झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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कर छोड गई हो । नीचे सघन अन्धकार । सब दिशाओ में गुलाई सी वाघे
हुये । झींगुर झकार रहे थे ।
रानी को नीद नही आ रही थी । कठिन व्यायाम से तप्त देह को ठड
भली लग रही थी । खिडकी खुली हुई थी । उसमें से कई बडे बडे तारे
दिखलाई पड़ रहे थे । झींगुर की झनकार के ऊपर दूर से आनेवाला
किसानो और चरवाहो के फाग-गीत का स्वर सुनाई पड जाता था ।
रानी ने सोचा, 'क्या ये लोग ईसाई बना लिये जावेगे ? ईसाई होने
पर फिर क्या अपनी फागें गा सकेगे ? इनके बच्चे किल्ली-डडा और कबड्डी
छोडकर फिर क्या खेलेगे ? होली, दिवाली, दशहरा ईद, सब यहा से -
चलदेंगे ? स्त्रियो का क्या होगा ? ऐसी सुन्दर वेश भूषा को छोड कर ये
सब क्या किरानी पोशाक करेंगी ? ईसाई आवागमन नही मानते, फिर
मुक्ति का क्या अर्थ ? और गीता, रामायण इत्यादि का क्या होगा ?'
रानी बिस्तरो मे बैठ गई ं। निविड अन्धकार में भी महल के सामने
वाला ऊँचा पुस्तक-भवन, अपनी थोडी सी रूप-रेखा प्रकट कर रहा था ।
'क्या वेद-शास्त्र, गीता, पुराण, दर्शन, काव्य ये सब व्यर्थ हो
जायँगे ? जला दिये जायँगे या फेक दिये जायँगे ?'
रानी ने होठ से होठ दबाया । नथनो से भभक निकली ।
'कदापि नही । कभी नही । मै लडूगी । उन गरीबो के गीतो की
रक्षा के लिये । इन पुस्तको के लिये और जो कुछ इनके भीतर लिखा है
उसके लिये । ऋषियो का रक्त ऐसा हीन और क्षीण नही हो गया है कि
उनकी सन्तान तपस्या न कर सके । कीडो-मकोडो की तरह यो ही
विलीन हो जाय ।'
'नही कृष्ण अमर है । गीता अक्षय है । हम लोग अमिट हैं ।
भगवान की दया से, शंकर के प्रताप से मै बतलाऊँगी कि अभी भारत
में कितनी लो शेष है । और यदि मै इस प्रयत्न में मर गई तो क्या होगा ।
कोई दूसरा तपस्वी मुझसे अच्छा खडा हो जावेगा और इस भूमि का
उद्धार करेगा । तपस्या का क्रम कभी खण्डित नही होगा ।'