रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७६ रसतरङ्गिणी
कञ्चुकाख्यां भजन्तीति प्राच्यपाश्चात्यसम्मतिः ।
केचिदेते कञ्चुकाख्या दोषा औपाधिकाः स्मृताः ॥१३॥
सप्तकंचुकानां परिचयः स्वरूपनिर्णयाय-रससंश्लिष्टाः प्राप्तपारदसंयोगधात-
वो नाग-वङ्गादयः यदा विष्णुपदामृतमम्बरपीयूषं (ऑक्सीजन् इत्याङ्गलभाषा-
याम्) गृह्णन्ति विशीर्णावयवत्वेनात्मनि लीनयन्ति, अवशीर्य्यते स्वरूपाच्च्यवते,
तथा चावरणसामान्यात् रससंगतानां धातूनां कंचुकाख्येति प्राचां पाश्चात्यानाञ्च
रासायनिकानीं सम्मतिः तथा च धातुसम्पर्कविनाशाय शुद्धिविधेया सूतस्येति ।
औपाधिका वणिग्भिः छलनाथं मिश्रितैर्धातुभिः समुत्पन्ना एवैति दोषा इति
केचित् ॥ ११-१३ ॥
आ.टी.-पारद में मिश्रित नाग वंग आदि धातु जब विष्णुपदामृत
(oxigen) रूप होकर पृथक् होते हैं तब उनका कुछ अवशिष्ट भाग चूर्ण रूप
में होकर पारद के ऊपर रह जाता है अर्थात् इस चूर्ण से पारद सर्वतः आच्छा-
दित हो जाता है । पारद में मिश्रित और चूर्ण रूप से पारद को कंचुक (आव-
रण) के समान ढकनेवाले इन्हीं धातुओं को कंचुक कहा जाता है । यह
प्राचीन और अर्वाचीन सम्मति (सिद्धान्त) है और रसतन्त्रकारों ने इन कञ्चुकों
को औपाधिक (व्यापारियों के द्वारा ठगने के लिए धातुओं का मिश्रण)
दोष माना है ॥ ११-१३ ॥
वक्तव्य--कञ्चुकों के विषय में H. E. Roscoe and C. Schorle-
mmer. F. R. S. की Chemistry में निम्न प्रकार से प्रकाश डाला है-
Impure mercury when shaken with air yields a black
powder caused by the oxidation of the metallic impurities,
and the film of the oxide incloses a small globule of the
liquid metal.
पारदशोधनस्यावश्यकता
नैसर्गिकास्तु ये दोषा ये चान्ये कंचुकाह्वयाः ।
तेषान्तु परिहाराय सामान्यं शोधनं स्मृतम् ॥ १४ ॥
विशुद्धो रसराजस्तु सत्यं पीयूषसोदरः ।
सदोषस्तु रसौ वैद्यैर्यमोऽयमपरः स्मृतः॥ १५ ॥
तस्मात्सूतविशुद्ध्यर्थं युक्तः सुपरिचारकः ।
सर्वमादाय सामग्रीं रसशुद्धिं समारभेत् ॥ १६ ॥