सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 80, कुल 1049 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 80

अथाऽयं परब्रह्मरूप सीताराम का वेदमूलक लोकोत्तर माहात्म्य ३
श्रीसीता महालक्ष्मी का नाम ही 'श्री' है। भावार्थक प्रत्यय करने पर भी श्रीशब्द का अर्थ सेवा एवं भक्ति है।
उत्कट उत्कण्ठापूर्वक मन, बुद्धि, चित्त एवं अन्तःकरण तथा अन्तरात्मा का तन्मयतापूर्ण प्रियतम-परिष्वङ्ग ही
'सेवा' है, वही 'श्री' सीता हैं। वही “श्रीयते सर्वगुणैर्या सा श्रीः” के अनुसार सकल-कल्याणों की अधिष्ठात्री
शक्तियों द्वारा सेव्या और वन्दनीया हैं। कान्ति, शान्ति, आभा, प्रभा, शोभा आदि सभी दिव्य शक्तियाँ उस
श्रीसीता की सेविकाएँ हैं। “श्रीयते हरिणापि या सा श्रीः” के अनुसार श्रीराम भी उसी श्रीसीता की सेवा
एवं आराधना करते हैं। आत्माराम का स्वरूपमाधुर्य ही आत्मा है। उसमें आसमन्तात् रमण करना ही
आत्माराम की आत्मारामता है। आत्मा ही परप्रेमास्पद होता है। आत्मज्ञों का वही सेव्य है। आनन्दसिन्धु राम का
माधुर्यसारसर्वस्व सीता ही आत्मा है। वही परप्रेमास्पद है, वही परम सम्भजनीय एवं परम वरेण्य राम का स्वरूपभूत
भर्ग है। ऐश्वर्य की दृष्टि से भी अद्भुतरामायण के अनुसार श्रीनारद के उपदेश से श्रीराम ने सीता की ध्यान, स्तुति,
स्तोत्र आदि द्वारा आराधना की थी और सदा ही करते रहते हैं। माधुर्य की दृष्टि से सीता श्रीराम की विशुद्ध
अन्तरात्मा हैं। ऐश्वर्य की दृष्टि से सीता ही श्रीराम के ऐश्वर्य का मूलमन्त्र महाशक्ति हैं। शक्ति के बिना ब्रह्म में
अनन्तब्रह्माण्डोत्पादकत्व, सर्वपालकत्व, सर्वसंहारकत्व आदि कुछ भी नहीं हो सकता है। तभी तो अध्यात्मरामायण
में श्रीसीता ने कहा है—"सृष्टि, स्थिति आदि तथा शिवधनुर्भङ्ग, रावण-वध आदि सब कार्य मैं ही करती हूँ।
श्रीराम तो सर्वथा निर्विकार, कूटस्थ चिदानन्दघनमात्र हैं।"
अभिन्नरूप श्रीसीता-राम की सेवा-शिक्षाप्रदानार्थ भिन्नरूपता
इसी तरह श्रीसीता श्रीराम की सेविका हैं 'श्री' हैं, शोभा हैं और वही श्रीराम की सेवा हैं, आराधना
हैं एवं मूर्तिमती अलभ्य, दुर्लभ, भक्तसर्वस्व भक्ति हैं। वही श्रीराम की ऐश्वर्यशक्ति हैं, महाशक्ति हैं, महालक्ष्मी हैं
और वही सीता सर्वगुणों की सेव्या तथा आराध्या हैं। वही श्रीराम की आराधनीया हैं एवं वही श्रीराम के स्वरूपभूत
माधुर्यसार-सर्वस्व की अधिष्ठात्री परप्रेमास्पदरूपा श्रीराम की आत्मा हैं। इस तरह यद्यपि सीता ही राम हैं, राम ही
सीता हैं इसमें किञ्चिन्मात्र भी अन्तर नहीं है तथापि
“सेवक-सेव्य भाव बिनु भव न तरिय उरगारि” (रा० मा० ७।११९ [क])
के अनुसार वही अभिन्न होते हुए भी उपासना, आराधना तथा सेवा की शिक्षा देने के लिए सीता-राम दो
रूपों में प्रकट हैं। “कृष्णश्चैव बृहद्वलः” (वा० रा० ६।११९।१५) के अनुसार श्रीराम ही श्रीकृष्णरूप में प्रकट
हुए हैं और उस स्थिति में श्रीसीता की मुख्य शक्ति श्रीकृष्ण-प्राणेश्वरी श्रीराधा के रूप में प्रकट होती हैं। अन्य
शक्तियाँ रुक्मिणी आदि के रूप में प्रकट होती हैं। श्रीराम ही यथावसर महाकामेश्वर के रूप में प्रकट होते हैं। उस
समय श्रीसीता की अभिन्न शक्ति ही कामेश्वराङ्कनिलया राजराजेश्वरी त्रिपुरसुन्दरी के रूप में प्रकट होती है। श्रीराम
ही जब अनन्त ब्रह्माण्डों के उत्पादक सर्वविधाता बनते हैं तब श्रीसीता ज्ञान-विज्ञान की अधिष्ठात्री महासंवित् सरस्वती
बन जाती हैं। जब श्रीराम विश्वपालक विष्णुरूप में व्यक्त होते हैं तब श्रीसीता ही अनन्त ऐश्वर्य की अधिष्ठात्री
महापालिनी, महालक्ष्मीरूप में प्रकट होती हैं। श्रीसीता रघुकुलकमल-दिवाकर श्रीराम की प्रभा तथा रामचन्द्र की
चन्द्रिका हैं। आनन्दसिन्धु श्रीराम में वह माधुर्यसार-सर्वस्व हैं। अध्यात्मरामायण के अनुसार जितने पुरुषवाचक शब्द
हैं उनका अर्थ श्रीराम है जितने स्त्रीवाचक शब्द हैं उनका अर्थ श्रीजनकनन्दिनी 'जानकी' ही है। श्रीसीता मूल-
प्रकृति ही नहीं किन्तु वह चित्स्वरूप परमतत्त्व भी हैं—
“यो ह वै श्रीपरमात्मा नारायणः स भगवान्”
“कलातीता भगवती सीतेति चित्स्वरूपा” (तार० उ० पा० ३)