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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

७४६ रामायणमीमांसा एकविंश
“अति अपार जे सरित बर, जौ नृप सेतु कराहिं ।
चढ़ि पिपीलिकउ परम लघु, बिनु श्रम पारहिं जाहिं ॥” ( रा० मा० १।१३ )
यह लिखा जा चुका है कि वाल्मीकिरामायण के एक-एक अक्षर से ब्रह्महत्या का पातक दूर होता है, यह
व्यास भगवान् ने कहा है । वाल्मीकिचरित में नाभादास ने भी यही स्वीकार किया है ।
अतः रामायण का रावणचरित भी रामचरित्र का अङ्ग होने से पवित्र एवं पापनाशक है ।
रामायण के अनुष्ठानों में सभी श्लोकों को मन्त्र मानकर संपुटित पाठ किया जाता है । तुलसी जिन्हें
विशुद्ध-विज्ञान कहते हैं, उन्हीं को तुलसीदास के भक्त बननेवाले “मानसप्रवक्ता” भ्रान्त कहते हुए लज्जित नहीं होते,
यह आश्चर्य है । वस्तुतः रामचरितमानस जैसी ही वस्तु अध्यात्मरामायण है । तुलसीदास ने अधिकांश उसी का
अनुसरण किया है । अध्यात्मरामायण के अनुसार ही तुलसी ने इतिहास की गौणता और श्रीराम के ऐश्वर्य-विशिष्ट
चरित्र का चित्रण किया है । उसके अनुसार शिव-पार्वती-संवाद के रूप में रामचरित्र प्रस्तुत किया है; फिर तो यही
कहना ज्यादा सङ्गत है कि अध्यात्मरामायण द्वारा वाल्मीकि की धारणा का संशोधन किया गया, परन्तु यह सब भी
निःसार ही है; क्योंकि सभी रामचरित्रों के प्रामाण्य की कसौटी वाल्मीकिरामायण ही है । इसी लिए महाभारत
की भावदीप टीका के रचयिता ने रामचरित्रों में वाल्मीकिरामायण का ही परम प्रामाण्य मानकर उसी के अनुसार
महाभारत के रामचरित्र का अर्थ किया है । महाभारत में लक्ष्मण के द्वारा कुम्भकर्ण का वध वर्णित है । उसे उन्होंने
यों कहकर समाहित किया कि लक्ष्मण के द्वारा कुम्भकर्ण मृतप्राय हो गया था किन्तु वध तो वाल्मीकिरामायण के
अनुसार श्रीराम द्वारा ही मानना उचित है । ठीक ही है, महर्षि वाल्मीकि ने ब्रह्माजी के आदेशानुसार समाधि द्वारा
श्रीराम, लक्ष्मण, श्रीसीता आदि सभी रामायण के पात्रों का चरित्र हसित, भाषित, इङ्गित, चेष्टित आदि का प्रत्यक्ष
अनुभव करके वर्णन किया है । संवाददाताओं के तारों व टेलीप्रण्टरों के अनुसार या सुनी-सुनायी कथाओं के अनुसार
नहीं लिखा है। अतः ऐतिहासिक तथ्य न होने पर तो कोई भी रामायण या महाभारत या भागवत केवल गप्प या
उपन्यासमात्र रह जायगा । इसलिए रामचरितमानस के राम एवं उनके चरित्र की तथ्यरूपता या सच्चाई का आधार
वाल्मीकिरामायण ही है ।
कहा जाता है कि “व्यास और तुलसीदास दोनों ही श्रीकृष्ण और श्रीराम को इतना ठोस मानते हैं कि
उनकी तुलना में उन्हें सारा इतिहास मिथ्या प्रतीत होता है ।” परन्तु यह कहना असङ्गत है, क्योंकि इसका अर्थ
यह है कि राम और कृष्ण वेदान्तवेद्य पारमार्थिक सत्य हैं और इतिहास आदि मिथ्या है। यदि यही बात है
तो क्या राम और कृष्ण के चरित्र आदि भी मिथ्या हैं ? यदि इतिहास और चरित्र दोनों ही मिथ्या हैं तो
भी उस पूर्वोक्त कथन का क्या अर्थ है ? राजा आदि की कथाएँ मिथ्या हैं, राम और कृष्ण की कथाएँ सत्य
हैं, तो इस कथन में क्या आधार है ? वेदान्त का एक अंश लेकर एक अंश छोड़ देना तो अर्धजरतीय न्याय
ही होगा ।
महानुभाव ! यदि आप इतिहास-पुराणों का प्रामाण्य न स्वीकार करेंगे और राम, कृष्ण आदि के जन्मों
तथा चरित्रों को ऐतिहासिक तथ्य न मानेंगे तो लेने के देने पड़ जायेंगे ।
यह भी कहना गलत है कि “श्रीराम और श्रीकृष्ण दोनों इस पृथ्वी पर स्थूलरूप में काल-विशेष में
अवतरित होते हैं, किन्तु उनका जन्म नहीं होता । यद्यपि तत्कालीन अधिकांश व्यक्तियों ने उन्हें साधारण बालकों की
भाँति ही जन्म लेते हुए देखा था ।” यह सब भी अनर्गल प्रलापमात्र है । यदि भगवान् का जन्म नहीं होता, तो
उनके जन्म और कर्म के चिन्तन, वर्णन का महत्त्व ही क्यों है ? गीता तो स्पष्ट कहती है जो मेरे ( भगवान् के )
दिव्य जन्म और कर्म को तत्त्वतः जानते हैं, वे जन्म तथा कर्म के बन्धनों से मुक्त होकर मुझ ( भगवान् ) को
प्राप्त करते हैं—

अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७४७
“जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः ।
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ।। ( गीता ४।९ )
गीता में भगवान् यह भी कहते हैं कि मैं अज, अव्यय एवं सब भूतों का ईश्वर होकर भी अपनी सच्चिदा-
नन्दलक्षणा प्रकृति का आश्रयण कर के माया कृपा शक्ति से उत्पन्न होता हूँ—
“अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् ।
प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय संभवाम्यात्ममायया ।।
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ।।
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे ।। ( गीता ४।६-८ )
तुलसीदासजी महाराज ठीक इसी प्रकार कहते हैं—
“जब जब होइ धरम कै हानी । बाढ़हिं असुर अधम अभिमानी ।।
तब तब धरि प्रभु बिबिध सरीरा । हरहिं कृपानिधि सज्जनपीरा ।। (रा० मा० १।१२०।३-४)
“असुर मारि थापहिं सुरन्ह राखहिं निज श्रुतिसेतु ।
जग बिस्तारहिं बिसद जस रामजन्म कर हेतु ।।'' ( रा० मा० १।१२१ )
“रामजनम के हेतु अनेका । परम बिचित्र एक तें एका ।।
जनम एक दुइ कहउँ बखानी । सावधान सुनु सुमति भवानी ।। (रा० मा० १।१२१।१,२)
“एक जनम कर कारन एहा । जेहि लगि राम धरी नरदेहा ।।” ( रा० मा० १।१२३।२)
“जोग लगन ग्रह बार तिथि सकल भए अनुकूल ।
चर अरु अचर हर्षजुत रामजनम सुखमूल ।।” ( रा० मा० ३।१९० )
“जेहि दिन राम जनम श्रुति गावहिं ।” ( रा० मा० १।३३।३ )
इससे अधिक भगवान् के जन्म में क्या प्रमाण हो सकता है । आखिर शरीर धारण ही तो जन्म है । जीव
भी तो देह ही ग्रहण कर जन्म लेता है । वस्तुतः देखा जाय तो जीव भी अजन्मा ही है—
“न जायते म्रियते वा कदाचित् ।” ( गीता २।२० )
जीव के लिए भी कहा गया है कि वह कभी “जायते, अस्ति, वर्धते, विपरिणमंते, अपक्षीयते, विनश्यति”
इन षड्‌विध भाव-विकारों से संसृष्ट नहीं होता । भेद यही है कि जीवों के भौतिक शरीर होते हैं और ईश्वर अपनी
दिव्य लीलाशक्ति के योग से सच्चिदानन्दमय दिव्य श्रीविग्रह धारण करते हैं । अविद्या वश जीव अल्पज्ञ एवं अल्पशक्ति
होता है और परमेश्वर सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान्, नित्य तथा शुद्धबुद्ध-मुक्तस्वभाव होते हैं । उनका श्रीविग्रह प्रकटरूप से
अमुक-अमुक देश और काल में अनुभूत होता है, अप्रकट रूप से वह नित्य एवं विभु भी है ।
“यथा अनेक वेष धरि, नृत्य करइ नट कोइ ।
सोइ सोइ भाव देखावइ, आपु न होइ न सोइ ।। ( रा० मा० ७।७२ )
इस दोहे का यह अर्थ नहीं कि ऐतिहासिक दृष्टि के राम से भिन्न ही कोई राम तुलसी को अभीष्ट
थे । किन्तु इसका अर्थ इतना ही है कि राम, कृष्ण, विष्णु, शिव आदि अनेक रूपों में वेदान्त-वेद्य परब्रह्म का
प्रादुर्भाव होता है ।

यह भी कहना ठीक नहीं कि “रङ्गमञ्च पर अभिनेता के रूप में जो क्रियाएँ की जाती हैं, उनके द्वारा
उनके चरित्र की आलोचना नहीं की जाती केवल अभिनय के उद्देश्य पर ही दृष्टि रखी जाती है।” क्योंकि अभिनय
भी मनमानी नहीं किया जाता। उसके लिए भी नाट्यशास्त्र का आश्रयण करना पड़ता है। अप्रामाणिक अभिनय
कभी भी लक्ष्यसिद्धि का साधक नहीं होता है। भगवान् राम मर्यादापुरुषोत्तम हैं। श्रीभागवत के अनुसार भी उनका
अवतरण मर्त्यशिक्षण के लिए होता है—
“मर्त्यावतारस्त्विह मर्त्यशिक्षणं रक्षोवधायैव न केवलं विभोः ॥” ( भाग० ५।१९।५)
वाल्मीकिरामायण या अध्यात्मरामायण या रामचरितमानस की दृष्टि से राम के चरित्र मानवों के लिए
आदर्श हैं। वेदादि-शास्त्रों ने मानव-जीवन का जो विधान बताया है, उसे कार्यान्वित कर के आदर्श रूप उपस्थित
करना बहुत कठिन और महत्त्वपूर्ण काम है। इसी लिए इस कठिन काम को राम ने उठाया और निभाया। कर्म
क्या हैं, कैसे हैं, उनका कैसे और कौन कब अनुष्ठान करें ? उसे गीता स्पष्ट शब्दों में कहती है कि जो शास्त्रविधि का
उल्लङ्घन करके यथेष्ट चेष्टा करता है उसे सिद्धि, परा गति कुछ भी नहीं मिलती—
“तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ ।
ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि ॥” ( गीता १६।२४ )
अतः हर एक कर्तव्य और अकर्तव्य को शास्त्र के अनुसार जानकर ही कर्म करना उचित है। गोस्वामी
तुलसीदास भी यही कहते हैं—
“बरनाश्रम निज-निज धरम निरत बेदपथ लोग ।
चलहिं सदा पावहिं सुखहि नहिं भय सोक न रोग ॥” ( रा० मा० ७।२० )
“सब नर करहिं परस्पर प्रीती । चलहिं स्वधर्मनिरत श्रुतिरीती ॥”(रा० मा० ७।२०।१)
भक्ति के साधन रूप में यही कहा—
“निज निज धरम निरत श्रुतिरीती ॥” ( रा० मा० ३।१५।३ )
श्रीकृष्ण ने गीता में भी यही कहा—यदि मैं शास्त्रानुसारी कर्म न करूँ तो ये लोग नष्ट हो जायेंगे और
मैं सङ्कर का कर्ता बन जाऊँगा—
“उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम् ।
सङ्करस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः ॥” ( गीता ३।२४ )
अतएव इस कथन में भी कुछ सार नहीं है कि “भगवान् यदि राम की भूमिका में उतरते हैं तो उनके
पार्षद जय-विजय रावण-कुम्भकर्ण की भूमिका में आते हैं। सत्-असत् के शाश्वत संघर्ष को विश्व के समक्ष प्रस्तुत
करना ही उसका उद्देश्य था, जिससे व्यक्ति अपने हृदयस्थ रावण को पहचान कर उसके विनाश की प्रक्रिया को
जान ले।” क्योंकि उस स्थिति में प्रश्न होगा कि राम-रावण नाम के कोई प्रामाणिक वस्तु हैं या केवल काल्पनिक
भावरूप ही हैं ? यदि पहली बात है तब तो ऐतिहासिकता से पिण्ड नहीं छूटेगा, यदि काल्पनिक ही हैं तब तो फिर
रावण अपने भीतर की ही कोई दुर्वृत्तियों का पुञ्ज हैं, वैसे ही राम भी सद्वृत्तियों का पुञ्ज ही हैं, फिर राम नाम
का जप, रामचरित्र का श्रवण, पठन, पाठ आदि का क्या महत्त्व होगा ? सिद्धान्ततः राम ऐतिहासिक होने पर भी
नित्य हैं, क्योंकि वेद के तुल्य ही रामायण तथा महाभारत भी नित्य हैं। इसी लिए वे वेद के उपबृंहण हैं। जैसे
प्रतिकल्प में वेदों का प्रादुर्भाव होता है, वैसे ही महाभारत, रामायण का प्रादुर्भाव होता है। भेद यह है कि वेदों की
अक्षरानुपूवीं में कोई परिवर्तन नहीं होता है, किन्तु रामायण तथा महाभारत की आनुपूर्वी में परिवर्तन होता है।
परार्थ और सिद्धान्त एक से रहने पर भी अक्षरानुपूवीं में परिवर्तन हो सकता है। भगवान् का गोलोक, साकेत

में प्रकटरूप से रहना सिद्ध ही है। भगवान् नित्य एवं सर्वत्र सुलभ होने पर भी प्रकटरूप से ऐतिहासिक
रूप में ही भगवान् के जन्म और कर्म होते हैं। उन्हीं का वर्णन और श्रवण होता है। उन्हीं से प्राणियों की
सद्गति होती है।
"ऐतिहासिक दृष्टि से राम का चरित्र देखने पर अनगिनत प्रश्न उठ खड़े होते हैं।" यह कथन जल्पवाद
है। केवल सहस्रों प्रश्न खड़े होंगे, इसलिए सत्य का अपलाप कर के भगवान् को एक भावात्मक वस्तु ही मान लेना
उचित नहीं, “सति कुड्ये चित्रोल्लेखः” भित्ति होने पर हो चित्र होता है। यदि कोई ऐतिहासिक तथ्य वस्तु है,
तभी उसमें आध्यात्मिक कल्पनाएँ भी सङ्गत हो सकेंगी। ऐसा नहीं तो आकाश-चित्रवत् सब कल्पनामात्र ही
रह जायेगी और हर प्रश्न का समाधान है ही। "ऐतिहासिक दृष्टि से राम को एक भूतकालीन राजकुमार के रूप
में देखना उसी दलदल में फँस जाना है जिससे भक्तों ने हमें उबारने की चेष्टा की है।" इसका उत्तर स्पष्ट है—श्री-
राम ऐतिहासिक राजकुमार के रूप में परब्रह्म परमात्मा के अवतार थे और वे आज भी साकेत धाम में प्रकटरूप से
रहते हैं। जहाँ भी भक्त उनका शुद्ध भाव से आह्वान करता है वहीं वे प्रकट होते हैं। इस सम्बन्ध में सम्पूर्ण
महाभारत, रामायण तथा पौराणिक साहित्य प्रमाण हैं। किसी भक्त ने कहीं भी यह नहीं कहा कि श्रीराम दशरथ
के यहाँ राजकुमाररूप से प्रकट नहीं हुए थे। तुलसी तो मानते हैं—
"जेहि इमि गावहिं बेद बुध जाहि धरहि मुनि ध्यान ।
सुइ दसरथसुत भगतहित कोसलपति भगवान् ॥” (रा० मा० १।११८)
इतना ही नहीं निर्गुण निराकार ब्रह्म के समान ही सगुण साकार ब्रह्म भी सर्वव्यापी होता है। इस विषय
पर जीवगोस्वामी प्रभृति आचार्यों ने बहुत-कुछ लिखा है।
अतः राम का ऐतिहासिक स्वरूप मानना दलदल में फँसना नहीं है, किन्तु वैसा न मानना ही नास्तिकता
के दलदल में फँस जाना है। कहा जाता है कि "आजकल ऐसे लोग बहुत बड़ी संख्या में हैं, जो श्रीराम को
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में रखकर दुर्भावनाओं की सृष्टि में संलग्न हैं। कुछ लोग इसमें उत्तर और दक्षिण का सङ्घर्ष
देखते हैं। यह आर्य और द्रविड़ के सङ्घर्ष के रूप में देखा जा रहा है। दक्षिण में यह बहुत प्रचलित तथ्य बनता जा
रहा है कि उत्तर ने दक्षिण पर आक्रमण किया था। आर्य राम ने द्रविड़ रावण को परास्त किया। भूत काल का
बदला अब श्रीराम के चित्रों से लेने की चेष्टा की जा रही है।"
श्रीरामचरित्र को ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में रखकर दुर्भावनाओं की सृष्टि में जो लोग लगे हैं, वे वेदादि-
शास्त्रों का प्रामाण्य नहीं मानते। रामायण का भी प्रामाण्य नहीं मानते, उनको आप तो क्या ! कोई भी नहीं मना
सकता है। किन्तु जो रामायण पढ़ेगा, उसका प्रामाण्य स्वीकार करेगा, वह कभी राम-रावण के सङ्घर्ष को आर्य-
द्रविड़ का सङ्घर्ष नहीं कह सकता, क्योंकि वाल्मीकिरामायण से ही सिद्ध है कि रावण महर्षि पुलस्त्य का पौत्र और
विश्रवा का पुत्र था। मानस में भी कहा गया है—'उत्तम कुल पुलस्ति कर नाती।' (रा० मा० ६।१९।२)
वह वैदिक ब्राह्मण था। पुलस्त्य आदि वैदिक आर्य थे, अनार्य नहीं थे। श्रीराम भी वैदिक आर्य थे—"आर्यः
सर्वसमश्चैव''''।'' हाँ, वह (रावण) असुरों और राक्षसों की भावनाओं का पोषक था और स्वयं माता के सम्बन्ध
द्वारा उनसे सम्बन्धित था। वस्तुतः भगवान् का पार्षद था और भगवान् की इच्छा से ही उनकी युद्ध की चिक्रीडिषा
की पूर्ति के लिए सनकादि के शाप के व्याज से रावण रूप में अवतीर्ण था। यह सब रामायणप्रामाण्य से ही सिद्ध
है। यदि रामायण का प्रामाण्य अमान्य है, तो न तो आपके भावात्मक राम सिद्ध होंगे और न रावण सिद्ध होगा।
क्योंकि आधुनिक इतिहास में उनका अस्तित्व है ही नहीं। आधुनिक ऐतिहासिक एवं प्रागैतिहासिक काल सब
६ हजार वर्ष के भीतर का ही है; उसमें न राम हैं और न रावण है। अतएव यह सब निर्मूल है कि "उत्तर ने

७५० रामायणमीमांसा एकविंश
दक्षिण पर आक्रमण किया । आर्य राम ने द्रविड़ रावण को परास्त किया । भूतकाल का बदला श्रीराम के चित्रों से लेने
की चेष्टा की जा रही है ।” क्योंकि रामायण की दृष्टि से वैसा सिद्ध नहीं है । अन्य प्रामाणिक इतिहास भी वैसा नहीं है ।
आपका यह कहना कि “वर्तमान युग की राजनीति को उसी परिप्रेक्ष्य में देखा जा रहा है—सावधान ! वही इतिहास
फिर लौटने न पावे । मिथ्या उन्माद की सृष्टि करके राजनीतिक-लाभ प्राप्त करने की चेष्टा की जा रही है ।” परन्तु
इस उन्माद का समाधान है, ऐतिहासिक वस्तुस्थिति का सम्यक् प्रचार, न कि पलायनवाद । याद रहे । आप कितना
भी कहें कि राम-रावण ऐतिहासिक पुरुष नहीं हैं, किन्तु वे आध्यात्मिक सत्-असत् के प्रतीक हैं तो भी राम का पुतला
जलाना बन्द नहीं करेंगे । उनका स्पष्ट कहना है कि आप लोग रामलीला करना कराना बन्द कर दो । क्या
आप यह स्वीकार करेंगे ? काशी में श्रीतुलसीदासजी के समय से ही रामलीला प्रचलित है और उस पराधीनता
के युग में जब कि हिन्दुओं का अपना कोई राजा नहीं था । उस समय रामलीला के जादू से लोगों के मुर्दार
मन में उत्साहित जीवन आया था और सभी बाल, वृद्ध, स्त्री, पुरुष गरज कर बोलते थे--बोलो राजा रामचन्द्र
भगवान् की जय । आज भी वह गर्जन की परम्परा सुरक्षित है ही । वे स्पष्ट मानने लगे थे कि वास्तव में हम
स्वतन्त्र हैं । हमारा राजा रामचन्द्र ही हैं और नहीं । यदि आप जैसे लोग रामलीला बन्द भी कर दें, तो उनका यह
भी आग्रह होगा कि आप राम-रावण की कथा भी बन्द करो । अन्त में वाल्मीकिरामायण और मानस की पुस्तकों
को जप्त करायेंगे और प्रत्यक्ष उनकी होली खेलेंगे । अतः पलायनवाद समाधान नहीं है । हम मन्दिरों में शङ्ख-घड़ि-
याल बजाते हैं । बहुत लोगों को बहुत बुरा लगता है और कुत्ते बेचारे तो रोने ही लगते हैं । क्या करें, बन्द कर दें
घण्टा, घड़ियाल और शङ्ख बजाना, बन्द कर दें पूजा करना ?
इसी तरह यह भी कहना निरर्थक है कि “उत्तरभारत में भी राम निर्विवाद नहीं हैं । एक ओर तो उन्हें
वर्ण-व्यवस्था के आधार पर आलोचना का विषय बनाया जा रहा है । राम शूद्रविरोधी और ब्राह्मणवादी हैं । इससे
लगता होगा कि ब्राह्मण तो उनके समर्थक होंगे ही; किन्तु कई ब्राह्मणपुङ्गव कहते हैं कि क्षत्रिय राम के समक्ष
भगवान् परशुराम की पराजय और स्तुति कराकर तुलसीदास ने अनर्थ कर डाला । कई लोग राम-रावण के युद्ध को
ब्राह्मण-क्षत्रिय के संघर्ष के रूप में देखते हैं । हो सकता है आगे चलकर श्रीराम को ब्राह्मण-द्वेषी सिद्ध किया जाय ।”
उक्त सभी बातें रामायण के विरुद्ध ही हैं । अगर रामायण का प्रामाण्य मान्य नहीं, तो राम होना ही असिद्ध है ।
यदि रामायण का प्रामाण्य मान्य है तो उसके अनुसार श्रीराम एक निष्पक्ष वेदादिशास्त्रानुसारी सम्राट् के रूप में
अवतीर्ण परब्रह्म थे । वे धर्मविरुद्ध आचरण करने पर रावण जैसे ब्राह्मण को भी प्राणदण्ड दे सकते हैं तो किसी
धर्मविरुद्ध शूद्र को भी प्राणदण्ड दे सकते हैं । अतएव वसिष्ठादि ब्राह्मण और निषादराज, कोल, भिल्ल और किरात
ही क्यों बन्दर, भालू, गीध, कौए आदि भी राम के अनन्य उपासक थे । -आज भी रामलीलाओं में स्त्री-पुरुष, बाल-
वृद्ध, ब्राह्मण-शूद्र सभी सम्मिलित होकर अपने निष्पक्ष सर्वहितकारी राजा रामचन्द्रजी महाराज की जय-जयकार करते
हुए उनके रथ को खींचते हैं । उनके विमान में कन्धा लगाकर धन्य-धन्य होते हैं । राम-परशुराम की कथा शास्त्र-
प्रामाण्यवादियों की दृष्टि में वस्तुस्थिति है, अपमान का वहाँ प्रश्न ही क्या है ? पुराणों के अनुसार एक भगवान् विष्णु
ही राम हैं । विष्णु के ही अंश परशुराम हैं । वाल्मीकिरामायण के अनुसार श्रीराम “ब्राह्मणानामुपासिता” ब्राह्मणों के
उपासक हैं । श्रीतुलसी के अनुसार श्रीराम विप्रपदपूजा का कवच पहनते हैं—
“कवच अभेद विप्रपद पूजा ।” (रा० मा० ६।७९।५)
और उनकी भक्ति का मुख्य आधार ही विप्रचरणप्रीति है—
“प्रथमहिं बिप्रचरन अति प्रीती ।” (रा० मा० ३।१५।३)

अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७५१
हाँ, पलायनवाद की नीति में भले ही ऐतिहासिक राम से पिण्ड छुड़ाकर कोई काल्पनिक राम का गुणगान
करो तो भी वेदादि शास्त्र न माननेवालों का मन आप बदल नहीं सकते । संसार में लोग रामायण की कथा को एक
सत्य घटना मानकर ही उसके अनुसार परमात्मा का श्रीरामरूप में अवतरण मानते हैं और उनके चरित्रों के सुनने
में पुण्य-प्राप्ति है, अतः उससे लाभ उठाते हैं । वस्तुतः ऐतिहासिक दृष्टि से भगवान् राम के चरित्र की समीक्षा से
घबड़ाने की बात नहीं है। राम अनादि अनन्त ब्रह्माण्ड में भी हैं और सब व्यक्तियों के अन्तरात्मा हैं। फिर भी
अवतार की दृष्टि से वे व्यक्ति भी हैं। सर्वरहित एवं सर्वस्वरूप हैं तो भी वे धर्मसंस्थापन के लिए अवतीर्ण थे, अतः
उस धर्म का पालन करते थे। साथ ही वे एक धार्मिक सम्राट् एवं वैदिक धर्म के रक्षक थे । वे आर्य, अनार्य, ब्राह्मण,
क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र न होते हुए भी अवतार की दृष्टि से क्षत्रिय थे । उन्होंने कहा—
“हम क्षत्रिय मृगया बन करहीं। तुम्ह से खल मृग खोजत फिरहीं ॥” (रा० मा० ३।१८।५)
"राम जाति-पाँति नहीं मानते थे ।” यह कहना सत्य का अपलाप करना है। जब वे धर्म-संस्थापनार्थ
आये थे और वैदिक धर्म जातिमूलक ही है, तब यह कैसे हो सकता है कि राम जाति-पाँति न मानें ।
“मानउँ एक भगति कर नाता ।” (रा० मा० ३।३४।२)
का यही अर्थ है कि किसी भी जाति का व्यक्ति उनको भजकर कृतार्थ हो सकता है। भक्ति न होने पर
जाति, पाँति, कुल, धर्म सब व्यर्थ होते हैं। किन्तु भक्ति के साथ वे वैसे ही महत्त्वपूर्ण होते हैं जैसे अङ्क रहने पर
शून्य का गौरव होता है। कोई भी समझदार शून्य को निरर्थक नहीं कह सकता, क्योंकि शून्य अङ्क बिना शून्य हैं पर
अङ्क रहने पर दशगुना विस्तार के हेतु होते हैं। इसी अर्थ में यह पंक्ति कही गयी है—
“भगतिहीन नर सोहइ कैसा । बिनु जल बारिद देखिअ जैसा ॥” (रा० मा० ३।३४।३)
कहा जाता है कि--
“सहज सरूप कथा मुनि बरनत रहत सकुचि सिर नाई ।
केवट मीत कहे सुख मानत वानर बन्धु बड़ाई ॥”
कहा जाता है कि “ब्राह्मणों को समादर देते हैं पर आनन्द उन्हें तभी आता है जब केवट उन्हें मित्र कह
कर पुकारता है ।” परन्तु इससे यह कहाँ सिद्ध होता है कि राम जाति पाँति नहीं मानते । “नीचहूँ सो करत
प्रीति....।” इस पद्य से तो स्पष्ट है कि राम जाति मानते थे क्योंकि उक्त पद में जातिवाचक शब्द का संप्रयोग है ।
रही बात प्रीति की सो जाति प्रेम में बाधक नहीं है। इसी लिए तो राम उच्च कुल के होते हुए भी नीच, कुजाति
वालों से प्रेम करते थे । यह उनकी महत्ता है। गीध, शबरी, वानर, भालू, कोल-भील, किरातों से भगवान् राम
प्रेम करते हैं, उनके मित्र हैं, इन बातों में विवाद नहीं है; परन्तु—
'बरनाश्रम निज निज धरम निरत वेदपथ लोग ।
चलहिं सदा पावहिं सुखहिं नहि भय सोक न रोग ॥” ( रा० मा० ७।२०)
यह वाणी श्रीराम को अस्वीकृत है क्या ?
कहा जाता है कि “ऐतिहासिक दृष्टि से राम के चरित्र को देखने से अनेक प्रश्न खड़े होते हैं ।” यही
क्यों परमेश्वर पर क्या कम विवाद है ? जैनों और बौद्धों का बहुत बड़ा समाज है । उनकी दृष्टि में जगतकारण ईश्वर
मानना भी अनेक मूर्खताओं में से एक है । सांख्य और मीमांसकों की दृष्टि में भी ईश्वर की समालोचना की गयी है ।
इस तरह क्या आस्तिक ईश्वर मानना छोड़ देंगे ? संसार में लोग अपने-अपने विश्वास एवं धारणाओं के अनुसार
भिन्न-भिन्न मत रखते हैं, तो भी ईश्वरवादी अपनी-अपनी भावना के अनुसार ईश्वर की भक्ति करते ही हैं। वैसे ही

७५२ रामायणमीमांसा एकविंश

ऐतिहासिक दृष्टि से लोगों की समालोचनाओं के रहते हुए भी श्रीराम का ऐतिहासिक, आध्यात्मिक, आधिदैविक रूप
भी मान्य है। वाल्मीकि तथा व्यास के द्वारा रचित रामायण, महाभारत, पुराण, संहिता, तन्त्र, आगम एवं मन्त्र,
ब्राह्मण, उपनिषद्, वेद के आधार पर ही राम व्यापक परमात्मा और ऐतिहासिक अवतारी भी हैं। उनकी विस्तृत
कथा का आधार वाल्मीकिरामायण ही है। कोई भी कथा प्रामाणिक होने पर आदरणीय हो सकती है। श्रीराम
वानरों के मित्र थे, शबरी के फल खानेवाले हैं। निषादराज के मित्र हैं। उनका गीध तथा भुशुण्डि से भी सम्बन्ध
था, यह सब यदि ऐतिहासिक नहीं है, तब क्या कल्पनामात्र है ? याद रहे, अपौरुषेय-वेद एवं तन्मूलक आर्ष वचनों के
आधार पर ही श्रीराम एवं उनके मित्र सिद्ध होगें, अन्यथा निर्मूल गल्पमात्र सब बात समझी जा सकती है। किसी
साधु-सन्त, महात्मा या वक्ता तथा कल्पक की कल्पना कल्पना ही रह जायेगी। तुलसीदास की रामायण भी उनकी
अपनी कल्पना नहीं है। उन्होंने “नानापुराणनिगमागम” के आधार पर ही रामचरित गाया है। वे वाल्मीकिरामायण
के सेतु द्वारा ही रामचरित का रसास्वादन करते हैं। यदि वाल्मीकिरामायण की उपेक्षा करनेवाला कोई भी हो
निश्चित ही तुलसी एवं उनके राम का भक्त नहीं हो सकता। यह ठीक है कि “तुलसी के राम प्रत्येक देश, काल
और व्यक्ति के हैं। उन्हें देश, काल तथा जाति की संकीर्ण परिधि में नहीं बाँधा जा सकता है। अनाथ तुलसी इन्हीं
राम का आश्रय पाकर धन्य हुए थे।” परन्तु वे राम क्या दशरथनन्दन नहीं थे ? क्या वे कौशल्यानन्दवर्धन नहीं थे ?
वस्तुतः कौन कहता है कि दशरथनन्दन ऐतिहासिक राम ईश्वर नहीं, वे प्रत्येक देश एवं काल के नहीं हैं ?
वे सब देश तथा सब काल के होते हुए भी ऐतिहासिक भी हैं। अयोध्या ऐतिहासिक नगरी थी। सूर्यवंशी राजा
दशरथ उसके सम्राट् थे। वसिष्ठजी उनके पुरोहित थे। उनके प्रयत्न से सर्वव्यापी राम उनके पुत्ररूप में प्रकट
हुए थे—
जग निवास प्रभु प्रगटे अखिललोक विश्राम।” (रा० मा० १।१९१)
इस ऐतिहासिक तथ्य का अपलाप करने से ईश्वर राम की भक्ति भी असम्भव हो है। निर्गुण निराकार राम
को सगुण साकार रामरूप या श्रीकृष्ण के रूप में प्रकट होने के लिए और अपनी लीलाओं का रसास्वादन कराने के
लिए भी किसी देश और काल में किसी माता-पिता से प्रकट होना पड़ता है। लीलाओं के लिए भी अनेक ऐतिहासिक
व्यक्तियों का उपयोग करना पड़ता है। इसी लिए तो “यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति” के अनुसार “जब
जब होइ धर्म कै हानी” तब तब भगवान् का प्रादुर्भाव माना जाता है।
यह कहना सङ्गत नहीं है कि “व्याकरण शब्दानुशासन है। वह व्यक्ति के लिए है न कि व्यक्ति शब्दा-
नुशासन के लिए। व्याकरण जब एक भवन की भाँति होता है। तब वह भाषा को सुरक्षा प्रदान करता है। किन्तु
उसका अतिरेक व्याकरण को कारागार बना देता है। जहाँ भाषा का सहज स्वरूप समाप्त होकर केवल कृत्रिमता शेष
रह जाती है।” (मा० मु० ३)
क्योंकि व्याकरण तो अपशब्दों से साधु शब्दों का विश्लेषण करता है। वही शब्दों का संस्कार है। शब्दों
के सहज स्वरूप की अभिव्यक्ति व्याकरण के द्वारा होती है। सूत्रों से प्रकृति और प्रत्ययों द्वारा शब्द-संस्कार की पद्धति
केवल बाल-व्युत्पादनार्थ है। शब्द तो नित्य ही हैं।
यदि शब्द का निश्चित स्वरूप न होगा तो उसके रूपान्तरण की कोई सीमा न रहेगी। फिर तो उसका
अर्थसम्बन्ध भी न रह सकेगा। ऐसी स्थिति में अन्य भाषाओं के समान संस्कृत शब्दों का रूपान्तरण होने से कालान्तर
में उनका ज्ञान भी असम्भव हो जायगा। नियमित रूप होने का ही परिणाम है कि लाखों वर्ष पुराने वाल्मीकिरामायण
का अर्थ आज भी समझा जा सकता है। परन्तु जिन भाषाओं का रूप बदल जाता है उनका अर्थ पचास वर्षों में ही
दुर्ज्ञेय हो जाता है।

जिस सम्बन्ध में पूर्ण परिचय न हो उचित है कि उस सम्बन्ध में प्राणी अनधिकार चेष्टा न करे । पृ० २३
मानसमुक्ता का सारा प्रसङ्ग काल्पनिक एवं आभासमय है ।
“भवानीशङ्करौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ ।
याभ्यां बिना न पश्यन्ति सिद्धाः स्वान्तस्थमीश्वरम् ॥”
वस्तुतः भवानी और शङ्कर दोनों ही नित्य वस्तु हैं । शङ्कर अनन्तकोटि ब्रह्माण्डों के अधिपति परमेश्वर
हैं । भवानी अनन्तकोटि ब्रह्माण्डोत्पादिनी शक्ति हैं । केवल ब्रह्म की उपासना नहीं बनती, किन्तु शक्तिविशिष्ट ब्रह्म
एवं साधिष्ठाना शक्ति की ही पूजा होती है । स्वरूपतः दोनों ही एक हैं । साधिष्ठाना शक्ति एवं शक्तिमद् ब्रह्म का
एक ही अर्थ होता है । इसी लिए जैसे श्रीतुलसीदास ने—'नमामीशमीशान' आदि स्तोत्र में शिवजी को ब्रह्मरूप कहा
है वैसे ही पार्वती के लिए भी—"भव भव विभव पराभवकारिणि" कहकर उन्हें भी ब्रह्मरूप ही कहा है,
क्योंकि “जन्माद्यस्य यतः” (ब्रह्मसूत्र १।१।२) के अनुसार जो सम्पूर्ण जगत् का उत्पादक, पालक और संहारक है
वही ब्रह्म है ।
जैसे राम और कृष्ण दोनों ही में ब्रह्म के लक्षण सम्पूर्ण हैं वैसे ही शिव और पार्वती दोनों में ब्रह्म के
सम्पूर्ण लक्षण हैं । वही बात सीता-राम और राधा-कृष्ण के सम्बन्ध में जाननी चाहिये । जैसे एक नट अनेक रूपों में
रङ्गमञ्च पर आता है वैसे ही वेदान्तवेद्य परब्रह्म अनेक रूपों में आता है । ब्रह्म का ऊँचा से ऊँचा जो रूप है वह
सीतोपनिषद् में सीता के लिए कहा गया है । सीता या राम, भवानी या शङ्कर दोनों ही निर्गुण निराकार, सगुण
निराकार एवं सगुण साकार हैं ।
यह बात वेदों, उपनिषदों, महाभारत, रामायण, पुराणों एवं तन्त्रों में स्पष्ट है । उन्हीं भवानी और
शङ्कर में श्रद्धा और विश्वास का आरोप है : भवानी और शङ्कर के स्वरूप में ही श्रद्धा और विश्वास को महत्त्वपूर्ण
मानकर उनका आदर करना चाहिये ।
वस्तुतः वे दोनों तो नित्य ब्रह्मरूप हैं । किन्तु श्रद्धा तथा विश्वास दोनों ही अन्तःकरण के धर्म हैं ।
शास्त्रों ने तो गुरु तथा वेदान्त वाक्यों में विश्वास को ही श्रद्धा कहा है फिर भी जैसे भवानी और शङ्कर एक होते
हुए भी व्यावहारिक रूप में एक में जननीस्वभाव-सुलभ कोमलता का अधिक प्राधान्य है—
‘कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ।" ( अपराधक्षमा० स्तो० )
और दूसरे में ईश्वर के अनुगुण मर्यादा-पालन में दृढ़ता का प्राधान्य है। श्रद्धा में कोमलता का झुकाव
अधिक होता है । विश्वास में दृढ़ता, स्थिरता और कठोरता अधिक है । यदि और सूक्ष्मदृशा से देखें तो शिव अग्निरूप
हैं तथा भवानी सोमरूप हैं । सोम में कोमलता तथा सरसता है । अग्नि में प्रकाश, उष्णता और दृढ़ता होती है ।
सारा संसार ही अग्नीषोमात्मक है । संसार की जितनी भी कोमल वस्तुएँ हैं उन सब में सोम का प्राधान्य है ।
जितनी कठोर वस्तुएँ हैं उनमें अग्नि का प्राधान्य है ।
उपनिषदों में यज्ञगत जल, दधि, दुग्ध, घृत, सोमरस आदि श्रद्धापदवाच्य कहे गये हैं । उन श्रद्धापदवाच्य
पदार्थों से समवेत कर्मों एवं तज्जन्य अपूर्व या अदृष्ट को भी श्रद्धा या अप् शब्द से व्यवहृत किया जाता है । श्रद्धा
होने पर ही प्राणी में इष्ट के प्रति झुकाव होता है । जिसके प्रति श्रद्धा होती है उसके प्रति प्राणी का अन्तःकरण,
अन्तरात्मा और सिर झुक जाता है । विश्वास से उसमें दृढ़ता आ जाती है । भक्ति में भी द्रवता होती है, कोमलता
रहती है ।
अन्तःकरण को लाक्षा ( लाह ) के समान कठोर द्रव्य माना गया है । वह तापक भावों से द्रवीभूत
हो जाता है । स्नेह, काम, क्रोध, द्वेष, ईर्ष्या आदि के सम्पर्क से अन्तःकरण पिघलता है । जैसे पिघली हुई लाक्षा
९५

७५४ रामायणमीमांसा एकविंश
में डाला हुआ रङ्ग स्थिर हो जाता है वैसे ही पिघले हुए अन्तःकरण में अभिव्यक्त भगवान् भी अन्तःकरण
में स्थिर हो जाते हैं ।
हम अनेक पदार्थों को देखते हैं, किन्तु उनका स्मरण नहीं रहता है । परन्तु जिसे स्नेह, काम, भय,
द्वेष आदि से द्रवीभूत मन से देखते हैं उसे भुलाने का प्रयत्न करने पर भी भुला नहीं पाते । किसी प्रिय मित्र या
प्रेयसी कामिनी की विस्मृति नहीं होती । सर्प, व्याघ्र या शत्रु को भय तथा द्वेष से द्रुत अन्तःकरण से ग्रहण करने
के कारण ही हम उन्हें भी नहीं भूल पाते हैं ।
सोमजातीय होने के कारण ही जल, दुग्ध, दधि, सोमलता आदि में द्रवता-कोमलता है । सोमांश होने
के कारण ही भक्ति, स्नेह, करुणा, श्रद्धा आदि अन्तःकरण के गुण प्रकट होते हैं । विश्वास भी अन्तःकरण का धर्म
है । श्रद्धा और विश्वास जब दोनों ही निर्दोष प्रमाण के आधार पर होते हैं तभी आदरणीय होते हैं । अविवेक के
कारण भी श्रद्धा तथा विश्वास होते हैं पर वे अन्धविश्वास एवं अन्धश्रद्धा ही होते हैं ।
संसार अनन्त है । परन्तु मनुष्य का ज्ञान बहुत सीमित होता है । चक्षु, श्रोत्र, घ्राण आदि इन्द्रियाँ,
मन आदि ज्ञान के साधन हैं । चक्षु तथा घ्राण के द्वारा बहुत सीमित वस्तुओं को जाना जा सकता है । मन, बुद्धि
आदि भी आन्तर सुख, दुःखादि के ज्ञान में स्वतन्त्र होते हुए भी बाह्य विषयों में वे स्वतन्त्र नहीं हैं । चक्षुरादि के
परतन्त्र होकर ही वे कुछ विषयों का ज्ञान करा सकते हैं ।
योगशास्त्र के अनुसार यदि प्रातिभ ज्ञान या ऋतम्भरा प्रज्ञा प्राप्त हो तो अधिक ज्ञान हो सकता है ।
योगजनित दिव्य ज्ञान के सामने तो सम्पूर्ण ज्ञेय ही ज्ञान की अपेक्षा कम हो जाता है । पर जो उत्कृष्ट कोटि की
सम्प्रज्ञात समाधि या असम्प्रज्ञात समाधि से सम्पन्न नहीं हैं उसके लिए ज्ञान के द्वार बहुत ही सीमित हैं । साथ ही
दम्भ की महिमा से गैर योगी भी योगी होकर पूजित होते हैं । फिर किस प्रकार सत्य वस्तु का ज्ञान हो सकता है ?
अतः अपौरुषेय मन्त्र-ब्राह्मणात्मक वेद एवं वेदमूलक आर्ष ग्रन्थों के द्वारा ही प्राणी अपने अभ्युदय एवं निःश्रेयस के
उपायों को जान सकता है ।
जैसे अकारणकरुणावरुणालय भगवान् प्राणियों के कल्याणार्थ ही उनके कर्मों के अनुसार अनन्त कोटि
ब्रह्माण्डात्मक प्रपञ्च का निर्माण करते हैं, वैसे ही वही प्रभु अभ्युदय एवं निःश्रेयस के उपायों को प्रकट करते हैं ।
श्रीभागवत में कहा गया है कि वेद साक्षात् नारायण ही हैं—
"वेदो नारायणः साक्षात् स्वयंभूरिति शुश्रुमः ।” ( भाग० ६।१।४० )
उन वेदादिशास्त्रों एवं तदनुसारी श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ गुरुओं के वाक्यों में विश्वास ही श्रद्धा है ।
ऐसी स्थिति में कबीरदास का व्यङ्ग्यभरा निम्नोक्त उत्तर निःसार है—
“तू कहता कागद की लेखी । मैं कहता आँखिन की देखी ॥”
वेदशास्त्र साक्षात् ईश्वर का निःश्वास है कागद की लेखी नहीं है । स्मृति क्षीण होने पर स्मृति की
सहायता के लिए कागद की लेखी का भी उपयोग होता है ।
धर्म और ब्रह्म दोनों ही आँखों के ही नहीं प्राणियों के मन और बुद्धि के भी सर्वथा अगोचर ही हैं ।
जिस वस्तु को प्रत्यक्ष या अनुमान से नहीं जाना जाता । उसी वस्तु के ज्ञान के लिए वेदों का आविर्भाव होता है—
"प्रत्यक्षेणानुमित्या वा यस्तूपायो न वेद्यते ।
एनं विदन्ति वेदेन तस्माद् वेदस्य वेदता ॥”

अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७५५
अज्ञातज्ञापक होने से ही प्रमाण का प्रामाण्य होता है। चक्षु के बिना अन्य प्रमाणों से रूप का बोध
नहीं होता। इसी लिए रूपज्ञान में नेत्र ही प्रमाण है। घ्राण के बिना गन्ध का बोध नहीं होता। इसी लिए गन्ध-
ज्ञान में घ्राण का प्रामाण्य है ।
तुलसी के शब्दों में ऐसी कोई बात नहीं मिलती जिससे वेदों का अनादर हो, वे तो स्वयं निरतवेदपथ
लोगों का ही महत्त्व मानते हैं। भक्ति में ही निरतश्रुतिनीति का ही महत्त्व मानते हैं। वेद की निन्दा करने से
बुद्ध अवतार धारण करनेवाला ईश्वर भी निन्दित होकर उपेक्षणीय हो जाता है—
“जेहि निन्दत निन्दित भयो विदित बुद्ध अवतार।”
वेदनिन्दकों की उन्होंने निम्नोक्त शब्दों में खबर ली है—
“शब्दी साखी दोहरा कहि नाना उपखान कहहिं खल निन्दहिं वेद पुरान ।”
आश्चर्य है—तुलसी मानस के आधार पर सुख-सुविधाओं को प्राप्त करनेवाले लोग ऐसी बातें कैसे
करते हैं !
यह कहना सर्वथा असङ्गत ही है कि कोई भी प्रमाण प्रत्यक्ष का स्थान नहीं ले सकता । क्योंकि प्रत्यक्ष
और अनुमान तो केवल लौकिक वस्तुओं तक ही सीमित रहते हैं। वेदादि प्रमाण ही वस्तुतः प्रमाण हैं । अतएव प्रत्यक्ष
तथा अनुमान का अतात्त्विक सां व्यावहारिक ही प्रामाण्य है । तात्त्विक प्रामाण्य तो वेदों का ही है। क्योंकि प्रत्यक्षादि
के विषय घटादि व्यवहारकाल में ही अबाधित होते हैं। परमार्थतः ब्रह्मातिरिक्त सब वस्तुएँ बाधित होती हैं, वे
अत्यन्त अबाध्य नहीं हैं। अत्यन्त अबाध्य तो केवल भगवान् ही हैं। अतएव तात्त्विक प्रामाण्य ब्रह्मबोधक वेद का ही
है । अन्य प्रमाणों का अतात्त्विक सां व्यावहारिक ही प्रामाण्य है ।
प्रत्यक्ष प्रमाण ज्येष्ठ प्रमाण ही आगम और अनुमान से प्रथम ही प्राणियों के व्यवहार में उपयुक्त होता
है । परन्तु यह ज्येष्ठत्व बाध्यता का हेतु है अबाध्यता का नहीं है । अतएव शुक्तिका में रजतज्ञान यद्यपि ज्येष्ठ है
तथापि पश्चाद्भावी कनीयान् शुक्ति ज्ञान से बाधित हो जाता है।
प्रामाण्यवाद का परिचय न होने से ही ऐसी बातें कही जा सकती हैं। आँखों की तो बात ही क्या ?
वर्णाश्रमानुसारी धर्मों एवं उपास्य स्वरूपों तथा शुद्ध ब्रह्म का प्रबोध तो वेद से अतिरिक्त प्रमाणों से हो ही नहीं सकता
है । वेदोपनिषद् शास्त्राचार्योपदेश से संस्कृत निर्मल मन या एकाग्रमनःसहकृत उपनिषद्-महावाक्य ही ब्रह्मसाक्षात्कार
के साधन हैं, आँख नहीं ।
सगुण साकार ब्रह्म का साक्षात्कार भी भगवच्चरणपङ्कज में समर्पण बुद्धि से अनुष्ठित स्वधर्मों से प्रसन्न हुए
भगवान् के द्वारा दत्त दिव्य दृष्टि से ही सम्भव होता है सामान्य चक्षुओं से नहीं । आश्चर्य तो यह है एक रामायण
वक्ता वेदशास्त्र को प्रमाण न मानकर कबीर को मानते हैं ।
यह कहना भी असङ्गत है कि “जो ऋषि ब्रह्म का साक्षात्कार कर चुके हैं। उन मन्त्रद्रष्टा ऋषियों ने जो
वाक्य कहे हैं वे प्रामाणिक हैं।”
मन्त्रद्रष्टा ऋषियों के वाक्य नहीं, किन्तु वे मन्त्र-ब्राह्मणात्मक वेद ही प्रमाण हैं जिनका ऋषि लोग दर्शन
करते हैं । ऋषियों के वे ही वाक्य प्रमाण हैं जो उन मन्त्रों और ब्राह्मणों के अविरुद्ध हैं । उनके विरुद्ध ऋषि वचन
भी प्रमाण नहीं हो सकते ।
“इस तर्क को सर्वथा अस्वीकार नहीं किया जा सकता । फिर भी शास्त्रों की प्रामाणिकता को असंदिग्ध
बनाने के लिए यह आवश्यक है कि लेखी को देखी के रूप में परिणत किया जाय ।” यह कथन भी असङ्गत ही है,

७५६ रामायणमीमांसा एकविंश
क्योंकि यह तर्क नहीं है । तर्क कोई प्रमाण नहीं होता । तर्क तो केवल व्याप्तिग्रह का सहायकमात्र होता है ।
किसी भी अंश में भी वेदप्रामाण्य को अस्वीकार करना नास्तिकता है । मनु के अनुसार वेद-निन्दक
नास्तिक— —“नास्तिको वेदनिन्दकः ।” ( मनु० २।११ )
“जो कोइ दूषहिं श्रुति करि तरका । परहि ते कोटि कल्पभरि नरका ॥” ( रा० मा० ७।९९।२ )
शास्त्र का प्रामाण्य सापेक्ष नहीं होता । सभी प्रमाणों का प्रामाण्य स्वतः होता है, परतः नहीं । यदि परतः
प्रमाण कहेंगे तो प्रथम प्रमाण की प्रमाणता के लिए दूसरे प्रमाण की आवश्यकता होगी और दूसरे प्रमाण के प्रामाण्य
के लिए तीसरा प्रमाण ढूंढ़ना पड़ेगा । इसी तरह चौथे, पाँचवें, छठे आदि प्रमाणों की अपेक्षा होने से अनवस्था-
प्रसङ्ग होगा ।
यदि किसी अन्तिम प्रमाण को स्वतः प्रमाण मानना ही है तो प्रथम प्रमाण को ही स्वतः प्रमाण क्यों न
माना जाय ? अतः विषयबाध एवं करणदोष का ज्ञान होने से अप्रामाण्य का निर्णय होता है । अतः अप्रामाण्य परतः
होता है । प्रमाण का प्रामाण्य तो स्वतः ही होता है । अर्थक्रियाकारित्व या प्रमाणान्तरसंवाद के कारण संसंदिग्धता की
निवृत्ति परतः प्रामाण्यवाद में होती है, स्वतः प्रामाण्यवाद में नहीं ।
यह भी कहना गलत है कि “योगी ग्रन्थों के आधार पर नहीं, किन्तु अनुभूति के आधार पर स्वीकार
करता है”, क्योंकि बुद्ध और महावीर भी योगी थे । उन्होंने ईश्वर की सत्ता स्वीकार नहीं की । अतः योग भी
स्वतन्त्ररूप से ईश्वर साक्षात्कार का हेतु नहीं है । किन्तु जैसा पूर्व में कहा गया है । वेदान्तादिसहकृत योगयुक्त मन
या योगयुक्तमनःसापेक्ष वेदवेदान्त ही ब्रह्म-साक्षात्कार का हेतु है ।
“शब्दप्रमाण परोक्षज्ञान का ही जनक होता है”, यह कहना भी गलत है, क्योंकि शब्द का विषय परोक्ष
है तो वहां परोक्ष ही ज्ञान होता है जैसे धर्म, अपूर्व, अदृष्ट तथा वैदिक क्रियाओं का उनके फलों के साथ कार्यकारणभाव
का ज्ञान परोक्ष रहता है । परन्तु ब्रह्मात्मा का ज्ञान वेदान्त शब्दों से उत्पन्न होने पर भी वह ज्ञान अपरोक्ष होता है
परोक्ष नहीं, क्योंकि उसका विषय ब्रह्म अपरोक्ष ही है ।
दशमस्त्वमसि इस वाक्य से जनित ‘दशमोऽहमस्मि’ यह ज्ञान अपरोक्ष ज्ञान ही होता है । सुख के वर्तमान
होने पर ‘त्वं सुखी’ इस वाक्य से जन्य ‘अहं सुखी’ इत्याकारक ज्ञान अपरोक्ष ज्ञान ही होता है ।
उपनिषदों के अनुसार साक्षात् अपरोक्ष व्यवधानशून्य प्रत्यक्ष ब्रह्म ही होता है । घटादि तो चक्षु
एवं तज्जन्य अन्तःकरणवृत्ति के द्वारा प्रत्यक्ष होते हैं । परन्तु बोधरूप ब्रह्म तो बोधरूप होने से वृत्ति-व्यवधान के
बिना ही अपरोक्ष है ।
कहा जाता है कि “ईश्वर को देखने के लिए जिस दृष्टि की अपेक्षा है तुलसी की भाषा में उसका नाम
है—श्रद्धा और विश्वास ।” परन्तु यह अत्यन्त असङ्गत है, कारण प्रमा चाहे परोक्ष हो चाहे अपरोक्ष हो उसका
कारण प्रमाण ही होता है । श्रद्धा और विश्वास स्वयं प्रमाण नहीं हैं । प्रमा-करण ही प्रमाण है । तर्क भी प्रमाण नहीं
है । इसी लिए तो गुरु और वेदान्तवाक्यों में विश्वास का नाम श्रद्धा है । श्रद् विश्वासं दधातीति श्रद्धा । कई बार
असम्भावना आदि दोषों के कारण निर्दोष प्रमाण से उत्पन्न प्रमाज्ञान भी निरर्थक हो जाता है ।
भच्छूनाम के व्यक्ति के सम्बन्ध में यह धारणा दृढ़ बन गयी थी कि वह मर कर प्रेत हो गया है । इसी
के कारण उसके मित्र राजा को अपने निर्दोष चक्षु से यह भच्छू है ऐसा ज्ञान होने पर भी उसी विपरीत भावना के
कारण उसको अपने आँखों पर भी विश्वास नहीं हुआ और वह उसे प्रेत समझकर भाग चला । अतः परीक्षित प्रामाण्य-
वाले प्रमाणों से किसी वस्तु का ज्ञान होने पर भी अविश्वास और अश्रद्धा की बात उठ सकती है । अतः निर्दोष प्रमाण

अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७५७
से निश्चित वस्तुनिश्चय को अडिग रखना संशय, विपर्यय आदि से उपप्लुत न होने देना विश्वास और श्रद्धा का
ही काम है।
प्रामाणिक वस्तु में दृढ़ आस्था दृढ़ अस्तित्वबुद्धि विश्वास है। वही विश्वास जब स्नेह से द्रवीभूत प्रीतियुक्त
बुद्धि में उद्भूत होता है तब श्रद्धापद से व्यपदेश्य होने लगता है। अतएव धर्म और ब्रह्म के सम्बन्ध में श्रद्धा एवं
विश्वास परम महत्त्वपूर्ण प्राणतुल्य हैं। उनके बिना सब प्रमाण भी व्यर्थ हो जाते हैं। इसलिए उन्हें भवानी और
शङ्कर के तुल्य कहा गया है।
योगभाष्यकार का कहना है कि "श्रद्धा जननीव योगिनं पाति" जैसे जननी पुत्र की रक्षा करती है
वैसे ही श्रद्धा उत्साहशक्ति योगी की रक्षा करती है। "पार्वती का जन्म हुआ है। परन्तु शिव अजन्मा हैं" यह कहना
असङ्गत है। क्योंकि स्वरूप से दोनों एक ही अनादि अनन्त परमात्मा हैं। अवतार की दृष्टि से जैसे भगवती के
अवतार होते हैं वैसे ही शिव के भी अवतार होते हैं। भगवान् शिव भी ब्रह्मा से उत्पन्न हुए हैं। वैसे ही जैसे राम
दशरथ से उत्पन्न हुए। जैसे सीता उत्पन्न होती हैं वैसे ही सती और उमा का भी अवतार ही होता है। अतएव यह
कहना भी सङ्गत नहीं है कि "श्रद्धा का जन्म होता है विश्वास का जन्म नहीं होता है।" क्योंकि आस्तिकों के
वातावरण में रहने से वेदादिशास्त्रों के संस्कार से ही विश्वास और श्रद्धा दोनों ही उत्पन्न होनेवाली चीज हैं।
बुद्धि भी उत्पन्न होनेवाली चीज है तो फिर उसका कोई भी धर्म अनुत्पन्न कैसे कहा जा सकता है? हां, परम्पराप्राप्त
आस्तिकता के संस्कार के समान विश्वास एवं श्रद्धा के संस्कार भी परम्पराप्राप्त हो सकते हैं।
तर्क
केवल शास्त्रोक्त जटिल अर्थों को बुद्ध्यारूढ़ करने के लिए ही तर्क का उपयोग मनन के रूप में किया
जाता है। 'श्रोतव्यः' के पश्चात् 'मन्तव्यः' की स्थिति आती है। मनन ही तर्क है। परन्तु उच्छृङ्खल तर्क का
आदर न कर शास्त्रसम्मत तर्कों का उपयोग करना चाहिये। अतएव यह कहना अनुचित है कि "तर्क व्यक्ति के अहं
को तुष्ट करने का ही एक साधन है। मनन, युक्ति, उपपत्ति शास्त्रसिद्ध वस्तु को बुद्ध्यारूढ़ करने का श्रुत्युक्त उपाय
है अहङ्कार की तुष्टि का उपाय नहीं।" उदयनाचार्य के अनुसार न्यायचर्चा या तर्क श्रवण के अनन्तर आनेवाली
मननरूप उपासना ही है— "न्यायचर्चेयमीशस्य मननव्यपदेशभाक्। उपासनैव क्रियते श्रवणानन्तरागता।"
(न्यायकुसुमाञ्जलि)।
बुद्धि
"बुद्धि प्रत्येक वस्तु को कार्यकारणभाव के आधारपर स्वीकार करती है। किन्तु हृदय की स्वीकृति के
पीछे कोई तर्क नहीं होता।" यह कहना असङ्गत है, क्योंकि हृदयपद से हृदयस्थ बुद्धि ही कही जाती है। हृदयपद
का वाच्यार्थपुण्डरीक के आकार का मांसपिण्ड ही है। 'मञ्चाः क्रोशन्ति' के समान गौण वृत्ति से ही 'हृदयेनाभिजानाति'
आदि प्रयोग होते हैं। वस्तुतः मन, बुद्धि, चित्त और अहङ्कार ये चारों ही अन्तःकरण हैं। ज्ञान-साधनरूप में अन्तः-
करण, मन, बुद्धि या चित्त ही प्रसिद्ध हैं। स्वस्थ श्रद्धालु बुद्धि ही कभी कभी हृदयशब्द से कही जाती है।
श्रद्धा
"श्रद्धा पूर्वजन्म में दक्षपुत्री है। दक्ष चतुर हैं। उन्हें अपनी योग्यता एवं बुद्धिमत्ता पर गर्व था। सती
जिज्ञासा हैं। बुद्धिमान् व्यक्ति में जिज्ञासा का पैदा होना स्वाभाविक है। परन्तु इस जिज्ञासा का सदुपयोग क्या है?
लोकपितामह ब्रह्मा ने दक्ष को आदेश दिया। अपनी पुत्री शिव को अर्पित कर दो। जिज्ञासा की पूर्ति तो है—संशय
का विनाश और विश्वास की उपलब्धि इत्यादि", परन्तु यह सब अटकलपच्चू भिड़न्त भिड़ानामात्र है।

वस्तुतः दक्षता गुण है दोष नहीं। अतएव गीता में भगवान् ने उच्च कोटि के ज्ञानी के लक्षणों में 'अनपेक्षः
शुचिर्दक्षः' (गीता १२।१६) दक्ष होना भी कहा है। भगवान् के अनेक नामों में दक्ष भी भगवान् का एक नाम
है—'उग्रः संवत्सरो दक्षः' (विष्णुसहस्रनाम) ।
गर्व एवं अभिमान तो अविवेक का ही परिणाम है। अविवेक से कोई ज्ञानी होने का या कोई दक्ष होने
का घमण्ड कर सकता है। कोई भक्त होने का भी तो अभिमान करता है। परन्तु क्या यह भक्ति का दोष है।
यह कहा जा चुका कि सती तथा उमा भगवान् शिव की स्वरूपभूता शक्ति हैं। उनके माया या मोह के
वर्णन का तात्पर्य राम की महिमा बतलाने में है। भगवान् विष्णु और ब्रह्मा शिवजी के दिव्य ज्योतिर्लिङ्ग का ओर-
छोर देखने के लिए गये। परन्तु पार न पाकर लौट आये। इस वर्णन का तात्पर्य विष्णु के अपकर्ष-वर्णन में नहीं है,
किन्तु शिव की महिमा के वर्णन में है। वैसे ही प्रकृत में भी समझना चाहिये।
यह कहा जा चुका है कि श्रद्धा, विश्वास, जिज्ञासा आदि सब अन्तःकरण की उत्कृष्ट वृत्तियाँ हैं।
आदरणीयता की दृष्टि से उन्हें भवानी तथा शङ्कर से सन्तुलित किया जाता है। इसी कारण सती का जिज्ञासु या
संशयालु होना नहीं कहा जा सकता है।
लोककल्याणार्थ तन्त्रों और आगमों में शिव-पार्वती-संवाद के रूप में बहुत से प्रश्नों एवं उत्तरों का वर्णन
है। श्रीकृष्ण भगवान् नारदजी से अनेक प्रश्न राजनीतिक व्यवहार के सम्बन्ध में करते हैं। श्रीनारदजी उनका
समाधान करते हैं। यह सब उनकी लीला ही है। उनको कोई संशय एवं जिज्ञासा नहीं है। तभी तो श्रीसीताजी
पार्वती की स्तुति में उन्हें भव (विश्व) के भव, विभव और पराभव का कारण बतलाती हुई उन्हें स्ववशविहारिणी
कहती हैं—
“भव भव विभव पराभवकारिणि।
बिश्वबिमोहिनि स्ववशबिहारिणि ॥” (रा० मा० १।१३४।४)
अतएव सती के सम्बन्ध में निम्नोक्त दुष्कल्पनाएँ करना बुद्धि का दुरुपयोग ही है।
“जिज्ञासा और विश्वास का परिणय लोकमङ्गल के लिए आवश्यक है। यही ब्रह्मा का दृष्टिकोण था।
किन्तु विवाह का परिणाम यह नहीं हुआ, जिसकी कल्पना ब्रह्मा के मन में थी। यद्यपि सती ने समग्र समर्पण की
भावना से ही शिव का वरण किया था। किन्तु वह अन्तश्चेतना की गहराइयों में छिपे हुए पिता के संस्कारों से स्वयं
को मुक्त न कर पायी थीं। जबतक जिज्ञासा अहंशून्य नहीं होगी तबतक विश्वास के लिए अर्पित होना सम्भव भी नहीं
है।” क्योंकि दक्ष होना कथमपि दोष नहीं है। दक्ष भगवान् विष्णु के परमभक्त थे। क्रियादक्ष तो थे ही। किन्तु वह
शिवद्रोही थे। यही एक उनमें मुख्य दोष था। यह संस्कार सती में बिल्कुल ही नहीं था। तभी तो उन्होंने शिवद्रोही
दक्ष से सम्भूत अपने शरीर को रखना अपने लिए लज्जाजनक माना था।
सतीजी का राम के सम्बन्ध में किया हुआ संशय ही पार्वती-जन्म में रामसम्बन्धी जिज्ञासाओं का मूल
बना था। जिज्ञासा का बीज ही संशय होता है। पूर्वोत्तरमीमांसाओं में प्रत्येक अधिकरण में विषय, विशय (संशय),
पूर्वपक्ष, उत्तरपक्ष तथा पूर्वपक्ष-निरासन-पूर्वक सिद्धान्त-व्यवस्थापन होता है। व्यावहारिक दृष्टि से शिवजी ने सती के
उस मोह का कारण भगवान् की माया को ही माना था—
“बहुरि हरि मायहि सिरु नावा।
प्रेरि सतिहि जेहि झूठ कहावा ॥” (रा० मा० १।५५।३)
अन्यथा शिव के कहने पर भी संशय क्यों न मिटता। माया का भी कुछ दोष नहीं था। इसी प्रकार

अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७५९
माया भगवान् के सम्बन्ध में संशय जिज्ञासा के द्वारा रामायण का विस्तृत वर्णन कराना चाहती थी । सती स्वयं भी
मायामोहित होने का नाटक कर के श्रीराम की अत्यन्त महिमा का प्रख्यापन कराना चाहती थीं ।
तर्क तथा प्रतितर्क से वैदिक सिद्धान्त का पूर्वोत्तरमीमांसाओं से परीक्षण किया जाता है। मीमांसा शब्द
का पूजित विचार ही अर्थ है। इसी तरह बुद्धि को मस्तिष्कनिवासिनी कहना भी निर्मूल है। शास्त्रानुसार बुद्धि का
निवासस्थान हृदय ही होता है। मस्तक में ही श्रोत्र, चक्षु, घ्राण, रसना इन चार ज्ञानेन्द्रियों का निवास होता है ।
मस्तिष्क में बुद्धिवृत्तिरूप ज्ञानतन्तुओं का बाहुल्य होने से भ्रान्तिवश ही कई लोग बुद्धि को मस्तिष्क-निवासिनी कहते
हैं, अतएव दक्षपुत्री से चतुराई और शैलपुत्री होने से जड़ता की कल्पना भी निर्मूल है।
यह भी कहना सङ्गत नहीं है कि "जो स्वयं को काव्य के प्राकट्य का माध्यममात्र स्वीकार करते हैं,
उनके हृदयप्राङ्गण में ईश्वर की प्रेरणा से सरस्वती नृत्य करती है ।
"जेहि पर कृपा करहि जन जानी । कबि उर अजिर नचावहि बानी ।।" (रा० मा० १।१०४।३)
ऐसे काव्य के अमित अर्थ की सम्भावनाएँ विद्यमान हैं। रचयिता के उद्देश्य की सीमाओं का पता लगाना
अनावश्यक श्रममात्र है ।
वाटिका में खिले हुए गुलाब का क्या अर्थ है ? कवि उसमें मुस्कुराहट देखता है। माली को वाटिका के
शृङ्गार के रूप में दिखायी देता है। कामिनी को शृंगार का प्रसाधन प्रतीत होता है। एक चिकित्सक को उसमें
ओषधि का तत्त्व दिखायी देता है। क्या कोई देखने के साथ कह सकता है कि रचयिता का इसमें मुख्य उद्देश्य कौन
था ? रचयिता के असीम उद्देश्यों को किसी सीमा में बाँध पाना सम्भव नहीं है।
ईश्वर-प्रेरणा से निर्मित काव्य के विषय में भी यही बात है कि जब काव्य का प्रतिपाद्य भी ब्रह्म हो तब
उसकी सीमाएँ खींच पाना और भी असम्भव है—
'हरि अनन्त हरिकथा अनन्ता । कहहिं सुनहिं बहुविधि सब सन्ता ।।' (रा० मा० १।१३९।३)
बहुविधि कहने सुनने की स्वतन्त्रता भी रामचरित में इसी लिए प्राप्त है कि शब्द यहाँ केवल सरोवर के
रूप में नहीं है जिसके अर्थ जल की कोई सीमा हो । सीमित सरोवर के जल का सूख जाना अवश्यम्भावी है, किन्तु
शब्द जहाँ नदी की मूल धारा के समान हैं वहाँ शब्द मूलस्रोत की भाँति नूतन अर्थ का जल प्रवाहित करता रहता है ।
शाश्वत काव्य का स्वरूप भी यही है ।" ( मा० मु० १४ )
उपर्युक्त बातें अविचारित रमणीय ही हैं, क्योंकि यदि शब्दों का कोई निश्चित अर्थ न होगा तब तो भिन्न-
भिन्न वक्ता अपनी अपनी बुद्धि और रुचि के अनुसार ही उनका नया नया मनमानी अर्थ करते जायेंगे । फिर तो तर्क
और आगम में कोई भेद ही न रह जायगा । जैसे एक तार्किक अपनी बुद्धि से दूसरे तर्क द्वारा पहले तर्क को काट
देता है। वैसे ही बुद्धिमान् लोग अपनी अपनी बुद्धि के बल पर आविर्भूत नये अर्थ से पुराने अर्थ को काट देंगे । फिर
किसी भी वचन का निश्चित अर्थ ही न हो सकेगा। यह शब्द के लिए भूषण नहीं, किन्तु दूषण ही है। गुलाब का
फूल शब्द नहीं है वह तो अर्थ ही है। उसका कोई अर्थ नहीं । उसके प्रयोजन तो अनेक हो ही सकते हैं। वह वाटिका
का शृंगार भी है, कलिका की मुस्कुराहट भी है, कामिनी का शृंगार भी है एवं भक्त के पूजा का उपकरण भी है।
चिकित्सक के लिए वह ओषधि भी हो सकता है। परन्तु यही बात शब्दों और वाक्यों के लिए नहीं ।
'गतोऽस्तमर्कः' इन शब्दों का अर्थ तो यही है कि सूर्य अस्ताचल को गये । पर अपनी अपनी परिस्थिति
के अनुसार उससे चोर चोरी का समय समझे, ब्राह्मण सन्ध्या करने का समय समझे और अभिसारिका अभिसार की
बात सोचे. परन्तु यह शब्दार्थ नहीं है ।

७६० रामायणमीमांसा एकविंश
अनादि अपौरुषेय वेद ईश्वर की प्रेरणा से किसी कवि की वाणी नहीं हैं, किन्तु साक्षात् ईश्वर की वाणी
हैं। यह वेदप्रमाण से सिद्ध है। परन्तु वेद के सम्बन्ध में यह विचार उठता है कि क्या वैदिक शब्द और वैदिक अर्थ
अत्यन्त अलौकिक हैं या लौकिक हैं ? यदि प्रथम पक्ष माना जायगा तब तो उनके अर्थज्ञान का कोई उपाय नहीं है ।
क्योंकि लौकिक मनुष्यों को तो लौकिक शब्दों और लौकिक अर्थों के साथ ही सङ्गतिग्रह होता है। अलौकिक शब्दों
और अलौकिक अर्थों का उन्हें ज्ञान ही नहीं, फिर शक्तिग्रह कैसे होगा ? शक्तिग्रह के बिना वाक्यार्थबोध कैसे होगा ?
बौद्ध आदि कहते हैं कि शब्द और अर्थ का कोई सम्बन्ध निश्चित नहीं होता । उसका यथेष्ट विनियोग
किया जा सकता है । इसी लिए वे कहते हैं कि 'अग्निहोत्रं जुहुयात्' इस वाक्य का 'श्वमांसं भक्षयेत्' ऐसा अर्थ क्यों
न हो ? सिद्धान्ततः इसका उत्तर यही है कि लौकिक शब्द ही वैदिक शब्द होते हैं । अतएव अलग से शक्तिग्रह की
भी अपेक्षा नहीं होती ।
पद तथा पदार्थ लौकिक एवं वैदिक समान ही होते हैं । अपूर्व स्वर्ग तथा उनका यज्ञायागादि के साथ
कार्य-कारणभाव अलौकिक वाक्यार्थ है पदार्थमात्र नहीं है । "यत्परः शब्दः स शब्दार्थः" शब्दों का जिसमें तात्पर्य
होता है वही वास्तविक शब्दार्थ होता है ।
तात्पर्यनिर्णय के लिए उपक्रम, उपसंहार, अभ्यास, अपूर्वता, फल, अर्थवाद और उपपत्ति का विचार करना
पड़ता है । इस दृष्टि से ही कर्म, उपासना का अनुष्ठान वेदार्थनिर्णय पर ही निर्भर है। यदि निश्चित वेदार्थ
निर्धारित न होगा तो कर्मोपासना का अनुष्ठान कैसे होगा ? ब्रह्मात्म-साक्षात्कार भी निश्चित शब्दार्थ के निर्धारण के
बिना असम्भव है । अतः किसी काव्य का अमित अर्थ है, यह कहना असम्भव है। हाँ अमित का अर्थ ब्रह्म है ।
अतएव श्रीभगवान् कहते हैं कि--'वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यः' सब वेदों से एकमात्र मैं ही वेद्य हूँ ।
भगवान् अनन्त हैं, उनके जन्म अनन्त हैं, चरित्र अनन्त हैं । परन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि कोई मन-
मानी कल्पना करने में स्वतन्त्र है । चरित्र का भी मन्त्र, ब्राह्मण और उपनिषद् रूप वेदों, पुराणों, रामायण,
महाभारत आदि इतिहासों, संहिताओं, तन्त्रों एवं आगमों के आधार पर ही निर्धारण होता है। स्वतन्त्र कल्पनाएँ
कल्पना ही समझी जायेंगी । अपौरुषेय वेद एवं तदाश्रित आर्ष सद्ग्रन्थ ही धर्म और ब्रह्म में प्रमाण हैं। अन्य सन्त-
महात्माओं के वचन भी उन्हीं पर निर्भर हैं ।
संस्कृत पर मिथ्या आक्षेप
"वर्णाश्रमधर्म में ब्राह्मण ही वैश्य थे । संस्कृत भाषा उनके द्वारा प्रयुक्त थी ।" (मानसमुक्तावली पृ० ६३)
संस्कृत भाषा या संस्कृत शब्द अनादि हैं। अन्य शब्द भी इसके अपभ्रंश एवं प्रवाह रूप से अनादि ही
होते हैं । वेदाङ्ग व्याकरण के द्वारा अपभ्रष्ट असाधु शब्दों से साधु संस्कृत शब्दों का पृथक्करण ही उसका संस्कार है ।
इसी लिए वह संस्कृत कहलाती है। जैसे छलनी गालनी या चालनी ग्राह्य वस्तुओं से अग्राह्य वस्तुओं को पृथक् कर
देती है । वैसे ही प्रकृत में व्याकरण के सूत्रों द्वारा साधु-असाधु शब्दों का पृथक्करण होता है ।
वेद अनादि अपौरुषेय सबके कल्याणकारी हैं। वे सबके हैं। संस्कृत ब्राह्मणों की ही नहीं ब्राह्मण, क्षत्रिय
और वैश्य तीनों वर्णों की भाषा है । इतना ही क्यों वह प्राणीमात्र की धर्मभाषा है। शूद्र बन्धुओं का उनके अधिकारा-
नुसार संस्कृत के नमोऽन्त मन्त्रों में अधिकार है । वेदादिशास्त्रों के उपदेशों को ही विभिन्न भाषाओं में सन्त-सज्जन
सबके कल्याणार्थ दुहराते हैं ।
अरे यह तो पाश्चात्यों का प्रचार है कि संस्कृत एक वर्ग विशेष की भाषा है । वर्णाश्रमधर्म तो सबका ही
धर्म है । तुलसी इसी के तो पोषक हैं । संस्कृत ग्रन्थों में स्वकीयत्व अपनत्व की भावना मिट जाना यह पाश्चात्य
प्रचार का प्रभाव है ।

कहा जाता है कि "संस्कृत के ग्रन्थों का आनन्द लेने के लिए विद्वान् की आवश्यकता होती है। विद्वान्
व्याख्याता और ग्रन्थ उनकी परिधि से इतने दूर थे कि उन्हें स्पर्श करने का साहस भी नहीं सकते थे। यह स्थिति
कुछ लोगों को अभीष्ट हो सकती थी। क्योंकि उसमें उनका व्यावहारिक स्वार्थ भी जुड़ गया था। पर लोक-मङ्गल
की दृष्टि से यह स्थिति एक ऐसी अभिशाप थी जिसके द्वारा समाज धर्म से चला गया।"
यह सब द्वेषपूर्ण प्रचार है। यह कहने और लिखनेवालों का भी स्वार्थ इस प्रचार से जुड़ा है। आखिर
तुलसीरामायण के बन जाने पर भी जनता को कथा चाहिये और तुलसीरामायण के भी सहस्रों वक्ता कथा कहने
लगे और उसी से लाखों रुपये कमाने लगे। हाँ, जहाँ कथा के नाम पर मूल वेद, वाल्मीकिरामायण, महाभारत,
भागवत आदि की चर्चा विद्वानों द्वारा चलती थी वह अब बन्द हो गयी। अब अधिकांश संस्कृतानभिज्ञ वक्ताओं तथा
सिद्धान्त से अनभिज्ञ वक्ताओं द्वारा भाषाग्रन्थों की कथा चल पड़ी।
उच्च वर्गों के अहङ्कार और दुर्व्यवहार से जिस प्रतिक्रिया का उदय हुआ उससे ब्राह्मण, संस्कृत और वेद
तीनों ही के प्रति तिरस्कार की भावना जैसे कबीर आदिकों में आयी थी वही आज मानस-वक्ताओं में भी आ रही है,
यह आश्चर्य है।
"वेद कन्तेव की गम्म नाही तहाँ।
कहै कबीर कोई रमै सूरा॥"
कबीर की ऐसी उक्तियाँ कुछ व्यक्तियों तक ही सीमित रह गयी हैं। परन्तु तुलसी वेद-प्रामाण्यवादी हैं।
उनका नास्तिकता से समन्वय नहीं हो सकता था।
"तुलसी के इष्ट राम केवल तुलसी के ही इष्ट नहीं थे, किन्तु वेदादि शास्त्रों के सर्वस्व थे। राम ऋषियों,
मुनियों की पूजा करते थे। किन्तु प्राचीन परम्परा के प्रति उनका यह समादर केवल कोल, भील और बन्दरों से
उनकी मित्रता के बीच बाधक नहीं बना।" (मा० मु० ६४)
यह तुलसी की कोई नयी बात नहीं है। तुलसी ने वेदशास्त्र, पुराण, रामायण और भारत के विरुद्ध कुछ
कहा ही नहीं। फिर इसमें प्राचीन और अर्वाचीन समन्वय का कोई प्रश्न ही नहीं उठता है। यह तो सुधारक
रामायणियों के मस्तिष्क का फितूरमात्र है।
यह कहना भी कुटिलता ही है कि "भले ही महर्षि वाल्मीकि की देवभाषा में प्रयुक्त वाणी भगवान् को
प्रिय लगती है। पर केवट के ग्राम्य बोली में भी राम उतना ही आनन्द लेते थे। एक ओर यदि वे वाल्मीकि की
वाणी सुनकर मुस्कराते हैं-
"सुनि मुनि वचन प्रेमरस साने।
सकुचि राम मन महँ मुस्काने॥" (रा० मा० २।११६।१)
तो दूसरी ओर केवट की वाणी उनमें उन्मुक्त आनन्द भर देती है-
"सुनि केवट के वैन प्रेम लपेटे अटपटे।
विहँसे राजिवनैन चितइ जानकी लखन तन॥" (रा० मा० २।१००)
मुस्कराहट में आनन्द की मर्यादित अभिव्यक्ति है। इसी प्रकार देवभाषा में संस्कृत भी व्याकरण से
अनुशासित है। विहँसना आनन्द की उन्मुक्त अभिव्यक्ति है। यह तो केवट की व्याकरणमुक्त ग्राम्यभाषा के अनुरूप
है।" (मा० मु० ६५)
यह केवल बुद्धि का दुरुपयोग ही है, क्योंकि तुलसी के वाल्मीकि राम से जिस भाषा में बात कर रहे हैं
९६

७६२ रामायणमीमांसा एकविंश
वह तो संस्कृत भाषा नहीं थी। वह तो तुलसी के मानस की ही भाषा थी, क्योंकि मानस के वाल्मीकि और राम
के संवाद की चर्चा वाल्मीकिरामायण में है भी नहीं। फिर मन महँ मुस्काने के आधार पर भी व्याकरण से
अनुशासित देवभाषा के अनुरूप राम के मर्यादित आनन्द की अभिव्यक्ति का क्या सम्बन्ध है ? तुलसी तो ऐसे दाँव-
पेंच की बात न कर सीधे कहते हैं—
"बेदबचन मुनिमन अगम ते प्रभु करुना अयन।
सुनत किरातन के वचन जिमि पितु बालक बयन ।।" ( रा० मा० २।१३५ )
"जिमि बालक कह तोतरि बाता।
सुनत मुदित मन पितु अरु माता ।।" ( रा० मा० १।७।५ )
माता-पिता अपने बच्चों को तोतरी बातों को प्रसन्न मन से सुनते हैं। विहँसते भी हैं। परन्तु किसी
ऋषि-मुनि या गुरुजनों की बातें तो गम्भीरता से ही सुनी जाती है। उसी तरह श्रीराम केवट, कोल, भिल्ल और
किरातों के प्रेमलपेटे अटपटे वचनों को सुनकर विहँसते हैं। मुनियों की गम्भीर बातों को सुनकर मुस्कराते हैं।
वहाँ खिलखिलाकर हँसना अनुचित भी है।
इतना ही क्यों संस्कृत के कवियों ने भी प्रेम की एक विचित्र अवस्था का वर्णन किया है। जिसमें
भगवान् की अटपटी लीला का चित्रण है। पर इसमें संस्कृत एवं ग्राम्यभाषा के विषाक्त संघर्ष का लेश भी नहीं है—
“गोपालाजिरकर्दमे विहरसे विप्राध्वरे लज्जसे
ब्रूषे गोधनहुंकृतैः स्तुतिशतैः मौनं विधत्से सताम्।
दास्यं गोकुलपुंश्चलीषु कुरुषे स्वाम्यं न दान्तात्मसु
जाने कृष्ण तवाद्भुतं प्रियमहो भक्तैः परच्छन्दितम् ॥”
भक्त कहता है कि हे गोपाल, आप गोमूत्र और गोमय के कर्दमयुक्त गोपालों के प्राङ्गण में तो स्वच्छन्द
विहार करते हैं। परन्तु विप्रों के ज्योतिष्टोम, वाजपेय आदि अध्वरों में पधारने में लज्जित होते हैं। गायों एवं
बछड़ों के हुंकारों से बोल पड़ते हैं, परन्तु सन्तों की सैकड़ों स्तुतियों के सुनने पर भी मौनभङ्ग नहीं करते हैं।
अरे आप गोकुल-पुंश्चलियों का तो खुशी से दास्य अङ्गीकार करते हैं, परन्तु बड़े बड़े जितेन्द्रिय महामुनियों का
स्वामित्व भी अङ्गीकार नहीं करते हैं यह क्या है ? हे कृष्ण ! हम आपके उस अद्भुत भक्तिपराधीनता को जानते हैं।
वस्तुतः यह सिद्धान्त सर्वसम्मत है कि देववाणी परमपवित्र पुण्यजनक है। वेदवाणी उससे भी पवित्र
साक्षात् परमेश्वर की वाणी है। अगर भगवान् की महिमा भगवान् का यश वेद के अधिकारियों को वेदवाणी में
प्राप्त हो तो बहुत ही श्रेष्ठ है। संस्कृत भाषा में मिले तब भी श्रेष्ठ है। परन्तु यदि वही वस्तु अन्य भाषा में मिले
तो भी वह श्रेष्ठ ही है।
यदि संस्कृत भाषा में ईश्वर का खण्डन सुनने को मिले, परन्तु प्राकृत ग्राम्य भाषा में भगवान् की महिमा
सुनने को मिले तो सहज ही में यहाँ विषय की महत्ता के सामने भाषा का प्रश्न गौण हो जाता है। परन्तु
यदि वही उत्कृष्ट तत्त्व वैदिक भाषा में मिले और प्राप्त करनेवाला उसका अधिकारी भी हो तब तो उसका उत्कर्ष
निर्विवाद है ही।
"मणि भाजन विष पारई पूरन अमिअ निहारु।
का छोड़िय का संग्रहहि देखु बिबेक बिचारु ॥”
मणिपात्र में विष भरा हुआ हो और मिट्टी के पात्र में अमृत रखा हुआ हो तो विवेकी किसे ग्रहण
करेगा एवं किसे छोड़ेगा ? यह कहने की जरूरत नहीं है।

अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७६३
पर इससे बाल्मीकिरामायण और मानस की तुलना करना निरी अनभिज्ञता ही होगी। यदि उत्तम
मणिपात्र में अमृत ही रखा हो तो उसे छोड़कर मृण्मय पात्र के अमृत को कौन ग्रहण करेगा ? क्योंकि वहाँ भाषा
और विषय दोनों का ही उत्कर्ष है । भाषा संस्कृत हो विषय निकृष्ट हो तो वहाँ जितना उत्कृष्ट भाषा से पुण्य
होगा उससे अधिक निकृष्ट विषय के अनुसन्धान से पाप होगा । किन्तु जहाँ भाषा ग्राम्य भी हो, किन्तु विषय हो
भगवान् का मङ्गलमय नाम, गुण, यश तथा स्वरूप तो वहाँ विषय के उत्कर्ष से भाषा के यत्किञ्चित् दोष भी
निरस्त हो जायेंगे । इससे संस्कृत एवं ग्राम्य गिरा के उत्कर्षापकर्ष की कल्पना नही करनी चाहिये ।
जब देवताओं और लोक के कल्याणार्थ देवाधिदेव भगवान् विष्णु नर के रूप में प्रकट होते हैं तो देवताओं
का भी उनकी सहायता-सेवा के लिए वानर तथा भालू के रूप में आविर्भाव होता है। देवताओं का पद मनुष्यों
से ऊँचा है । फिर भी परमतह्मपद वैकुण्ठपद उससे भी ऊँचा हैं । देवतापद का सुख सातिशय हैं, निरतिशय नहीं है ।
सुतरां उत्कर्षापकर्ष के कारण वहाँ ईर्ष्या, द्वेष आदि दोषों की सत्ता रहती है। इसी लिए देवतापद से आगे बढ़ने
की अपेक्षा होती है। देवता भी हिरण्यगर्भ के अंश हैं । हिरण्यगर्भ परमेश्वर का ही समष्टि सूक्ष्म शरीर विशिष्ट
सोपाधिक रूप हैं । फलतः देवराज इन्द्र ब्रह्मविद्वरिष्ठ ज्ञानी भी होते हैं ।
परमेश्वर की कथा, स्तुति आदि तो अपनी अपनी भाषा में अपनी अपनी शक्ति के अनुसार सदा ही
सभी करते हैं । तामिल, तेलगू, गुजराती, मराठी, पञ्जाबी, काश्मीरी, बङ्गला, उड़िया, मैथिली, हिन्दी आदि
भाषाओं में ही नहीं अनेक अन्य भाषाओं में अनेक कवियों ने प्रभु के गुणगणों का वर्णन किया है। परन्तु उन
सबका आधार वेद, रामायण, महाभारत, पुराण, तन्त्र, आगम आदि ही हैं। अतः अपने मूलभूत वेदादि शास्त्रों
से कोई अलग नहीं था ।
इतना ही क्यों अरबी के डेढ़ हजार वर्ष पूर्व कुरान आदि के द्वारा, अपनी भावना के अनुसार इङ्गलिश
भाषा में दो हजार वर्ष पूर्व तथा जेन्दावेस्ता द्वारा उससे भी पहले भक्तों ने ईश्वर का गुणगान किया ही है ।
“कबीर की जीवनी के आधार पर कहा जाता है कि कबीर के मन में उस वर्णव्यवस्था के प्रति कैसे
राग हो सकता था जो उनको एक सन्त के निकट पहुँचाने में बाधक बनी । साथ ही श्रीरामचरित्र का वह अंश
भी उनके स्मृति में रहा ही होगा जिसमें शम्बूक नाम के शूद्र तपस्वी का इसलिये वध कर दिया गया कि वह
वर्णाश्रमव्यवस्था का उल्लङ्घन करके तपस्या में संलग्न था ।
कबीर ऐसी परिस्थिति में उन राम को कैसे स्वीकार कर सकते थे जो एक शूद्र को सत्कर्म करने का
अधिकार भी देने को प्रस्तुत नहीं हैं। दूसरी ओर राम-नाम की साधना से उन्हें अमित लाभ हुआ था । उसे अस्वी-
कार कर पाना उनके लिए सम्भव न था । अतः रामनाम को स्वीकार करते हुए भी दशरथनन्दन राम को ईश्वर के
रूप में स्वीकार न करना उनके लिए स्वाभाविक था ।''
यह सब शास्त्रीय व्यवस्था न समझने का ही दुष्परिणाम है । शास्त्रोक्त वर्णाश्रमव्यवस्था किसी का भी
अपमान करना नहीं सिखलाती । श्रीरन्तिदेव ने पुल्कस जैसे अतिशूद्रों का भी ससम्मान आतिथ्य किया था ।
आतिथ्यवेला में नाम और गोत्र के प्रश्न के बिना ही वैश्वानर बुद्धि से किमी भी अतिथि का सम्मान करना शास्त्र-
सम्मत है । शिवनाम, रामनाम सबके ही लिए कल्याणकारी हैं, यही वेदादि शास्त्रों का निश्चित मत है । पुराण में
सहस्रों उदाहरण भरे पड़े हैं। श्रीभागवत का अजामिलोपाख्यान उनमें ज्वलन्त प्रमाण है । अतः श्रीरामानन्दाचार्य के
पास जाकर कबीर अपनी जिज्ञासा नहीं प्रकट कर सकते थे, ऐसा इतिहास मनगढ़न्त ही है ।
महाभारत के अनुसार तो विदुर शूद्र थे । परन्तु भगवान् कृष्ण उनके अतिथि होते थे । धर्मव्याध के समीप
धर्मतत्त्वज्ञान के लिए पतिव्रता के वचन से ब्रह्मचारी भी जाकर तत्त्वज्ञान प्राप्त करता है । फिर कबीर का रामानन्दा-
चार्य के समीप तक पहुँचना कठिन था, यह कहना असङ्गत ही है ।

शास्त्रों के अनुसार निराकार निर्गुणोपासना भी विहित है। उससे भी दोष दूर होते हैं। एक निर्गुणो-
पासक के हृदय में प्रतिशोध की भावना सङ्गत नहीं है। गुह की उपासना के विपरीत निराकारवादी कबीर की प्रवृत्ति
धर्मयुक्त नहीं हो सकती। यदि निराकार राम सगुण साकार राम हो सकते हैं तो यह सत्य वस्तुस्थिति सिद्ध संत
कबीर के मन में अवश्य आनी चाहिये थी। सिद्ध के मन में ऐसी प्रतिक्रिया हो जिससे वह सत्य से मुंह मोड़ ले, यह
कैसी सङ्गति और कैसी सिद्धि है ?
वेदों की प्रामाणिकता स्वीकार न करने से ब्रह्मात्मसाक्षात्कार वैसे ही सम्भव नहीं, जैसे नेत्र के बिना
रूपसाक्षात्कार असम्भव है।
“दुनिया ऐसी बावरी पाथर पूजन जाय ।
घर की चकिया कोई ना पूजे जाकर पीसा खाय ॥”
यह कबीर का कथन असङ्गत है, क्योंकि आस्तिक पत्थर नहीं पूजते । किन्तु वेद प्रमाण के अनुसार
पाषाणमयी प्रतिमा में आवाहित परमेश्वर की ही पूजा करते हैं। फिर कबीर को तो इतना भी ज्ञान नहीं था कि
हिन्दू चाकी ही नहीं अपितु कुम्हार के चाक को भी पूजते हैं।
श्रीराम ने शम्बूक को सत्कर्म करने का अनधिकारी कभी नहीं माना। राम मर्यादापुरुषोत्तम थे। वर्णा-
श्रम-मर्यादा का उल्लङ्घन करने के कारण ही श्रीराम रावण जैसे ब्राह्मण को भी प्राणदण्ड देने को बाध्य हुए थे।
फिर यदि वे वर्णाश्रममर्यादोल्लङ्घी किसी को दण्ड दें तो उनका क्या दोष है ?
शास्त्रानुसार ब्राह्मण भले अखण्ड भूमण्ड का स्वामी हो, राजा हो, परन्तु उसे राजसूय यज्ञ का अधिकार
नहीं है, क्योंकि क्षत्रिय जाति का राजा ही राजसूय यज्ञ कर सकता है, अन्य नहीं । इस सत्य निष्पक्ष स्थिति में कबीर
अगर दशरथनन्दन के रूप में प्रकट राम को ईश्वर नहीं मानते तो क्या प्रतिक्रियावादी या दुराग्रही नहीं कहे जायेंगे ?
श्रीराम ने तो वर्णाश्रमधर्म का पालन और उपदेश करते हुए भी शबरी, गीध, कोल, भिल्ल, किरात,
वानरों और भालुओं से मैत्री कर उनका परम कल्याण किया था। फिर, उन्हें किसी प्रकार भी अनीश्वर कैसे कहा
जा सकता है ?
“एक दारुगत देखिय एकू । पावक युग सम ब्रह्मबिबेकू ॥” ( रा० मा० १।२२।२ )
दारुगत अग्नि निराकार है। पर वही दाहकत्व और प्रकाशकत्व विशिष्ट होकर साकार भी हो जाता है ।
“जो गुणरहित सगुन सो कैसे । जिमि हिम उपल बिलग नहिं जैसे ॥” (रा० मा० १।११५।२)
जब दशरथनन्दन रघुवर ईश्वर हो सकते हैं तब राम को अनैतिहासिक भी कैसे कहा जा सकता है ? यदि
कोई रघुवंश नहीं हो तो व्यापक नित्य राम को दशरथनन्दन कैसे कहा जा सकता था ?
“बन्दहुँ राम नाम रघुवर को” ( रा० मा० १।१८।१ )
“महर्षि वाल्मीकि राम के समकालीन थे। यदि उन्हें उनमें पूर्ण मानवता का साक्षात्कार हुआ था तो वह
स्वाभाविक ही था। किन्तु तुलसी ने राम को देखा तब उन्हें वे केवल मानव के रूप में कैसे दिख सकते थे । काल
की इस विशाल परिधि में स्वयं अपने को अभिव्यक्त करनेवाला ईश्वर को छोड़कर अन्य कोई नहीं हो सकता था।”
परन्तु यह भी असङ्गत है, क्योंकि वाल्मीकि श्रीराम को माधुर्यभाव की दृष्टि से, राजकुमार की दृष्टि से
वर्णन करते हुए भी परमेश्वर ही मानते हैं।
“स हि देवैरुदीर्णस्य रावणस्य वधार्थिभिः ।
जज्ञे विष्णुर्महातेजा आदिकर्ता स्वयंप्रभुः ॥”

अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७६५
"भवान्नारायणो देवः" ( वा० रा० यु० का० )
तुलसीदास उक्त तर्क के आधार पर नहीं, किन्तु वेद और पुराण, महाभारत के आधार पर राम को
परमेश्वर मानते थे । क्योंकि काल की इस विशाल परिधि के पार तो कई सिद्ध भी अपने को अभिव्यक्त कर
सकते थे ।
योगभाष्य के अनुसार जैगीषव्य दस महाकल्पों के अनन्तर भी अपने को व्यक्त कर सकते थे । "दशसु
महाकल्पेषु विपरिवर्तमानेन मया यत्किञ्चिदनुभूतं तद् दुःखमेव ।"
तभी तो तुलसीदास श्रीराम का कोशलपाल के रूप में ही स्मरण करते हैं ।
"तुलसी तो को कृपालु जो कियो कोशलपाल ।
चित्रकूट को चरित्र चेत चित करि सो ॥"
यह कहना भी गलत है कि "गोस्वामी के मन में इतिहास के प्रति कोई आकर्षण नहीं था । उनके लिए
राम पुराण या त्रेतायुग के बीते हुए पात्र नहीं हैं। वह तो उनके शाश्वत विद्यमान रहनेवाले राम हैं ।" क्योंकि
उनकी दृष्टि में वाल्मीकि के अनुसार राम केवल त्रेतायुग के ही नहीं हैं। वे विष्णु, नारायण या वेदवेद्य परमात्मा ही
थे । अतएव शाश्वत हैं । तभी तो राम को रघुवंशमणि एवं कोशलपाल कृपालु कहते हैं। अतः त्रेता युग में चक्रवर्ती
दशरथनन्दन के रूप में प्रकट राम ही तुलसी के शाश्वत राम भी हैं ।
वस्तुतः तुलसी के निर्मल पवित्र भाव पर जो उन्हें वर्णाश्रमधर्म पर छीटाकसी करनेवाला बताना चाहते
हैं ऐसे वक्ताओं से जनता को ईश्वर ही बचाये ।
वे कहते हैं कि "राघवेन्द्र केवट के उस दैन्य को मिटा देना चाहते थे, जिसे समाज ने उसपर लाद दिया
था । वह धन की दृष्टि से ही नहीं, हर तरह से हीन कर दिया गया था । वह अस्पृश्य था ।
"जासु छाँह छुइ लेइअ सींचा ।"
वह किसी राजा के समक्ष मुख खोलने की कल्पना भी नहीं कर सकता था ।"
यह वही सुधारवाद है जिसका भूत आधुनिक लोगों पर सवार होता है । कथावाचक सज्जन भी उसके
अपवाद नहीं हैं। परन्तु उनके अनुसार राम एवं तुलसी को अवश्य ही नयी आचारसंहिता प्रचलित करनी चाहिये
थी । कम से कम "जासु छाँह छुइ लेइअ सींचा" का उत्तर अवश्य देना चाहिये था । वक्ता कह सकता है कि
भगवान् ने उसे गले लगाकर ही इसका उत्तर दे दिया था । परन्तु वह भूल करता है । क्योंकि शास्त्रसंस्कारी तो यह
समझ लेगा कि आचार में धर्मशास्त्र प्रमाण होता है, इतिहास नहीं। हिन्दी व्यवहार में आदरणीय नहीं, किन्तु
कांस्टिट्यूशन ही व्यवहार में आदरणीय है ।
ईश्वरों का सब आचरण काम में नहीं लाना चाहिये, किन्तु उनकी आज्ञा का ही पालन करना चाहिये—
"ईश्वराणां वचः सत्यं तथैवाचरितं क्वचित् ।" (भाग० १०।३३।३२)
शास्त्राविरुद्ध ही आचरण अनुष्ठानयोग्य होता है। वैदिक भी यही कहते हैं—
"यान्यस्माकं सुचरितानि तानि त्वयोपास्यानि नो इतराणि ।" (तै० उ० १।११।२)
जो हमारे अनवद्य निर्दोष शास्त्राविरुद्ध आचरण हैं उनका ही आदर करना चाहिये अन्य का नहीं ।
समाज ने कोई चीज किसी पर लाद दी, यह निष्प्रमाण है। विशेषतः वह शास्त्रानुसारी समाज जिसमें
श्रीराम का अवतरण हुआ उसने कोई अनुचित स्थिति किसी पर लादी होती तो क्या उसमें राम का प्रादुर्भाव होना