झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मीबाई २४७
रानी फिर लेट गईं ।
'नैन छिन्दन्ति शस्त्राणि नैन दहति पावक' सोचते हुए निद्रा लाने
की चेष्टा करने लगी। इतने में पहरे वाली स्त्री-सैनिक ने द्वार के पास
आकर खासा । रानी ने अनसुनी कर दी । वह फिर खासी । रानी बैठ
गई ।
पूछा, 'क्या है ?'
पहरे वाली भीतर आई ।
उसने कहा, 'श्रीमन्त सरकार, मोतीबाई दर्शन के लिये आई है ।
मैंने मना किया। नही मानी । हठ कर रही हैं। कहती हैं आधी घडी
का तुरन्त समय दिया जाय । जैसी आज्ञा हो ।'
रानी ने मोतीबाई को बुला लिया । पास काठ की एक चौकी पडी
थी । मोतीबाई से उसी पर बैठने को कहा । वह नही बैठी ।
बोली, 'सरकार इस चिट्ठी को पढले ।'
मोतीबाई दीपक उठा लाई चिट्ठी पर किसी के हस्ताक्षर नही थे ।
उसमें लिखा था:—
'अब और नही सहा जाता । कब तक कलेजे में छुरी चुभाये रहे ।
उठो और धर्म के लिये कट मरो । थोडे से विदेशियो ने इस विशाल
देश को घेर रक्खा है । निकाल दो । देश को स्वतन्त्र करो । धर्म की
रक्षा करो ।'
रानी—'यह चिट्ठी कहा मिली ?'
मोतीबाई—'इस प्रकार की कई चिट्ठियां छावनी में आई हैं। मुझको
भरोसे के लोगो ने आज दिन में बतलाया था । इस चिट्ठी को सरदार
तात्या साहब ने दिया है ।'
रानी—'तात्या टोपे ! कहा हैं ? झासी कब आये ?'
मोतीबाई—'सन्ध्या के समय आये और प्रात काल के पहले चले
जायेंगे । वह इसी समय दर्शन करना चाहते हैं । बाहर खडे हैं ।'
रानी—'बाहरी कमरे में बिठलाओ । में आती हू ।'