रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
गोस्वामी तुलसीदास, रामचरितमानस
ॐ
रामायणमीमांसा
प्रथम अध्याय
परब्रह्मस्वरूप सीता-राम का वेदमूलक लोकोत्तर माहात्म्य
सौन्दर्यसारसर्वस्वं माधुर्यगुणबृंहितम् ।
ब्रह्मैकमद्वितीयं तत् तत्त्वमेकं द्विधा कृतम् ॥
वेदादिशास्त्रसंवेद्यं सीतारामस्वरूपकम् ।
सरहस्यं सतां सेव्यमद्भुतं प्रणमाम्यहम् ॥
श्रीसीता-राम का अनुपम ऐश्वर्य
श्रीसीता और श्रीराम अनन्तकोटि ब्रह्माण्डों के अधिष्ठान स्वप्रकाश परब्रह्मस्वरूप हैं। वे ही सूर्य, चन्द्र,
अग्नि आदि बाह्य ज्योतियों तथा श्रोत्र, नेत्र, मन, बुद्धि, चित्त, जीव, दैवत आदि आन्तर ज्योतियों के भी ज्योति
हैं। वे ही ईश्वर के ईश्वर, ब्रह्मा के ब्रह्मा, ज्ञान के ज्ञान, आनन्द के आनन्द तथा अनुपम अचिन्त्य अनन्त कल्याण
गुणगणों के निधान हैं और सौन्दर्य, माधुर्य, सौरस्य, सौगन्ध्य, सौकुमार्य, सौशील्य, आभा, प्रभा, शोभा, कान्ति,
शान्ति प्रभृति दिव्य गुणों की अधिष्ठात्री महालक्ष्मी-समुदायों से सेव्य, अतएव अनन्त लक्ष्मियों की भी लक्ष्मी हैं—
“सूर्यस्यापि भवेत्सूर्यो ह्यग्नेरग्निः प्रभोः प्रभुः ।
श्रियाः श्रीश्च भवेदग्रया कीर्त्त्याः कीर्त्तिः क्षमा-क्षमा ॥” (वा० रा० २।४४।१५) ।
श्रीसीता प्रेमसारसर्वस्व राम की सौन्दर्यसारसर्वस्व
श्रीसीता-राम का स्वरूप सुषमाकामधेनु के सौन्दर्य-पयोराशि से जनित नवनीत से निर्मित है। म्रदिमा की
अधिष्ठात्री महालक्ष्मी के चरणकमल कमल से भी कोटिगुण अधिक सुकोमल हैं। वह म्रदिमा की अधिष्ठात्री महालक्ष्मी
अपने लोकोत्तर सुकोमल हस्तारविन्द से श्रीसीता के चरणारविन्द का स्पर्श करने में अपने पाणिपङ्कज
को कठोर समझ कर सकुचाती है। श्रीतुलसीदासजी के अनुसार सीता अनुपमेय हैं। ज्ञान-विज्ञान की अधिष्ठात्री
राजराजेश्वरी महात्रिपुरसुन्दरी भी अनेक कारणों से श्रीसीता की उपमानश्रेणी में नहीं आ सकतीं। श्रीमहालक्ष्मी के
प्राकट्य के लिए क्षीरसमुद्र का मन्थन करना पड़ा था। तदर्थ मन्दराचल को मन्थानदण्ड बनाना पड़ा था। मन्दराचल
को धारण करने के लिए भगवान् को कच्छपावतार धारण करना पड़ा था। वासुकि नागरूपी रज्जु से मन्दराचल
को निबद्ध कर देवताओं, दानवों तथा स्वयं श्रीविष्णु को मन्थन करने का आयास करना पड़ा था, तब महालक्ष्मी
का प्रादुर्भाव हुआ था, पर आनन्दसिन्धुसार-सर्वस्व भगवान् राम के माधुर्यसार-सर्वस्व की अधिष्ठात्री राघवेन्द्र-प्राणेश्वरी
श्रीसीता के उपमान के लिए वह पर्याप्त नहीं है। हाँ, यदि क्षीरसागर के बदले छविसुधा-सागर हो और पाषाणमय
२ रामायणमीमांसा प्रथम
मन्दराचल के स्थान में शृङ्गाररूप मन्दराचल हो और उसका आधारभूत कच्छप भी परम रूपमय हो, वासुकि नाग के
स्थान में शोभामयी रज्जु हो और मन्थन करनेवाले देवता आदि के स्थान में साक्षात् आधिदैविक काम ही स्वयं अपने
पाणिपद्म से मन्थन का कार्य करें तो इस विधि-विधान से जो अलौकिक लक्ष्मी प्रकट होगी वही कथञ्चित् श्रीसीता का
उपमान बन सकती है। विजयलक्ष्मी, साम्राज्यलक्ष्मी, ऐश्वर्यलक्ष्मी, माधुर्यलक्ष्मी, मोक्षलक्ष्मी प्रभृति सब लक्ष्मियाँ
अनायास ही वहाँ उपस्थित हो जाती हैं जहाँ श्रीसीता के कृपाकटाक्ष-लेश का उन्मेष होता है।
अनुपम प्रेम, अनुपम सौन्दर्य एक दूसरे से अभिन्न हैं। प्रेमसार-सर्वस्व राम हैं एवं सौन्दर्यसार-सर्वस्व
श्रीसीता हैं। राघवेन्द्र-हृदयेश्वरी श्रीसीता के अरुण चरणारविन्द की अरुण रज ही श्रुति-सीमन्तिनीजनों के सीमन्त
का सिन्दूर है अर्थात् श्रीसीता के चरणारविन्दों की रज से ही श्रुतियाँ सौभाग्यशालिनी होती हैं।
श्रीसीता राम की महाशक्ति एवं सर्वस्व हैं
सीतोपनिषद् में कहा है, अनेकरूपा श्रीसीता के अनुग्रह से वेद एवं वेदवेद्य परमात्मा सौभाग्यशाली होते हैं।
जैसे शीतलता, मधुरता एवं पवित्रता ही गङ्गा के प्रवाह का सार है तथा मधुरिमा अमृत का सर्वस्व है, वैसे ही आनन्द-
सिन्धु सुखराशि श्रीराघवेन्द्र के माधुर्यसारसर्वस्व की अधिष्ठात्री महालक्ष्मी ही सीता हैं। यद्यपि श्रीसीता और राम
दोनों परस्पर अभिन्न प्रेमसौन्दर्यसार हैं; उनमें चन्द्र तथा चन्द्रिका का एवं भास्कर तथा प्रभा का जैसा अभेद सम्बन्ध
है। अमृतसिन्धु का उसके माधुर्य से विप्रयोग की कल्पना असम्भव है। श्रीसीता और राम का सम्बन्ध तो पूर्वोक्त
उदाहरणों से भी अत्यधिक घनिष्ठ है, वह कैसे विच्छिन्न हो सकता है। फिर भी श्रीसीताजी राम की अनन्य भक्ति एवं
अनन्य सेवा स्वरूप होने के कारण संप्रयोग-विप्रयोगात्मक उद्बुद्ध उभयविध शृङ्गाररससार-सर्वस्वस्वरूपा हैं। यही कारण
है कि उनका जहाँ अखण्डरूप से श्रीराम के साथ नित्य सम्बन्ध है, वहीं उनका श्रीराम के साथ चिर-विप्रयोग भी
परिलक्षित होता है। विप्रयोग शृङ्गार का महत्त्व रसिकों की दृष्टि में संप्रयोग शृङ्गार से कहीं अधिक है। तभी तो
किसी ने कहा है—
“सङ्गमविरहविकल्पे वरमिह विरहो न सङ्गमस्तस्य ।”
सङ्गम और विरह का वरदान मिल रहा हो तो भक्त विरह का वरदान माँगेगा, सङ्गम का नहीं; क्योंकि
सङ्गम से प्रियतम का सम्मिलन सीमित होता है, परन्तु विरह में तो प्रियतम ही सर्वत्र सर्वरूप से अन्तःकरण,
अन्तरात्मा, प्राणों तथा रोम-रोम में निरन्तर मिलते रहते हैं। उसी की अनुभूति श्रीराम इस प्रकार करते हैं—
कुवलय विपिन कुंत बन सरिसा। बारिद तपत तेल जनु बरिसा॥
जे हित रहे करत तेई पीरा। उरग-स्वास सम त्रिविध समीरा॥
तत्त्व प्रेम कर मम अरु तोरा। जानत प्रिया एकु मनु मोरा॥
सो मनु रहत सदा तोहि पाहीं। जानु प्रीति रसु एतनेहि माहीं॥
(रा० मा० ५।१४।२-४)
लोक में जो उत्कण्ठा प्रिय के विप्रयोग में होती है वह संयोग में नहीं होती, पर प्रियतम के बिना
उस उत्कण्ठा का रसास्वादन ही नहीं होता और जब प्रियतम हैं तब वह उत्कण्ठा नहीं होती। इसी दृष्टि से
श्रीसीता-राम में सर्वदा सर्वाङ्गीण सम्मिलन-संश्लेष रहने पर भी औपाधिक विश्लेष की अभिव्यक्ति होती है जिसमें
प्रियतम की उपस्थिति से भी उत्कट उत्कण्ठा अनुभूत होती है और उत्कट उत्कण्ठा के साथ ही साथ प्रियतम का पूर्ण
परिष्वङ्ग प्राप्त होता है। उत्कण्ठापूर्ण परिष्वङ्ग ही पूर्ण भक्ति है, वही पूर्ण सेवा है, वही प्रभु-प्राप्ति का साधन है एवं
वही फल भी है। वही सीता है, वही श्रीराम का हृदय है और वही लोकोत्तर माधुर्य है। “श्रीराम” इस महामन्त्र
में ‘श्री’ शब्द से श्रीसीता का ही उल्लेख हुआ है। ‘श्री’ शब्द का “श्रयति इति श्रीः” इस व्युत्पत्ति से सेवा करनेवाली
अथाऽयं परब्रह्मरूप सीताराम का वेदमूलक लोकोत्तर माहात्म्य ३
श्रीसीता महालक्ष्मी का नाम ही 'श्री' है। भावार्थक प्रत्यय करने पर भी श्रीशब्द का अर्थ सेवा एवं भक्ति है।
उत्कट उत्कण्ठापूर्वक मन, बुद्धि, चित्त एवं अन्तःकरण तथा अन्तरात्मा का तन्मयतापूर्ण प्रियतम-परिष्वङ्ग ही
'सेवा' है, वही 'श्री' सीता हैं। वही “श्रीयते सर्वगुणैर्या सा श्रीः” के अनुसार सकल-कल्याणों की अधिष्ठात्री
शक्तियों द्वारा सेव्या और वन्दनीया हैं। कान्ति, शान्ति, आभा, प्रभा, शोभा आदि सभी दिव्य शक्तियाँ उस
श्रीसीता की सेविकाएँ हैं। “श्रीयते हरिणापि या सा श्रीः” के अनुसार श्रीराम भी उसी श्रीसीता की सेवा
एवं आराधना करते हैं। आत्माराम का स्वरूपमाधुर्य ही आत्मा है। उसमें आसमन्तात् रमण करना ही
आत्माराम की आत्मारामता है। आत्मा ही परप्रेमास्पद होता है। आत्मज्ञों का वही सेव्य है। आनन्दसिन्धु राम का
माधुर्यसारसर्वस्व सीता ही आत्मा है। वही परप्रेमास्पद है, वही परम सम्भजनीय एवं परम वरेण्य राम का स्वरूपभूत
भर्ग है। ऐश्वर्य की दृष्टि से भी अद्भुतरामायण के अनुसार श्रीनारद के उपदेश से श्रीराम ने सीता की ध्यान, स्तुति,
स्तोत्र आदि द्वारा आराधना की थी और सदा ही करते रहते हैं। माधुर्य की दृष्टि से सीता श्रीराम की विशुद्ध
अन्तरात्मा हैं। ऐश्वर्य की दृष्टि से सीता ही श्रीराम के ऐश्वर्य का मूलमन्त्र महाशक्ति हैं। शक्ति के बिना ब्रह्म में
अनन्तब्रह्माण्डोत्पादकत्व, सर्वपालकत्व, सर्वसंहारकत्व आदि कुछ भी नहीं हो सकता है। तभी तो अध्यात्मरामायण
में श्रीसीता ने कहा है—"सृष्टि, स्थिति आदि तथा शिवधनुर्भङ्ग, रावण-वध आदि सब कार्य मैं ही करती हूँ।
श्रीराम तो सर्वथा निर्विकार, कूटस्थ चिदानन्दघनमात्र हैं।"
अभिन्नरूप श्रीसीता-राम की सेवा-शिक्षाप्रदानार्थ भिन्नरूपता
इसी तरह श्रीसीता श्रीराम की सेविका हैं 'श्री' हैं, शोभा हैं और वही श्रीराम की सेवा हैं, आराधना
हैं एवं मूर्तिमती अलभ्य, दुर्लभ, भक्तसर्वस्व भक्ति हैं। वही श्रीराम की ऐश्वर्यशक्ति हैं, महाशक्ति हैं, महालक्ष्मी हैं
और वही सीता सर्वगुणों की सेव्या तथा आराध्या हैं। वही श्रीराम की आराधनीया हैं एवं वही श्रीराम के स्वरूपभूत
माधुर्यसार-सर्वस्व की अधिष्ठात्री परप्रेमास्पदरूपा श्रीराम की आत्मा हैं। इस तरह यद्यपि सीता ही राम हैं, राम ही
सीता हैं इसमें किञ्चिन्मात्र भी अन्तर नहीं है तथापि
“सेवक-सेव्य भाव बिनु भव न तरिय उरगारि” (रा० मा० ७।११९ [क])
के अनुसार वही अभिन्न होते हुए भी उपासना, आराधना तथा सेवा की शिक्षा देने के लिए सीता-राम दो
रूपों में प्रकट हैं। “कृष्णश्चैव बृहद्वलः” (वा० रा० ६।११९।१५) के अनुसार श्रीराम ही श्रीकृष्णरूप में प्रकट
हुए हैं और उस स्थिति में श्रीसीता की मुख्य शक्ति श्रीकृष्ण-प्राणेश्वरी श्रीराधा के रूप में प्रकट होती हैं। अन्य
शक्तियाँ रुक्मिणी आदि के रूप में प्रकट होती हैं। श्रीराम ही यथावसर महाकामेश्वर के रूप में प्रकट होते हैं। उस
समय श्रीसीता की अभिन्न शक्ति ही कामेश्वराङ्कनिलया राजराजेश्वरी त्रिपुरसुन्दरी के रूप में प्रकट होती है। श्रीराम
ही जब अनन्त ब्रह्माण्डों के उत्पादक सर्वविधाता बनते हैं तब श्रीसीता ज्ञान-विज्ञान की अधिष्ठात्री महासंवित् सरस्वती
बन जाती हैं। जब श्रीराम विश्वपालक विष्णुरूप में व्यक्त होते हैं तब श्रीसीता ही अनन्त ऐश्वर्य की अधिष्ठात्री
महापालिनी, महालक्ष्मीरूप में प्रकट होती हैं। श्रीसीता रघुकुलकमल-दिवाकर श्रीराम की प्रभा तथा रामचन्द्र की
चन्द्रिका हैं। आनन्दसिन्धु श्रीराम में वह माधुर्यसार-सर्वस्व हैं। अध्यात्मरामायण के अनुसार जितने पुरुषवाचक शब्द
हैं उनका अर्थ श्रीराम है जितने स्त्रीवाचक शब्द हैं उनका अर्थ श्रीजनकनन्दिनी 'जानकी' ही है। श्रीसीता मूल-
प्रकृति ही नहीं किन्तु वह चित्स्वरूप परमतत्त्व भी हैं—
“यो ह वै श्रीपरमात्मा नारायणः स भगवान्”
“कलातीता भगवती सीतेति चित्स्वरूपा” (तार० उ० पा० ३)
४ रामायणमीमांसा प्रथम
सर्वनियन्ता परमेश्वर का अस्तित्व अवश्य मान्य है
दिन के पहले रात एवं रात के पहले दिन होता है। बीज के पहले अङ्कुर एवं अङ्कुर के पहले बीज का होना
अनिवार्य है। इसी प्रकार सोने के पहले जागना और जागने के पहले सोना होता है, सृष्टि के पहले प्रलय, प्रलय के
पहले सृष्टि एवं कर्म के पहले जन्म, जन्म के पहले कर्म का होना अनिवार्य है। जन्ममूलक देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि,
अहङ्कार आदि की हलचल ही कर्म है। लोक में शुभ कर्म का शुभ फल एवं अशुभ कर्म का अशुभ फल होता है।
संसार में आकस्मिक कोई वस्तु नहीं होती, कार्यकारणभाव सर्वत्र ही स्पष्टरूप से देखा जाता है। मेज, घट, प्रासाद,
मोटर, वायुयान, राकेट आदि सभी विलक्षण कार्यों का निर्माण किसी ज्ञानवान्, इच्छावान् तथा क्रियावान् चेतन द्वारा
ही देखा जाता है। ठीक इसी प्रकार वृक्ष, भूमि, भूधर, चन्द्र, सूर्य, सागर आदि का निर्माण भी किसी ज्ञानवान्,
क्रियावान् तथा चेतन के द्वारा ही सम्भव है। हाँ, लौकिक छोटे-छोटे कार्य अल्पशक्ति, अल्पज्ञ चेतन जीव के द्वारा
निर्मित होते हैं, परन्तु विश्व-प्रपञ्च का निर्माण अल्पज्ञ अल्पशक्ति जीव द्वारा सम्भव नहीं; अतः उसके निर्माण के लिए
सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् परमेश्वर स्वीकार्य होते हैं। लोक में भी अचेतन देह आदि या अचेतन कर्म स्वयं अपना फल नहीं
दे सकते हैं, उनका फलदाता चेतन राजा आदि ही होता है। उसी प्रकार जीवों के कर्मों का फल भी स्वयं कर्म नहीं दे
सकते। जड़ प्रकृति भी फल देने में समर्थ नहीं है। जीव चेतन होने पर भी जब अपने एक जन्म के कर्मों एवं उनके
फलों को नहीं जानता है तब अन्य अनेक जन्मों के कर्मों को कैसे जान सकेगा ? उसमें फल देने की भी क्षमता नहीं है,
अतः अनन्त ब्रह्माण्डों तथा एक ब्रह्माण्ड के अनन्त जीवों एवं एक जीव के अनन्त अनन्त कर्मों तथा उनके विचित्र
फलों को जाननेवाला और तदनुसार फल देने की क्षमता से सम्पन्न सर्वशक्तिमान् सर्वनियन्ता परमेश्वर का अस्तित्व
अवश्य ही मानना होगा।
संसार का सञ्चालन नियमों पर ही आदृत है। सूर्य, चन्द्र, भौम, बुध, शुक्र आदि ग्रहों की गति और
उदय-अस्त सभी नियमित हैं। यदि उनकी गति अनियमित हो तो वे आपस में ही टकराकर विश्व-विप्लव उपस्थित
कर सकते हैं। समुद्र का ज्वार-भाटा तथा विभिन्न चेतना-चेतन पदार्थों के गुण और स्वभाव नियमित परिलक्षित होते
हैं। कल्प, युग, वर्ष, पक्ष, दिन, प्रहर, दण्ड की कौन कहे क्षण-क्षण का हिसाब-किताब प्रकृति में नियत है। नियमों का
पालन भी तभी हो सकता है जब उनके पीछे कोई सावधान नियामक शासक होता है। इस दृष्टि से भी सब प्राकृतिक
नियमों का व्यवस्थापक, पालक एवं नियामक सर्वज्ञ सर्वेश्वर अत्यावश्यक है।
अपौरुषेय वेद ही परमेश्वर का शाश्वत संविधान है
इस तरह अनादि जीव, जगत् आदि सभी संसार एवं उसके अनादि प्राकृतिक नियमों के व्यवस्थापक
सर्वनियन्ता, सर्वज्ञ तथा सर्व-शक्तिमान् प रमेश्वर की सत्ता स्वीकार किये बिना कोई भी व्यवस्था नहीं चल सकती;
अतः जैसे लोक में शासक, शिष्ट (शासित) और शासनविधान (कॉस्टीट्यूशन) आवश्यक होते हैं, वैसे ही समष्टि
विश्व-प्रपञ्च में भी जीव एवं जगत् शासित हैं, परमेश्वर उनका शासक है और वेदादि शास्त्र ही शासन-विधान हैं।
लौकिक शासित, शासक आदि सादि होते हैं; अतः उनका संविधान भी सादि होता है, पर विश्व-प्रपञ्च की दृष्टि से
अनादि जन्म-कर्म का आधार होने से जीव अनादि है एवं विश्व-निर्माता नियामक भी अनादि है; अतः उसका संविधान
वेदादि भी अनादि है।
इसी दृष्टि से वैदिक सनातन हिन्दू-धर्म और दर्शन के सिद्धान्तानुसार वेद अनादि, अपौरुषेय और नित्य
कहा जाता है। ऋग्वेद के "वाचा विरूपनित्यया" (ऋ० सं० ८।७५।६) इस मन्त्र में वेदवाणी को नित्य
कहा गया है। सर्वप्राचीन विधान-विशेषज्ञ मनु ने वेद-वाक्यों से विश्व-प्रपञ्च का निर्माण एवं वेदों से ही धर्म का
ज्ञान माना है—
अध्याय परंब्रह्मरूप सीताराम का वेदमूलक लोकोत्तर माहात्म्य ५
“वेदशब्देभ्य एवादौ पृथक् संस्थाश्च निर्ममे ।” ( मनु १।२१ )
“प्रमाणं परमं श्रुतिः ।” ( मनु २।१३ )
व्यासजी ने भी “शब्द इति चेन्नातः प्रभवात् प्रत्यक्षानुमानाभ्याम्” (ब्र० सू० १।३।२८) से वेद को नित्य
कहा है । किसी कर्ता के द्वारा कोई भी कार्य ज्ञानपूर्वक ही होता है और ज्ञान या विचार के साथ कोई न कोई
भाषा भी होती है । इस दृष्टि से विश्व-निर्माण के अव्यवहित पूर्व में होनेवाले ईश्वरीय ज्ञान की भाषा वैदिक भाषा
ही है । अर्थात् ईश्वरीय ज्ञान वैदिक शब्दों से अनुविद्ध ही होते हैं । वाक्यपदीय के अनुसार कोई भी ऐसा ज्ञान नहीं
होता जिसमें सूक्ष्मरूप में शब्दों का सम्पर्क न हो—
“न सोऽस्ति प्रत्ययो लोके यः शब्दानुगमादृते ।” ( वा० प० १।१२३ )
सभी ज्ञान शब्द से सम्बद्ध ही होते हैं—
“अनुविद्धमिव ज्ञानं सर्वं शब्देन भासते ॥” ( वा० प० १।१२३ )
“अत एव च नित्यत्वम्” ( ब्र० सू० १।३।२९ )
इत्यादि सूत्रों द्वारा वेद को अनादि एवं नित्य कहा गया है ।
“मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम् ।” ( आप सू० ) इस आपस्तम्बसूत्र के तथा व्यास, जैमिनि आदि के
अनुसार मन्त्र-भाग तथा ब्राह्मण-भाग वेद कहा जाता है । आरण्यक तथा उपनिषदों का भी अन्तर्भाव ब्राह्मणग्रन्थों में
ही है । कुछ उपनिषदों का अन्तर्भाव मन्त्र-भाग में है । इस तरह मन्त्र, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद् ये सभी
वेद हैं ।
वेदों का स्वतःप्रामाण्य
पुरुष-निर्मित ग्रन्थों में पुरुषाश्रित भ्रम, प्रमाद, विप्रलिप्सा, करणापाटव आदि दोषों से उनके दूषित होने
की सम्भावना होती है; क्योंकि पुरुषमात्र में प्रायः उक्त दोष सम्भावित होते हैं । अतएव पौरुषेय ग्रन्थों का प्रामाण्य
तभी होता है जब उनके मूल पुरुष का आप्तत्व निश्चित हो जाय । अपौरुषेय वेद तो स्वतः समस्तपुरुषदोषशङ्कारूपी
कलङ्क से विरहित होने के कारण स्वतःप्रमाण हैं । सामान्यतः प्रत्यक्षादि प्रमाण भी अपनी उत्पत्ति में कारण की
अपेक्षा रखते हैं, पर अपने स्वार्थबोधनरूप कार्य में अन्य की अपेक्षा न रखने से वे भी स्वतःप्रमाण माने जाते हैं ।
कारणदोष एवं विषय-बाध से उनका अप्रामाण्य होता है । पित्तादि कारणदोष के ज्ञान से “पीतः शङ्खः”, “तिक्तः
गुडः” इस ज्ञान का अप्रामाण्य होता है । एवं शुक्ति में “नेदं रजतम्” इस बाध-ज्ञान से “इदं रजतम्” ज्ञान का
अप्रामाण्य होता है । जो लोग एक प्रमाण के प्रामाण्य के लिए अन्य प्रमाण की अपेक्षा मानते हैं उनके मत में
अनवस्थादोष अनिवार्य है । यदि किसी अन्तिम ज्ञान को स्वतःप्रमाण मानना ही है तो प्रथम को ही स्वतःप्रमाण
क्यों न माना जाय ? जो लोग यह समझते हैं कि प्रथम जल-ज्ञान के प्रामाण्य का निश्चय संवादी ज्ञान अर्थात् स्नान,
पान आदि सफल प्रवृत्ति-ज्ञान से होता है; उसमें सन्देह का अवकाश नहीं है, वे लोग भ्रान्त हैं, क्योंकि स्वप्न के
स्नान, पान आदि ज्ञान तथा रमणी-रमणादि संवादी ज्ञान में भी संशय होता ही है । इस तरह वैदिक वाक्य स्वार्थ-
बोधक होने से स्वतःप्रमाण हैं । अपौरुषेय होने से उनमें कारण-दोष का ज्ञान नहीं होता । अग्निहोत्र और स्वर्ग का
कार्य-कारणभाव अलौकिक होने से उसका बाधक ज्ञान भी नहीं होता; अतः कारणदोष, बाधज्ञान आदि न होने से
उसका स्वतःप्रामाण्य अकाट्य ही है ।
वेदावतार वाल्मीकिरामायण का अकुण्ठ प्रामाण्य
अन्य सभी पौरुषेय ग्रन्थों में कारण-दोष की सम्भावना बनी रहती है । उनमें वेदमूलकत्व तथा पुरुष के
आप्तत्व के ज्ञान से ही प्रामाण्य होता है । वाल्मीकिरामायण, महाभारत, मन्वादि-धर्मशास्त्र, पुराण आदि का प्रामाण्य
६ रामायणमीमांसा प्रथम
उनके वेदमूलक होने से है; क्योंकि वे सब वेद के व्याख्यानरूप ही हैं। मनु, व्यास आदि के अनुसार वेद अनादि
हैं। आधुनिक इतिहासकारों की दृष्टि से भी ऋग्वेद संसार की सबसे प्राचीन पुस्तक है। वाल्मीकिरामायण वेदों
का अवतार तथा वेद-व्याख्यानरूप ही है, यह पुराण का उद्घोष है—
“वेदवेद्ये परे पुंसि जाते दशरथात्मजे ।
वेदः प्राचेतसादासीत् साक्षाद् रामायणात्मना ।।” ( वा० रा० १।१।१ )
वेदवेद्य परमेश्वर श्रीराम के अवतीर्ण होने पर वेद ही प्राचेतस महर्षि से रामायण के रूप में प्रकट हुए ।
वाल्मीकि-रामायण का भी यही मत है कि वेद के उपबृंहणार्थ महर्षि ने लव-कुश को रामायण ग्रन्थ पढ़ाया—
“वेदोपबृंहणार्थाय तावग्राहयत प्रभुः ।” ( वा० रा० १।४।६ )
इस तरह मन्त्र, ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद्, रामायण, महाभारत, मन्वादि धर्मशास्त्र, पुराण, षड्दर्शन,
आगम आदि सभी सनातनधर्मियों के मान्य ग्रन्थ हैं तथा हिन्दी, मराठी आदि विविध भाषाओं में लिखित रामचरित-
मानस, भावार्थरामायण, ज्ञानेश्वरी-गीता आदि ग्रन्थ भी वेदमूलक होने से ही प्रमाण हैं ।
श्रीसीतारामचरित्र की वेदमूलकता
श्रीसीता एवं श्रीराम का चरित्र मन्त्ररामायण, पूर्वोत्तरतापनीयोपनिषद्, रामरहस्योपनिषद् तथा मुक्ति-
कोपनिषद् आदि में स्पष्टरूप से वर्णित है ।
इसी प्रकार मन्त्ररामायण में रामकथा का विस्तार से वर्णन है । सीतोपनिषद् में सीता का माहात्म्य वर्णित
है । पचासों अन्य उपनिषदों में भी श्रीराम की वन्दना है । वाल्मीकि रामायण में श्रीसीताराम-चरित्र विस्तारपूर्वक
वर्णित है । अध्यात्मरामायण, आनन्दरामायण, अद्भुतरामायण, महाभारत, पद्मपुराण, स्कन्दपुराण आदि
में भी श्रीराम का चरित्र वर्णित है । इन सब में वेदों का महत्त्व, श्रीराम की परमेश्वरस्वरूपता तथा श्रीसीता का
महाशक्ति या राम का स्वरूप होना स्पष्टरूप से वर्णित है । ऋग्वेद-दशममण्डल के तिरानवेवें सूक्त में श्रीरामका राजा
के रूप में स्पष्ट वर्णन है ।
वाल्मीकिरामायण में श्रीसीता-राम का यथार्थ वर्णन
“प्राप्तराज्यस्य रामस्य वाल्मीकिर्भगवानृषिः ।
चकार चरितं कृत्स्नं विचित्रपदमर्थवत् ।।” ( वा० रा० १।४।१ )
भगवान् वाल्मीकि ने राम के राज्यसिंहासनासीन होने के पश्चात् रामचरित रामायण का निर्माण किया ।
वाल्मीकिरामायण के अनुसार रामायण ग्रन्थ श्रीरामचन्द्र के समय का लिखा हुआ है । यह तथ्य मूलरामायण के
प्रश्नोत्तर से भी स्पष्ट है । वहाँ प्रश्न किया गया है ।
को न्वस्मिन् साम्प्रतं लोके गुणवान् कश्च वीर्यवान् ।।” ( मू० रा० १।१।२ )
इस प्रश्न में ‘साम्प्रतम्’ से वर्तमान-काल में विशिष्ट गुणसम्पन्न पुरुष के सम्बन्ध में प्रश्न किये गये हैं ।
उत्तर में अतीत तथा वर्तमान की अनेक घटनाओं के सम्बन्ध में तथा भविष्य की घटनाओं के सम्बन्ध में क्रियाओं
का प्रयोग किया गया है । जैसे—
“इक्ष्वाकुवंशप्रभवो रामो नाम जनैः श्रुतः ।
नियतात्मा महावीर्यो द्युतिमान् धृतिमान् वशी ।।” ( मू० रा० १।१।८ )
“स जगाम वनं वीरः प्रतिज्ञामनुपालयन् ।” ( मू० रा० १।१।२४ )
अध्याय परब्रह्मरूप सीता-राम का वेदमूलक लोकोत्तर माहात्म्य ७
“न पुत्रमरणं केचिद् द्रक्ष्यन्ति मनुजाः क्वचित् ॥” ( मू० रा० १।१।९१ )
“चातुर्वर्ण्यं च लोकेऽस्मिन् स्वे स्वे धर्मे नियोक्ष्यति ॥” ( मू० रा० १।१।९६ )
इन उत्तरवाक्यों में श्रीराम वन गये । राम-राज्य में कोई पुत्र-मरण नहीं देखेगा । राम चारों वर्गों को
अपने-अपने धर्मों में नियुक्त करेंगे । इस प्रकार विभिन्न काल की क्रियाओं का स्पष्ट निर्देश है ।
इन प्रमाणों के आधार पर सिद्ध होता है कि वाल्मीकिरामायण ग्रन्थ राम के समकाल का ही है; अतः
श्रीसीताराम के सम्बन्ध में वाल्मीकिरामायण ही मुख्य प्रमाण है ।
वाल्मीकीय रामायण के अनुसार साक्षात् ब्रह्माजी ने कहा—महर्षे ! मेरी प्रेरणा से ही “मा निषाद प्रतिष्ठां
त्वम्” इस श्लोक के रूप में रामायण ग्रन्थ तुम्हारे मुख से प्रकट हुआ है । तुमने धर्मात्मा श्रीराम का चरित्र नारदजी
के मुख से जैसा सुना है, वैसा वर्णन करो । श्रीराम के चरित्र का, रहस्य, गुप्त, प्रकट जो भी वृत्त
चौबीस हजार श्लोकों, पाँच सौ सर्गों, छह काण्डों तथा उत्तरकाण्ड के रूप में सीताचरित्र रामायण का
निर्माण वाल्मीकि ने किया और वेदार्थ में परिनिष्ठित सीता-पुत्र कुश और लव को वेद का उपबृंहण करने के उद्देश्य
से यह ग्रन्थ पढ़ाया। इससे सिद्ध होता है कि यह रामायण श्रुति-तात्पर्यविषयीभूत परम तत्त्व का ही प्रतिपादन
करनेवाला ग्रन्थ है—
“स तु मेधाविनौ दृष्ट्वा वेदेषु परिनिष्ठितौ ।
वेदोपबृंहणार्थाय तावग्राहयत प्रभुः ॥” (वा० रा० १।४।६)
यह रामायण सीता का महान् चरित्र है। यह शृङ्गार, करुण, हास्य, रौद्र, भयानक, वीर आदि विविध रसों
से युक्त है। गान्धर्व-तत्त्वज्ञ स्वरसम्पन्न, परम रूपवान् कुश और लव ने वीणा-वादन के साथ इसका गायन कर अभ्यास
किया। इनके गान से ऋषि-महर्षि भी विस्मित होकर साधु साधु कहने लगते थे और सन्तुष्ट होकर कमण्डलु, कुठार
आदि पुरस्कार के रूप में देने लगते थे। वे अपने दिव्य गायन से सबके शरीरों, अङ्गों, मनों एवं हृदयों तथा कानों
को आह्लादित करते थे (वा० रा० १।४)। इतना ही नहीं कुश और लव को पढ़ाकर उस रामायण ग्रन्थ के
परीक्षार्थ महर्षि ने तत्कालीन जनता में उसे प्रचारित भी कराया। अधिकांश अयोध्यावासियों के समक्ष जो घटनाएँ
घटी थीं, उनके सामने उन घटनाओं का वर्णन हुआ और अयोध्यावासियों की दृष्टि में यह ग्रन्थ अक्षरशः परम सत्य
सिद्ध हुआ।
वाल्मीकिरामायण के अनुसार श्रीविष्णु भगवान् ही राम के रूप में अवतीर्ण हुए हैं; वाल्मीकिरामायण में
यह स्पष्ट उल्लेख है कि महाद्युति, शङ्ख, चक्र, गदा और पद्म धारण करनेवाले विष्णु आये (वा० रा० १।१५।१६)।
देवताओं ने कहा—हे विष्णो ! आप अपने को चतुर्धा विभक्त कर मनुष्यरूप में अवतीर्ण हों तथा प्रवृद्ध
लोककण्टक रावण को मारें (वा० रा० १।१५।२१,२२)।
तब सुरश्रेष्ठों द्वारा प्रार्थना करने पर भगवान्, व्यापक नारायण श्रीरामचन्द्र के रूप में प्रकट हुए (वा०
रा० १।१७)।
भगवान् विष्णु पुत्र-भाव को प्राप्त हुए। उत्तम ग्रह और नक्षत्रों के उदित होने पर श्रीकौशल्या ने 'सर्व-
लोक नमस्कृत जगन्नाथ परमेश्वर' को रामरूप में प्रकट किया। जो सर्व शुभ लक्षणों से युक्त एवं विष्णु के शुद्ध लक्ष्यार्थ-
स्वरूप अर्ध भाग हैं और वही इक्ष्वाकुवंश-वर्धन श्रीराम हैं (वा० रा० १।१८।१०,११)।
विश्वामित्र का कहना है—सत्यपराक्रम परब्रह्मरूप राम को मैं जानता हूँ और जो तपोनिष्ठ लोग हैं वे भी
जानते हैं। महातेजा वसिष्ठ भी श्रीराम को उसी रूप में पहचानते हैं (वा० रा० १।१९।१४,१५)।
ये मूर्तिमान् धर्म हैं, वीर्यवानों में सर्वाधिक बुद्धिसम्पन्न (सर्वज्ञ) तथा तपस्या के परम लक्ष्य हैं। ये विविध
अस्त्रों को जानते हैं। सचराचर त्रैलोक्य में भक्तिहीन जन इन्हें नहीं जानते और न जानेंगे (वा० रा० १।२१।
१०,११)।
श्लेषालङ्कार से विश्वामित्र की भी उक्त श्लोकों में स्तुति है।
महातेजा गौतम ने अहल्या के साथ विधिवत् श्रीराम की पूजा की और अपने तप में लग गये (वा०
रा० १।४९।२१,२२)।
परशुराम ने कहा था—त्रैलोक्यनाथ ! आपने जो मुझे पराजित किया है इससे मैं आप को मधुहन्ता
मधुसूदन समझता हूँ। स्वर्गादि लोकों का दान करना या उन्हें प्रतिबद्ध करना ईश्वर का ही कार्य है (वा० रा०
१।७६।१७-१९)।
यही बात "उतामृतत्वस्येशानः" (पु० सू० २) इस श्रुति में कही गयी है।
उदीर्णदर्प रावण का वध चाहनेवाले देवताओं की प्रार्थना से भगवान् सनातन विष्णु ही मनुष्य-लोक में
रामरूप से प्रकट हुए हैं। कोई भी मनुष्य पुरुषोत्तम राम के सौन्दर्य और माधुर्य से पूर्ण स्वरूप के रसास्वादनार्थ
गये हुए अपने मन एवं नेत्रों को उनके चले जाने पर भी हटा नहीं सकता। उनके चले जाने पर भी दर्शकों
के मन एवं नेत्रों में उनका दिव्य रूप जगमगाता रहता है। जो मनुष्य स्वप्न में या ध्यान में भी निर्गुण अन्तर्यामी या
सगुण साकार रूप से श्रीराम को नहीं देखता है और श्रीराम अनुग्रह की दृष्टि से जिसे नहीं देखते वह सब लोकों में
निन्दित होता है। उसकी आत्मा, अन्तःकरण आदि भी उसकी निन्दा करते हुए उसे कोसते हैं। वसिष्ठजी कहते हैं,
लोक में ऐसी वस्तु की सत्ता ही सम्भव नहीं जो राम की अनुव्रत न हो। सब सत्ताओं के उद्गमस्थान महासत्तास्वरूप
श्रीराम ही हैं।
"यश्च रामं न पश्येत्तु रामो यं नाभिपश्यति ॥"
"निन्दितः सर्वलोकेषु स्वात्माप्येनं विगर्हते ॥" (वा० रा० २।१७।१३,१४)
"लोके नहि स विद्येत यो न राममनुव्रतः ॥" (वा० रा० २।३७।३२)
धर्मरता वैदेही सीता, श्रीराम का अनुगमन करती हुई, कृतकृत्य हैं। जैसे सुमेरु को सूर्यप्रभा कभी नहीं
त्यागती वैसे ही सीता राम से कभी वियुक्त नहीं होती (वा० रा० २।४०।२४)।
श्रीसुमित्रा कहती हैं—कौशल्ये ! श्रीराम सूर्य के भी सूर्य, अग्नि के अग्नि, प्रभु के भी प्रभु, ईश्वर के
भी ईश्वर, श्री के भी अग्या श्री हैं। वे कीर्ति के भी कीर्ति एवं क्षमा के क्षमा हैं। जैसे दग्ध तप्त लोह-पिण्ड में
दाहकत्व देनेवाला अग्नि, दग्धा लोहपिण्ड का भी दग्धा कहा जाता है, वैसे ही सूर्य आदि में प्रकाशकत्व तथा ईश्वर
में ईश्वरत्व आदि प्रदान करनेवाले सर्वाधिष्ठान स्वप्रकाश राम सूर्य आदि के भी सूर्य आदि हैं। अर्थात् श्रीराम
स्वप्रकाश सर्वान्तर्यामी परब्रह्म हैं (वा० रा० २।४४।१५)।
सत्यस्वरूप श्रीराम के वचन हैं—संसार में सत्य ही ईश्वर है, सत्य में ही धर्म सदा प्रतिष्ठित है। वेद भी सत्य
ब्रह्म में ही प्रतिष्ठित, पर्यवसित हैं, अतः सत्यनिष्ठ होना आवश्यक है—
"सत्यमेवेश्वरो लोके सत्ये धर्मः सदाश्रितः ।” (वा० रा० २।१०९।१३)
“वेदाः सत्यप्रतिष्ठानास्तस्मात् सत्यपरो भवेत् ॥" (वा० रा० २।१०९।१४)
सत्य ब्रह्म-धर्म को छिपाने के कारण तथागत बुद्ध को नास्तिक ही समझना चाहिये (वा० रा० २।१०९।३४)।
बौद्धों के अनुसार लङ्कावतारसूत्र के बुद्ध ने लङ्कापति रावण को बौद्ध धर्म का उपदेश किया था; अतः
शुद्धोदनपुत्र गौतम बुद्ध से पहले भी बुद्ध की प्रसिद्धि थी।
श्रीअगस्त्यजी ने श्रीराम से कहा—आप मुझे पूज्य एवं मान्य अतिथि के रूप में प्राप्त हैं। उन्होंने श्रीराम की
पूजा कर आतिथ्य-सत्कार किया और श्रीराम से कहा, यह विश्वकर्मा द्वारा निर्मित दिव्य महाचाप इन्द्र ने आपके
लिए प्रदान किया है। रावणादि पर विजय प्राप्त करने के लिए आप इसे ग्रहण करें (वा० रा० ३।१२।३०-३२)।
महर्षियों, सिद्धों, देवताओं और गन्धर्वों ने कहा—गायों एवं ब्राह्मणों का तथा जो लोगों द्वारा लोकहितैषी के
रूप से सम्मत हैं उनका कल्याण हो। संग्राम में आप पुलस्त्य-कुलप्रसूत निशाचरों पर विजय प्राप्त करें (वा० रा०
३।२३।२८)।
अकम्पन ने कहा—महाप्रशा श्रीराम कुपित होने पर विक्रम द्वारा सर्वथा असाध्य हैं, अजेय हैं। महायशा
२
१० रामायणमीमांसा प्रथम
पुरुषव्याघ्र श्रीराम अपने विक्रम से सब लोकों का संहार कर समस्त प्रजा का पुनः निर्माण कर सकते हैं (वा० रा०
३।३१।२६)।
मारीच ने कहा—श्रीराम मूर्तिमान् धर्म हैं। वे सत्यपराक्रम हैं, देवों में इन्द्र के समान सब लोकों के (पृथ्वी
के ही नहीं) राजा हैं (वा० रा० ३।३७।१३)।
वह तेज अप्रमेय है, जिसकी पत्नी जनकात्मजा है (वा० रा० ३।३७।१८)।
सीताके वियोगमें सन्तप्त एवं कुपित होकर श्रीराम ने कहा—मैं सब लोकों का निर्माता हूँ, शूर हूँ। हे लक्ष्मण !
लोकहित में रत, दान्त एवं मृदु होनेसे अज्ञानी लोग मेरा अवमान कर रहे हैं। त्रिदशेश्वर मुझे निर्वीर्य समझ रहे हैं।
मैं त्रैलोक्य को कालकर्म से संयुक्त (मृत्यु के वशीभूत) कर सकता हूँ और सचराचर जगत् का नाश कर सकता हूँ
(वा० रा० ३।६४।५४-६२)।
तारा ने वाली से कहा—युगान्त में उद्भूत प्रलयाग्नि के समान राम शत्रु के बलों का मर्दन करनेवाले हैं।
वह साधुओं के निवास-वृक्ष एवं आपद्ग्रस्त प्राणियों के परम आश्रय हैं। वह आर्तों के एकमात्र संश्रय एवं यश के
एकमात्र भाजन हैं। उनसे बैर करना तुम्हारे लिए उचित नहीं है। वे ज्ञान-विज्ञान सम्पन्न हैं, पिता की आज्ञा के
पालन में निरत हैं एवं सम्पूर्ण गुणों के आकर हैं (वा० रा० ४।१५।१९-२१)।
तारा ने अदृष्टपूर्व प्रधान पुरुष श्रीराम को देखकर यह काकुत्स्थ हैं ऐसा जाना (वा० रा० ४।२४।२८) और
उसने कहा—आप अप्रमेय हैं, देश, काल और वस्तु के परिच्छेद से शून्य हैं, दुरासद, जितेन्द्रिय, उत्तम धार्मिक,
अक्षयकीर्ति एवं विलक्षण पुरुष हैं। पृथ्वी के समान क्षमावान् एवं अरुणनेत्र हैं (वा० रा० ४।२४।३१)।
हनुमान् का वचन स्वयंप्रभा तापसी के प्रति—
दाशरथि राम सर्वलोक के राजा हैं। महेन्द्र एवं वरुण के समान प्रभावशाली हैं।
चतुरानन स्वयम्भू ब्रह्मा, त्रिपुरान्तक त्रिनेत्र रुद्र, देवताओं के राजा महेन्द्र इन्द्र भी राम के सामने युद्ध में
टिक नहीं सकते, क्योंकि श्रीराम ही त्रिमूत्ति हैं (वा० रा० ५।५१।४४)।
श्रीराम ने स्वयं कहा—इच्छा करने पर मैं संसारके सभी पिशाच, दानव और राक्षसों का एक अंगुली के
अग्रभाग से संहार कर सकता हूँ। सङ्कल्पसिद्धि ईश्वर का लक्षण है। अपरिमेयशक्ति ईश्वर यदि अपनी निरतिशय
शक्ति एवं महिमा को प्रकट करें तो उनके लिए कुछ भी असाध्य नहीं है; परन्तु ब्रह्मा के दिये हुए वरदान के अनुसार
नरलोक का अनुसरण करते हुए श्रीराम ने वानर आदि की सहायता की अपेक्षा की है। जो अनन्य-भाव से
भगवान् राम की प्रपत्ति स्वीकार कर लेता है अथवा सेव्य-सेवकभाव से, रक्ष्य-रक्षकभाव से भी—'मैं आपका हूँ,'
इस प्रकार प्रार्थना करता है उसे वे सब भूतों से तात्कालिक एवं आत्यन्तिक अभय प्रदान करते हैं (वा० रा०
६।१८।२३,३३)।
श्रीसीता का वचन है—मैं राघव से वैसे ही अभिन्न हूँ जैसे भास्कर से उसकी प्रभा अभिन्न होती है। जैसे
विदितात्मा व्रत-स्नात विप्र की विद्या अनपायिनी होती है वैसे ही मैं श्रीराम की अनपायिनी शक्ति हूँ। जैसे लोपामुद्रा
अगस्त्य की, सुकन्या च्यवन की, सावित्री सत्यवान् की एवं श्रीमती कपिल की अनन्य अनपायिनी हैं वैसे ही मैं श्रीराम
की अनन्य अनपायिनी हूँ (वा० रा० ५।२१।१६)।
जैसे अरुन्धती वसिष्ठ की तथा रोहिणी चन्द्रमा की अनुगामिनी हैं वैसे ही मैं श्रीराम की अनुगामिनी हूँ (वा०
रा० ५।२१।२४)।
महातेजा राम को सुर या असुर कोई भी जीत नहीं सकता (वा० रा० ५।२७।२२)।
त्रिजटा कहती है—हे राक्षसियो ! प्रणिपातमात्र से प्रसन्न होकर जनक-नन्दिनी मैथिली महान् भय ( संसार-
भय ) से भी रक्षा कर सकती हैं । तदनन्तर वही ह्रीमती बाला सीता अपने पति की विजय की बात त्रिजटा के
स्वप्न से जानकर प्रसन्न होकर बोली—यदि विजय की बात सत्य होगी तो मैं तुम लोगों का अवश्य रक्षण करूँगी
(वा० रा० ५।२७)
श्रीहनुमान् कहते हैं—कमल की पाँखुरी के समान अरुण, स्वच्छ, दीर्घ-आयत नेत्रवाले राम सब प्राणियों के
मन को हरण करनेवाले परम प्रिय हैं, ( सभी प्राणियों के परप्रेमास्पद आत्मा है ), सभी जीवों के रक्षिता (अन्तर्यामी)
हैं एवं वेदविद् लोगों द्वारा सुन्दररूप से वे पूजित हैं । राम ब्राह्मणों के उपासक हैं । वही लोगों की मर्यादाओं के
ईश्वररूप से कर्त्ता हैं एवं अवताररूप से कारयिता हैं ( वा० रा० ५।३५।८-१० ) ।
देवताओं ने भगवान् विष्णु से प्रार्थना की थी—आप मनुष्य-रूप धारण कर संग्राम में रावण को मारें, क्योंकि
ब्रह्मा ने उसे यह वरदान दे रखा है कि मनुष्य को छोड़कर अन्य से तुम्हें कोई भय नहीं है ( वा० रा० १।१६।३,५ ) ।
श्रीसीता कहती है—वह जयन्त तीनों लोकों में भटका किसी को भी त्राता न पाकर अन्त में राघवेन्द्र की
शरण में आया । अपनी शरण में आये और भूमि में पतित जयन्त को देखकर राम ने उसे अभय दिया ( वा० रा०
५।३०।३४ ) ।
श्रीहनुमान् जी कहते हैं—अस्त्रवित् राम, महाबल लक्ष्मण एवं राजा सुग्रीव विजयी हों (वा० रा० ५।४३।८) ।
त्रिलोकनायक श्रीराम के सामने कोई देवता एवं स्वयम्भू चतुरानन ब्रह्मा भी नहीं टिक सकते ( वा० रा०
५।५१।४४ ) ।
अग्नि से हनुमान् की रक्षा के लिए सीता ने अग्नि से कहा था, यदि मैंने गुरुजनों की सेवा की है, यदि मैंने
तपश्चर्या की है, यदि मैंने एकपत्नीत्व पातिव्रत्य का पालन किया है तो हे अग्ने ! तुम हनुमान् के लिए शीतल हो
जाओ । जो सीता अपने तेज से अग्नि को शीतल कर सकती है, वह अपने तेज से रावण को भी भस्म कर सकती थी ।
इसीलिए रावण का तर्जन करती हुई सीता ने कहा था कि श्रीराम का सन्देश न होने से और अपनी तपस्या की
रक्षा की दृष्टि से ही मैं भस्म करने में समर्थ अपने तेज से तुझे भस्म नहीं कर रही हूँ—
“असन्देशात्तु रामस्य तपसश्चानुपालनात् ।
न त्वां कुर्मि दशग्रीव भस्म भस्मार्हतेजसा ॥” ( वा० रा० ५।२२।२० )
श्रीहनुमान् ने यही सोचा था कि श्रीराम के प्रभाव से ही जैसे समुद्र में मेरे विश्राम के लिए मैनाक पर्वत प्रकट
हुआ था वैसे ही उनके प्रभाव से अग्नि मेरा दहन नहीं कर रहा है और माता श्रीसीता की मृदुलता तथा दयालुता से
एवं मेरे पिता वायुदेव के सखा होने के कारण भी अग्निदेव मुझे नहीं जला रहे हैं ( वा० रा० ५।५३ ) ।
श्रीराम ने कहा—मेरा अद्भुत परिष्वङ्ग ब्रह्मानन्दरूप है । यह मुनियों का सर्वस्व है । ऐसे शुभ अवसर पर मैं
महात्मा हनुमान् को वही परिष्वङ्ग प्रदान करता हूँ । नागेश भट्ट के अनुसार भगवान् राम का शरीर शुद्ध आनन्दरूप
ही है, अतः उनका आलिङ्गन सर्वस्वभूत है; क्योंकि आनन्द ही राम आदि के देहरूप से भासता है । यह गीता एवं
विष्णुसहस्रनाम-भाष्य में श्रीशङ्कराचार्य भगवान् ने कहा है ( वा० रा० ६।१।१३ ) ।
श्रीराम कहते हैं—मित्र-भाव से सम्प्राप्त विभीषण को किसी प्रकार भी मैं नहीं त्याग सकता, भले ही उसमें
दोष हो । सत्पुरुषों की दृष्टि में सदोष शरणागत का भी ग्रहण गर्हित नहीं है । किसी अनिष्ट की शङ्का फिर भी नहीं
करनी चाहिये, क्योंकि इच्छा करने पर मैं संसार के सभी पिशाचों, दानवों और राक्षसों को अंगुली के अग्रभाग से ही
मार सकता हूँ । एक बार भी जो दृढ़ निष्ठा से मुझको प्रपन्न हो जाता है और ‘मैं तुम्हारा हूँ’ ऐसी प्रार्थना करता है
१२ रामायणमीमांसा प्रथम
उसे मैं सब भूतों से सर्वथा अभय प्रदान करता हूँ, यह मेरा व्रत है। सुग्रीव ! तुम विभीषण को लाओ, मैंने उसे
अभय-प्रदान कर दिया है। विभीषण ही क्या रावण भी यदि शरण में आये तो उसे भी मेरी ओर से अभय प्राप्त हो
सकता है (वा० रा० ६।१८।२, २२, २३, ३३, ३४) ।
रावण का गुप्तचर कहता है—मैं आगम-योग से भली भाँति जानता हूँ कि श्रीराम हरि (विष्णु) हैं। उनके
बल, रूप तथा प्रभाव का वर्णन करना मेरी शक्ति के बाहर है। जिनसे कभी भी धर्म चलित नहीं होता और जो
धर्म का कभी भी अतिक्रमण नहीं करते, जो वेदविदों में श्रेष्ठ हैं, वेदों और ब्राह्मणों को जानते हैं वे अपने बाणों से
आकाश को छिन्न-भिन्न कर सकते हैं, पर्वतों को विदीर्ण कर सकते हैं (वा०रा० ६।२८।१६, १९, २०) । उन राम के
सदृश पराक्रम में पृथ्वी में कोई भी नहीं है। भूतल में कोई भी श्रीराम के गुणों का वर्णन नहीं कर सकता
(वा० रा० ६।३०।२९, ३०) । मानव-देह में विष्णु ही अवतीर्ण हैं। विपुल विक्रमशाली राम मानवमात्र नहीं हैं
(वा० रा० ६।३५।३६) ।
तदनन्तर गरुड़ भगवान् राम और लक्ष्मण को देखकर प्रसन्न हुए ओर बोले—काकुत्स्थ ! मैं गरुत्मान् हूँ ।
मैं आपका बहिश्चर प्राण के तुल्य प्रिय सखा हूँ। आपकी सहायता के लिए आया हूँ (वा० रा० ६।५०।४६) ।
श्रीलक्ष्मण ने रावण की शक्ति लगने पर विष्णु के अचिन्त्य अर्ध-भाग के रूप में अपना स्मरण करते हुए शक्ति
को सहन किया। रावण अपनी बाहुओं से पूरा बल लगाने पर भी उन्हें उठा नहीं सका, परन्तु श्रीहनुमान् की भक्ति
एवं सौहार्द से शत्रुओं के लिए अप्रकम्प्य होने पर भी वे परम लघु हो गये (वा० रा० ६।५९।११०, १११, ११७) ।
मन्दोदरी ने रावण के मरने पर विलाप करते हुए कहा था—जब वानरों ने महासमुद्र में सेतु बाँध लिया तभी
मैंने समझ लिया था कि राम मनुष्य नहीं हैं। ये निस्सन्देह महायोगी, योगेश्वर, सनातन परमात्मा ही हैं। इनका
आदि और अन्त नहीं है। ये अज्ञानरूपी तम से परे साक्षात् परमेश्वर हैं। शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले
विष्णु हैं। इनके वक्षःस्थल में श्रीवत्स है। ये नित्यश्री, अजेय एवं शाश्वत ध्रुव हैं। सत्य-पराक्रम विष्णु ही मानव-वपु
धारण कर वानर-भाव को प्राप्त देवताओं से परिवृत होकर श्रीराम के रूप में प्रकट हुए हैं। विजन वन में स्थित
वसुधा को वसुधा एवं श्री की भी श्री निरवद्याङ्गी सर्व कल्याणकारिणी सीता को छल से, लङ्का में लाकर आपने
अनर्थ किया है। (वा० रा० ६।११४।१४-२२) ।
तदनन्तर राजा कुबेर, अमित्रकर्षण यम, सहस्राक्ष महेन्द्र, परन्तप वरुण, तीन नेत्रवाले श्रीमान् वृषभध्वज
महादेव तथा सर्वलोक-निर्माता ब्रह्मविदों में श्रेष्ठ ब्रह्मा ये सब लोग सूर्यतुल्य विमानों में बैठकर लङ्कापुरी में रघुकुल-
तिलक राम के समीप आये और बोले—श्रीराम, आप सब लोकों के कर्त्ता विष्णु हैं, ज्ञानवानों में सर्वश्रेष्ठ हैं। आप
अग्नि में प्रवेश करती हुई सीता की उपेक्षा कैसे कर रहे हैं ? सब देवताओं में श्रेष्ठ आप अपने को क्यों नहीं समझ
रहे हैं ? सत्य ही आपका स्वरूपभूत धाम है। वसुओं के आप पूर्व वसु हैं। आप प्रजापति हैं। तीनों लोकोंके आप
आदिकर्त्ता एवं स्वयंप्रभु हैं। आप सबके प्रभु हैं, आपका प्रभु कोई नहीं है। अश्विनीकुमार आपके दोनों श्रोत्र हैं, चन्द्र
और सूर्य दोनों आपके नेत्र हैं। हे परन्तप ! सब लोकों के आदि, अन्त एवं मध्य में सर्वद्रष्टा, सर्वाधाररूप से ज्ञानियों
द्वारा आप ही परिलक्षित होते हैं। आप प्राकृत मनुष्य की भाँति सीता की उपेक्षा क्यों कर रहे हैं ?
इसी प्रकार सब लोकपालों ने भी लोक-स्वामी श्रीराम से कहा एवं ब्रह्मा ने भी कहा—आप चक्रधारी
नारायण देव हैं, विभु हैं। आप ही एकशृङ्ग (एक दंष्ट्रावाले) वराहरूप में प्रकट होते हैं। आप अतीत तथा अनागत
सब शत्रुओं को जीतनेवाले हैं। आप अक्षर परब्रह्म हैं। सब लोकों के आदि, मध्य और अन्त में आप ही परम सत्यरूप
से विद्यमान रहते हैं। सब लोकों के लिए आप ही परम धर्मस्वरूप हैं। आप ही चतुर्भुज विष्वक्सेन हैं। आप ही
शार्ङ्गधन्वा हृषीकेश हैं। आप ही पुराण पुरुषोत्तम हैं—
अध्याय परब्रह्मरूप सीता-राम का वेदमूलक लोकोत्तर माहात्म्य १३
'अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः' । ( भ० गी० १५।१८ )
अर्थात् क्षराक्षरातीत पुरुषोत्तम ही वेदान्त-वेद्य शुद्धपरब्रह्म-तत्त्व हैं ।
आप अजित हैं, खड्गधारी विष्णु हैं एवं बृहद्दल कृष्ण हैं । आप ही सेनानी, नेता, मन्त्री, बुद्धि, सत्त्व, क्षमा,
दम तथा सबके प्रभव एवं अप्यय हैं । आप ही उपेन्द्र वामन तथा मधुहन्ता मधुसूदन हैं । आप सर्वात्मा होने के कारण
इन्द्रकर्मा महेन्द्र हैं । आप ही पद्मनाभ तथा रण में शत्रुओं का अन्त करनेवाले हैं । दिव्य महर्षि लोग आपको शरणार्ह
शरण ( आश्रय ) कहते हैं । हजारों शाखावाले वेद एवं सैकड़ों जिह्वावाले शेष तथा अपरिगणित महर्षि भी आपको ही
शरण्य कहते हैं । आप तीनों लोकों के आदिकर्त्ता और स्वयम्प्रभु हैं । सिद्धों, साध्यों आदि सबके परम-आश्रय और
सबके पूर्वज आप ही हैं । आप ही यज्ञ हैं, आप ही वषट्कार, ॐकार तथा परन्तप हैं । आप कौन हैं, आपका प्रभाव
एवं अन्त कहाँ है, यह कोई नहीं जानता । ज्ञानियों को ज्ञान-दृष्टि से सब भूतों में विशेषतः ब्राह्मणों में, गायों में सभी
दिशाओं में, गगन में, पर्वतों में वनों में, सर्वात्मरूप में तथा विशिष्ट विभूतियों के रूप में आपका दर्शन होता है । आप
महाविराड्रूप से सहस्रों चरण, सहस्रों मस्तक एवं सहस्रों नेत्रवाले होकर शोभित होते हैं । आप सभी भूतों तथा पर्वतों
वाली पृथ्वी को धारण करते हैं । प्रलय होने पर जल में महोरग—शेषरूप से आप दिखायी देते हैं । हे राम ! देव,
दानव और गन्धर्वों सहित तीनों लोकों को आप धारण करते हैं ।
ब्रह्मा कहते हैं—राम ! मैं आपका हृदय ( बुद्धि ) हूँ । सरस्वती देवी आपकी जिह्वा हैं, । सब देवता आपके
गात्र में रोमों के रूप में मुझसे निर्मित हैं । आपके निमेष से रात्रि तथा उन्मेष से दिन होता है । आपके नित्य ज्ञान
से अनुविद्ध शब्द ही वेद हैं । किंबहुना आपके बिना कहीं भी, कोई भी वस्तु नहीं है—
“लोके नहि स विद्येत यो न राममनुव्रतः ।” ( वा० रा० २।३७।३२ )
लोकमें ऐसा कोई नहीं है जो आपका निष्ठावान् भक्त न हो । सारा संसार ही आपका शरीर है । आपका
स्थैर्य ही वसुधा है । अग्नि आपका रोष है । आपका प्रसाद ही श्रीवत्सरूप सोम है । प्राचीन काल में आपने ही
तीन डगों से तीनों लोकों को नापा था और महान् असुर बलि को बाँध कर महेन्द्र को राजा बनाया था । श्रीसीता
साक्षात् लक्ष्मी हैं । आप विष्णु एवं प्रजापति कृष्ण हैं । रावण के वधार्थ आप मानुषी तनु में प्रविष्ट हुए हैं । धार्मिक-
श्रेष्ठ ! हम लोगों का रावण-वधादि कार्य आपने सम्पन्न कर दिया है । अब आप अपने दिव्य धाम में आइये । आपका
बल एवं वीर्य अमोघ है । आपका दर्शन तथा स्तुति भी अमोघ है । आपके प्रति भक्तिसम्पन्न मनुष्य भी अमोघ
( सफल कामनावाले ) होंगे । ( वा० रा० ६।११९।२-३१ ) ।
ये इन्द्र सहित तीनों लोक, सिद्ध, परमर्षि पुरुषोत्तम-स्वरूप आपका अभिवादन कर अर्चन कर रहे हैं । हे
सौम्य, इस रामरूप परम तत्त्वको तुम जानो, जिसे भगवती श्रुति ने देवताओंका हृदय कहा है और देवताओं का परम
गुह्य महोपनिषद् कहा है । सम्पूर्ण जगतों का कारण नित्य अव्यक्त जो ब्रह्म है वही परन्तप राम हैं ( वा० रा०
६।१२२।३०,३१ ) ।
श्रीराम ने कहा—सीता मुझसे वैसे ही अभिन्न है जैसे भास्कर से प्रभा । जनक-पुत्री मैथिली तीनों लोकों में
अत्यन्त विशुद्ध हैं । जैसे आत्मवान् प्राणी द्वारा कीर्ति का त्याग अशक्य है वैसे ही सीता का त्याग भी अशक्य है
( वा० रा० ६।१२०।१८,१९ ) ।
इस रामायण के पढ़ने और सुनने से श्रीराम सतत प्रसन्न होते हैं और वे राम सनातन विष्णु हैं । वे
महाबाहु आदि देव हरि एवं प्रभु नारायण हैं ( वा० रा० ६।१३०।११७ ) ।
१४ रामायणमीमांसा प्रथम
सब लोग विश्वास के साथ जोर से बोलें—
“भगवान् विष्णु का बल प्रवृद्ध हो ।” ( वा० रा० ६।१३०।११८ )
आप नारायण, चतुर्भुज, सनातन-देव हैं । अप्रमेय अव्यय प्रभु राक्षसों को मारने के लिए श्रीरामरूप में उत्पन्न
हुए हैं। समय समय पर नष्ट धर्म को व्यवस्थित करने के लिए प्रजाहितार्थ आप प्रकट होते हैं। हे शरणागतवत्सल !
आप दस्यु लोगों के वधार्थ अवतीर्ण होते हैं ( वा० रा० ७।८।२६, २७ ) ।
तदनन्तर वे भगवान् विष्णु अपने दिव्य-धाम में प्रतिष्ठित हुए, जिसके द्वारा चराचर त्रैलोक्य व्याप्त है ।
✽
द्वितीय अध्याय
कामिल बुल्के की रामकथा
वास्तव में ईसाइयत फैलाने की दृष्टि से ही श्रीबुल्के ने रामकथा लिखी है। वे जानते हैं कि हिन्दुओं में राम-
कथा का परम सम्मान है, साथ ही वेद में भी उनका परम सम्मान है। हिन्दुओं का यह भी दृढ़ विश्वास है कि उनके
धर्म की सभी बातें वेदों में विद्यमान हैं, अतः "रामकथा वेदों में नहीं है" यह कहकर बुल्के ने हिन्दू-विश्वासों पर
आघात करना चाहा है।
मैक्समूलर ने अपने पिता को पत्र लिखते हुए कहा था, "ईसाइयत प्रचार के लिए ऋग्वेद का एक विशिष्ट
संस्करण प्रकाशित करना अत्यन्त आवश्यक है। इससे हिन्दूधर्म की कई कमजोरियाँ सामने आ जाएँगी, परिणामतः
ईसाइयों को अपना धर्म फैलाने में सुविधा होगी।" ठीक इसी प्रकार की दुरभिसन्धि रामकथा के निर्माता के मन में
भी हो तो कोई आश्चर्य नहीं।
कामिल बुल्के ने अपनी 'रामकथा' पुस्तक में वेदों में रामायण के पात्रों की चर्चा करते हुए लिखा है—
'ऋग्वेद' में इक्ष्वाकु का एक बार उल्लेख हुआ है (ऋ० सं० १०।६०।४)। लेकिन उस सूक्त में इक्ष्वाकु का नाममात्र
दिया गया है, जिससे इतना ही प्रतीत होता है कि वे कोई राजा थे। 'यस्येक्ष्वाकुरुप व्रते रेवान् मराय्येधते । अर्थात्
जिसकी सेवा में धनवान् प्रतापवान् इक्ष्वाकु की वृद्धि होती है।
'अथर्ववेद' में भी एक बार इक्ष्वाकु का नाम आया है—
'त्वा वेद पूर्वं इक्ष्वाको यम ्' (अथ० सं० १९।३९।९)।
किन्तु बेचारे बुल्के को पता नहीं कि वेद अनादि, अपौरुषेय, नित्यसिद्ध प्रमाण ग्रन्थ हैं। उन के ही आधार
पर विश्व की सृष्टि होती है। अतएव सूत्ररूप से वेद में उन सभी वस्तुओं का उल्लेख है जो सृष्टि में महत्त्वपूर्ण हैं।
इतिहास, पुराण आदि आर्ष-ग्रन्थों द्वारा उन्हीं वेदों का विस्तृत व्याख्यान करके उपबृंहण किया जाता है। जिस
सूर्यवंश में राघवेन्द्र भगवान् का प्रादुर्भाव हुआ है, इक्ष्वाकु उसके प्रमुख सम्राट् थे, अतः वेदों में उनका उल्लेख होना
उचित ही है। इक्ष्वाकु राजा थे और राष्ट्रहित में उपयोगी उन सब विशिष्ट वस्तुओं के ज्ञाता थे, ये बातें वेद से ज्ञात
होती हैं। इतना ही पर्याप्त है। वेदों में जो वस्तु सूत्ररूप से कही गयी है, वाल्मीकिरामायण में उसी का विस्तार
किया गया है। रामायण के अनुसार इक्ष्वाकुवंश में ही श्रीरामचन्द्र का आविर्भाव हुआ था। एतावता 'वेद में
इक्ष्वाकु का नाममात्र है। उनका राम के साथ कोई असाधारण सम्बन्ध सिद्ध नहीं होता है' ये सब बातें निरर्थक हैं।
इससे यह भी नहीं समझना चाहिए कि मन्त्र-रचना के पहले इक्ष्वाकु नाम के राजा प्रसिद्ध थे, उनके बाद मन्त्र-रचना
हुई, क्योंकि लोक में यद्यपि घटनापूर्वक शब्दोल्लेख होता है, तथापि वेद में शब्दानुसारिणी ही घटना होती है।
श्रीबुल्के के अनुसार निम्नोक्त मन्त्र में दशरथ का वर्णन मिलता है—
'चत्वारिद् दशरथस्य शोणाः सहस्रस्याग्रे श्रेणिं नयन्ति ।' (ऋ० सं० १।१२६।४)
दशरथ के लाल रङ्ग के चालीस घोड़े एक हजार घोड़ों के दल का नेतृत्व करते हैं।
ठीक ही है। इस मन्त्र में भी उन्हीं प्रभावशाली सम्राट् दशरथ का वर्णन है, जिनके उदात्त चरित्र का
रामायण में विस्तार किया गया है। जिस शब्द का अर्थ किसी प्राचीन ग्रन्थ में अप्रसिद्ध हो उसका अर्थ उस ग्रन्थ से
१६ रामायणमीमांसा द्वितीय
मिलते-जुलते प्रामाणिक अन्य ग्रन्थ के आधार पर निर्धारित किया जाता है । रामायण जब वेद का व्याख्यानभूत
है तब यह सुतरां सिद्ध है कि वेदों में वर्णित दशरथ वे ही हो सकते हैं जो रामायण में प्रसिद्ध हैं । भले ही
मध्य एशिया की आर्य-जाति मितन्नि ( जिसका शासनकाल ई० पू० १४०० माना जाता है¹ ) में दशरथ नाम
का कोई राजा रहा हो । उसे रामायण प्रसिद्ध वैदिक दशरथ से भिन्न ही समझना चाहिये, क्योंकि रामायण के
अनुसार रामायण के दशरथ का समय उससे लाखों वर्ष प्राचीन है ।
ऋग्वेद के—
‘प्र तद् दुःशीमे पृथवाने वेने प्र रामे वोचमसुरे मघवस्तु ।
ये युक्त्याय पञ्च शतास्मयु पथा विश्वाव्येषाम् ॥’ (ऋ० सं० १०।९३।१४)
मैंने दुःशीम पृथुवान, वेन और राम ( असुर ) इन यजमानों के लिए यह ( सूक्त ) गाया है ।
इस मन्त्र में वर्णित राम भी रामायण के ही राम हैं । सूर्यवंशी राजा वेन के अनन्तर वर्णित राम अवश्य ही
सूर्यवंशी थे । रामायण के राम बड़े-बड़े यज्ञों के कर्ता थे, यह भी प्रसिद्ध है । ‘असुर’ शब्द जहाँ स्वतन्त्र होता है वहाँ
असुर-जाति का बोधक होता है, पर जहाँ विशेषणरूप में प्रयुक्त होता है वहाँ महाप्राणवान्, महाबलवान् अर्थ का ही
बोधक होता है । रामायण में प्रसिद्ध है—
“ब्रह्मा स्वयंभूश्चतुराननो वा रुद्रस्त्रिनेत्रस्त्रिपुरान्तको वा ।
इन्द्रो महेन्द्रः सुरनायको वा स्थातुं न शक्ता युधि राघवस्य ॥” (वा० रा० ५।५१।४४),
“पिशाचान् दानवान् यक्षान् पृथिव्याञ्चैव राक्षसान् ।
अङ्गुल्यग्रेण तान् हन्यामिच्छन् हरिगणेश्वर ॥” (वा० रा० ६।१८।२३) ।
“मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम्” इस आपस्तम्बसूत्र के अनुसार मन्त्र और ब्राह्मण दोनों की वेदसंज्ञा है ।
अधिकांश उपनिषदें ब्राह्मण-भाग के अन्तर्गत आती हैं । उपनिषदों में प्रश्नोपनिषद्, रामतापनीय उ०, रामरहस्य उ०
आदि में राम का पर्याप्तरूप से वर्णन आता है, जिससे मन्त्र-वर्णित राम की प्रत्यभिज्ञा होती है । प्रश्नोपनिषद् में—
“भगवन् हिरण्यनाभः कौसल्यो राजपुत्रो मामुपैत्यैतं प्रश्नमपृच्छत” ( प्र० उ० ६।१ )
हिरण्यनाम कौसल्य नाम की चर्चा आयी है । वह वाल्मीकिरामायण अयोध्याकांड सर्ग ७५ श्लोक १३ के
अनुसार राम का ही नामान्तर है ।² रामपूर्वोत्तरतापनीय उ० में रामायण-वर्णित कथाओं का भी विस्तार से उल्लेख
है । फिर भी श्रीबुल्के वेद में रामायण के पात्रों का अभाव मानते हैं, यह आश्चर्य है । साथ ही उन्होंने प्रश्नोपनिषद्
तथा रामतापनीय उपनिषद् आदि की भी चर्चा क्यों नहीं की—यह भी आश्चर्य है ।
श्रीबुल्के के अनुसार “वैदिक जनक से रामायण के जनक की अभिन्नता असम्भव तो नहीं है, पर अत्यन्त
सन्दिग्ध प्रतीत होती है ।” परन्तु बात ऐसी नहीं है । श्रीबुल्के को ‘ब्रह्म’ शब्द से ब्राह्मण की भ्रान्ति हुई है ।
याज्ञवल्क्य कर्म के भी बहुज्ञ थे, उसी पर प्रसन्न होकर उन्होंने याज्ञवल्क्य को उपहार दिया था, एक सहस्र गौएँ
प्रदान की थीं ।
“याज्ञवल्क्यो वरं ददौ सहोवाच कामप्रश्न एव मे ।
त्वयि याज्ञवल्क्यासदिति ततो ब्रह्मा जनक आस ॥” ( श० ब्र० ११।६।२।१० )
याज्ञवल्क्य ब्रह्मविद्या में निष्णात थे; इसलिए जनक ने उनसे यथेष्ट प्रश्न करने का वर प्राप्त किया था ।
कालान्तर में याज्ञवल्क्य के पुनः जनक के यहाँ आने पर उसी वरदान के अनुसार जनक ने उनसे ब्रह्मसम्बन्धी
१. दे० रामकथा पृ० २ । २. हिरण्यनाभो यन्नास्ते सुतो मे सुमहाशयाः ॥
विविध प्रश्न किये थे । फिर जनक स्वयं भी याज्ञवल्क्य के समान ब्रह्मिष्ठ हो गये । यहाँ 'ब्रह्म' शब्द का अर्थ ब्रह्मिष्ठ
है । श्रीबुल्के कहते हैं—"शतपथ में जनक याज्ञवल्क्य को शिक्षा देते हैं" परन्तु यह तो वरदान मांगने से ही स्पष्ट हो
जाता है कि रहस्य में जनक का ज्ञान उत्कृष्ट कोटि का था । उसी पर याज्ञवल्क्य प्रसन्न भी हुए थे । पर ब्रह्मज्ञान
में याज्ञवल्क्य का ही ज्ञान सर्वोत्कृष्ट था । इसीलिए वर प्राप्त करके जनक ने उनसे ब्रह्म का ज्ञान प्राप्त किया और
ब्रह्मिष्ठ हो गये । सायण ने भी स्पष्टरूप से कहा है कि याज्ञवल्क्य से वर प्राप्त कर जनक ब्रह्मा अर्थात् ब्रह्मिष्ठ
हो गये—
“ततो याज्ञवल्क्यवरप्रदानान्तरं स जनकः ब्रह्मिष्ठो बभूव ।”
“अतः जनक ब्राह्मण हो गये । पहले जनक याज्ञवल्क्य आदि को ज्ञान देते थे । उपनिषद् में याज्ञवल्क्य जनक
को शिक्षा देनेवाले हो गये" यह सब बुल्के साहब की भ्रान्ति ही है ।
छान्दोग्य उपनिषद् (५।११।४) और शतपथब्राह्मण (१०।६।१।२) में जिन कैकेय महाराज अश्वपति का वर्णन
आता है वे भी चक्रवर्ती महाराज दशरथ की प्रसिद्ध पटरानी कैकेयी के पिता ही हैं। पूर्वोक्त युक्ति से रामायण में
कैकेयी के पिता अश्वपति की वैदिक अश्वपति के रूप में चर्चा होनी चाहिये । कैकेय अश्वपति का ग्रहण होना
स्वाभाविक है । "उपस्थितं परित्यज्यानुपस्थितकल्पने मानाभावात्” इस न्याय से प्रसिद्ध सम्बन्ध का परित्याग कर
अप्रसिद्ध कल्पना असङ्गत है ।
श्रीबुल्के ने “तैत्तिरीयब्राह्मण (३. १०. ९), शतपथब्राह्मण (११. ३. १. २-४), (११. ४. ३. २०),
(११. ६. २. १-१०), (११. ६. ३. १) आदि, जैमिनीयब्राह्मण (१. १९.), (२.७६, ७७) तथा शतपथब्राह्मण के
अन्तर्गत बृहदारण्यकोपनिषद् (३. १. १-२) आदि स्थलों के अनुसार जनक को क्षत्रिय और ब्राह्मण बतलाया है;"
यह सर्वथा प्रमाणशून्य है । जिसने अग्निहोत्र-रहस्य का सम्यक् निरूपण कर याज्ञवल्क्य से काम-प्रश्न करने का वरदान
प्राप्त किया था, उसी जनक ने कालान्तर में कुछ कहने की इच्छा से आये हुए याज्ञवल्क्य से अपने पूर्व प्राप्त वरदान के
अनुसार प्रश्न किये थे और याज्ञवल्क्य ने अपने वरदान के अनुसार उनके यथाकाम किये गये प्रश्नों का उत्तर दिया
था । वे भी वैदेह जनक ही हैं । इनमें से किसी को ब्राह्मण मानना और अन्य को क्षत्रिय मानना निराधार है ।
जनक एक नहीं थे, किन्तु वाल्मीकिरामायण बालकाण्ड सर्ग ७१ श्लोक ४ के अनुसार मिथिके पुत्र प्रथम
जनक हुए । वे इतने प्रतापी थे कि उनके नाम से जनक-वंश ही चल पड़ा । उस जनक-वंश में ह्रस्वरोमा जनक के
दो पुत्र थे । छोटे का नाम कुशध्वज था और बड़े पुत्र सीता के पिता थे—
"तस्य पुत्रद्वय राज्ञो धर्मज्ञस्य महात्मनः ।
ज्येष्ठोऽहमनुजो भ्राता मम वीरः कुशध्वजः ॥” ( वा० रा० १।७१।१३ )
यद्यपि राजा जनक के नाम का उल्लेख यहाँ नहीं है तो भी विष्णुपुराण (४।५।३०), वायुपुराण (८९।१५),
ब्रह्माण्डपुराण (३।६४।१५) एवं पद्मपुराण पातालखण्ड (५७।५) के अनुसार उनका नाम सीरध्वज था । सीता के
पिता सीरध्वज और जनक-याज्ञवल्क्य-संवाद से सम्बद्ध जनक अभिन्न प्रतीत होते हैं । पुराणों के अनुसार सीता के
पिता महान् ज्ञानवान् और योगनिष्ठ थे । वसिष्ठ, विश्वामित्र आदि अपरिगणित महर्षियों से पूर्ण परिचित थे । साक्षात्
विष्णुस्वरूप राम के श्वसुर और महालक्ष्मीरूपा सीता के पिता होने का सौभाग्य भी उन्हें प्राप्त था । इससे वैदिक
जनक और रामायण के जनक की अभिन्नता समझी जा सकती है, क्योंकि अभिन्नता का बाधक कोई प्रमाण विद्यमान
नहीं है ।
“वैदिक साहित्य में सीता" इस शीर्षक से विचार करते हुए बुल्के साहब कहते हैं—"वैदिक साहित्य में दो
३
१८ रामायणमीमांसा द्वितीय-
भिन्न-भिन्न सीताओं की सूची मिलती है। पहली सीता कृषि की अधिष्ठात्री देवी है जिसका उल्लेख ऋग्वेद से लेकर
सारे वैदिक साहित्य में अनेक स्थलों पर मिलता है। दूसरी सीता का परिचय तैत्तिरीयब्राह्मण से प्राप्त होता है, जहाँ
सीता-सावित्री (सूर्य की पुत्री) और सोम राजा का उपाख्यान विस्तारपूर्वक दिया गया है। इसके अतिरिक्त
'सीता' शब्द का लाङ्गल-पद्धति के अर्थ में वैदिक साहित्य में अनेक बार उल्लेख हुआ है; पर वहाँ सीता में व्यक्तित्व
का आरोप नहीं है। अतः प्रस्तुत दृष्टिकोण से महत्त्वपूर्ण न होने के कारण उन स्थलों का विश्लेषण अनावश्यक है।"
उनका सङ्केत टिप्पणी में दिया गया है—ऋग्वेद (४।५७।४), अथर्ववेद (११।३।१२), यजुर्वेदीय काठकसंहिता
(२०।३), कपिष्ठलसंहिता (३२।५,६), मैत्रायणीसंहिता (३।२।४,५), तैत्तिरीयसंहिता (५।२।५।५), शतपथब्राह्मण
(१३।८।२।६,७) आदि स्थलों में हल द्वारा खींची हुई सीताओं का सङ्केत है। दूसरे प्रकार की सीता पर विचार
करते हुए श्रीबुल्के ने बताया है कि "कृष्णयजुर्वेद के तैत्तिरीयब्राह्मण में सीता-सावित्री की कथा मिलती है।
उसमें सीता और श्रद्धा दोनों प्रजापति की पुत्रियां मानी जाती हैं। सायण के अनुसार प्रजापति सूर्य हैं। प्रस्तुत
उपाख्यान में सीता (सावित्री) सोम राजा का प्रेम अङ्गराग के द्वारा प्राप्त करती है। यद्यपि सोम पहले सीता की
बहन श्रद्धा से प्रेम करते थे। इस कथा का मूल ऋग्वेद के सूर्यसूक्त (ऋ० सं० १०।८५) में विद्यमान है। वहाँ
सूर्य की पुत्री सूर्या का सोम के साथ विवाह वर्णित है। इस सूक्त में सोम से चन्द्रमा का और सूर्या से ऊषा का
वर्णन माना जाता है। इस कथा का वर्णन ऋग्वेद के दोनों ब्राह्मणों में है। प्रजापति ने सोम राजा को अपनी
पुत्री सूर्या-सावित्री दे दी (ऐ० ब्रा० ४।७) और (कौ० ब्रा० १८।१)। इसके अतिरिक्त (तै० सं० २।३।५),
(का० सं० ११।३) और (मै० सं० २।२।७) इन स्थलों पर प्रजापति की तैंतीस पुत्रियों का सोम राजा के साथ
विवाह वर्णित है। इनमें से केवल रोहिणी का नाम दिया गया है।
तैत्तिरीयब्राह्मण में इस कथा का परिवर्तित रूप इस प्रकार है-प्रजापति ने सोम राजा की और तीनों वेदों
की सृष्टि की थी। सोम राजा ने तीनों वेदों को हस्तगत कर लिया था। सीता-सावित्री सोम राजा को पतिरूप में
चाहती थी। लेकिन सोम श्रद्धा (सीता की बहन) को चाहते थे। सीता ने अपने पिता को नमस्कार कर कहा-
मैं आपकी शरण लेती हूँ, मैं सोम राजा को पतिरूप में चाहती हूँ, पर वे श्रद्धा को चाहते हैं। प्रजापति ने स्थागर
नामक अङ्गराग तैयार किया और पूर्व दिशा की ओर दस होतृ-मन्त्र पढ़कर, दक्षिण की ओर चार होतृ-मन्त्र,
पश्चिम की ओर पाँच होतृ-मन्त्र, उत्तर की ओर छह होतृ-मन्त्र और ऊपर की ओर सात होतृ-मन्त्र पढ़कर तथा
सम्भार-मन्त्रों और पत्नी-मन्त्रों से उस अङ्गराग को अभिमन्त्रित कर सीता का मुख अलङ्कृत किया। पुनः वह सोम
राजा के पास गयी। सीता को देखकर प्रेमवश होकर उन्होंने कहा-मेरे पास आइये। सीता ने कहा-मैं
आपके पास आती हूँ, परन्तु आप प्रतिज्ञा करें कि मुझसे सम्बन्ध रखेंगे और आपके हाथ में जो है, उसे मुझे
दे दीजिये।"
आगे रामकथा के लेखक श्रीबुल्के कहते हैं- "सीता-सावित्री आदि कथाओं का वाल्मीकिरामायण से कोई
प्रत्यक्ष सम्बन्ध प्रतीत नहीं होता, फिर भी सम्भव है कि अनसूया के अङ्गराग का वृत्तान्त इस उपाख्यान से
प्रभावित हुआ हो। वहाँ अत्रि की पत्नी अनसूया सीता को माला, वस्त्र, आभूषणों के साथ एक अनश्वर अङ्गराग
भी प्रदान करती हैं, जिससे सीता का शरीर दिव्य सौन्दर्य से युक्त होता है-
"अङ्गरागेण दिव्येन लिप्ताङ्गी जनकात्मजे ।
शोभयिष्यसि भर्तारं यथा श्रीर्विष्णुमव्ययम् ॥" ( वा० रा० २।११८।२०) ।
अध्यात्मरामायण में भी इस अङ्गराग का उल्लेख है -
"अङ्गरागञ्च सीतायै ददौ दिव्यं शुभानना ।
न त्यक्ष्यतेऽङ्गरागेण शोभा त्वां कमलानने ॥" ( अ० रा० २।९।८९) ।
अध्याय कामिल बुल्के की रामकथा १९
गोस्वामी श्रीतुलसीदासजी भी तैत्तिरीयब्राह्मण के उपाख्यान से परिचित थे और उन्होंने सीता की
मर्यादा के विरुद्ध समझकर जानबूझकर इस अङ्गराग की चर्चा नहीं की । वे लिखते हैं—
"दिब्य बसन भूषण पहिराये ।
जो नित नूतन अमल सुहाये ॥” ( रा० मा० ३।४।२ )
यह भी कल्पना है कि महाभारत और रामायण में बलराम एवं परशुराम भी प्रसिद्ध थे, अतः राम के साथ
दाशरथि विशेषण लगाया जाता था। बादमें रामभद्र और रामचन्द्र नामों का व्यवहार होने लगा । उत्तररामचरित,
पद्मपुराण आदि रचनाओं में 'रामचन्द्र' सबसे अधिक लोकप्रिय नाम हो गया । राम दाशरथि को 'चन्द्र' उपाधि क्यों
मिली ? इस प्रश्न को सुलझाने के लिए डाक्टर वेबर ने सीता—सावित्री के वृत्तान्त का उदाहरण दिया है। वाल्मीकि-
रामायण में इसका कारण ढूंढना अधिक सङ्गत होगा । राम के सौन्दर्य और लोकप्रियता की अभिव्यञ्जना के लिए
वाल्मीकि ने बहुत स्थलों में चन्द्रमा की उपमा दी है—
रामं चन्द्रमिवोदितम् । (२।४४।२२ )
राममुखं पूर्णचन्द्रमिवोदितम् । ( ६।३३।३२ )
रामः पूर्णचन्द्राननः । ( २।१।४४ )
रामः सोमवत् प्रियदर्शनः । ( १।१।१८ )
रामः लोककान्तः शशी यथा । (५।३४।२८ )
रामवदनमुदितपूर्णचन्द्रकान्तम् । ( ६।११४।३५ )
अतः रामचन्द्र नाम का आधार वाल्मीकिरामायण को छोड़कर अन्य कल्पित उपाख्यानों में ढूंढ़ना अनावश्यक है
राम के सौन्दर्य, लोकप्रियता, सौम्यता आदि गुणों की अभिव्यक्ति के लिए उनके कोमल शान्त स्वभाव को अभिव्यक्त
करने के लिए आदि काव्य में बार-बार श्रीराम की चन्द्र से तुलना की जाती है। राम के लिए रामायण में एक ही
बार 'रामचन्द्र' शब्द का प्रयोग हुआ है—
"रामचन्द्रमसं दृष्ट्वा ग्रस्तं रावणराहुणा ।” ( वा० रा० ६।१०२।३२ )
अर्थात् रामचन्द्र को रावण-राहु से ग्रस्त देखकर देवता वानर आदि घबरा गये ।
यदि प्रारम्भ से ही राम के लिए 'रामचन्द्र' का प्रयोग हुआ होता तो यह कहा जा सकता था कि राम के
शील एवं शान्त स्वभाव का कारण यह है कि मूलतः वह चन्द्रमा के देवता थे । तब सीता—सावित्री और सोम राजा
का उपाख्यान रामकथा का बीज माना जा सकता था और रामायण का अङ्गराग एवं तैत्तिरीयब्राह्मण का स्थागर
अलङ्कार मूलतः वेद-की सीता ( लाङ्गल-पद्धति ) में पड़ी हुई ओस होती जिसमें चन्द्रमा प्रतिबिंबित है । इसी तरह
सीता एवं कृषि की अधिष्ठात्री देवी दोनों का उद्गम एक होता । जिन वेबर ने यह कल्पना की थी उन्होंने भी इसे
कल्पना ही माना है। साथ ही यह भी विचारणीय है कि राम सूर्यवंशी हैं। उनका सोम से कोई सम्बन्ध बहुत सम्भव
नहीं है ।”
पहले, कृषि की अधिष्ठात्री देवी सीता के सम्बन्ध में विचार करते हुए श्रीबुल्के कहते हैं— “प्रारम्भिक वैदिक
काल में जिन देवताओं का उल्लेख है वे अधिकतर प्रकृति के देवता हैं। अर्थात् प्रभावशाली प्राकृतिक दृश्यों और
शक्तियों में देवताओं की कल्पना कर ली गयी है। कार्यक्षेत्र के अनुसार वे तीन विभागों में विभक्त हैं—द्युलोक,
अन्तरिक्ष और पृथ्वी के देवता । ऋग्वेद में इन्द्र के लिए २५०, अग्नि के लिए २००, सोमलता के मादकरस-देवता
के लिए १०० से अधिक सूक्त सर्वप्रधान हैं। फिर भी सूर्य, वायु, उषा, वरुण, मित्र, पर्जन्य आदि बहुत से देवताओं