झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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पीरअली—'जार पहाडी पर से ।'
रोज़—'ओ सिली ! (मूर्ख) जार पहाडी से किले का बहुत कम
नुकसान होगा ।'
पीरअली—'जी नही । किले की पश्चिमी दीवाल जो मटीली टोरया
पर है बहुत कम ऊँची है । उसको दाहिनी बगल में शकरगढ किले का
उत्तर पश्चिम हिस्सा है । इसी में पानी पीने का कुआ और रानी साहब
के पूजन का मन्दिर है । तमाम औरतें जो सिपाहगीरी का काम करती
हैं, इसी जगह दुपहरी या शाम को जमा होती हैं। इस जगह के तोड़ने
से किला हाथ में आ जावेगा और शहर की एक इमारत न बचेगी ।'
रोज़—'और उत्तर की ओर से ?'
पीरअली—'उनाव फाटक और भाडेरी फाटक की सीध में मटीले
टेकड़े हैं, जिनकी वजह से आपका तोपखाना कामयाब न हो सकेगा ।
रोज़—'अच्छा, तुम हमको दक्षिरा तरफ का कोई फाटक वाल
मिला दो ।'
पीरअली— मैने अर्ज़ की न—कोशिश करूंगा ।'
रोज़ ने पीरअली को धन्यवाद देकर वापिस किया ।
पीरअली जब सागर खिडकी पर वापिस आया, उसने वरहामुद्दीन
को सावधान पाया ।
पीरअली ने कहा,'खुदा खुदा करके लौट पाया हू । आज बहुत थोडा
भेद मिल पाया है । कल मौका मिलते ही फिर जाऊँगा ।'
बरहामुद्दीन ने पूछा, 'आज कुछ मालूम हो पाया या इतनी मिहनत
सब बेकार गई ?'
'बेकार तो नही गई, ' पीरअली ने उत्तर दिया, 'यह मालूम कर
लाया हूँ कि एक भी तोप या तोपखाना हिन्दुस्थानी सिपाही के हाथ में
नही है । सब तोपे अङ्गरेजो ने अपने काबू मे रख छोडी हैं ।'
'इतना तो मुझको भी मालूम है कि अङ्गरेजो ने हिन्दुस्तानियो का
भरोसा करना बिलकुल छोड़ दिया है ।'