झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मीबाइ १८६
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रानी के पास आठ बजे के लगभग तात्या, रघुनाथसिंह और
जवाहरसिंह आये । रघुनाथसिंह पुष्ट देहका बडा बलशाली पुरुष था ।
जवाहरसिंह जरा छरहरे शरीर का परन्तु काफी बलवान ।
प्रणाम करके तीनो बैठ गये ।
रानी ने पूछा, 'दीवान जवाहरसिंह को क्या कटीली से ले आये
तात्या ?'
हाथ जोडकर जवाहरसिंह ने उत्तर दिया, 'दीवान रघुनाथसिंह का
एक साडिनी सवार लिवा लाया । उसने प्रात काल के बहुत पहले ही
सोते से जगाया था ।'
तात्या ने कहा, 'मै स्वय नही गया । दीवान साहब से प्रार्थना की
और इन्होने तुरन्त रात को ही, साडिनी-सवार भेज दिया । घुडसवार
जाता तो दीवान साहब को भी घोडे पर ही आना पडता । शायद कोई
सन्देह करता, इसलिये ऊँट भेजा ।'
जवाहरसिंह बोला, 'श्रीमन्त सरकार, मुझे किसी का भी डर नही
है । उस दिन के लिये तरस रहा हूँ, जब झाँसी और अपने स्वामी के
लिये अपना शरीर त्याग दू ।'
रघुनाथसिंह झूमने लगा ।
रानी ने मुस्कराकर कहा, 'आप ही लोगो का बल-भरोसा है । एक
दिन आवेगा जब आप लोगो के जौहर का उपयोग होगा । तात्या ने
कुछ बतलाया होगा ?'
रघुनाथसिंह—'बतलाया है सरकार । थोडे में समझ लिया । हम
लोगो को ज्यादा सुनने समझने की दरकार ही नही है । अपनी माता के
दर्शन करने थे, इसलिये चले आये ।'
जवाहरसिंह—'हम लोगो को सरकार के हाथो अपनी तलवार पर
गगाजल छिटकवाना है ।'