झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मीबाई २५१
कमल फूलो का राजा । सरस्वती की महानता, लक्ष्मी की विशालता
उसके पराग और केशर में कही अदृष्ट रूप से निहित है । वह विष्णु
की नाभि से निकला और अनन्त समय के उपरान्त वही वापिस जायगा ।
वह हिन्दुस्थान की प्रकृति का, सस्कृति का, मृदुल, मजुल. मांगलिक और
पावन प्रतीक है । उसका रग हलका लाल है । वह बिलकुल रक्त नही है ।
हिन्दुस्थान में होने वाली क्रान्ति खूनी जरूर थी, परन्तु उस खूनी क्रांति
के गर्भ में मंजुलता और पावनता गढी हुई थी । इसीलिये सन् ५७ की
क्रांति का यह प्रतिबिम्ब चुना गया । क्रांति करेंगे—मानवीयता की रक्षा
के लिये, क्रांति होगी—मानवीयता लिये हुये !
कमल के साथ रोटी भी चलती थी । एक गाव से दूसरे गाव एक
रोटी भेजी जाती थी । दूसरे गाव में फिर ताजी रोटी बनी और तीसरे
गाव भेज दी गई । हिन्दुस्थान की वह क्रांति हिन्दुस्तानियो की रोटी की
रक्षा के लिये हुई थी । रोटी उस रक्षा के प्रयत्न का प्रतीक थी ।
जिसने सोचा उसने कल्पना का कमाल कर दिया । यह उपज हिन्दुओं
और मुसलमानो, दोनो की थी ।
कमल और रोटी का दौरा समाप्त नही हुआ था कि छ मई को
मेरठ में विस्फोट हो गया ।
मेरठ में बडी छावनी थी । कई हिन्दुस्थानी और अङ्गरेजी पलटनें थी ।
एक हिन्दुस्थानी पलटन के नब्बे सिपाहियो को कारतूस दिये गये । सिपा-
हियों को विश्वास था कि कारतूस अस्पृश्य चर्बी वाले हैं । अङ्गरेजो ने
उन्हे आश्वासन दिया, कि नही हैं। पचासी सिपाहियो ने कारतूसो को
छूने से इनकार कर दिया । उनका कोर्टमार्शल हुआ । आज्ञा न मानने के
अपराध में उनको दस दस वरस के कठोर कारावास का दंड मिला । नौ
मई के दिन इन सिपाहियों को गोरी फौज और तोपखाने के सामने लाकर
खडा किया गया । वरदियाँ उतरवा ली गईं और हथकडी वेडियां डाल
दी गईं । छावनी के बाकी हिन्दुस्थानी सिपाही भी इस दृश्य को देखने
के लिये बुला लिये गये थे ।