या विडलवण के साथ प्रयोग करना चाहिये । वात कफात्मक
पुरातन शिरःशूल रोग में इसको दशमूलकषाय के साथ देना चाहिये । पुरा-
तन व्रणों में इसका कण्टकारी, सुगन्धबाला, गिलोय तथा सोंठ के कषाय के
साथ प्रयोग करना चाहिये । पुरातन आमवात ( गठिया ) में रससिन्दूर को
गुडूची, मोथा, शतावर, पिप्पली, हरड़, वच तथा सोंठ के कषाय के साथ दिन
में दो बार प्रयोग करना चाहिये । कामशक्ति ( वाजीकरण ) को बढ़ाने के
लिए सेमल की कोंपल, मूसलीचूर्ण अथवा सुश्रुतोक्त विदार्यादिगण के औष-
धिचूर्ण के साथ दुग्धानुपान से सेवन करना चाहिये । धातुवृद्धि के लिए
इसका अभ्रकभस्म अथवा स्वर्णभस्म दोनों के साथ प्रयोग करना चाहिये ।
स्वप्न-मेह ( स्वप्नदोष Night Discharge ) को दूर करने के लिए इसमें
जायफल, लौंग, कपूर तथा अफीम का चूर्ण मिलाकर जल अथवा शीतल-
चीनी के कषाय अनुपान से सेवन करना चाहिये । चिरकालीन शिरःकम्प
( सिर काँपना ) रोग में रससिन्दूर को बलाकषाय के साथ कुछ दिन सेवन
कराने से लाभ होता है । वमन को रोकने के लिए जीरा, त्रिकटु ( सोंठ,