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सर्वकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

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विध व्रणों में होनेवाली भयंकर पीड़ा को शान्त करता है । और अल्प मात्रा
में दिये जाने पर उक्त रोगों को नष्ट करने के साथ-साथ पाचकाग्नि को भी
तीव्र कर देता है । यदि इस रसकर्पूर को इससे सोलहगुणा शीतल जल में
डाला जाय तो यह उसमें अच्छी तरह घुल जाता है ॥ ७२-७५ ॥
रसकर्पूरस्य मात्रानिरूपणम्
आरभ्य रक्तिकायास्तु चतुःषष्ट्यंशतो भिषक् ।
द्वात्रिंशद्भागपर्यन्तं मात्रामस्य प्रयोजयेत् ॥ ७६ ॥
अथास्य मात्रानिरूपणम्-रक्तिकायाः चतुःषष्ट्यंशत (१/६४) आरभ्य द्वात्रिं-
शद्भागपर्यन्तं (१/३२), अस्य मात्रा बलाबलं विज्ञाय दातव्येति ॥ ७६ ॥
भा. टी.—इस रसकर्पूर की मात्रा रत्ती के ६४ चौंसठवें भाग से लेकर
बत्तीसवें भाग तक प्रयोग की जाती है ॥ ७६ ॥
रसकर्पूरस्य आभ्यन्तरप्रयोगार्थं मात्रानिर्माणप्रकारः
चूल्लिकावणं शुद्धं गुञ्जापञ्चकसंमितम् ।
समञ्च रसकर्पूरं षष्टितोलकसंमिते ॥ ७७ ॥
जले विनिक्षिपेत्प्राज्ञो मात्रामस्य प्रकल्पयेत् ।
बिन्दुत्रिंशकतश्चादौ षष्टिबिन्दुमितां पराम् ॥ ७८ ॥
अथास्याभ्यन्तरप्रयोगोपयोगिमात्रानिर्माणप्रकारः—शुद्धं चूल्लिकावणं
नवसादरं ५ गुञ्जामितम्, रसकर्पूरञ्च ५ गुञ्जामितम्, षष्टितोलकमिते जले
विनिक्षिप्य ३० बिन्दुषतः ६२ बिन्दुपर्यन्तं मात्रां जानीयात् ॥ ७७-७८ ॥
भा.टी.--शुद्ध नौसादर पाँच रत्ती, और रसकर्पूर पाँच रत्ती, इन दोनों
को एकत्र पीसकर साठ तोले शीतल जल में घोलकर रख लें । अब इसमें से
तीस बूँद से लेकर साठ बूँद तक की मात्रा में प्रयोग करें ॥ ७७-७८ ॥
अस्य आभ्यन्तरप्रयोगार्थं चूर्णरूपेण मात्रानिर्माणप्रकारः
श्लक्ष्णं दारुसिताचूर्णं पञ्चमाषकसंमितम् ।
गुञ्जैकं रसकर्पूरं क्षिपेन्निम्बूव्लमर्दितम् ॥ ७९ ॥
रक्तिकैकमितं चूर्णं मात्रायां विनियोजयेत् ।
रक्तिकैकमिता पूर्णमात्रास्य परिकीर्तिता ॥ ८० ॥
अथ चूर्णरूपेण मात्रानिर्माणप्रकारः--श्लक्ष्णं मसृणम्, दारुसिता
त्वक् ॥ ७६-८० ॥
भा. टी.--पाँच मासे दालचीनीचूर्ण में एक रत्ती रसकपूर (नींबूरस