रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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देहलोहमयीं सिद्धिं सूतेऽतः सूत उच्यते ।
स्वभावाच्चपलो यस्मात् ततोऽसौ चपलः स्मृतः ॥३॥
आतङ्कपङ्कमग्नानां पारदानाच्च पारदः ।
अभ्रादिरसराजत्वाद्रासराजः स्मृतो बुधैः ॥४॥
अत्र पारदनामानि तन्त्रव्यवहारसाधनानि, शिवाह्वयो यावच्छिवनामभि-
र्वाच्यः । नामनिरुक्तिः शिष्यबोधार्था । रसनात् भक्षणात्, अधिराजत्वात्
प्रधानत्वात्, देहसिद्धिः नीरोगता, लोहसिद्धिः स्वर्णादिरूपा, चपलश्चञ्चलः,
आतङ्क एव पङ्कः, तत्र मग्नानां पारदानात् पारद इति ॥ १-४ ॥
पारद के नाम
भा.टी.—रस, रसेन्द्र, सूत, रसेश्वर, चपल, रसराज, पारद; ये सब पारे
के नाम कहे जाते हैं । इसके अतिरिक्त शिव के जितने नाम हैं वे सभी पारे
के नाम कहे जाते हैं ।
अभ्रक आदि महारसों तथा स्वर्णा आदि धातुओं का भक्षण करने के
कारण पारद को रस शब्द से कहा जाता है । अभ्रक आदियों में सर्वोपरि होने
के कारण इसे रसेन्द्र कहते हैं । शरीर में स्वास्थ्य उत्पादन करने तथा स्वर्णादि
धातुओं को बनाने के कारण इसे सूत कहते हैं । यह स्वभावतः चंचल होता
है, अतः इसे चपल भी कहते हैं । रोगरूपी कीचड़ में फँसे हुए प्राणियों का
उद्धार करने से पारद और अभ्रक आदि उत्तम औषधियों में यह राजा के
समान होने से इसे रसराज कहा जाता है ॥ १-४ ॥
विशुद्धाविशुद्धसूतस्य स्वरूपम्
शुद्धः सूतो यतस्त्वन्तः सुनीलो बहिरुज्ज्वलः ।
सूर्य्यप्रभश्चाविशुद्धो धूम्रो वा परिपाण्डुरः ॥५॥
अविशुद्धसूतस्य हेयत्वम्
सदोषो रसराजस्तु विदध्याद्विविधान् गदान् ।
तस्माद् दोषविहीनस्तु योगेषु विनियोजयेत् ॥६॥
तत्र शुद्धसूतस्वरूपम्—अन्तःसुनीलः मध्यावच्छेदेन नीलप्रभः । अविशुद्धस्तु
परिपाण्डुरः ईषत्पीतवर्णः, स च त्याज्यः—"अन्तः सुनीलो बहिरुज्जवलो यो
मध्याह्नसूर्यप्रतिमप्रकाशः । शस्तोऽथ धूम्रः परिपाण्डुरश्च चित्रो न योज्यो रस-
कर्मसिद्धयै" इति प्राचीनसंवादात् ॥ ५-६ ॥