झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
पृष्ठ 201, कुल 526 में से
संदर्भ में पढ़ें१६० झाँसी की रानी
रघुनाथसिंह—'और अपनी माता का आशीर्वाद प्राप्त करना है।'
रानी मुस्कराई । बोली, 'आप लोगो को मै अच्छी तरह जानती हू ।
आप लोग सहज ही प्राणो की होड लगा सकते हैं। परन्तु मै चाहती हूँ
कि प्राणो को सहज ही न खोया जाय। अवसर आने पर ही तलवार
म्यान से वाहर निकले। छोटी छोटी सी वात पर न खिंच जावे।'
तात्या—'इन लोगो को लाट की आज्ञा पर बहुत क्षोभ हुआ ।
और ये तुरन्त कुछ जवाव देना चाहते थे।'
रानी—'अङ्गरेजो के अन्याय बढते जावे तो अच्छा ही है। फिर
भगवान हमारी जल्दी सुनेंगे । असल में अभी इन छोटी बातो पर खीझ
कसर का निकालना, अच्छा नही है।'
उन दोनो ठाकुरो ने स्वीकार किया ।
फिर उन दोनो ने अपनी चमचमाती हुई तलवारे, रानी के पैरो के
पास रखदी और हाथ जोडकर खडे हो गये ।
रानी ने मुन्दर से कहा, 'गगाजल ला ।'
मुन्दर गंगाजल ले आई । रानी ने पहले जवाहरसिंह की तलवार
पर छींटे दिये और फिर रघुनाथसिंह की तलवार पर ।
उन दोनो ने रानी के चरण स्पर्श करके तलवारें म्यान में डाल ली ।
रानी पुलकित हुई ।
एक क्षण में अपने को सयत करके बोली, गगाजल की पवित्रता को
निभाना । आपस की कलह में इसका प्रयोग मत करना और न किसी
कलुषित काम में ।'
उन दोनो ने मस्तक नवाये ।
रघुनाथसिंह ने कहा, 'सरकार अब आशीर्वाद मिलना चाहिये ।'
रानी का गला भर आने को हुआ । उन्होने नियन्त्रण कर लिया ।
बोली, 'तुम्हारे हाथो स्वराज्य के आदर्श का पालन हो । सुखी रहो
और अपने पीछे ऐसा नाम छोड जाओ कि आने वाली अन त पीढिया.
तुम्हारे स्मरण से अपने को शुद्ध करती रहे ।'