झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
पृष्ठ 263, कुल 526 में से
संदर्भ में पढ़ें२४२ झाँसी की रानी
इसके बाद वे लोग जेलखाने भेज दिये गये ।
उनके साथी सिपाही क्षुब्ध हो गये, परन्तु उनको ३१ मई तक रुके
रहनेकी आज्ञा थी, इसलिये वे गुस्सा पी गये । घटना सुबह की थी ।
सन्ध्या समय हिन्दुस्थानी सिपाही बाजार में गये । सबसे पहले कुछ
वेश्याओ ने आवाजें कसी ।
‘आहा ! आपकी मूछें देखिये ! कैसी भाजी हैं !! भाइयो को जेल-
खाने भेजकर मुए किसी पोखरे में न डूब मरे !!!’
फिर गृहस्थ स्त्रियो ने । पुरुषो ने भी ताने कसे ।
सिपाही वारको को लौट आये । धैर्य ने साथ छोड दिया । स्त्रियो के
शब्द कलेजे में बिध गये । रात को गुप्त मन्त्रणा हुई । निश्चय हुआ कि
३१ मई तक नही ठहरेंगे । उसी रात उन लोगो ने दिल्ली खबर भेजी कि
कल परसो तक दिल्ली पहुँचते हैं, सब लोग तैयार रहे ।
दस मई को मेरठ में तलवार बन्दूक चल गई । अङ्गरेजो को मारमूर
कर सिपाही दूसरे दिन दिल्ली पहुच गये । वहा की हिन्दुस्थानी सेना उनसे
मिल गई । दिल्ली निवासियो ने उनका साथ दिया ।
चारो ओर ‘दीन दीन,’ ‘अल्ला हो अकबर’ और ‘हर हर महादेव’ की
पुकारें एक दूसरे में होकर गूंज गई । दिल्ली की अंग्रेजी फौज मुहासिरे
में पड गई ।
मेरठ और दिल्ली की सम्मिलित हिन्दुस्थानी फौज ने दिल्ली के लाल
किले पर अधिकार कर लिया । वादशाह बहादुरशाह को भारत का सम्राट
घोषित किया और २१ तोपो की सलामी दी । वादशाह ने क्रांति का
नेतृत्व स्वीकार किया और उसने सबसे पहला जो काम किया, वह था
गो-वध का क़तई बन्द कर देना ।
मई के महीने में लगभग सारे उत्तर हिन्द में क्रांति की आग भड़क
उठी—किसी दिन कही, और किसी दिन कही ।