झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
लक्ष्मीबाई ४०७
उसकी तलवार का वार दूल्हाजू ने लोहे की छड पर झेला । तलवार
भन्ना कर बीच से टूट गई । तलवार का जो टुकडा सुन्दर की मुट्ठी में
बचा था उसी को तानकर सुन्दर दूल्हाजू पर उछली । दूल्हाजू ने छड
का सीधा हूला दिया । वह ठप से बाये वक्ष पर लगा । साथ ही बाहर
तुमुल 'हुर्रा' घोष हुआ ।
चोट की परवाह न करके सुन्दर ने फिर वार किया । दूल्हाजू पीछे
हटा । परन्तु उसने सुन्दर के पेट पर छड अडा दी । उधर गोरो ने धक्के
से फाटक खोल लिया । सुन्दर के मुँह से 'हर हर महादेव' निकला था
कि एक गोरे की गोली ने सौन्दर्यमयी सुन्दर को अमर कर दिया । गोली
उसके सिर पर पडी थी ।
दूल्हाजू ने छड पृथिवी पर टेक दी । दूल्हाजू पर भी गोरो की
बन्दूके सीधी हुई परन्तु उनके अफसर ब्रिगेडियर ने तुरन्त निवारण
किया, 'आवर मैन' ( अपना आदमी है ) ।
गोरो ने बन्दूके नीची करली । टिड्डी दल की तरह भीतर घुस पडे ।
अफसर ने कहा, 'यह रानी है ?'
दूल्हाजू ने उत्तर दिया, 'नही साहब महज नौकरानी ।'
अफसर ने अपने साथियो से कहा, 'बट ए सोल्जर शी विल हैव
ए सोल्जर्स आनर ।' (लेकिन सिपाही है । सिपाही की इज्जत उसको
मिलेगी ) ।
स्वर्गवासिनी सुन्दर की दृढ मुट्ठी अभी ढीली नही हुई थी । तलवार
का छोटा-सा टुकडा अब भी उसकी मुट्ठी में था । दो गोरे उसके शरीर
को बाहर ले गये और पत्थरो से दाब दिया । जहा उनके और नत्थेखा
के भी अनेक सिपाही दबे हुये थे । उसके उपरान्त वे लोग सब दिशाओ
में, शहर में घूमने लगे ।
टेक के पीछे से रोज के पास तार द्वारा नगर विजय का संवाद
पहुँचा ।
४०८ झांसी की रानी
रोज ने अफसरों से कहा, 'उस आदमी को जागीर में गांव पक्के
हुये।' दूल्हाजू के उस कृत्य का समाचार बहुत शीघ्र चारो ओर फैल गया।
फिर रोज ने तुरन्त आदेश दिया कि सैंयर फाटक को तोड़ो शहर
में बढ़ो और सब बागियों का नाश करो।
खुदाबख्श के फाटक पर कहर पर कहर बरसने लगे। इसी समय
रामचन्द्र देशमुख घोड़े पर आया। उसी समय एक गोली खुदाबख्श को
लगी। सैंयर फाटक का तोपखाना बन्द हुआ। एक अङ्गरेज दीवार पर
चढ़ा। मोतीबाई ने तलवार से उसका सिर कलम कर दिया और
खुदाबख्श की लाश को टांग कर नीचे उतर आई। रामचन्द्र ने मोतीबाई
को अपने पीछे घोड़े पर बिठलाया और लाश को सामने लाद कर किले
पर चढ़ आया। उसके किले में आते ही किले का फाटक बन्द कर लिया
गया। लाश को महल के पास रख कर ढक दिया गया। मोतीबाई की
आंख से आँसू नही निकला।
रानी आ गई।
'मोतीबाई,' रानी ने कहा, 'तुम लोगो का अक्षय कर्म मैने अपनी
आंखो देखा है।'
सरकार मोतीबाई ने भर्राये हुये स्वर में कहा, 'काम देखिये। अपने
पास किला अब भी है और आप हैं। मैं इनका प्रबन्ध करती हूँ।'
'महल के बिलकुल निकट ही,' रानी कण्ठ को संयत कर के बोली,
'कुंवर साहब को दफनाया जावे।'
देशमुख ने पूछा, 'सुन्दर ?'
'ओर्छा फाटक पर मारी गई,' मोतीबाई ने उत्तर दिया, 'दूल्हाजू ने
देश द्रोह करके फाटक खोल दिया।'
रानी ने ओठ सटाये।
धीरे से बोली, 'जीवन में यही बड़ा भारी धोखा खाया।'
फिर उन्होंने ज़रा जोर से कहा, 'बरहामुद्दीन ने ठीक कहा था उसके
साथ अन्याय हुआ। कहा है, कुछ जानते हो देशमुख ?'
लक्ष्मीबाई ४०६
'नही सरकार,' देशमुख ने सक्षिप्त उत्तर दिया ।
रानी ने अंगरखे की जेब में हाथ डाला ।
बरहामुद्दीन का इस्तीफा जेब में था । उसको उन्होने वही पडा
रहने दिया ।
मोतीबाई ने महल के पास ही कबर के लिये मिट्टी खुदवानी आरम्भ
करदी और बहुत शीघ्र एक बडा गड्ढा खुदवा लिया ।
रानी दूरबीन लेकर ऊपर के बुर्ज पर चढ गईं ।
रोज़ नगर की बुर्ज पर बुर्ज अपने अधिकार में करता चला जा रहा
था । गोरे शहर भर में फैलते चले जा रहे थे । झासी की सेना मरती-
कटती जा रही थी । आगें लगाई जा रही थी । झांसी मे हाहाकार हो रहा
था और उसके साथ तुमुल 'हुर्रा' घोष । रानी ने देखा कि शहर वाले महल'
नाटकशाला और महल के सामने वाले विशाल पुस्तकालय को, गोरे
घेरने का प्रयास कर रहे हैं और इन स्थानो के भीतर बन्द झाँसी के
सैनिक लड रहे हैं । तब वे बुर्ज से नीचे उतर आई ।
एक पेड के नीचे पत्थर पर बैठकर सोचने लगी, 'झाँसी का सर्वनाश
होने को है । स्वराज्य की स्थापना अभी दूर है । परन्तु कर्म करने मात्र
का अधिकार है, फल से हमको क्या ?'
उठ खडी हुईं ।
जवाहरसिंह, रघुनाथसिंह, गुलामगौस, भाऊ बख्शी, गुलमुहम्मद;
भोपटकर इत्यादि सरदारो को बुलवाया । उन लोगो को अपना निश्चय
सुनाया —
'बाहर निकल कर लडो, गोरो को शहर से निकालो और झाँसी की
रक्षा करो ।'
सलाह सम्मति का न तो समय था और न मौका ।
गुलमुहम्मद ने कहा, 'हुजूर को शुक्रिया । फौरन चले । गोरो को
शहर से निकालें ।'
४१० झाँसी की रानी
रानी ने आदेश दिया, 'गोलन्दाज़ अपने अपने ठियो पर काम करते
रहें।'
भाऊ बख्शी ने आगे बढकर रानी के पैर पकड लिये ।
प्रार्थना की, 'सरकार मुझको बाहर साथ जाने की आज्ञा दी जाय ।
मेरी तोप पर किसी और को कर दिया जाय ।'
'अच्छा, गोलन्दाज़ो में से केवल तुम', रानी ने कहा, 'जल्दी करो ।
विलम्ब का काम नही है ।'
बख्शी साथ हो गया ।
भोपटकर की इच्छा न थी कि रानी बाहर जाकर लड़े, परन्तु वह
स्तब्ध रह गया । रानी फुर्ती के साथ तैयार होकर किले के बाहर हो
गईँ । साथ में पठान, बुन्देलखण्डडी इत्यादि पन्द्रह सौ सैनिक । पीछे
भोपटकर भी गया । दक्षिण की ओर से आ आकर गोरे महल के
पश्चिम की ओर बढ रहे थे ।
रानी झंझावात की तरह पहले दक्षिण की ओर झपटी, जहा से
अंग्रेजी सेना घुसी चली आ रही थी । रानी का छापा इतना प्रचण्ड था
कि अंग्रेजी सेना भागी । पूर्व की ओर के मकानो की आड से बन्दूके चलाने
लगी । तलवारो की मार के सामने वह बिलकुल न ठहर सकी ।
रानी ने चिल्लाकर कहा, 'आज प्रमाणित कर दो कि हिन्दुस्थानी
सिपाही की तलवार के सामने संसार का कोई योद्धा नही टिक सकता ।'
उनके दस्ते ने ऐसी तलवार चलाई कि गोरी पल्टन बिखर कर हट
गई, परन्तु मकानो की आड से गोलिया चलाने लगी । पाच सौ पठान
दक्षिण और पूर्व दिशाओ में फैलकर फिर भी गोरो को पीछे हटाते रहे—
और मरते रहे । रानी के महल और हाथीखाने के आसपास* टकसाल
तक गोरी सेना फैली हुई थी और उसके लिये मकानो की आड थी ।
उसका जवाब देने के लिये रानी की सेना भी उसी प्रकार और उसी
दिशा में फैली । गोरी सेना के कुछ सिपाही दबाव पड़ने के कारण
❉अब यहां सदर अस्पताल है । अस्पताल के उत्तर में टकसाल मुहल्ला ।
लक्ष्मीबाई ४११
पश्चिम दिशा की ओर खण्डेराव फाटक की ओर बढ़े। वहा उनको
अटकना पडा।
रानी उसी ओर बढ़ रही थी कि उन्होने देखा एक सिपाही किसी
मकान में से निकल पडा और अकेले उन कई गोरो से भिड़ गया। उसने
ऐसी तलवार चलाई कि कई गोरे हताहत हुये। कुछ और गोरे आ गये।
वह सिपाही घिर गया। तो भी वह अकेला उनको पछेलता गया। रानी
ने अपने घोडे को तेज किया। पीछे पीछे उनके सिपाही दौडे। रानी के
पहुचते पहुँचते वह सिपाही और गोरे पचकुइयो से नीचे की तरफ पहुच
गये। उस अकेले सिपाही ने फिर कई गोरो को तलवार के घाट उतारा,
परन्तु यकायक उस पर कई वार पडे और वह गिर गया। इतने में रानी
सैनिको सहित आ पहुँची। गोरे भाग गये।
रानी ने पास जाकर देखा—बरहामुद्दीन था। उसके मरने में कुछ
क्षण बाकी थे। बेचैन था। रानी घोडे पर से उतरी। बरहाम के सिर
पर हाथ फेरा। बहराम ने पहिचान लिया। उसने आंखे फाडी। पूरा
बल लगाया। लेकिन कठिनाई से बोल पाया, 'हुजूर, माफी।'
मुश्किल से रानी के मुह से निकला, 'तुम सच्चे सिपाही हो। माफ
किया।'
फिर जोर लगाकर बरहाम ने कहा, 'सरकार, जान नही निकलती।
मेरी चि ट्...ठी।'
रानी ने जेब से उसके इस्तीफे का कागज निकाला। 'यह लो',
रानी बोली।
'नही, स र ⸱ का...र', बडी मुश्किल से बरहाम ने कहा,
'फाड ⸱ डा ⸱ लि ये तब ⸱⸱ जान नि ⸱ क ⸱⸱ ले गी।'
रानी ने तुरन्त चिट्ठी की चिन्दी चिन्दी कर डाली।
बरहामुद्दीन के मुखमण्डल पर उस घोर पीडा मे आनन्द की छाप
लग गई। उसके अन्तिम शब्द थे 'ज ⸱⸱ ल ⸱ वा...अल्ला...ह...'
भाऊ ने आकाश की ओर दृष्टि करके कहा,
४१२ झाँसी की रानी
'आहा कैसा मीठा मरण है यह ! भगवन् मेरी भी ऐसी ही सद्गति
हो ।'
बरहामुद्दीन का प्राणान्त हो गया ।
रानी ने हुकुम दिया । इसी स्थान पर इसकी कबर बनाई जाय ।*
पास के रहने वालों को कबर का प्रबन्ध देकर रानी और उनके
सैनिक गोरो पर झपटे । वे भागे । अब पश्चिम से पूर्व होती हुई दक्षिण
तक रानी के सैनिको की एक पात सी बन गई । पीठ पर किला था ।
यकायक वृद्ध नाना भोपटकर रानी के सामने आ गया ।
बोला, 'पहले इस बूढे ब्राह्मण का वध करिये तब आप गोली खाइये ।'
रानी—'नाना साहब, यह क्या ?'
नाना—'आप देखती नही हैं, गोरे मकानो की आड से गोली चला
रहे हैं और आपके सैनिक हताहत हो रहे है । आप पर एक गोली पडी
कि समग्र झासी रसातल को गई । अभी अपने हाथ मे किला है । लडाई
जारी रखी जा सकती है । लौटिये या मेरा वध करिये ।'
रानी की समझ में आ गया ।
गुलमुहम्द पास आ गया था । उसने भी कहा, 'सरकार, बुड्ढा ठीक
बोलता हे । अन्दर चले ।'
उत्तरी फाटक से रानी किले मे भाऊ और नाना भोपटकर के साथ
चली गईं गुलमुहम्मद के साथ तीन सौ पठान ही भीतर जा सके ।
बाकी सब बाहर लडाई में मारे गये । बुन्देलखण्डडी सैनिक लगभग सब
कट मरे । किले के फाटक बन्द कर लिये गये ।
- बरहामुद्दीन की कबर उसी जगह बा० जासोनाथ चौधरी के बाग
में, और कबरो के पास है ।
लक्ष्मीबाई ४१३
[ ७६ ]
गोरो ने शहर के सब फाटको पर अपना प्रबन्ध कर लिया, उनको
अपने उन निशशस्त्र पुरुषो, स्त्रियो और बच्चो के खून का बदला लेना था,
जिनको बख्शिशअली इत्यादि बहुत थोडे से हिन्दुस्थानियो ने मारा था ।
पाच वर्ष की आयु से अस्सी वर्ष तक के जितने पुरुष मिले उनका कतल
शुरू कर दिया । हलवाई पुरा में आग लगादी । कुछ स्त्रिया अपने
सतीत्व के नष्ट होने के भय से कुओ में गिरकर मर गई । रोज का
आदेश था कि स्त्रियो को न मारा जाय, उनको जान बूझ कर गोरो ने
नही मारा । लेकिन अपने पति की रक्षा के लिये जो स्त्रिया उनकी आड
बनने के लिये आ गई वे गोलियो से मरी । झाँसी के कवि और गायक
भी लडे थे, वे मारे गये या घायल हुये । गवँयो मे केवल मुगलखा बचा
और नर्तकियो मे दुर्गा और एक और ।
गोरो ने घर घर में घुसना और सोना चांदी इत्यादि सामान लूटना
शुरू किया ।
शहर वाले राज महल के चारो ओर अङ्गरेजी सेना का सबसे
अधिक उपद्रव हुआ । नाटकशाला के सामने दक्षिण की ओर रानी का
अस्तबल था । उस अस्तबल को रानी के बुन्देलखण्डो सिपाहियो ने किले
की लढ़ाई में परिवर्तित कर दिया । थे लगभग कुल पचास ही । परन्तु
जब तक एक भी जिन्दा रहा अङ्गरेजो ने अस्तबल पर कब्जा नही कर
पाया । एक एक दीवार, एक एक कोठरी, एक एक ईट पर कब्जा करने
में अङ्गरेजो को न जाने कितने सिपाही बलिदान करने पडे ।
इसके बाद महल की एक एक इञ्च भूमि के लिये युद्ध हुआ । जब
महल के सब सिपाही खतम हो गये उस पर भी कब्जा हो गया । सब
सामान लूटा । एक बक्स में से यूनियन जैक झण्डा मिला, जिसे लार्ड
विलियम बेंटिक ने रामचन्द्रराव को दिया था महल के सिरे पर वह
झडा लगा दिया गया । महल के केवल उस भाग को छोडकर, जिस पर
यूनियन जैक फहरा रहा था, बाकी महल में आग लगादी गई । नाटक-
४१४ झांसी की रानी
'शाला भी न बची। सुन्दर पर्दे, जिनकी सहायता से शकुन्तला, रत्नावली
और हरिश्चन्द्र नाटक खेले जाते थे, खाक कर दिये गये।
और इसके बाद जो कुछ हुआ उससे उन बर्बरो की पाशविकता
इतिहास में अमिट अक्षरो में लिख ली गई—महल के सामने वाले
विशाल पुस्तकालय मे आग लगा दी गई ! थोडी ही देर में कलाओ का
वह भंडार अग्नि की गगनभेदी लौ फेकने लगा। कभी रोम, सिकन्दरिया
और राज-गृह में भी ऐसा हुआ था, परन्तु वह बर्बर युग था ! और यह
विज्ञान का सभ्य युग !!
रानी ने किले पर से देखा। उनके हाथ मे दूरबीन न होती तो भी
दिखलाई पड सकता था। पर दूरबीन ने सब कुछ स्पष्ट दृष्टिगोचर
करा दिया।
अस्तबल मिटा—फिर बन सकता था। राजमहल जला—उसके
बनाने वाले फिर उत्पन्न हो जायंगे। लेकिन पुस्तकालय ? वेद, शास्त्र,
पुराण, काव्य, इतिहास इत्यादि सस्कृति के और अरबी-फारसी के अनेक
हस्तलिखित ग्रन्थ जिनको प्रतिलिपि करने के लिये दूर दूर के विद्याव्य-
सनी आते थे, फिर कौन पैदा करेगा ? रानी का माथा घूमने लगा।
जिसको किसी कष्ट किसी समस्या, किसी विपत्ति ने कभी नही हिला
पाया था, वह जलते हुये पुस्तकालय को देखकर मूर्च्छित होने को हुई।
मुन्दर साथ थी। उसने संभाल लिया। रानी ने प्रबल प्रयत्न करके मूर्छा
को दूर किया। पानी मँगवाया, पिया। इतने में हलवाईपुरा और
कोरियो के मुहल्ला की आगो की लपटे दिखलाई दी। क्रन्दन, पुकार और
चीत्कार की समग्र ध्वनिया यकायक सुनाई पडी। जन-वध, कतले-ग्राम,
लोक-सहार का प्रत्यक्ष प्रमाण। रानी का हृदय धसने लगा।
'मुन्दर, मुन्दर, मेरी प्यारी झासी की यह कुगति, यह दुर्गति !
और मेरे जीतेजी ! मेरी आंखो के सामने !' रानी ने भरे गले से कहा।
गला फटसा गया। मुन्दर उनको खींचकर नीचे ले आई।
लक्ष्मीबाई ४१५
महल की चौखट पर बैठ कर वह रोईं। लक्ष्मीबाई रोईं ! वह
जिसकी आखो ने आसुओ से कभी परिचय भी न किया था ! वह जिसका
वक्षस्थल वज्र का और हाथ फौलाद के थे ! वह जिसके कोश में निराशा
का शब्द न था ! वह जो भारतीय नारीत्व का गौरव और शान थी !
मानो उस दिन हिन्दुओ की दुर्गा रोई ।
मुश्किल से आसुओ की अविरल धारा टूटी थी कि रामचन्द्र देशमुख
ने कर्तव्य वश समाचार दिया, 'सरकार, कुवर गुलाम गौसखां दुश्मन की
गोली से मारे गये ।'
रानी सिंहनी की तरह उछल कर खडी हो गईं । अङ्गरखे के छोर
से आंसू पोछ डाले । गला साफ किया ।
आज्ञा दी, 'भाऊ को उनकी जगह भेजो ओर लाश को महल के
पास ।'
आज्ञा पालन के लिये देशमुख चला गया । रानी मुन्दर को साथ
लेकर दक्षिणी बुर्ज के नीचे, जहा खुदाबख्श के शव के लिये कबर तैयार
हो चुकी थी, आईं । मोतीबाई वहा थी ।
पश्चिमी बुर्ज से भाऊ बख्शी अङ्गरेजी शिविर पर धडाधड़ गोलाबारी
कर रहा था । केन्द्रीय बुर्ज से रघुनाथसिंह । दक्षिणी बुर्ज शान्त थी ।
'मोतीबाई', रानी ने कहा, 'में दफनाने का प्रबन्ध करती हू, तुम तब
तक इस बुर्ज के तोपखाने को जगादो ।'
खुदाबख्श के शव के मोह मे मोतीबाई जरा ठमठमाई ।
रानी बोली, 'अभी विलम्ब है । कुंवर गुलाम गौसखा का भी शव
यही आ रहा है ।'
विस्फारित लोचन मोतीबाई ने विस्मय के साथ कहा, 'क्या उस्ताद
मारे गये ?',
'हा मोती,' रानी ने उत्तर दिया । मोतीबाई तोप पर चली गई ।
पहली बाढ दागी थी कि उस पर नजदीक से गोलियो की बौछार हुई ।
अंग्रेज किले के सदर फाटक के पास आ गये थे ओर उनको पास से
४१६ झाँसी की रानी
निशाना लेने का सुअवसर था। बुर्जों की मुंडेरे उस दिन के युद्ध में टूट
गई थी और उनकी मरम्मत न हो पाई थी। अन्य गोलियाँ तो मोतीबाई
के आस पास से निकल गईं, परन्तु एक ने कन्धा नीचे से फोड़ दिया।
हृदय उसका बच गया, मृत्यु अवश्यम्भावी थी।
उधर से गुलामगौस की लाश आई। इधर से एक सैनिक मोतीबाई
को उठा लाया। उसको पानी पिलाया गया। रुधिर बहुतायत से जारी
था, परन्तु वह अचेत न थी।
मुन्दर ने रानी से दक्षिणी बुर्ज के तोपखाने को सँभालने की अनुमति
चाही।
रानी ने दृढतापूर्वक इनकार किया, 'नही। यही ठहर। तुझको अब
सहज ही नही खोऊँगी।'
मोतीबाई का सिर रानी ने अपनी गोद में रख लिया।
मोतीबाई की आखो में आसू भर आये। बोली, 'इस गोदी में सिर
रक्खे हुये मरना किसी और के भाग्य में नही बाईसाहब।'
रानी ने सिर पर हाथ फेरते हुये कहा, 'मेरी मोती तू आज हीरा हुई।'
'सरकार,' मोतीबाई ने व्याकुल स्वर में कहा, 'मैं कुछ भी हूँ परन्तु
शुद्ध हूँ।'
'नही तू शुद्ध ही नही,' रानी बोली, 'तू पवित्र है। देख, हीरा एक
दिन सबको मरना है, परन्तु सत्कार्य में प्राण देना, भगवान का ध्यान
करते करते मरना, यह जन्म भर की अच्छी कमाई से ही प्राप्त होता है।'
मोतीबाई ने आख मीची। उसका चेहरा पीला पड गया।
रानी ने कहा, 'आत्मा अमर है। शरीर का चाहे जो कुछ हो, वही
एक प्रकाश शेष रहता है।'
मोतीबाई अचेत हो गई।
रानी ने दो कब्रे और तैयार करने के लिये आज्ञा दी। कबरें तुरन्त
तैयार हो गईं।
लक्ष्मीबाई ४१७
रानी की गोद मोतीबाई के खून से तर हो गई। मोतीबाई का पीला
मुर्झाया चेहरा एकदम प्रदीप्त हुआ। आखे अधमुदी हुईं। होठ फड़के
उसके मुँह से निकला—'रानी...उजाला.. ला...' और वह मुर्झाया
हुआ फूल अनन्त विकास पाकर बिखर गया।
मुन्दर ने कहा, 'सरकार, इनको और कु वर खुदाबख्श को एक ही
कबर में रक्खा जावे।'
रानी बोली, 'ऐसा नही होता और फिर यह कुमारी थी।'
तीनो को अलग अलग कबरो मे, परन्तु पास पास दफना दिया गया।
अन्त्येष्टि क्रिया गुलमुहम्मद ने की। रघुनाथसिंह ने उन तीनो वीरो को
तोप की सलामी दी।
सन्ध्या होने को आ रही थी। इसलिये जल्दी जल्दी में चबूतरा इन
तीनो का पक्का और एक ही बाघ दिया गया। चबूतरे के ऊपर निशान इन
तीनो के अलग अलग बना दिये गये। *
इसके उपरान्त रानी ने नहाया-धोया। कपडे बदले, वेश वही पुरुष
सैनिक का।
महल के नीचे खण्ड में मुख्य मुख्य लोगो को इकट्ठा किया।
बोली, 'आज तक आप लोगो ने अप्रतिम वीरता से झासी की रक्षा
की। प्राणो की होड लगादी। परन्तु अब चिन्ह अच्छे नही देख पडते
हैं। हमारे लगभग सभी सूरमा और दलपति और गोलन्दाज काम आ
गये। दीवारो और फाटको के रक्षक वीर मारे गये। किले की चार सहस्र
सेना में से उतने सौ भी नही बचे हैं। अङ्गरेजो ने किला घेर लिया है। वे
एकाध दिन में ही भीतर आ जावेगे। आप लोगो में से जो लडते लडते
बचेगे उनको कैद और फासी होगी। मै पकडी तो नही जा सकती परन्तु
*यह चबूतरा महल के दक्षिणी कोने पर अब भी स्थित है। उसकी
जियारत होती है और चादरे चढती हैं—लेकिन साल भर में केवल
शिवरात्रि के दिन जब किले का यह भाग हिन्दुस्तानियो को सुलभ हो
जाता है।
४१८ झाँसी की रानी
मेरे शव को फिरङ्गी स्पर्श करेंगे । इतने से ही मेरे पुरखो का, मेरे विख्यात
ससुर का अपमान हो जायगा । अब शिवराम भाऊ की बहू के लिये केवल
एक साधन शेष है । बारूद की कोठी में सैकड़ो मन बारूद है। मैं वहा
जाती हूँ और पिस्तौल के धड़ाके के साथ अपने पुरखो में मिल जाती हूँ।
किले से बाहर जाने के लिये कई गुप्त मार्ग हैं। आप लोग उनसे निकल
जाये । अभी सन्ध्या होने में कुछ देर है । रात का काफी अन्धेरा आप
लोगो को मिल जायगा ।'
भाऊ बख्शी धर्राते हुये कण्ठ से बोला, 'मै भी उसी बारूद के साथ,
सरकार की सेवा के लिये यात्रा करूंगा ।'
नाना भोपटकर ने तुरन्त कहा, 'आप आत्मघात करने जा रही हैं ।
यही न ? कृष्ण का पूरा गीता जिसको कण्ठाग्र याद है और जो गीता के
अठारहवे अध्याय को अपने जीवन में वर्तती चली आई हैं, और जो
प्रत्येक परिस्थिति में स्वराज्य की स्थापना के यज्ञ की वेदी पर संकल्प कर
चुकी हैं, वह आत्मघात करेगी ! अङ्गरेज़ो से हमारे पुस्तकालय को भस्म
करके जो आघात हमारे कृष्ण को नही पहुँचा पाया है वह आपका
आत्मघात पहुचावेगा । करिये कृष्ण का, गीता का अपमान । आप रानी
है । आपकी आज्ञा का पालन तो सबको करना ही है । परन्तु आपके
उपरान्त देश की जनता आपके लिये क्या कहेगी —जिसकी रक्षा के लिये
आपने बीड़ा उठाया था ?
रानी ने सिर नीचा कर लिया ।
वृद्ध भोपटकर कहता गया, 'आप राजमाता हैं। आपके नन्हासा
दामोदरराव पुत्र है । वह आपके पुरखो का प्रतीक, झाँसी की आशा है ।
कालपी में अभी पेशवा की सेना मौजूद है। दिल्ली, लखनऊ, कानपुर
इत्यादि के पतन हो जाने पर भी जनता का पतन नही हुआ है ।
विन्ध्यखण्ड, महाराष्ट्र और अवध अक्षय हैं । किले के भीतर वाले और
किले से बाहर दूर दूर वाले पठान देश के लिये कट मरने को कटिबद्ध हैं।
लक्ष्मीबाई ४१६
आप किले के बाहर होइये अग्रेजो की सेना को चीरते हुये निकल जाइये
और कालपी पहुँच कर पुनश्च हरिओ३म् कीजिये।'
रानी सोचने लगी। भोपटकर ने मुन्दर को दामोदरराव के लिवा
लाने के लिये इशारा किया। वह उसके लेने के लिये चली गई।
रानी की आखो के सामने एक दृश्य घूम गया'---
'कुरुक्षेत्र का मैदान है। कौरव पाण्डवो की सेनाये एक दूसरे के सामने
डटी हुई हैं। अर्जुन ने कृष्ण से कहा, भगवन् मेरा साहस डिग गया है।
मेरा सामर्थ्य हिल गया है। मै असमर्थ हूँ लडना नही चाहता। भगवान
कृष्ण ने उद्बोधन किया। अर्जुन ने फिर गाण्डीव धनुष हाथ में ले लिया।'
आखो के भीतर ही रानी को एक चमत्कार की अभिव्यक्ति हुई।
इतने में दामोदरराव वहा आ गया। दौड़कर रानी की गोद में
बैठ गया।
गुलमुहम्मद ने कहा, 'सरकार अमारा सारा कौम मुलक वास्ते कट
मरेगा।'
रानी उठी। उन्होने नाना भोपटकर के पैर छुये। कहा, 'एक दिन
मैने आपकी राजनीति पर आक्षेप किया था। मुझको क्षमा करना नाना
साहव।' फिर एक क्षण वाद बोली, 'भाइयो, मेरी इस क्षणिक दुर्बलता
को भूल जाना। मै लडूगी। आज सबके सामने प्रण करती हू कि यदि
समस्त अग्रेजो का मुझको अकेले सामना करना पडे, तो करू गी।'
उस अत्यन्त हीन परिस्थिति मे भी किले के भीतर वाले नर-नारियो
के उमङ्ग का उजाला भर गया।
रानी ने कहा, 'थोडा सा खा-पी लो। जो लोग शस्त्र ग्रहण नही
कर सकते वे गुप्त मार्ग से निकल जाये शेष मेरे साथ उत्तरी द्वार से
भांडेरी फाटक होते हुए कालपी की ओर चले। भांड़ेरी फाटक का प्रबन्ध
कौन करेगा?'
४२७ झांसी की रानी
भाऊ बख्शी ने जिम्मा लिया । उसका मकान कोरियो के मुहल्ले के
निकट था । और वह उन लोगो को अच्छी तरह जानता था । * बख्शी
गुप्त मार्ग से किले के बाहर चला गया । रानी ने अपने पुराने सेवक
सेविकाओ को पुरस्कार देकर विदा किया । वे पैर छू छूकर, रो रोकर
वहा से चले गये । नाना भोपटकर भी चला गया ।
जवाहरसिंह को रानी ने आज्ञा दी, 'आप अपने इलाके में जाकर
सैन्य संग्रह करिये और कालपी आ जाइये ।'
जवाहरसिंह ने प्रार्थना की, 'मे आपको सुरक्षित स्थान में पहुँचाकर
लौटूँगा अन्यथा नही । केवल इस आज्ञा का जीवन में उल्लङ्घन किया है ।
इस अपराध के लिये क्षमा चाहता हूं ।'
रानी ने स्वीकार किया ।
थोडे समय उपरान्त रानी और मुन्दर महादेव के मन्दिर में गईं ।
वन्दना की । ध्यान किया ।
समाप्ति पर रानी ने मुन्दर से कहा, वह पलाश अब भी फूल रहा
है । सिन्दूरोत्सव के दिन की मालाये अब भी उससे लिपटी होगी ।'
मुन्दर बोली, 'एक बार उसको भेट लीजिये बाईसाहब ।'
'अवश्य,' रानी ने कहा, 'वह हर साल फूलेगा और झासी हरसाल
'सिन्दूरोत्सव मनायेगी । झासी का सिन्दूर अमर हो ।'
उन दोनो ने उस पलाश से भेंट की ।
मुन्दर बोली, 'फूल की मालायें सूख गई हैं ।'
रानी ने कहा, 'उनकी आत्मा तो हरी-भरी है । ये उनके चढ़ाये
फूल हैं जो इस युद्ध में वलिदान हो गईं हैं ।'
इसके बाद वे दोनो महल पर आ गईं ।
- बख्शी की हवेली के नाम से वह मकान अब भी प्रसिद्ध है । श्री
सेठ जिनदास कोचर के अधिकार मे है । अमेरिकन मिशन की कुछ स्त्रिया
उसमें किराये से रहती थी ।
लक्ष्मीबाई ४२१
मोरोपन्त ताम्बे ने बहुत सा द्रव्य और जवाहर इकट्ठे किये। किले
के उत्तरी भाग में नीचे की ओर द्वार की बगल में एक हवेली, हाथीखाना
और घुडसार थी। लडाई के दिनो में जवाहरसिंह और रघुनाथसिंह इसी
हवेली में रहते थे। मोरोपन्त ने एक हाथी पर जवाहर और अशर्फियां
लादी। और लोगो ने कमर में अशर्फिया बाधी। रानी और मुन्दर पुरुष
वेश में घोडो पर सवार हुईं।
उस समय रात बहुत नही गई थी। पूर्व दिशा में बडा तारा ऊपर
चढ आया था। घना अँधेरा केवल शहर की आगो से फट फट जा रहा
था। अँधेरे के ऊपर बड़े छोटे तारे दम दमा रहे थे। नीचे शहर के
अँधेरे पर उन आगो के बड़े बड़े लाल-पीले छपके से पड पड जाते थे।
रानी ने एक चादर से दामोदरराव को पीठ पर कसा और अपने
तेसस्वी सफेद घोडे को किले के उत्तरी भाग से निकालकर आगे किया।
पीछे पीछे पठान, मुन्दर, जवाहरसिंह, रघुनाथसिंह इत्यादि। द्वार से
निकलते ही उन्होने किले को नमस्कार किया, झासी को नमस्कार किया।
कण्ठ में कुछ अवरोधसा अवगत किया। इस भय से कि कही आख में
आसू न आ जाय उन्होने उत्तर दिशा की ओर मुह मोडा और किले के
उतार के नीचे आ गईं। किला बिलकुल सूना छोडा।
मोरोपन्त का हाथी बीच में था। सवार अधिक न थे। उनकी रक्षा
के हेतु बाकी सैनिक पैदल थे। नङ्गी तलवारे लिये हुये।
यह टोली टकसाल के पश्चिम वाले मार्ग से भाडेरी फाटक की ओर
अग्रसर हुई। जैसे ही कोतवाली की बराबरी पर आई अङ्गरेज़ी सेना से
भिडामिडी हो गई। रानी 'हर हर महादेव' उच्चार करती हुई उनको
चीरती फाडती मुन्दर सहित निकल गईं। पठान शत्रुओ से बेतरह लडे।
बहुत से मारे गये बाकी आगे बढे।
जगह जगह-जलते हुये मकानो से उजाला हो रहा था। रानी और
अनेक सङ्गी द्रुत गति से भाडेरी फाटक के निकट पहुच गये। वहां बख्शी
कोरियो को लिये हुये अङ्गरेज़ी फौज की एक टुकडी को तलवार के युद्ध
४२२ झांसी की रानी
में उलझाये हुये था। इधर से रानी की टुकड़ी पहुंची। जलते हुये मकानों
के प्रकाश में थोड़ी देर के लिये विकट युद्ध हुआ। बख्शी ने फाटक खोल
दिया और फिर अपने कोरी सैनिको को लेकर अङ्गरेज टुकड़ी पर टूट
पड़ा। जान पड़ता था कि उसको जीवन का मोह नही। वैसे ही निर्मोही
पठान थे। बख्शी फाटक के बगल में मारा गया। उसने मरने के पहले
रानी को देख लिया था। मरने के पहले उसने 'हर हर महादेव' और
'झांसी की रानी की जय' का घोष किया था। उसके शरीर पात को
रानी ने देखा, परन्तु इतना समय भी न था कि मुह से 'धन्य' भी कह
पाती।
थोडे से लोगो के साथ रानी बाहर हो गईं। मरने से बचे हुये
अङ्गरेज सैनिक भाग गये। कोरियो ने भांडेरी फाटक फिर बन्द कर
लिया* और भाऊ बख्शी को एक जलते हुये मकान के अँगारो में डालकर
उसकी अन्त्येष्टि कर दी।
रानी और उनके साथियो को कोट के बाहर की भूमि का राई रत्ती
पत्ता था। अन्धेरे में वह सहज ही बढती चली गईँ। बातचीत विलकुल
धीरे धीरे होती थी। अञ्जनी की टोरिया के पास ओर्छे की सेना का
पहरा था और एक अँग्रेजी छावनी का। यहाँ रोक टोक हुई। लड़ाई
भी। यहां से रानी के साथ केवल दस बारह सवार रह गये और मुन्दर।
आगे निर्गम मार्ग। अगाध अँधेरा। झींगुर झङ्कार रहे थे। उनके
ऊपर घोडो की टापो की आवाज हो रही थी। सब ओर सन्नाटा छाया
हुआ था। पीछे झांसी में आगें जल रही थी और आवाजे आ रही थी।
आगे अन्धकार मे जगल और गडमऊ का पहाड लिपटे हुये, दवे हुये से
दिखलाई पड़ रहे थे। चिडिया पेड़ो पर से भड-भडाकर उडती और घोड़ो
को चौंका देती। घोड़े जल्दी चलाये जाने के कारण ठोकर ले ले पड़ते
थे। आगे का मार्ग अन्धकार पूर्ण और भविष्य तिमिराच्छन्न। ज्यो त्यो
*यह फाटक ७५ वर्ष तक ज्यो का त्यो बन्द रहा। १९३३ के जाड़ो
में खोला गया।
रानी लक्ष्मीबाई अंग्रेजी सेना मे से माग बनाकर जवाहरसिंह, गुलमुहम्मद आदि
चुने हुये सरदारों के साथ झांसी छोड़ रही है।
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लक्ष्मीबाई ४२३
करके आरी नामक ग्राम के पास से यह टोली आगे गई। पहूज नदी
मिली। लोगो ने चुल्लुओ से पानी पिया और फिर आगे बढे। कभी
धीमी गति से कभी तेजी के साथ। जब दस बारह मील निकल आये तब
ये लोग कुछ क्षण के लिये ठहरे।
रानी ने जवाहरसिंह और रघुनाथसिंह से कहा, 'अब आप लोग
लौट जाओ और सेना एकत्र करके मुझे कालपी में आकर मिलो।'
रघुनाथसिंह ने तुरन्त कहा, 'यह कार्य दीवान जवाहरसिंह अच्छा
कर सकते है। मैं तो साथ चलूँगा।'
रानी मान गई। जवाहरसिंह ने उनके पैर छुये और कटीली की
ओर चला गया।
रानी की टोली आगे बढी। इसमें गुलमुहम्मद और उसके कुछ
पठान भी थे।
जनरल रोज को रानी के निकल जाने का पता बहुत शीघ्र लग
गया। उसने तुरन्त लैफ्टिनेण्ट बोकर नामक अफसर को कुछ गोरो और
निज़ाम हैदराबाद के एक दस्ते के साथ रानी का पीछा करने के लिये
भेजा।
मोरोपन्त भाडेरी फाटक से निकल कर अन्जनी की टौरिया तक
आया, परन्तु जैसे ही यहाँ लडाई छिडी, उसने समझ लिया कि हाथी
महान सकट का कारण होगा। उसने दतिया की दिशा मे हाथी को मोड
दिया और जितनी तेजी सम्भव थी उतनी तेजी के साथ भागा। कुछ अंग्रेज़
सवारो ने पीछा किया। उसकी जांघ मे किसी घुडसवार की तलवार का
घाव भी लगा, परन्तु वह निकल गया और सवेरे दतिया पहुँच गया।
एक तंबोली के यहा ठहरा। परन्तु छिपाये छिप नही सकता था।
राज्याधिकारियो को मालूम हो गया। राज्य ने हीरे जवाहर सब जब्त
कर लिये और मोरोपन्त को पकड़ कर तुरन्त झासी भेज दिया।
रोज़ ने दिन के दो बजे जलते हुये महल और भस्मीभूत पुस्तकालय
के वीचो बीच मोरोपन्त को फाँसी दे दी !
४२४ झांसी की रानी
[ ७७ ]
जैसे ही झलकारी को मालूम हुआ कि रानी भांडेरी फाटक से
बाहर निकल गयी, उसने चैन की साँस ली । घर के एक कोने में थोड़ी
देर पड़ी रही । पूरन बाहर से आया ।
बोला, 'अव इतै से भगने पर है ।'
झलकारी—'तुम चले जाओ । मै घरै हो । गोरा लुगाइयन से नईं
बोल है ।'
पूरन—'मै कहत इतै से चल । जिद्द जिन कर । तै मारी जैय और
मैं मारो जैंग्रो ।'
झलकारी—'देखो मोसे हठ न करो । कऊँ जा दुको । मैं घर न
छोड़ हो, न छोड़ हो, वालाजी की सौगन्ध ।'
पूरन उसके हठीले स्वभाव को जानता था । वह एक लोटा पानी
लेकर एक खण्डहल मे जा छिपा ।
थोड़ी देर में झलकारी को अपने दरवाजे के सामने घोडे की टाप का
शब्द सुनाहु पड़ा । झाँक कर देखा । बिना सवार का बढ़िया घोडा जीन
लगाम समेत । जीन से जान पडता था कि झाँसी की सेना का है ।
झलकारी समझ गई कि सवार,मारा गया और घोडा भाग खडा हुआ है ।
झलकारी ने किवाड खोले । घोडे को पकडा । और घर के पास
वाले पेड से बाँध दिया । फिर भीतर चली गयी ।
उसने एक योजना सोची और उसको कार्यान्वित करने का निश्चय
किया । जब उसने निश्चय किया तब वह सीधी तनकर खडी हो गयी थी ।
झलकारी ने अपना श्रृङ्गार किया । बढ़िया से बढ़िया कपडे पहिने
ठीक उसी तरह जैसे लक्ष्मीबाई करती थी । गले के लिये हार न था,
परन्तु काँच के गुरियो का कण्ठा था । उसको गले मे डाल लिया ।
प्रात काल की प्रतीक्षा करने लगी ।
प्रातःकाल के पहिले ही हाथ मुँह धोकर तैयार हो गई ।