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सर्वकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

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पृष्ठ 125

पञ्चमस्तरङ्गः ८३
करणाय । अद्यत्वे बहवोऽलसा हिंगुलस्य द्विगुणवस्त्रवेष्टितस्य शनैर्ज्वालनद्वारा
पारदविश्लेषणामातन्वते, स च लघुरपि प्रकारो रसस्य साकल्येनोर्ध्वपातनस्याभा-
वात् नागवङ्गादिदोषांपरिहारकत्वादुपेक्षित आचार्य्यैः,—इत्यवधेयम् ॥३८-४२॥
भा.टी.—सिंगरफ को फरहद के स्वरस से अथवा चांगेरीस्वरस अथवा
जम्बीरी नींबू के स्वरस से एक दिन मर्दनकर सुखा करके ऊर्ध्वपातन यन्त्र में
डालकर उड़ा लेवैं । इस प्रकार से प्राप्त पारद स्वच्छ और सप्त कञ्चुक रहित
हो जाता है । अब इस पारद में १६ वाँ भाग हरिद्राचूर्ण डालकर अथवा
नमक और नींबू का रस डालकर दो दिन तक मर्दन करें । मर्दन करने के
बाद अच्छी तरह सूख जाने पर इसे चौतह वस्त्र में छान लें । इस शुद्ध पारद
को योगों में प्रयोग कर सकते हैं । ऊर्ध्वपातन के लिये कितना बड़ा यन्त्र
होना चाहिए इसका निर्णय गुरुपदेशानुसार करना चाहिए । यहाँ पर पारद
का मान न होने से यन्त्र मान को भी नहीं लिखा जा सकता है । अथवा
केवल नींबू के रस में घोटकर ऊर्ध्वपातन यन्त्र में उड़ा लेने से भी हिंगुल से
पारद निकल आता है ॥ ३८-४२ ॥
अथ पारदस्य अष्टौ संस्काराः
रसायनप्रयोगेषु रसागमविशारदः ।
रसराजं प्रयुञ्जीत कर्माष्टकविशोधितम् ॥ ४३ ॥
स्वेदनं मर्दनञ्चैव मूर्च्छनोत्थापने तथा ।
पातनत्रितयञ्चाथ बोधनं सुनियामनम् ॥ ४४ ॥
सुप्रदीपनमित्यष्टौ प्रोक्ताः सर्वोपयोगिनः ।
संस्कारा रसराजस्य रसशास्त्रविशारदैः ॥ ४५ ॥
अथ पारदस्याष्टौ संस्काराः—रसतन्त्रप्रसिद्धाः सर्वोपयोगिनश्च वर्ण्यन्ते,
नाम्नामर्थैरेव तत्त्वमेषां व्याख्यातम् । नामकीर्तनादेव संख्यालाभेऽपि पुनरष्टौ
इति कथनं न्यूनाधिकतानिषेधाय । यद्यप्यष्टादशसंस्काराः प्राचीनतन्त्रसिद्धा-
स्तथापि न तेषां व्याधावुपयोगोऽतस्त इहोपेक्षिताः परिभाषासौकर्याय, तदेतदाह
सर्वोपयोगिन इति ॥ ४३-४५ ॥
भा.टी.—रसशास्त्र के विद्वान् को चाहिए कि वह रसायनप्रयोगों में अष्ट-
संस्कार युक्त पारद का प्रयोग करें। स्वेदन, मर्दन, मूर्च्छन, उत्थापन, त्रिविधपा-
तन (ऊर्ध्वपातन, अधःपातन, तिर्यक्पातन), बोधन, नियामन और दीपन—ये
आठ संस्कार ही यहाँ पर सर्वोपयोगी होने के कारण बताये जाते हैं ॥४३-४५॥