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सर्वकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

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पृष्ठ 155

८ षष्ठस्तरङ्गः ११३
अथ चन्दनादिवटिका - ऊषणं कृष्णमरिचम्, सिता खण्डम्, कुङ्कुमं
काश्मीरम्, रससुमं रसपुष्पम् ॥ ५०-५१ ॥
भा.टी.-लालचन्दन, कालीमिर्च, खांड, रसकर्पूर, लौंग; इन सबको
पृथक्-पृथक् एक तोला लेकर एकत्र खरल में जल के साथ घोटकर एक-एक
रत्ती की गोली बना ल । इनमें से प्रतिदिन एक या दो गोली मक्खन के साथ
सेवन करावें । यह चन्दनादि-वटी कही जाती है। इसके प्रयोग से भयंकर
नवीन फिरंग रोग शान्त हो जाता है। यह फिरंग रोग की निर्विकार और
उत्तम औषधि है ॥ ५०-५१ ॥
अथ रसपुष्पमलहरः
रसपुष्पं चतुर्गुञ्जं मेलयेत्तोलकोन्मिते ।
क्षालिते नवनीते तु शतधा विमलाम्भसा ॥५२॥
मतो मलहरोऽयन्तु रसपुष्पसमाह्वयः ।
लिप्तोऽयं नाशयेत्याशु फिरङ्गव्रणजां रुजम् ॥५३॥
अथ बाह्यप्रयोगार्थमस्य मलहरः - चतुर्गुञ्जामितं रसपुष्पं तोलकमित
निर्मलोदके शतधा धौते नवनीते मेलयेत् । सोऽयं फिरङ्गव्रणपीडाहरः रोप-
णश्च ॥ ५२, ५३ ॥
भा. टी.-चार रत्ती रसकपूर सौ बार जल से धोये हुए १ तोला
मक्खन में घोटकर अच्छी तरह मिला लें । इसको रसपुष्प मलहर (मरहम)
कहते हैं । इस मरहम को फिरंग व्रणों पर लगाने से वे शीघ्र ही दूर हो
जाते हैं ॥ ५२-५३ ॥
रसपुष्पाद्यमलहरः
रसपुष्पं चतुर्गुञ्जं सिक्थतैलञ्च तोलकम् ।
खल्वेऽतिमसृणे क्षुद्रे दत्त्वा यत्नेन मर्दयेत् ॥ ५४ ॥
ततो विशालवक्त्रायां काचकुप्यां तु विन्यसेत् ।
गदितोऽयं मलहरो रसपुष्पाद्यसंज्ञकः ॥ ५५ ॥
रसपुष्पाद्यो मलहरो व्याख्यायते ॥ ५४, ५५ ॥
भा.टी.-रसकपूर चार रत्ती और सिक्थतैल एक तोला लेकर इन दोनों
को एक छोटे चिकने खरल में अच्छी तरह घोटकर मरहम तैयार कर लें ।
तैयार करने के बाद प्रयोग करने में सुविधा के लिए एक चौड़े मुख की शीशी
में रख लें । इस मरहम को रसपुष्पाद्यमलहर कहते हैं ॥ ५४-५५ ॥