सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

३५४ झांसी की रानी
और उपकरणो का फिर से निरीक्षण किया जहां जो त्रुटि पाई,उसको
सभाला ।
मंगलवार ( २३ मार्च ) को रोज ने हमले की आज्ञा दी । युद्ध
आरम्भ हो गया ।
सैयर-फाटक की बाईं तरफ एक टेक पर अङ्गरेज़ो का तोपखाना था ।
वहा से सैंयर-फाटक और ओर्छा-फाटक पर तथा उन फाटको के बीच की
दीवार पर गोलो की बरसा हुई । चलते हुये गोलो की चादर के नीचे गोरी
पलटन संगीनी बन्दूके लिये दीमक की तरह चली । खुदाबख्श और
दूल्हाजू ने उनको बढने दिया । जब मार के काफी भीतर आ गये तब
उन्होने कहर को मानो उड़ेल दिया । गोरी पलटन धरती में बिछ गई और
फिर खुदाबख्श ने टेक के तोपखाने को अपना लक्ष्य बनाया । अङ्गरेज
तोपची मारे गये और तोपो का मुँह बन्द हो गया । तोपखाने के पीछेवाली
सेना पीछे को भागी । उसके ऊपर गुलामगोस ने 'घनगरज' की मार
फेकी । मुश्किल से कुछ आदमी बचकर रोज के पास तक पहुँच पाये । पूर्व
की ओर से भी सागर-खिडकी और लक्ष्मी-फाटक पर हमला होता हुआ
दिखा, परन्तु उसकी गति धीमी थी—लक्ष्मीताल के दक्षिणी सिरे का
छोटा सा चक्कर देना पडा, परन्तु भाऊ बख्शी की 'कड़कबिजली' ने पूर्व
का मोर्चा ऐसा साध रक्खा था कि पूर्व की ओर से आक्रमण करने की
रोज को साध मनमें ही समा गई ।
रोज ने किले के दक्षिण में, जीवनशाह की टौरिया के ठीक बगल
में—पूर्व की ओर—किले से तीन सौ गज के फासले पर मोर्चा बनाया,
परन्तु इस मोर्चे के बनाने में उसको काफी समय और आदमी खर्च करने
पडे । सध्या तक वह बहुत कम काम कर पाया । रात मे मोर्चा बनकर
तैयार हो गया । इसके सिवाय रोज ने इस मोर्चे की सहायता के लिये
तीन नये मोर्चे और बनाये ।

लक्ष्मीबाई ३५५
[ ६८ ]
झासी के तोपची और सिपाही रात भर जागते रहे। रानी ने दुहरी
कुमुक का प्रबन्ध किया। दिन में अपनी अपनी जगह पर गुलाम गौस,
खुदाबख्श, रघुनाथसिंह, भाऊ बख्शी, दूल्हाजू, पूरन और सागरसिंह,
रात में उनके स्थानापन्न, रानी के स्त्री गोलन्दाज।
परन्तु यह बदली सुबह होते ही नही हुई। झिङ्गा इन गोलन्दाजो
के पास पहुँच गई और काम में मदद करती रही। दोपहर के उपरान्त
बदलो होनी थी।
गुलाम गौस रात भर का जागा था, जो स्त्री उसके पास काम कर
रही थी, उससे गौस का मन नही भर रहा था। उसने उसके बदले में
लालता ब्राह्मण को मागा। रानी ने लालता को भेज दिया। लालता के
आते ही गौस की खुमारी चली गई।
गौस ने उससे कहा, 'रानी साहब की स्त्री-गोलन्दाज चपल बहुत हैं,
मुझको ठण्डा आदमी चाहिये जो काम करने के समय गाता न हो।'
लालता हँसकर बोला, 'कभी कभी आल्हा गाते गाते तो मै भी काम
करता हू खा साहब।'
'तब वह गीत याद रखना पण्डित जी', गौस ने कहा 'जननी जनम
दियो है तोखो बस आजहि के लाने।'
लालता ने फसील के छेद में होकर देखा कि जीवनशाह की पहाड़ी
की आड में होकर बगल वाली टौरियो के पीछे कुछ तोपे और चढाई
जा रही हैं। गुलाम गौस ने भी देखा।
गौस की आख एक पल के लिये गीध की आख की तरह सधी।
बोला, 'पडित जी, एक लोटा जल पिलाओ और मेरी घनगरज तोप
और उसकी छोटी बहिनो का काम देखो। मै बारह बजे छुट्टी लूँगा।
खुदा ने चाहा तो खाना-वाना खाने के बाद शाम को मिलूँगा। फिर
रात को सोऊँगा। हा तो एक बार वह गीत तो मन से गादो। एक
सतर से ज्यादा नही।

३५६ झाँसी की रानी
ललता ने स्वर में गाया, 'जननी जनम दियो है तोखो बस आजहि
के लाने।' गीत की समाप्ति हुई कि गौस ने तोपखाने को पलीता छुलाया
'घनगरज और उसकी छोटी बहिनो' ने इतनी जोर की गरज की कि
जिमीन काँप गई । दक्षिणी सिरे की सब बुर्जों से एक एक क्षण के बाद
बाढ दगना शुरू हो गई । तोपो के भरने का उत्कृष्ट प्रबन्ध था । एक
तोपखाने की बाढ और दूसरे की बाढ के दगने मे थोडा ही अन्तर पडता
था । रोज के तोपखानो ने जवाब दिया, परन्तु जवाब कमजोर था । गौस
के तोपखानो ने ऐसी मार बरसाई कि रोज़ का दम फूल उठा । उसका
दक्षिणी दस्ता नष्ट भ्रष्ट हो गया । कुछ तोपखाने बन्द हो गये, परन्तु एक
तोपखाना कोलाहल कर रहा था । समय लगभग दोपहर का हो गया था ।
गुलाम गौस ने कहा 'मुझे भूख लग रही है और गोरो का यह
तोपखाना मानता नही। अच्छा देखता हूँ ।'
गुलाम गौस ने 'घनगरज' को एक अंगुल इधर उधर सरकाया ।
निशाना बाधा और एक फटने वाला गोला छोडा ।
बारूदे इन तोपो की ऐसी थी कि धुश्रा न होता था, इसलिये गौस
ने अपने निशाने की सफलता तुरन्त देखी । उछल कर बोला, 'वह
मारा।' उसके साथियो ने देखा कि गोरे तोपची मारे गये और तोप भी
उलट कर बेकार हो गई ।
अङ्गरेजो का दक्षिणी मीर्चा बिलकुल ठण्डा हो गया । गौस भोजन
और आराम के लिये चला गया । लालता ने स्थान पकडा ।
पूर्व की ओर से अङ्गरेजी तोपो के गोले आने लगे । कुछ किले से
टकराते थे और कुछ शहर में गिरकर घरो का और लोगो का नाश
करते थे । भाऊ बख्शी ने कडकबिजली का स्थान ज़रासा परिवर्तित किया
और निशाना साधकर पलीता दिया । थोडी देर में रोज का पूर्वीय मोर्चा
भी ठंडा हो गया । तोपची मारे गये और तोपे बेकार हो गईं । बख्शी
अपनी पत्नी को तोपखाना सौप कर भोजन और आराम के लिये चला
गया ।

लक्ष्मीबाई ३५७
मुन्दर ने रघुनाथसिंह की जगह ली। सुन्दर ने दूल्हाजू की, मोतीबाई
ने खुदाबख्श की। दीवान जवाहरसिंह को थोड़ी देर के लिये छुट्टी देदी
गई। रानी घोड़े पर सवार होकर शहर के सब मोर्चों को देखने और
सँभालने के लिये चली गई । तीसरे पहर के अन्त में लौट आईं।
जवाहरसिंह फिर अपने काम पर डट गया।
चौथे पहर से लेकर सन्ध्या तक स्त्री तोपचियो ने दृढ़तापूर्वक काम
किया। रात को भी उन्हीं को काम पर रहना था। केवल खंडेराव फाटक
और सागर खिड़की पर स्त्रियां काम नहीं कर रही थीं। खंडेराव फाटक
पर सागरसिंह ने अपना नायब स्वयं चुन लिया और सागर खिड़की पर
बरहामुद्दीन नामका एक बुन्देलखण्ड पठान भेज दिया गया।
इसका आना पीरअली को अच्छा नहीं लगा।
पीरअली ने कहा, 'खांसाहब आपको नाहक कष्ट दिया गया। मैं
तो दिन रात इस छोटी सी खिड़की को सँभालने को तैयार हूँ।'
'मीरसाहब,' बरहामुद्दीन बोला, 'आप थोड़ा आराम करलें, रात भर
के जागे हुये हैं।'
'गई रात तो सभी जागे हैं। आप भी तो न सोये होगे ?'
'हुकुम है। पालन करना होगा।'
'ऐसा भी क्या ! अरे साहब सोइये। कल रहियेगा मेरी मदद पर।'
'नहीं, जनरल साहब सुनेंगे तो नाराज़ होंगे। और रानी साहब
सुनेंगी तो मैं अपना मुँह ही न दिखा सकूँगा।'
'तो रह जाइये, मगर एक बात है—किसी को मालूम न हो।'
'मुझे किस्से कहानी कहते फिरने से मतलब ही क्या ?'
'बात ऐसी है कि अगर फूटकर बाहर निकल जाय तो मेरे टुकड़े
हो जायेंगे।'
'आप कहिये। विश्वास करिये।'
अङ्गरेजी छावनी में क्या हो रहा है, क्या होने वाला है, कहा कहा नए
मोर्चे बनाये गये और किस तरह से हमला जोर का होगा इन बातो की

३५८ झाँसी की रानी
जासूसी करने का भार मेरे सिर है। अङ्गरेजी छावनी में भोपाल रियासत
के भी सिपाही हैं। उनमें से एक मेरा रिश्तेदार है। जब मै थोड़े दिन
हुए तालबेहट की ओर गया था तब उसको मैने मिला लिया था। वह
कुछ और लोगो से मिला हुआ है, इसलिये ठीक ठीक खबर मिल जायगी।
वह खबर अपने बडे काम की होगी। इस खबर के लाने के लिये मैं रात
को चुपचाप बाहर जाऊँगा। सबेरे के बहुत पहले आ जाऊँगा। यदि
अङ्गरेजो को खबर लग गई, तो मे मार दिया जाऊँगा और अङ्गरजी फौज
में मेरा जो रिश्तेदार है, वह, और उसके साथी, सब मारे जायगे। रानी
साहब का नुकसान होगा।'
'मै किसी से न कहूँगा, मगर मै चला जाऊँ या सो जाऊँ तो आपके
ठौर खाली हो जायगा। फिर यदि दुश्मन यहा होकर रात में धावा बोलदे
तो अपना कितना वडा नुकसान न होगा?'
'यह तो छोटी सी खिडकी है। इसकी खबर भी अङ्गरेजो को न होगी।'
'जैसा आप उचित समझे। मै सोचता हूँ, हर हालत मे मरा इस
ठिये पर रहना आपके लिये लाभ दायक होगा।'
'खूब। आप रहिये। मगर जब सब लोग सो जायगे तब मै जाऊ गा।'
'लेकिन फाटक नही खोलना चाहिये।'
'फाटक पर ताले पड़े हैं। मै मुहरी के रास्ते जाऊ गा।'
'मुहरी। कौन सी मुहरी?'
'वही जो खिडकी के बगल मे है?'
जब सब सो गये पीरअली ने बरहामुद्दीन को मोहरी दिखलाई और
उसी में होकर बाहर चला गया।
आध मील चलने के उपरान्त वह अङ्गरेजी छावनी के पास पहुँचा।
टोका गया। उसने पूर्व निश्चित सकेत को कहा। सन्त्री ने आगे बढने
दिया। कई अड्डो पर रोका जाने और अनुमति पाने पर पीरअली रोज
और उसके मातहत दलनायको के सामने पहुँचा, दुभाषिये के द्वारा
तुरन्त बातचीत हुई।

लक्ष्मी बाई ३५६
रोज़— किले में से जो गोलाबारी हुई,उसका प्रधान नायक कौन है ?'
पीरअली—'गुलाम गौसखा और भाऊ बख्शी ।'
रोज़ ने बागियो का रजिस्टर लोटवाया, पलटवाया । उसमें ये नाम
न थे ।
रोज़—'ये लोग कौन है ?'
पीरअली—'रानी साहब के नौकर हैं ।'
रोज़—'ओर्च्छा फाटक और सैयर फाटक पर कौन हैं ?'
पीरअली—'दीवान दूल्हाजू ओर्च्छा फाटक पर है और कुंवर खुदाबख्श
सैयर फाटक पर ।'
फिर रजिस्टर देखा गया । ये नाम भी न निकले ।
रोज़—'कोई लालता ब्राह्मण है ?'
पीरअली—'है, किले में है ।'
रोज़ ने दात पीसे ।
बोला, 'जनरल कौन है ?'
पीरअली—'खुद रानी साहब । उनके नीचे दीवान जवाहरसिंह
जागीरदार काम करते हैं ।'
रोज़—'कुल कितने गोलन्दाज हैं ?'
पीरअली—'बेहिसाब । सैकड़ो । बहुत तो औरतें गोलन्दाज हैं ।'
रोज़—'बाई जोव ! स्टुअर्ट, यह भासी तो महज नरक (हैल) है ।
औरते गोलन्दाज ! कल दूरवीन से अच्छी तरह देखूँगा ।'
स्टुअर्ट—'बारूद बनाने का कोई कारखाना है या पहले से बनी
रक्खी हैं ?'
पीरअली—'पहले की बनी रक्खी है और बनाने का कारखाना
भी है ।'
'रोज़—'इट इज स्मोक लैस पाउडर स्टुअर्ट ( धुआँ न देने वाली
बारूद है ! ) उत्तरी दरवाजे किसके सुपुर्द हैं ?'

३६० , झांसी की रानी
पीरअली—ठाकुरो, काछियो और कोरियो के हाथ में। दतिया-
फाटक तेलियो के हाथ में है।'
रोज़—'दी होल पीपुल एगेन्स्ट अस (पूरी जनता हमारे खिलाफ है)
अच्छा तुम किस जगह काम करते हो ?'
पीरअली —'सागर खिडकी पर।'
रोज़—'हमारे हवाले कर सकोगे !'
पीरअली—'खुशी से, मगर आपको फायदा कुछ न होगा। सागर
खिडकी की ठीक पीठ पर खजाञ्ची की कोठी है। उस पर तोपखाना है।
वह मेरे काबू का नही है। वहां पठान और ठाकुर हैं।'
रोज़—'कोई औरतें हाथ में आ सकती है ?'
पीरअली—'तोबा, तोबा झासी की औरतें पूरी शैतान हैं। एक
नाचने गाने वाली मेरी जान पहिचान की है, मगर वह जासूसी मुहकमें
की प्रधान है और अब तोप चलाती है।'
रोज़—'डैन्सिंग गर्ल ए गनर ! (नाचने वाली गोलन्दाज !) व्हाट
एल्स हैव आई टु हियर इन दिस डैम्ड् एकर्सैड प्लेस (इस सत्यानासी
पलीत जगह में मुझको अब और क्या सुनना बाकी रह गया है ?)।
स्टुअर्ट—'मगर जासूसी मुहकमें का अफ़सर तो एक मोतीसाईं सुना
गया था ?'
पीरअली—'जी नही वह अफ़सर यही नाचने वाली है और उसका
नाम मोतीबाई है।'
वे सब हँस पडे।
रोज़ ने कहा, 'वी हैव मैड फूल्स् आव अस ! (हम लोग वेवकूफ
बन गये । ) अच्छा, किसी एक फाटक वाले से हमको मिलादो। तुमको
और उसको बहुत इनाम मिलेगा।'
पीरअली —'कोशिश करूंगा।'
रोज़— तुम बतला सकते हो शहर और किले पर हमरी तोप का
गोला कहा से अच्छा पड़ेगा ?'

लक्ष्मीबाई ३६१
पीरअली—'जार पहाडी पर से ।'
रोज़—'ओ सिली ! (मूर्ख) जार पहाडी से किले का बहुत कम
नुकसान होगा ।'
पीरअली—'जी नही । किले की पश्चिमी दीवाल जो मटीली टोरया
पर है बहुत कम ऊँची है । उसको दाहिनी बगल में शकरगढ किले का
उत्तर पश्चिम हिस्सा है । इसी में पानी पीने का कुआ और रानी साहब
के पूजन का मन्दिर है । तमाम औरतें जो सिपाहगीरी का काम करती
हैं, इसी जगह दुपहरी या शाम को जमा होती हैं। इस जगह के तोड़ने
से किला हाथ में आ जावेगा और शहर की एक इमारत न बचेगी ।'
रोज़—'और उत्तर की ओर से ?'
पीरअली—'उनाव फाटक और भाडेरी फाटक की सीध में मटीले
टेकड़े हैं, जिनकी वजह से आपका तोपखाना कामयाब न हो सकेगा ।
रोज़—'अच्छा, तुम हमको दक्षिरा तरफ का कोई फाटक वाल
मिला दो ।'
पीरअली— मैने अर्ज़ की न—कोशिश करूंगा ।'
रोज़ ने पीरअली को धन्यवाद देकर वापिस किया ।
पीरअली जब सागर खिडकी पर वापिस आया, उसने वरहामुद्दीन
को सावधान पाया ।
पीरअली ने कहा,'खुदा खुदा करके लौट पाया हू । आज बहुत थोडा
भेद मिल पाया है । कल मौका मिलते ही फिर जाऊँगा ।'
बरहामुद्दीन ने पूछा, 'आज कुछ मालूम हो पाया या इतनी मिहनत
सब बेकार गई ?'
'बेकार तो नही गई, ' पीरअली ने उत्तर दिया, 'यह मालूम कर
लाया हूँ कि एक भी तोप या तोपखाना हिन्दुस्थानी सिपाही के हाथ में
नही है । सब तोपे अङ्गरेजो ने अपने काबू मे रख छोडी हैं ।'
'इतना तो मुझको भी मालूम है कि अङ्गरेजो ने हिन्दुस्तानियो का
भरोसा करना बिलकुल छोड़ दिया है ।'

३६२ झांसी की रानी
'इस पर भी गोरो के साथ भोपाल, हैदराबाद और ओर्छा रियासत
के दस्ते हैं और मदरास उत्तर की काली पल्टन भी ।'
'ओर्छा रि ासत का दस्ता उत्तर की ओर श्रञ्जनी की टौरिया पर
तैनात है ।'
'तुमको कैसे मालूम ?'
'किले में चर्चा थी । रानी साहव के जासूसो ने खबर दी होगी ।'
पीरअली ने सोचा, 'बरहामुद्दीन चतुर मालूम होता है; सावधान
होकर काम करना चाहिये ।'

लक्ष्मीबाई ३६३
[ ६६ ]
उसी रात रोज़ ने सनर्कता के साथ जार पहाड़ी पर तोपखानो के
मोर्चे बाधे । सुवह होते ही तोपो के मुहरे ठीक किये, निशान साधे ।
तोपो पर पलीते पडे और शहर का विध्वन्स आरम्भ हो गया । लोग
बेहिसाब मरने और घायल होने लगे । आगे, लगी बाजार बन्द रहे ।
साधारण जनता भूखो प्यासो मरने लगी । शहर में हाहाकार मच गया
झासी की गलिया वीरान दिखने लगी । किले की पश्चिम-दीवार में
सूराख़ हो उठे ।
शहर का हाल जानकर रानी दुखी हुई । तुरन्त सवार होकर किले
से उतरी और बरसते हुये गोलो में होकर प्रत्येक मुहल्ले को उत्साह दान
किया । आग बुझाने का बहुत अच्छा प्रवन्ध किया । अन्नक्षेत्र और
सदावर्त कायम किये । तब किले को लौटी ।
लौटते ही गुलाम गौस के पास पहुँची । उसने भक्ति पूर्वक प्रणाम
किया ।
'खा साहव, आज पश्चिम की ओर कोई नया मोर्चा बना है । इसका
निरोध होना ही चाहिये,' रानी ने कहा, 'चौथाई नगर बरबाद हो गया
है । कल न जाने क्या गत होगी ।'
'दक्षिणी मोर्चे का सरकार इन्तजाम करदें,' गौस ने निवेदन किया,
में अङ्गरेजो के उस मोर्चे को देख लूँगा ।'
रानी ने कहा में मोतीबाई को भेजती हूँ ।'
गौस बोला, वह कमाल की गोलन्दाज है सरकार, मगर इस मोर्चे
को न सँभाल पावेगी । अङ्गरेज लोग दक्षिण के सिवाय और किसी ओर
से नही आ सकते ।'
रानी ने पूछा, 'तुम्हारा ऐसा विचार क्यो है ?'
'हुजूर' गौस ने उत्तर दिया, इसी दिशा से किला अत्यन्त निकट
पडता है ।'
रानी ने कहा, 'बख्शिन को यहा भेज दूँ ?'

३६४ झाँसी की रानी
'भेज दीजिये सरकार,' गौस ने सहर्ष स्वीकार किया, 'वह बड़े
खानदान की है ।'
रानी की त्योरी बदली, परन्तु उन्होने तुरन्त नियन्त्रण किया ।
सोचा, 'आत्म त्याग में वह वेश्या-पुत्री किस खानदान वाले से कम है ?
हे भगवान्, त्याग में भी ऊँचनीच !' और चली गई ।
बख्शिन ने दक्षिण बुर्ज की 'घनगरज' और उसकी 'छोटी बहिन'
को संभाला । वह गौस के बतलाये हुये क्रम पर काम करती रही ।
गुलाम गौस तुरन्त पश्चिमी बुर्ज पर पहुँचा । यहा लालता काम कर
रहा था । गौस ने बारीकी के साथ दूरबीन द्वारा निरीक्षण किया ।
बोला, 'पण्डित जी अङ्गरेजो का मोर्चा पहिचाना ?'
'वह देखो न काली टोरो के पीछे है ।'
'नही पडित जी, काली टौरों के पीछे महज बारूद का धुआं किया
जा रहा है जिसमे हम लोग धोखा खाते रहे । वे जो ताजा लाल मिट्टी
के ढेर लगे हैं तोपे वहा हैं ।'
लालता ने दूरवीन पकडी 'देखो' असहमत हुआ ।
'खा साहव' लालता ने कहा, 'मिट्टी और बजरी के उन ढेरो में तोपें
नही बिठलाई जा सकती ।'
'माफ कीजियेगा पडित जी,' गौस बोला, तोपे खास मतलब से
उन्ही ढेरो में बिठलाई गई हैं । जरा ठहरिये ।'
गौस ने तोपो पर दूरबीने कसी । तोपो को इधर-उधर खिसका कर
ठीक किया । निशान बाधे, बारूद और गोले भरे । इस कार्य में उसको
अधिक समय नही लगा ।
इसके बाद इधर गौस ने तोपो को पलीते दिये उधर वे मिट्टी के
ढेर उघड़ गये मरे हुये तोपची नजर आये । उलटी हुई और टूटी तोपें ।
फिर बाढें की गई ।
अङ्गरेजो के पश्चिमी मोर्चे का जवाब बिलकुल बन्द होगया । नगर
में चैन हो गया । गौस ने जाकर रानी को प्रणाम किया । रानी सोने के

लक्ष्मीबाई ३६५
चूडे मँगवा कर गौस को अपने हाथ से पहिनाये । रानी हर्ष मे मग्न थी
और गौस का खुरदरा चेहरा आसुओ से तर था । तीसरे पहर के उपरान्त
कुमुक बदली । स्त्रियो ने तोपे हाथ में लीं और भीषण गोलाबारी शुरू
कर दी ।
कामासिन टौरिया पर से रोज ने दूरवीन में से देखा । बगल में
उसका फौजी डाक्टर लो था और पास ही मातहत जनरल स्टुअर्ट ।
रोज ने कहा, 'ओह ! स्त्रिया तोप चला रही हैं ! स्त्रिया गोला-बारूद
ढो रही हैं । कुछ खाना-पानी बाट रही हैं । टूटी हुई दीवारो और कँगूरो
की मरम्मत मे मदद दे रही हैं । इतनी तरतीब से, इतनी तेजी से
हिन्दुस्थानियो को काम करते आज देखा ! अचरज होता है ।'
लो ने दूरबीन हाथ में ली । देखते ही बोला, 'जनरल, पेड़ो की छाया
में कुछ स्त्री-पुरुष काम कर रहे हैं । हमारा एक गोला उनके बीच में
पडा । धूल फिकी । फिर भी वे सब वही के वही !'
रोज ने और स्टुअर्ट ने भी निरीक्षण किया । स्टुअर्ट बोला, 'ये सब
नेपोलियन हो गये क्या ?'
लो ने कहा, 'तब झासी हमारा वाटरलू होगा ।'
रोज ने मुस्कराकर झिडका, 'हिश, अभी बहुत घोर युद्ध करना
पडेगा । यह रानी नेपोलियन नही, जोन आव आर्क सी जान पडती है ।'
स्टुअर्ट ने कहा, इसको जिन्दा पकड सके तो कमाल होगा ।'
उसी समय तार खटखटाया ।
मालूम हुआ कि पश्चिमी मोर्चा सबका सब तहस-नहस हो गया ।
स्टुअर्ट को पश्चिमी मोर्चे को फिर सँभालने की आज्ञा दी । वह चला
गया । स्टुअर्ट के ब्रिगेड का अधिकाश दक्षिणी मोर्चे पर था । उसके
दलनायक को रोज ने तार द्वारा आदेश दिया, 'बहुत जोर के साथ किले
की दक्षिणी बुर्ज पर गोलाबारी करो । उस व्हिसलिंग् डिक को किसी तरह
बन्द करो ।'

३६६ झाँसी की रानी
गौस के 'घनगरज' तोपखाने के शोर और मृत्युवमन का नाम इन
लोगो ने व्हिसलिंग् डिक—हल्ला करने वाला शैतान रखा था।
आज्ञा पाते ही दक्षिणी ब्रिगेड ने अत्यन्त तीव्रता के साथ काम
शुरू किया। उनके तोपखाने लगातार भयंकर आग और गोले उगलने
लगे। बख्शिन जवाब पर जवाब दे रही थी बारूद और धुएँ से उसका
सुन्दर चेहरा काला पड गया था। पसीने की रेखाओ से जितना चेहरा
घुल गया था केवल उतना उसके स्वर्ण वर्ण को प्रकट कर रहा था।
ब्रिगेड ने तोपो की रक्षा में किले की ओर दौड लगाई। घनगरज के
तीपखाने ने उनका सहार कर दिया। बहुत अंग्रेजी फौज मारी गई।
उसको लौटना पडा। परन्तु उनके तोपखाने ने एक काम कर लिया।
एक गोला बुर्ज के कंगूरे को तोडकर बख्शिन के कन्धे पर लगा।
कन्धा टूट गया, उड़ गया। वह अचेत होकर गिर पड़ी।
बख्शी को पूर्वी बुर्ज पर समाचार मिला। निर्मम होकर बख्शी ने
उत्तर दिया, 'उससे बढकर झासी और झासी की रानी हैं। शाम को
देखूगा। तब तक दाह मत करना।'
बख्शी अपने काम पर जुट गया। एक वार आकाश की ओर उसने
देखा। गीता के कृष्ण को याद किया और अपने को कठोर से कठोर
सकट में डालता हुआ तोपो को दुगुनी तेजी के साथ चलाने लगा। रोज
का पूर्वी मोर्चा बुझ गया।
परन्तु बख्शी का पलीता सुलगता और आग देता रहा।
बख्शिन चली गई। रानी तुरन्त आईं। बख्शिन के रक्तमय शव
को गोद में रख लिया। गला रुद्ध हो गया, एक शब्द भी मुह से नही
निकल रहा था—और न आँख से एक आंसू। तोपखाना बन्द हो गया
था। अङ्गरेजो के गोले घड़ावड़ बुर्जो और दीवारो से टकरा रहे थे और
उनको ढा रहे थे। मुन्दर ने दूरवीन से अपनी बुर्ज पर से देखा। दौड़कर
आई।
घबराकर बोली, 'बाईसाहव !'

लक्ष्मीबाई ३६७
रानी के मुँह से केवल एक शब्द निकला, 'गौस ।' -
सुन्दर समझ गई। दौड़कर पश्चिमी बुर्ज से गुलाम गौस को बुला
लाई ।
गौस ने देखा झाँसी की रानी धूल मे बैठी बख्शिन के शव से लिपटी
हुई हैं।
गौस ने कहा, यह क्या सरकार, अभी न जाने कितने सरदार कुरबान
होगे ? हुजूर हम लोगो को समझाती हैं कि स्वराज्य की लडाई किसी
के मरने-जीने पर निर्भर नही है। और फिर बख्शिनजू तो अमर हो
गई । उठिये । देखिये उस जवामर्द बख्शी को । वह अपने ठिये पर अटल
है। आप ऐसा मोह करेगी तो हम लोग गोरो से कितने दिन लड सकेगे ?
आप यहाँ से हट जाय और दीवान खास में बैठकर हुकुम भेजती रहे ।
मैं इनको मजा चखाता हूँ ।'
रानी बख्शिन के शव का आवश्यक प्रबन्ध करके दीवान खास में
चली गई ।
गौसखा ने 'बिसमिल्लाह' किया और घनगरज को सँभाला । तीन
बाढो में ही अङ्गरेजी मोर्चे का तोपखाना, तोपची और तोपखाने पर
काम करने वाले, सब स्वाहा हो गये ।
गौस ने अपने साथियो से कहा, 'यह तो मेरे साथी सरदार को
मारने का बदला हुआ, अब कुछ प्रसाद भी देता हूँ। देखो भोखनबाग
के पूर्व में गुसाइयो के मन्दिरो की आड से ये लोग सैयर-फाटक पर
गोलाबारी कर रहे हैं। बिचारा खुदाबख्श मन्दिरो के लिहाज के कारण
जवाब नही दे पाता, परन्तु मन्दिरो के बीच में सन्ध है। उसी सन्ध में
होकर अङ्गरेजी तोपखाना काम कर रहा है। वह सन्ध खुदाबख्श की
सीध में नही है, पर घनगरज की सीध में हैं।'
साथी ने अनुरोध किया, 'मन्दिर पर गोला न पडे खासाहब । नही
तो बड़ा अनर्थ हो जावेगा ।'

झांसी की रानी
'अगर मन्दिर की एक ईंट भी मेरे गोले से टूट जाय तो तलवार से
मेरी गर्दन कलम कर देना।'
गौस ने घनगरज का मुहरा मोड़ा, परन्तु वहा से सीध नही बैठती
थी और न निशाना जमता था। तोप को ज्यो का त्यो करके वह
रघुनाथसिंह वाली बुर्ज पर गया।
'दीवान साहब,' गौस ने विनय की, 'दो पल के लिये तोप मुझे बख्श
दीजिये। सैयर-फाटक के सामने वाला अङ्गरेजी तोपखाना बन्द करना है।'
'तोप खुशी से लीजिये,' रघुनाथसिंह ने कहा, परन्तु अङ्गरेजी
तोपखाने पीछे मिटेंगे, मन्दिर पहले।'
गौस ने दृढ़तापूर्वक कहा, 'दूरबीन दीजिये, मुझको मन्दिरो की सन्ध
से केवल अङ्गरेजी तोपखाना देखना है। मन्दिरो को मैं देखूंगा ही नही।'
रघुनाथसिंह को गुलाम गौस की गोलन्दाजी का भरोसा था दूरबीन
और तोप उसके हवाले करदी।
गौस ने तोप के ठिये को संभाला, सुधारा और दूरबीन लगाकर
निश्चिन्तता के साथ गोला छोड़ा। उसका जो कुछ फल हुआ उसे रघु-
नाथसिंह ने दूरबीन से देखा।
अङ्गरेज तोपची मारे गये। तोपें नष्ट हो गईं और मन्दिर बच गये।
उसी समय गुलाम गौसखा को रानी ने अपनी तौल भर चांदी का
तोड़ा पुरस्कार में दिया। जब लालता ने सुना उसका जी गिर गया।
सन्ध्या समय बख्शिन के शव का दाह किया गया।
बख्शी हर्षोन्मत्त था, परन्तु उसकी आंखो में पागलपन था।
कभी कभी वह असंगत और अप्रासंगिक बात कहता था। 'नैनं
छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।' और कोई समझा हो या न
समझा हो, परन्तु रानी इस महावाक्य को समझती थी।
रात हुई। लड़ाई ने कुछ शांति पकड़ी। पीरअली के पास वरहापु-
द्दीन पहुंच गया।

लक्ष्मीबाई ३६६
पीरअली ने तुरन्त कहा, 'देखो मेरे पता लगाने के कारण गोलन्दाजो
को कितना लाभ हुआ।'
बरहामुद्दीन को शक हुआ। उसको दबाकर बोला, 'बेशक हुआ
होगा, मगर किले में गोलन्दाजी नही कर रहा था, इसलिये कुछ कह
नही सकता।'
पीरअली ने शेखी मारी, 'हमारी खिडकी के सामने अङ्गरेजो का
कोई मोर्चा नहीं पडता नही तो दात खट्टे कर देता।'
बरहामुद्दीन ने खुशामद की, 'मीरसाहब कहिये दात और सिर तोड
देते।'
पीरअली ने प्रसन्न होकर कहा, 'एक ही बात है।'
जब कुछ रात बीत गई पीरअली ने बरहामुद्दीन से धीरे से कहा,
'अब मै जासूसी पर जाता हूँ आप यहाँ होशियार रहना।'
बरहाम ने मंजूर किया।
पीरअली मुहरी के रास्ते से बाहर हो गया। और उसके पीछे पीछे
चुपचाप बरहाम। आध मील चलने के बाद जब पहले छबीने के संत्री ने
टोका तब पीरअली ने सकेत शब्द में उत्तर दिया। पीरअली आराम के
साथ अङ्गरेज छावनी में दाखिल हो गया। बरहाम बहुत उदास धीरे २
सागर-खिडकी को लौट आया।
जब पीरअली लौटा बरहाम ने प्रश्न किया, 'आज की क्या खबर
लाये मीरसाहब?'
उसने उत्तर दिया, 'ज्यादा पता नही लगा। सिर्फ इतना मालूम कर
सका कि कल शहर पर गोलाबारी पश्चिम की तरफ से होगी।'
'आज तो सरदार गुलाम गौस ने कमाल कर दिया। जिधर की तोप
संभाली उसी तरफ कहर बरसा दिया।'
'हमारी बारूद भी बहुत अच्छी है। धुआँ होता ही नही। अङ्गरेजो
को पता नही लगता कि तोपखाने किधर लगे हुये हैं।'

४. काल्पी प्रयाण, ग्वालियर दुर्ग विजय, कोटा की सराय में महाबलिदान एवं उपसंहार

३७० झाँसी की रानी

‘तो भी वे लोग हमारे गोलन्दाज पर गोलन्दाज़ मार रहे हैं। खैर
है कि हमारे यहाँ तोपचियो की कमी नही है वरना झासी का घण्टे भर
भी बचना मुश्किल था।’
‘बारूद कहा बनाई जाती है खासाहब ?’
‘महल के उत्तर में इमली के पेड़ो के नीचे। आपने क्या नही देखा ?’
‘नही तो मै उस तरफ नही गया खासाहब।’
‘एक बात मुझको भी बतलाइये मीर साहब। आप अङ्गरेजी छावनी
में पहुच कैसे जाते हैं ?’
‘कुछ न पूछो खासाहब, गड्ढो, खाइयो और झाड झङ्खाड की आडे
लेता हुआ जाता हूँ। ज़रा चूकूँ तो गोली सर पर पड़े। बडी जोखिम का
काम है। सीटी का एक बँधा हुआ इशारा करता हूँ। मेरा रिश्तेदार आ
जाता है और बाते बतला देता है। मै लौट आता हूँ। फिर वही मुहरी
की मुसीबत। इतना बदबूदार कीचड है कि तोबा।’
बरहाम के पैरो में भी कीचड़ लगा हुआ था। पीरअली ने देख
लिया।
उसने पूछा, ‘खासाहब तुम्हारे पैरो मे कीचड कैसा ?’
उसने भोलेपन के साथ उत्तर दिया, ‘मै भी मुहरी में होकर बाहर
थोडी दूर चला गया था। देखता था कि कैसा रास्ता है। आपके जाने
के बाद गया और तुरन्त लौट आया।’
पीरअली को सन्देह हो गया। उसने एक निश्चय किया। बरहाम
का सन्देह जाग्रत हुआ। उसने भी एक सकल्प किया।

लक्ष्मी बाई ३७१

[ ७० ]

सुन्दर को उस रात दूल्हाजू की कुमुक सौंपी गई। उसने दूल्हाजू से
गोलन्दाजी सीखी थी, इसलिये वह उसका आदर करती थी। सन्ध्या के
उपरान्त सुन्दर ओर्च्छा फाटक के ऊपर दूल्हाजू के पास पहुँच गई।
दूल्हाजू ने दिन में खूब तोप चलाई थी। वह प्रसन्न था और सुन्दर
उस दिन के काम पर सन्तुष्ट थी, केवल बख्शिन के देहान्त पर कभी कभी
मन कसक उठता था।
दूल्हाजू ने सुन्दर से कहा, 'आज तो बाई मै बहुत थक गया हूँ।
सारा शरीर दुख रहा है।'
'आप विश्राम करिये। मै तो रात भर सावधान रहूँगी।'
'दिन भर फिर वही सब करना पडेगा।'
'मै दिन में भी आपकी जगह काम करती रहूगी।'
'और कल रात?'
'रात को भी काम कर दूंगी। तब तक आप सुस्ता लेंगे। परसो दिन
में आप तोपखाना सँभाल लेना। मैं सो लूंगी। रात का काम फिर पकड़
लूंगी।'
'सुन्दर तुम बहुत प्रबल हो।'
आपकी कृपा।'
'और अत्यन्त सुन्दर।'
'इसका उत्तर कुछ नही दे सकती। भगवान ने जैसा बनाया वैसी हूँ।'
'तुमको देखते ही, तुम्हारे दर्शन करते ही न जाने मेरा चित्त कैसा
हो जाता है। तुम तो महले की रानी होने के योग्य हो।'
'रानी तो एक ही हैं—और एक ही हो सकती हैं।'
'सुन्दर मै तुमको अपने हृदय से लगाना चाहता हू। क्या कहती हो?'
'यही कि आप बहुत नीच हैं।'
दूल्हाजू इस उत्तर की आशा नही कर रहा था। उसने अपनी ठेस
को मुश्किल से सँभाला। उत्तेजित हुआ।

३७२ झाँसी की रानी
बोला, 'जानती हो मै ठाकुर हू ।'
सुन्दर ने दृढ सुहावने स्वर में कहा, 'जानते हो मै कुराभी हूँ, जिस
जाति की सहायता से छत्रपति ने एक छत्र राज्य स्थापित किया था।'
दूल्हाजू यकायक हँस पड़ा।
बोला, 'मै सुन्दर बाई तुमसे परम प्रसन्न हुआ। मैने तुम्हारी परीक्षा
लेने के लिये ही यह सब कहा था।'
सुन्दर ने स्थिरता के साथ कहा, 'हर्ष है कि आपकी परीक्षा शीघ्र
समाप्त हो गई।'
दूल्हाजू की आँख से लौ छूट पड़ी, परन्तु सुन्दर ने नही देखा।
'तोपखाना सँभालो,' दूल्हाजू बोला, 'मै सबेरे काम पर आ जाऊँगा।'
और अधिक वह कुछ न कह सका। चला गया।
अब सुन्दर का क्षोभ जाग्रत हुआ। खीझ कर उसने अपने मन में
कहा, 'दो जूते मुह पर न लगा पाये। बडा सरदार बना फिरता है। मेरे
स्त्रीत्व को इतना दुर्बल समझा !'
सबेरा होते ही दूल्हाजू अपने ठिये पर आ गया। सुन्दर से कोई बात
नही हुई उसने ऐंठ के मारे क्षमा प्रार्थना तक नही की। सुन्दर ने रात का
सब हाल रानी को सुनाया।
रानी ने सुन्दर को वर्जित किया, 'और किसी से कुछ मत कहना।
गोलन्दाज बहुत मारे गये हैं। यदि मेरे पास काफी आदमी होते तो
दूल्हाजू को अपने हाथ से कोडे लगाती और झांसी बाहर कर देती,
परन्तु इस समय ज़रा सह लेना चाहिये। तुझे अनुमति देती हूँ कि यदि
वह फिर कोई बेहूदी बात कहे तो अकेले में जूते लगा देना। तू उसको
कुश्ती मे पछाड़ सकती है।'
सुन्दर को अच्छा लगा। चुप रही। रानी ने समझा कि इतने से
सन्तुष्ट नही हुई। उन्होने दूल्हाजू को बुलाया और अकेले में काफी डांटा
फटकारा।

लक्ष्मीबाई ३७३
कहा, 'अबकी बार तुमको क्षमा किया । अपना काम करो । ऐसा
ओछापन न करना ।'
दूल्हाजू काम पर शीघ्र लौट गया ।
उसने सोचा, 'एक ने नीच कहा, दूसरी ने ओछा । मेरे सच्चे प्रेम
को किसी ने न पहिचाना । सुन्दर एक छोटी जाति की स्त्री है । मैं उसको
खुल्लम खुल्ला रख लेता । ठकुराइन बन जाती । लेकिन बडी पाजी औरत
है और रानी औरतो की तरफदार । मैने कहा ही क्या था ? विश्वास
दिलाया कि उसकी परीक्षा कर रहा था, परन्तु रानी ने विश्वास नही
किया । इस प्रकार का बर्ताव तो बडे बडे महाराज भी मेरे साथ नही
कर सकते ।'
दूल्हाजू उस बर्ताव को अपना अपमान समझता था । वह उस पहर
अपना कर्तव्य, शिथिलता और अन्यमनस्कता के साथ करता रहा । कुशल
यही थी कि पिछले दिन गुसाइयो के मन्दिरो के पास वाले तोपखाने के
मिट जाने के कारण और रोज के पश्चिमी मोर्चे पर अधिक जोर देने के
कारण, ओर्छा फाटक ने अधिक गोलाबारी का आवाहन नही किया ।
दोपहर के बाद धूप कडी हो गई । लू भी चल उठी । दोनो ओर
के तोपखाने और सिपाही अवकाश लेने लगे ।
पीरअली दूल्हाजू के पास आया । रामरहीम होने के उपरान्त बात
चीत होने लगी । पीरअली चाहता था कि कम से कम एक सरदार को
अपने पक्ष में कर लू ।
पीरअली — 'दीवान साहब आपको तो बडा कडा परिश्रम करना
पडता है आपकी वजह से मेरी खिडकी पर दुश्मन कोई दबाव ही नही
डाल पाता ।
दूल्हाजू — 'परिश्रम तो, सचमुच, मीर साहब मुझको बहुत करना
पडता है । मारे जाने पर मेरे परिश्रम का कोई मूल्य आका जायगा
या नही इसमें सन्देह है ।'