सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 831, कुल 1049 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 831

७५४ रामायणमीमांसा एकविंश
में डाला हुआ रङ्ग स्थिर हो जाता है वैसे ही पिघले हुए अन्तःकरण में अभिव्यक्त भगवान् भी अन्तःकरण
में स्थिर हो जाते हैं ।
हम अनेक पदार्थों को देखते हैं, किन्तु उनका स्मरण नहीं रहता है । परन्तु जिसे स्नेह, काम, भय,
द्वेष आदि से द्रवीभूत मन से देखते हैं उसे भुलाने का प्रयत्न करने पर भी भुला नहीं पाते । किसी प्रिय मित्र या
प्रेयसी कामिनी की विस्मृति नहीं होती । सर्प, व्याघ्र या शत्रु को भय तथा द्वेष से द्रुत अन्तःकरण से ग्रहण करने
के कारण ही हम उन्हें भी नहीं भूल पाते हैं ।
सोमजातीय होने के कारण ही जल, दुग्ध, दधि, सोमलता आदि में द्रवता-कोमलता है । सोमांश होने
के कारण ही भक्ति, स्नेह, करुणा, श्रद्धा आदि अन्तःकरण के गुण प्रकट होते हैं । विश्वास भी अन्तःकरण का धर्म
है । श्रद्धा और विश्वास जब दोनों ही निर्दोष प्रमाण के आधार पर होते हैं तभी आदरणीय होते हैं । अविवेक के
कारण भी श्रद्धा तथा विश्वास होते हैं पर वे अन्धविश्वास एवं अन्धश्रद्धा ही होते हैं ।
संसार अनन्त है । परन्तु मनुष्य का ज्ञान बहुत सीमित होता है । चक्षु, श्रोत्र, घ्राण आदि इन्द्रियाँ,
मन आदि ज्ञान के साधन हैं । चक्षु तथा घ्राण के द्वारा बहुत सीमित वस्तुओं को जाना जा सकता है । मन, बुद्धि
आदि भी आन्तर सुख, दुःखादि के ज्ञान में स्वतन्त्र होते हुए भी बाह्य विषयों में वे स्वतन्त्र नहीं हैं । चक्षुरादि के
परतन्त्र होकर ही वे कुछ विषयों का ज्ञान करा सकते हैं ।
योगशास्त्र के अनुसार यदि प्रातिभ ज्ञान या ऋतम्भरा प्रज्ञा प्राप्त हो तो अधिक ज्ञान हो सकता है ।
योगजनित दिव्य ज्ञान के सामने तो सम्पूर्ण ज्ञेय ही ज्ञान की अपेक्षा कम हो जाता है । पर जो उत्कृष्ट कोटि की
सम्प्रज्ञात समाधि या असम्प्रज्ञात समाधि से सम्पन्न नहीं हैं उसके लिए ज्ञान के द्वार बहुत ही सीमित हैं । साथ ही
दम्भ की महिमा से गैर योगी भी योगी होकर पूजित होते हैं । फिर किस प्रकार सत्य वस्तु का ज्ञान हो सकता है ?
अतः अपौरुषेय मन्त्र-ब्राह्मणात्मक वेद एवं वेदमूलक आर्ष ग्रन्थों के द्वारा ही प्राणी अपने अभ्युदय एवं निःश्रेयस के
उपायों को जान सकता है ।
जैसे अकारणकरुणावरुणालय भगवान् प्राणियों के कल्याणार्थ ही उनके कर्मों के अनुसार अनन्त कोटि
ब्रह्माण्डात्मक प्रपञ्च का निर्माण करते हैं, वैसे ही वही प्रभु अभ्युदय एवं निःश्रेयस के उपायों को प्रकट करते हैं ।
श्रीभागवत में कहा गया है कि वेद साक्षात् नारायण ही हैं—
"वेदो नारायणः साक्षात् स्वयंभूरिति शुश्रुमः ।” ( भाग० ६।१।४० )
उन वेदादिशास्त्रों एवं तदनुसारी श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ गुरुओं के वाक्यों में विश्वास ही श्रद्धा है ।
ऐसी स्थिति में कबीरदास का व्यङ्ग्यभरा निम्नोक्त उत्तर निःसार है—
“तू कहता कागद की लेखी । मैं कहता आँखिन की देखी ॥”
वेदशास्त्र साक्षात् ईश्वर का निःश्वास है कागद की लेखी नहीं है । स्मृति क्षीण होने पर स्मृति की
सहायता के लिए कागद की लेखी का भी उपयोग होता है ।
धर्म और ब्रह्म दोनों ही आँखों के ही नहीं प्राणियों के मन और बुद्धि के भी सर्वथा अगोचर ही हैं ।
जिस वस्तु को प्रत्यक्ष या अनुमान से नहीं जाना जाता । उसी वस्तु के ज्ञान के लिए वेदों का आविर्भाव होता है—
"प्रत्यक्षेणानुमित्या वा यस्तूपायो न वेद्यते ।
एनं विदन्ति वेदेन तस्माद् वेदस्य वेदता ॥”