रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६२ रसतरङ्गिणी
हरीतकी, विभीतक ( बहेड़ा ), राई, सैन्धा नमक, चित्रक तथा सहजने के
बीज; इनको प्रत्येक पारद के बराबर भाग लेकर पारद के साथ किसी अम्लद्रव
काञ्जी आदि के साथ अच्छी तरह मर्दनकर नष्टपिष्ट कर लें । फिर इस कल्क
को यन्त्र में रखकर अधःपातन द्वारा पारद को प्राप्त कर लें ॥ ७८-७६ ॥
तिर्यक् पातनम्
उद्दिष्टैरोषधैः साकं रसराजं सुपेषयेत् ।
तिर्यक्पातनयन्त्रे च गृह्णीयान्निर्मलं रसम् ॥८०॥
तिर्यक्पातने केचिदाहुः — “श्लक्ष्णीकृतमभ्रदलं रसद्विगुणं च तथारनालेन ।
खल्वे त्रिदिनं मृदितं यावत् तन्नष्टपिष्टतामेति ॥ कुर्यात्तिर्यक्पातनपातितसूतं
क्रमेण दृढवह्निम्” ॥ ८० ॥
भा. टी. तिर्यक्पातन के लिये लिखी हुई औषधियों के साथ पारद को
अच्छी तरह पीसकर तिर्यक्पातन में रख के अग्निताप द्वारा तिरछा उड़ा लेना
तिर्यक्पातन संस्कार कहा जाता है ॥ ८० ॥
बोधनलक्षणम्
मर्दनादियोगेन जातक्लैब्यस्य शूलिनः ।
क्लैब्यापहं तु यत्कर्म बोधनं कथ्यते बुधैः ॥८१॥
अथ बोधनस्वरूपम् — जातक्लैब्यस्य शूलिनः पारदस्य । अत्र — “जलसैन्धव-
युक्तस्य रसस्य दिवसत्रयम् । स्थितिराप्यायनी कुम्भे याऽसौ रोधनमुच्यते ॥”
इत्यादिनास्य रोधनमपि नामान्तरमनुसन्धेयम् ॥ ८१ ॥
भा.टी. — मर्दन पातन आदि संस्कार या कर्मों के द्वारा पारद में एक
प्रकार की नपुंसकता आ जाती है, इस नपुंसकता को दूर करने के लिये किये
जानेवाले संस्कार को बोधन या रोधन कहा जाता है ॥ ८१ ॥
बोधनस्य प्रथमः प्रकारः
भूर्जपत्रे निधायाथ रसराजं निरोधयेत् ।
प्रक्षिप्य सैन्धवं तोये दोलायन्त्रे पचेद् बुधः ॥८२॥
एवं संस्वेदितः सूतो भृशमाप्यायितो भवेत् ।
जातवीर्यप्रकर्षो हि षण्ढतामिह मुञ्चति ॥८३॥
द्वितीयः प्रकारः
जलसैन्धवसूतपूरितां क्षितिगर्ते खलु काचकूपिकाम् ।
विनिधाय दिनत्रयं ततो गतषण्ढ्यः सबलो रसो भवत् ॥८४॥