रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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अथ रसकर्पूरगुटिका—कुंकुमं काश्मीरम् । कुंकुमादिपञ्चद्रव्याणामेको
माषकः प्रत्येकम्, रसकर्पूरस्यैका गुञ्जा । निम्बूनीरेण सम्मर्च्य कृता रक्तिमिता
बटी नवनीतमध्ये निधाय भक्षिता फिरङ्गरोगशमनी । रसकर्पूरगुटिका नामतः ॥
भा.टी.—काश्मीरी केशर, कालीमिर्च, लालचन्दन, लौंग, जावित्री,
इनको पृथक् एक-एक मासे लेकर इसमें एक रत्ती रसकर्पूर मिलाकर सबको
एकत्र निम्बूरस से मर्दन करके एक-एक रत्ती की गोली बना लें । इसको रस-
कर्पूर वटी कहते हैं । इस वटी को नवनीत ( मक्खन ) के साथ सेवन करने
से फिरङ्ग रोग नष्ट हो जाता है ॥ ८४–८६ ॥
बाह्यप्रयोगार्थं भूतघ्नचक्रिका
रसं कर्पूरनामानं गुणपर्वतभागिकम् ।
निम्बूकाम्लञ्च विशदं वसुपावकसंमितम् ॥ ८७ ॥
समाधाय विधानज्ञो मेलयेदतियत्नतः ।
चक्रिकाः कारयेद्वैद्यो गुञ्जाषट्कमिताः पृथक् ॥ ८८ ॥
रसज्ञैस्तु समाख्याता नाम्ना भूतघ्नचक्रिका ।
न जातु विकृतिं याति भूतसंघविषापहा ॥ ८६ ॥
भूतघ्नचक्रिकायां रसकर्पूरस्य त्रिसप्तति ( ७३ ) भागाः । गुणास्त्रयः,
सत्त्वरजस्तमांसीति । पर्वताश्च सप्त 'सप्तैते कुलपर्वताः' इत्युक्तेः । तथा च
“अङ्कानां वामतो गतिः” इति न्यायात् सप्तांकोत्तरं त्रिकाङ्कलाभात् त्रिसप्ततिरिति
(७३) प्राचां परिभाषा । एवमग्रेऽपि ज्ञेयम् । विशदं निर्मलम् । निम्बूकाम्लं
वक्ष्यमाणप्रकारम्, वसुपावकसंमितं अष्टत्रिंशद् ( ३८ ) भागमितम् । उभयं
समादाय अतियत्नेन सावधानतया सम्यङ् मिश्रयित्वा वर्तुलचिपेटाः चक्राकाराः
चक्रिकाः कार्याः । केवलं रसकर्पूर एव जले द्रावितो विश्लिष्टपारदो बहुदिनानि
स्थातुमयोग्यश्च स्यादतो निम्बूकाम्लमेलनमत्र योग्यम् ॥ ८७–८६ ॥
शुद्ध रसकपूर तिहत्तर ७३ भाग निम्बूकाम्ल अड़तीस भाग देकर दोनों
को एकत्र मिलाकर पीस लें और इसकी छः रत्ती की चक्रिका ( टिकिया
Tablets ) बना लें । इन टिकियाओं को क्रिमिघ्नचक्रिका कहा जाता है ।
यह कभी भी खराब नहीं होने पाती है और अनेक प्रकार के कृमि दोषों को
नष्ट करती है ॥ ८७–८६ ॥
वक्तव्य—रसकर्पूर में निम्बूकाम्ल मिला कर रखने का अभिप्राय स्पष्ट है
कि चिरकाल तक रखने पर भी रसकपूर खराब नहीं होता है। यदि केवल