झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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दूसरे ने कहा, 'झांसी की रानी । उसको जिन्दा पकड़ो ।'
परन्तु काशीबाई की तलवार ने यह मन्सूबा असम्भव कर दिया ।
ऐसी चलाई कि दो सवार तो अश्व समेत कट गये । कई घायल हो गये
परन्तु एक सवार की तलवार से उसका घोडा मारा गया । काशीबाई
पैदल लडी । उस स्थिति में भी उसने कई सवारो को घायल किया ।
अन्त मे—काशीबाई के सिर पर एक तलवार पडी । लोहे की टोपी के
कारण सिर बच गया, परन्तु कन्धा कट गया । तो भी काशीबाई शिथिल
नही हुई । फिर दूसरी तलवार । काशीबाई का अन्त हो गया—उस
समय उसके मुँह से निकला—'हर हर महा......'
गोरे प्रसन्न थे । उठाकर रोज़ के पास ले गये ।
'यह बहुत लडी हुज़ूर । औरत के शरीर में शैतान है ।'
रोज़ ने काशी के शव को पहिचनवाया । पहिचानने वाले ने सिर
हिलाकर आश्वासन दिया, 'यह रानी नही है । रानी की बहिन हो या
सहेली हो या तात्या की कोई नातेदार ।'
रोज़ ने काशी का शव सुरक्षित रक्खा, और तात्या की सेना की
ओर ध्यान दिया । पेशवा के दस्तो के पैर उखड़ चुके थे । वे भागे ।
जूही भी भागकर तात्या के पास पहुची ।
बोली, 'काशीबाई कही फँस गई है । मारी गई होगी ।'
उसी समय रोज़ के गोले तात्या की वेतवा तटवर्ती सेना पर गिरे ।
तात्या ने जवाब दिया । परन्तु रोज़ के दूसरे अनेक दस्तो ने छोटी हलकी
तोपो से उस पर कई पार्श्वों से आक्रमण किया तात्या को अपनी सेना
बेतवा पार ले जानी पडी । रोज़ ने पीछा नही छोडा । तात्या की बडी बडी
'तोपे अपने बोझ के कारण बेतवा की रेत मे धस गई । न खिच सकी ।
तात्या को छोडनी पडी । हार खाकर भागना पडा । रोज़ के दस्तो ने
लगभग सोलह मील तक उसका पीछा किया । अङ्गरेजो के हाथ बहुत
सामान और तोपखाने लगे । सन्ध्या तक मैदान साफ हो गया । तात्या के
पन्द्रह सौ सैनिक मारे गये । वह मुश्किल से एरच घाट होकर कोच होता