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रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

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पृष्ठ 138

९६ रसतरङ्गिणी
द्वितीयः प्रकारः-यवजो यवक्षारः, अनलश्चित्रकः, शेफालिका “हरसिंगार”
इति भाषायाम् ॥ ६७ ॥
भा.टी.-सुहागा, पाँचों नमक, काली मिर्च, सहंजना, राई, कसीस, जवाखार,
चित्रक, फिटकरी, संभालू, सज्जीखार, इन सबको समभाग में लेकर दोलायंत्र
में डालकर जल भर दें और पारद की पोटली लटकाकर इसे ६ घण्टे स्वेदन
करें तो पारद धातुओं को ग्रास करने की शक्ति प्राप्त कर लेता है ॥ ६७ ॥
तृतीयः प्रकारः
स्वेदयेदासवाम्लेन सहितं याममात्रकम् ।
भिषग्वरः सूतराजं शीघ्रं वीर्यविवृद्धये ॥६८॥
चतुर्थः प्रकारः
अथवा दहनक्वाथैस्त्रिदिनं काञ्जिके पचेत् ।
एवं संस्वेदितः सूतो ग्रासार्थी जायते परम् ॥६६॥
आसवाम्लेन काञ्जिकेन ॥ ६८-६६ ॥
भा.टी.-पारद को केवल काञ्जी में दोलायन्त्र द्वारा एक पहर तक स्वेदन
करने से भी इसकी शक्ति बढ़ जाती है ॥ ६८ ॥
अथवा चित्रक क्वाथ तथा काञ्जी में तीन दिन तक पारद को स्वेदन
किया जाय तो भी उसमें धातुग्रास करने की शक्ति उत्पन्न हो जाती है ॥६६॥
जारणास्वरूपम्
सूते गन्धादिनिक्षिप्तात्तत्तद्विधिविशेषतः ।
गन्धाद्यं जार्यते यत्तु जारणां तदिहोच्यते ॥१००॥
षड्गुणगन्धकजारणस्य प्रयोजनम्
वसुविधविधिसंस्कृतोऽपि सूतो रसविबुधैरिह हिङ्गुलोत्थितो वा ।
रसगुणबलिजारणाविहीनो गदगणवारणतां तु नैति नूनम् ॥१०१॥
अथ जारणालक्षणम्-तत्तद्विधिविशेषतः वालुकायन्त्रकच्छपयन्त्रादिप्रका-
रेण । जार्यते वह्न्यादि योगात् क्षीणं क्रियते । “द्रुतग्रासपरीणामो विडयन्त्रा-
दियोगतः । जारणा इति” रसेन्द्रचूडामणौ, “जारणा नाम गालनपातनव्यतिरे-
केण ग्रस्तघनहेमादिरसस्य पूर्वावस्थाप्रतिपन्नत्वम्” इति च-आयुर्वेदप्रकाशकारः॥
जारणाफलम्-वसुविधविधिसंस्कृतः अष्टविधसंस्कारयुक्तः रसविबुधैरिति