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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

मैकडानल के अनुसार याकोबी की यह कल्पना ठीक मालूम पड़ती है कि हनुमान् के साथ कृषि-कार्य का
कुछ सम्पर्क था और वे वर्षा के एक उपदेवता थे ।
इन पाश्चात्यों के अनुसार रामायणग्रन्थ अयोध्याकाण्ड से लेकर युद्ध काण्ड तक ही था। मागध और
वन्दियों ने पीछे से बालकाण्ड और उत्तरकाण्ड उसमें जोड़ दिये हैं। उनके अनुसार मूल काव्यखण्ड के जातीय नायक
आगे जोड़े गये अंशों से जातीय नायक के रूप में परिवर्तित हो गये । वह समस्त जन-समाज के लिए नैतिक आदर्श
के प्रतीक बन गये । कुछ प्रक्षिप्त अंशों को छोड़कर मूल पाँच काण्डों में मनुष्यनायक बालकाण्ड और उत्तरकाण्ड में
देवता के रूप में परिणतः होकर भगवान् विष्णु के साथ एकाकार हो गये । प्रो० विंटरनित्स के अनुसार असल रामायण
में राम की भगवत्ता या विष्णु का अवतार होने का कोई उल्लेख नहीं था । कीथ के अनुसार रामायण दो उपाख्यानों
का तालमेल है । उनमें से दूसरा है सीताहरण के कारण राम और रावण का युद्ध ।
यह मूलतः एर्क प्राकृतिक आख्यान है। इनमें अनेक काल्पनिक घटनाओं का समावेश है। इन्हीं आधारों
पर कामिल बुल्के ने भी अनेक दुष्कल्पनाएँ की हैं ।
समाधान
वस्तुतः वेद अनादि अपौरुषेय नित्य ग्रन्थ हैं । मन्त्र, ब्राह्मण और उपनिषद् उन्हीं के भेद हैं । रामायण,
महाभारत, पुराण और आगम सब उन्हीं वेदों की व्याख्या एवं उपबृंहणमात्र हैं। पाश्चात्यों की कल्पनाएँ निर्मूल
एवं दुरभिसन्धिपूर्ण हैं । वेदों और उपनिषदों में राम की कथा है । वाल्मीकिरामायण में उसी का विस्तृत विवेचन है ।
वाल्मीकि राम के समसामयिक त्रिकालदर्शी महर्षि थे । कृष्णद्वैपायन कृष्ण के समय विद्यमान थे। फिर
भी इन महर्षियों ने समाधिजा ऋतम्भरा प्रज्ञा से सीता, राम, भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न, हनुमान् आदि के सभी स्थूल
तथा सूक्ष्म चरित्रों का साक्षात्कार कर रामायणकाव्य या आर्ष इतिहास लिखा है । रामायण के अनुसार ही बालकाण्ड
से लेकर युद्धकाण्ड तक ६ काण्ड और उत्तरकाण्ड वाल्मीकिकृत रामायण है । यह महर्षियों का उद्घोष परम्पराप्राप्त,
महाभारतादि ग्रन्थों से समर्थित एवं महान् भाष्य-टीकाकारों से आदृत है । उसके विरुद्ध पाश्चात्य-कल्पना निःसार हैं ।
अयोध्या से युद्धकाण्ड तक ५ काण्डों में भी राम की भगवत्ता का वर्णन करनेवाले सहस्रों श्लोक हैं । सबको प्रक्षिप्त कह
देना हठवादिता के सिवा और कुछ नहीं है । इस तरह बाइबिल आदि ग्रन्थों की भी प्रक्षिप्तता सिद्ध होगी ।
“ममापि सफलं चक्षुः स्मारितश्चास्मि राघवम् ।
रामाभिधानं विष्णुं हि जगद्धृदयनन्दनम् ॥
सीतावक्त्रारविन्दाकं दशास्यध्वान्तभास्करम् ।
मानुषं गात्रसंस्पर्शं गत्वा भीम त्वया सह ॥” (म० भा० ३।१५१।६–८)
हनुमान्‌जी भीमसेन से कहते हैं राम के दर्शन से मेरे चक्षु सफल हैं। आज पुनः मनुष्यगात्र के संस्पर्श से
जगत् के हृदय को आनन्दित करनेवाले, सीतामुखपङ्कज को प्रफुल्लित करनेवाले सूर्य एवं रावणरूपी अन्धकार को
मिटानेवाले भास्कर राम का स्मरण हो रहा है ।
ब्रह्मा ने कहा है, मेरी प्रार्थना से चतुर्भुज विष्णु अवतीर्ण हुए हैं । वे रावण-वधादि कार्य करेंगे—
“तदर्थमवतीर्णोऽसौ मन्नियोगाच्चतुर्भुजः ।
विष्णुः प्रहरतां श्रेष्ठः स तत्कर्म करिष्यति ॥” ( म० भा० ३।२७६।५ )
धौम्य ने कहा है, भीमकर्मा विष्णु ने दशरथ के गृह में अवतीर्ण होकर मनुष्यरूप से संग्राम में रावण को
मारा था—

अध्याय रामचरितसिंहावलोकन ६७५

“विष्णुना वसता चापि गृहे दशरथस्य च।
दशग्रीवो हतश्छन्नं संयुगे भीमकर्मणा ।” ( म० भा० ३।३१५।२ )
कि बहुना महाभारत में अनेक स्थलों पर राम का चरित्र एवं राम का परब्रह्म विष्णु होना वर्णित है ।
हरिवंश महाभारत का ही खिल है। उसमें भी रामायण महाकाव्य की चर्चा है।
“रामायणमहाकाव्यमुद्दिश्य नाटकं कृतम् ।
जन्म विष्णोरमेयस्य राक्षसेन्द्रवधेप्सया ॥” ( हरिवं० ९३।६ )
कालिदास ( ई० पू० १ म० श० ) ने रघुवंश में राम को विष्णु का अवतार कहा है ।
कौटिल्य चाणक्य ने ( ई० सन् ५४ में ) रावण-वध का उल्लेख किया है—
“मानाद्रावणः परदारानप्रयच्छन् ।” ( १।६।९ )
भास ( ई० पू० ५ श० ) ये मौर्ययुग के हैं। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में उनके प्रतिज्ञायौगन्धरायण नाटक
से 'नवं शरावं' श्लोक उद्धृत है । उनके यज्ञफलनाटक, प्रतिमानाटक तथा अभिषेकनाटक इन नाटकों की विषयवस्तु
रामायण की है। अभिषेकनाटक ( ४।१४ ) तथा अभिषेकनाटक ( ६।२८ ) में सीता के साथ राम के मायामानुषवेष
में अवतार का उल्लेख है । एतावता ई० पू० १ श० राम को विष्णु माना जाने लगा था, बुल्के आदि की ये कल्पनाएँ
सर्वथा मिथ्या हैं ।
चरक में विष्णुसहस्रनाम का पाठ विहित है। 'विष्णुसहस्रनाम' में “रामो विरामो विरतः” आदि में राम
का नाम आया है। चरक वैशम्पायन के समसामयिक हैं। आद्यशङ्कराचार्य स्वा० दयानन्द के अनुसार ई० पू० ३
शती के हैं । आधुनिक दृष्टिकोण से भी ई० ७वीं शती के हैं। किन्तु यह मत मिथ्या है। उन्होंने विष्णुसहस्रनाम-
भाष्य में रामः ३९४, क्षमा ४४२, सुमुखः ४५६, कपीन्द्रः ५०१, जितामित्रः ५२४, भूषयः ६२८, शूरसेनः ७०४;
धनुर्धरः ८५८ तथा क्षमिणांवरः ९१९ विष्णुनामों की रामवाचक व्याख्या की है। रामभुजङ्गप्रयात आदि अनेक
स्तोत्रों में उन्होंने सीताराम की विष्णुरूप में चर्चा की है ।
“राम दक्षिण भारत में आर्यसभ्यता फैलाते हैं, राम-रावणयुद्ध इन्द्र-वृत्रयुद्ध का प्रतीक है, इन्द्रजित्, इन्द्र-
शत्रु और वृत्र एक ही व्यक्ति के नाम हैं, देवशुनी सरमा और विभीषणपत्नी सरमा अभिन्न थीं एवं हनुमान् वर्षा के
उपदेवता थे ।” ये सब बातें पाश्चात्यों की निराधार अटकलमात्र हैं । विश्व की सृष्टि भारत से ही हुई हैं । “मनुष्य
इधर-उधर फैले, भारतीय हिन्दू कहीं बाहर से आये” यह कल्पना वेदादि शास्त्रों और इतिहासों से विरुद्ध है ।
सीता का आविर्भाव हलाग्र से होने के कारण उनका नाम सीता पड़ा, परन्तु राम का खेती से किसी
विशेष सम्बन्ध की कल्पना निराधार है । बलराम का हल से सम्बन्ध है, राम का नहीं । वे दोनों एक नहीं हैं ।
बलराम हलधर थे, पर हल और मुसल उनके आयुध थे । वे हलधर किसान नहीं थे । राम तो धनुर्धर थे, फिर उनका
कृषि से सम्बन्ध कैसा ? वे तो १४ वर्ष वनवास में रहे । कृषि करना तो दूर रहा, वे कृषि का अन्न भी ग्रहण नहीं
करते थे ।
पाश्चात्य लोग रामायण के वानर, भालू एवं राक्षसों को असभ्य जाति के मनुष्य ही मानते हैं । रामायण
से विदित होता है कि रावण को वरदान मिला था कि मनुष्य, वानर तथा भालुओं के सिवा तुम देवता, दानव, राक्षस
आदि से अवध्य होगे । इसी लिए उसके नाशार्थ विष्णु मायामानुष राम के रूप में प्रकट हुए थे । देवता भी ब्रह्मा के
आदेश से वानर और भालू रूप में अवतीर्ण हुए थे । वे कामरूपी, कामचारी, प्रचण्ड पराक्रमी तथा दीर्घायु थे ।
पवनसुत हनुमान् समुद्र लांघने में समर्थ हुए । द्वापर में गन्धमादन पर्वत पर उनका रूप देखकर भीम भी मोहग्रस्त
हो गये । वे अर्जुन की ध्वजा पर बैठकर पाण्डवों की सहायता करते थे ।

६७६ रामायणमीमांसा विंश
ब्रह्मा ऋक्षपति, इन्द्र वाली तथा सूर्य सुग्रीव के रूप में अवतीर्ण थे । ऋक्षपति की कन्या जाम्बवती कृष्ण
की एक पट्टमहिषी थी । यद्यपि यह सब अलौकिक, अविश्वसनीय प्रतीत होगा, परन्तु शङ्कराचार्य के “तस्मात् समूल-
मितिहासपुराणम्” ( ब्र० सू० १।३।३३ ) के भाष्य-वचन के अनुसार इतिहास-पुराण में विश्वास करना ही चाहिये
( देखिये देवताधिकरण ) । माता-पिता के गुण सन्तान में आते ही हैं । किसी में माता के और किसी में पिता के
अधिकांश गुण आते हैं । अतः हनुमान् आदि में मातृपक्ष से वानरी आकृति और वानरी भाषा आदि गुण प्राप्त हुए
तथा पितृपक्ष से देवताओं के जैसे अद्भुत तेज, पराक्रम तथा देवताओं की संस्कृत भाषा भी प्राप्त हुई । इसी प्रकार
वाली आदि में देवताओं के समान ही वेदादि शास्त्रों का प्रतिभान भी हुआ । हनुमान् ने विशिष्ट ज्ञानार्थ सूर्य से
अध्ययन भी किया । आज वैज्ञानिक प्राणियों एवं पौधों के जोड़-मेल से विलक्षण प्राणियों तथा पौधों की सृष्टि
करते ही हैं ।
राक्षस असुरों में ही योनिविशेष हैं। वे उग्र, कामरूपी और कामचारी थे । शूर्पणखा तथा हिडिम्बा ने
सुन्दर मानवीरूप धारण किया था । विभीषण एवं उसके मन्त्री मनुष्यवेष में ही युद्ध करते थे । राक्षस भी दीर्घायु
थे । तभी रावण ने मान्धाता एवं अनरण्य के साथ युद्ध किया था ।
राम की ऐतिहासिकता
हिन्दू जाति के धार्मिक सांस्कृतिक एवं पारिवारिक जीवन पर मर्यादापुरुषोत्तम राम का अमिट प्रभाव
है । हिन्दू-परिवार में जन्म एवं विवाह के अवसरों पर रामजन्म एवं राम-विवाह सम्बन्धी गीत गाये जाते हैं । शरीर
की अन्तिम यात्रा 'रामनाम सत्य है' की ध्वनि के साथ होती है । भारत के कोने-कोने में राम और उनके भक्त
हनुमान् के मन्दिर हैं । लाखों व्यक्ति प्रतिदिन रामायण का पाठ करते हैं तथा अयोध्या, रामेश्वर, पञ्चवटी, चित्रकूट,
आदि तीर्थों की यात्रा करते हैं । करोड़ों हिन्दुओं के ही नहीं श्याम, थाइलैण्ड आदि देशों के निवासियों के नाम भी
रामायण से सम्बन्धित होते हैं । राम प्रत्येक हिन्दू के जीवन में रम रहे हैं। ईश्वर के नामों में सर्वप्रसिद्ध नाम राम
ही है । भारत के बच्चे-बच्चे की जबान पर राम-नाम रहता है । काशी में जीवों को मुक्ति के लिए शिवजी राम-नाम
का उपदेश करते हैं। फिर भी राम की ऐतिहासिकता पर शङ्का करना केवल मतिविभ्रम ही है। वह आधुनिक
पाश्चात्य कूटनीतिज्ञों के दुष्प्रचार का परिणाम है । आधुनिक वैज्ञानिक आविष्कारों के चमत्कारों से तथा वेदादि
शास्त्रों, दर्शनों एवं तर्कशास्त्रों के अनभ्यासों से भारतीय प्रभावित से हो गये हैं। आत्मज्ञानशून्य देश परकीय चाक-
चिक्यों से प्रभावित होते ही हैं ।
वस्तुतः परम्पराप्राप्त इतिहास तथा जीवनवृत्तसम्बन्धी प्रामाणिक पुस्तकें तथा तत्कालीन या कालान्तरवर्ती
पुस्तकों में तत्सम्बन्धी चर्चाएँ, उसके द्वारा लिखित पुस्तकें या तन्निर्मित मन्दिर, सेतु तथा तत्सम्बन्धी शिलालेख,
ताम्रलेख या मुद्राएँ किसी के ऐतिहासिक होने में प्रमाण कही जाती हैं।
इस दृष्टि से देखने पर राम की भी ऐतिहासिकता सिद्ध है। राम के जीवन की प्रमुख घटनाएँ लोकपरम्परा
में अत्यन्त प्रसिद्ध हैं । भारत में उनका नाम प्रत्येक जिह्वा पर है। संसार के इतिहास में ऐसी प्रसिद्धि किसी की भी
नहीं है । भारत में ही नहीं सुदूरदेशों में भी राम के चरित्रों के आधार पर अनेक लीलाएँ तथा नाटक होते हैं।
चौबीस हजार श्लोकों की वाल्मीकिरामायण में उनके जीवनवृत्त का ही वर्णन है ।
वाल्मीकि के समान ही व्यास भी सर्वज्ञ थे। उनके महाभारत तथा पुराणों में राम व रामायण की भरपूर
चर्चा है । महाभारत के अनुसार भीम जैसे महावीर हनुमान् की पूँछ नहीं उठा सके । अन्त में भीम के प्रश्न पर
हनुमान् ने अपने परिचय में राम की कथा की चर्चा की ( म० भा० ३।१४७ ) । महर्षि मार्कण्डेय ने वनवास के
समय युधिष्ठिर से कहा था, आपकी यह विपत्ति देखकर मुझे रामचन्द्र का स्मरण हो आया । पिता की आज्ञा से

अध्याय रामचरितसिंहावलोकन ६७७
धनुष हाथ में लेकर घूमते हुए उन्हें ऋष्यमूक पर्वत पर मैंने देखा था। उन्होंने यह नहीं कहा कि मैंने केवल सुना
है ( म० भा० ३।२५।६-९ ) । गीता के कृष्ण कहते हैं कि शस्त्रधारियों में मैं राम हूँ । शङ्कराचार्य की रामपद की
व्याख्या में दाशरथि राम कहा गया है। लगभग सभी पुराणों तथा काव्यों में श्रीमद्भागवत भागवतों का परमा-
दरणीय ग्रन्थ है। प्रतिवर्ष जिसके हजारों सप्ताह होते हैं, उसमें भी रामायण एवं राम की चर्चा है ।
श्रीराम की नीति
“न रामसदृशो राजा पृथिव्यां नीतिमानभूत् ।
सुभृत्यता तु यन्नीत्या वानरैरपि स्वीकृता ।।” ( शु० नी० ४।६।१०।७८ )
शुक्रनीति के अनुसार राम सदृश कोई भी नीतिमान् नहीं हुआ । उनकी नीतिमत्ता से ही वानरों तथा
भालुओं ने भी उनकी सुभृत्यता स्वीकार की थी ।
“यान्ति न्यायप्रवृत्तस्य तिर्यञ्चोऽपि सहायताम् ।
अपन्थानं तु गच्छन्तं सोदरोऽपि विमुञ्चति ॥”
श्रीराम जैसे न्यायनिष्ठ के प्रभाव से वानर और भालु भी राम के साथी हो गये और दुर्मार्गनिष्ठता के
कारण ही रावण का भाई भी साथ छोड़कर उससे पृथक् हो गया ।
“ब्रह्मचर्येण तपसा राजा राष्ट्रं विरक्षति ॥” ( अथ० सं० ११।५।१७ )
ब्रह्मचर्य एवं तपस्या से राजा राष्ट्र की रक्षा करता है। इसके उदाहरण श्रीराम हैं।
“न हि तद्भविता राष्ट्रं यत्र रामो न भूपतिः ।
तद् वनं भविता राष्ट्रं यत्र रामा निवत्स्यति ॥ ( वा० रा० २।३७।२९ )
जहाँ राम राजा नहीं वह देश राष्ट्र नहीं है, जहाँ राम निवास करेंगे वह वन भी राष्ट्र होगा । भगवान्
के भक्त उनका मङ्गलाशासन करते हैं—
“मङ्गलं कोसलेन्द्राय महनीयगुणात्मने ।
चक्रवर्तितनूजाय सार्वभौमाय मङ्गलम् ॥”
भगवान् मङ्गलों के भी मङ्गल हैं। ब्राह्मण, गौ, अग्नि, हिरण्य, सर्पि, जल तथा राजा गरुड़पुराण
( ३०५।७४, ७५ ) के अनुसार मङ्गल हैं तथा सिंह, साँड, हाथी, कलश, व्यजन, वैजयन्ती, भेरी एवं दीप भी
मङ्गल हैं। दधि, दूर्वा आदि मङ्गलों के भी मङ्गल, देवताओं के दैवत, जो परन्तप एवं परमतेज हैं उन महनीय-
गुणागार चक्रवत्तित्सुत सार्वभौम कोसलेन्द्र के लिए मङ्गलाशासन करना महत्त्वपूर्ण है। राम से बढ़कर सन्मार्गस्थित
संसार में कोई है ही नहीं—
“नहि रामात् परो लोके विद्यते सत्पथे स्थितः ।” ( वा० रा० २।४४।२६ )
श्रीराम धर्मज्ञ, सत्यसन्ध, प्रजाहितनिरत, यशस्वी, ज्ञानसम्पन्न, सर्वपोषक, रिपुसूदन, सर्वजीवलोक के
रक्षक, तत्तद्वर्णाश्रममर्यादाओं का पालन करके धर्मका पालन करनेवाले, अपने यज्ञ, अध्ययन, दान आदि एवं युद्धादि
रूप धर्म का सादर अनुष्ठान करनेवाले तथा स्वभक्त जनों के अवश्यम्भावी अनिष्टों को भी मिटाकर मोक्ष प्रदान कर
रक्षण करनेवाले हैं । रघुवंश, भट्टिकाव्य आदि सैकड़ों काव्यों तथा नाटकों में राम की चर्चा है । अध्यात्मरामायण,
आनन्दरामायण, अगस्त्यसंहिता आदि संहिताओं में राम की चर्चा है ही । ऐसे बहुचर्चित राम को अनैतिहासिक
कहना अनभिज्ञता का ही परिचय देना है। भागवत आदि पुराणों के अनुसार रामसेतु एवं रामेश्वर की स्थापना

भी राम के ऐतिहासिक होने में ज्वलन्त प्रमाण हैं। रामसेतु के खण्डों पर ही रामेश्वर पहुँचने का रेलवे
मार्ग स्थित है।
राम की जन्मकुण्डली
यद्यपि पुराणों के अनुसार राम का जन्म २८ वें मन्वन्तर के २४ वें त्रेता में हुआ है फिर भी पाश्चात्यों
ने अपनी अटकल से उनका जन्म ईसा पूर्व कुछ शतियों या सहस्राब्दियों में ही माना है। जोन्स नामक अंग्रेज
इतिहासज्ञ राम का जन्म-काल ई० पूर्व २०२९ वर्ष मानता है। टॉड ने ई० पूर्व ११०० वर्ष राम का जन्म-समय
माना है। वैन्थली ने ई० पूर्व ९५० वर्ष ही स्वीकार किया है। विल्फर्ड नामक इतिहासज्ञ ने ई० पूर्व १३६० वर्ष
राम का जन्म-काल माना है।
महर्षि वाल्मीकि के अनुसार दशरथ के पुत्रेष्टियज्ञ की समाप्ति के १२ मास बीतने पर चैत्र शु० ९मी
पुनर्वसु नक्षत्र कर्क लग्न में तथा जब पांच ग्रह अपनी उच्च राशि में स्थित थे एवं गुरु चन्द्र के साथ थे उस समय
राम का अवतार हुआ—
“ततो यज्ञे समाप्ते तु ऋतूनां षट् समत्ययुः ।
ततश्च द्वादशे मासे चैत्रे नावमिके तिथौ ॥
नक्षत्रेऽदितिदैवत्ये स्वोच्चसंस्थेषु पञ्चसु ।
ग्रहेषु कर्कटे लग्ने वाक्पताविन्दुना सह ॥” (वा० रा० १।१८।८, ९ )
ज्योतिषियों के अनुसार रवि, भौम, गुरु, शुक्र और शनि ये पाँच ग्रह उच्च के थे। अर्थात् रवि मेष के,
मङ्गल मकर के, गुरु कर्क के, शुक्र मीन के एवं शनि तुला के थे। स्थूल रीति से सप्तर्षिगण लगभग सहस्र वर्ष,
वरुण ८४ वर्ष एवं शनि लगभग २॥ वर्ष एक राशि में रहते हैं। सूर्य एक राशि पर एक मास और गुरु एक राशि
पर एक वर्ष रहते हैं। सूर्य, गुरु और शनि के विचारसे पाँचों उच्चस्थ ग्रहों की गणना करने से रामचन्द्र का जन्म-
काल १,८५,०७१ वर्ष पूर्व हुआ था। इन्हीं ग्रहों के अनुसार रामराज्य की महनीयता तथा राम के लोकोत्तर बल,
वैभव, प्रताप आदि अतुलनीय थे। मङ्गल उच्च गृहस्थ होने पर शुभप्रद नहीं होता, इसी लिए स्त्रीकष्ट आदि की
प्राप्ति हुई। यह भी एक मत ही है। परन्तु पुराण प्रमाण के अनुसार जब चौबीसवीं त्रेता राम का काल है तब तो
उसी के आधार पर विचार करना उचित है। वाल्मीकिरामायण में वर्णित ग्रहस्थिति उस समय भी रही होगी।
राम की नीतिमत्ता
वाल्मीकिरामायण के अनुसार राजतन्त्र होते हुए भी भारत में लोकतन्त्र था। इसी लिए महाराज दशरथ
को राम को यौवराज्य देने के लिए जनस्वीकृति अपेक्षित हुई थी। इंग्लैण्ड तथा जापान में आज भी राजतन्त्र होते हुए
भी जनतन्त्र हैं ही। शासन में भ्रष्टाचार तथा भाई-भतीजावाद या कुनवापरस्ती न पनपने देने के लिए राजा और
प्रजा दोनों पर ही धर्म का नियन्त्रण होता था। मन्त्रों, ब्राह्मणों तथा मन्वादिधर्मशास्त्रों, शुक्र, बृहस्पति आदिनिर्मित
नीतिशास्त्रों ने इसके लिए राजा को सदाचारी, जितेन्द्रिय, आन्तरिक षड्रिपूओं का विजेता तथा कामज, क्रोधज
अष्टादश व्यसनों से रहित बनाने पर पूर्ण बल दिया है। श्रीदशरथ ने पृथिवी भर के समस्त प्रधान लोगों को
बुलाया था—
“समानािनाय मेदिन्यां प्रधानान् पृथिवीपतिः ।” ( वा० रा० २।१।४६ )
मन्त्री वही होते थे जो पौरों एवं जानपादों के विश्वासभाजन होते थे—
“तस्मै मन्त्रः प्रयोक्तव्यो दण्डमाधित्सता सता ।
पोरजानपदा यस्मिन् विश्वासं धर्मतो गताः ॥” ( म० भा० १२।८३।४५, ४६ )

अध्याय रामचरितसिंहावलोकन ६७१
शुक्रनीति के अनुसार राजा क्रोध तथा लोभ से विवर्जित होकर धर्मशास्त्र के अनुसार न्यायाधीश, मन्त्री,
एवं पुरोहित की सम्मति से शासन करता था ।
"धर्मशास्त्रानुसारेण क्रोधलोभविवर्जितः ।
सप्राड्विवाकः सामात्यः सब्राह्मणपुरोहितः ॥" ( शु० नी० ४।५।१२ )
राजा की सभा में सभी जाति के मुख्य लोग सभ्य होते थे—
"सभ्याः सर्वासु जातिषु ।" ( शु० नी० )
"जातिजानपदान् धर्मान् श्रेणीधर्मांश्च धर्मवित् ।
समीक्ष्य कुलधर्मांश्च स्वधर्मं प्रतिपादयेत् ॥" ( मनु० ८।४१ )
के अनुसार राम जातिधर्म, देशधर्म, श्रेणीधर्म तथा कुलधर्मों को यथावत् जानते एवं उनका पालन करते
थे । भारतीय नीति एवं राजधर्म में राजा का आचरण ही आदर्श राज्य का आधार होता है । राजा चाहे व्यक्ति हो
चाहे दल, वह अपने व्यवहार से समाज का उन्नायक होता है । अतएव राम ने अपने आचरण द्वारा प्रजा तथा समाज
को आदर्शरूप में ढाला था । यद्यपि वैयक्तिक आचरण का निजी जीवन से ही सम्बन्ध होता है, परन्तु वस्तुतः राम का
वैयक्तिक जीवन भी समाज के लिए ही था । जैसी गर्भिणी स्त्री का निजी व्यवहार भी गर्भस्थ शिशु के हित की दृष्टि
से होता है । तभी वे लोकाराधन के लिए वैयक्तिक स्नेह, दया, सौख्य तथा जानकी तक को त्यागने को तैयार थे ।
यज्ञ आदि के प्रसङ्ग से राम निरन्तर दान तथा त्याग में ही लगे रहे । जहाँ आज देने में संकोच है तो चारों तरफ से
लेने का ही संघर्ष है । पर राम के समय राम के आदर्शानुसार सब में देने की ही होड़ थी । लेने का संघर्ष सर्वथा
समाप्त था । संग्रह-वृत्ति में ही संघर्ष होता है । तुलसीदासजी के अनुसार प्रजा के सुभाग से ही भानु जैसा भूपति होता
है । भानु धरती से कब कितना रस खींचता है यह किसी को नहीं मालूम पड़ता है, पर भानुजनित मेघ से रसमय जल
बरसते देखकर सभी हर्षित होते हैं—
"तुलसी प्रजासुभाग ते भूप भानु सो होय ।
बरसत हरषत लोग सब करखत लखै न कोय ॥"
कालिदास के अनुसार 'सहस्रगुणमुत्स्रष्टुमादत्ते हि रसं रविः' हजारों गुना अधिक करके देने के लिए जैसे
सूर्य पृथ्वी से अप्रत्यक्ष रसादान करता है वैसे ही राजा हजारों गुना अधिक देने के लिए प्रजा से सीमित अप्रत्यक्ष कर
ग्रहण करता है । भारतीय नीति एवं रामराज्त में अलग से कोई विधान नहीं था । विधि या संविधान वेद ही हैं ।
आर्ष धर्मग्रन्थ एवं नीतिग्रन्थ उनकी व्याख्या थे । तुलसी के अनुसार—"श्रुतिपथ पालक धर्मधुरन्धर ।" ( रा०
मा० ७।२३।१ ) राम ने अनादि श्रुतिसिद्ध धर्म के सर्वमान्य रूप को, उसका पालन करके, व्यवहार की वस्तु बनाया ।
तभी तो भरत कहते हैं—
"चाहिय धर्मशील नरनाहू ।" ( रा० मा० २।१७७।१ )
जब शासक ही विधायक बन जाता है तब निरङ्कुशता ही फैलती है । आजकल भी कार्यपालिका और
विधायिका एवं न्यायपालिका को पृथक्-पृथक् रखने का नाटक किया जाता है । राम ने विधान नहीं बनाया, किन्तु
आदर्श आचरण उपस्थित किया । तुलसी के राम ने राजधर्म का सर्वस्व यही कहा था—
"मुखिआ मुखु सो चाहिअइ खान पान कहूँ एक ।
पालइ पोसइ सकल अंग तुलसी सहित विवेक ॥" ( रा० मा० २।३१४ )

६८० रामायणमीमांसा विंश
प्रजा के विभिन्न वर्गों का उनकी स्थिति, क्षमता तथा संस्कार के अनुसार पालन-पोषण करना राजा का
कर्तव्य है । परन्तु विवेक के साथ । मुख द्वारा भक्षित अन्न रसरूप से हस्त, पाद, नेत्र, श्रोत्र, हृदय, मन, बुद्धि आदि
सबको प्रभावित करता है । परन्तु सबकी योग्यता एवं आवश्यकता एक नहीं है। सबको एक लाठी से हांकना विवेक
नहीं है। हाथी को मनभर चींटी को कनभर की कहावत प्रसिद्ध ही है। धर्मनियन्त्रित विवेकी राजा ही विभिन्न परि-
स्थितियों, व्यक्तियों एवं श्रेणियों के साथ यथोचित कुशलताके साथ व्यवहार कर सकता है। भारतीय राजा उतना
शासक नहीं होता था, जितना प्रजा को हित का परामर्शदाता । शास्त्र की दृष्टि से राजा परमेश्वर का अंश होता है ।
छत्र, चँवर, सिंहासन आदि उसके विशिष्ट पद के अनुरूप आवश्यक हैं। फिर भी उनके अभिमान में अपने को प्रजा से
अलग-बिलग समझ लेने में राजा प्रजा की पिता-पुत्र की सी आत्मीयता लुप्त हो जाती है। श्रीराम प्रजा को आत्मीयता
दृष्टि से उपदेश करते हैं, राजा के रुआब में नहीं—
“जो अनीति कछु भाषौं भाई ।
तौ मोहि बरजहु भय बिसराई ॥” ( रा० मा० ७।४२।३ )
यहाँ 'राजा करे सो न्याय' को कोई स्थान नहीं है। ऐसा राजा प्रजा के हृदयसिंहासन का अधीश्वर होता
है। कहा जा सकता है कि ऐसा राजतन्त्र प्रजातन्त्र पर ही आदृत होता है। जनता को निर्भीकता के साथ राजा के
व्यक्तिगत जीवन की भी समालोचना करने की स्वतन्त्रता होती थी। तभी राम ने सीतानिन्दक का भी कल्याण ही
किया । किसी की जुबान पर ताला नहीं था। वह राजा दण्ड के बल पर किसी का मुंह बन्द नहीं करता था, किन्तु
आचरण बदल कर ही प्रजा का अनुरागभाजन होता था । ऐसा विनयी, सच्छास्त्र तथा सत्पुरुष सेवी राजा का
शास्त्रसम्मत सरल जीवन ही संसार का मार्गदर्शक होता है। तभी रामराज्य में सब सुखी थे। सभी शोकरहित थे—
“हरषित भये गये सब सोका ।” ( रा० मा० ७।१९।४ )
सबका वैर-विग्रह मिट गया । विषमता मिट गयी । महारानी वैदेही के शरीर में केवल माङ्गल्यसूत्र ही
भूषण रह गया । यज्ञ के प्रसङ्ग से राम ने सर्वस्व दान दे दिया । राजा के आचरण का प्रभाव जनता पर पड़ता ही
है। संग्रह या विषमता ही द्वेष का कारण बनती है। विषमता मिटने पर वैरनिवृत्ति स्वाभाविक ही है। फिर भी
अध्यात्मनिष्ठा तथा स्वधर्मानुष्ठान आवश्यक होता है। उसके बिना सहज सन्तोष नहीं होता है। इसी लिए रामराज्य
में सब अपने वर्णाश्रम-धर्म के अनुसार वेदमार्ग पर ही चलते हुए शोक और मोह से रहित तथा सुखी थे। राम ने—
"आब्रह्मन् ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायतामाराष्ट्रे राजन्यः शूर ईषव्योतिव्याधी महारथो जायतां
दोग्ध्री धेनुर्वोढानड्वानाशुः सप्तिः पुरन्ध्रियोंषा जिष्णू रथेष्ठाः सभेयो युवास्य यजमानस्य वीरो जयतां
निकामे निकामे नः पर्जन्योभिवर्षतु फलवत्यो न ओधयः पच्यन्तां योगक्षेमो नः कल्पताम् ।” ( शु० यजु०
२२ ) के अनुसार अपने राष्ट्र को बनाया था, जिसमें वसिष्ठादि जैसे ब्रह्मवर्चसी ब्राह्मण थे । राम, लक्ष्मण, भरत जैसे
शूरवीर राजन्य थे । उस राष्ट्र में पर्याप्त दूध देनेवाली गायें और महान् भार वहन करनेवाले बैल उत्पन्न होते थे ।
तीव्रगामी घोड़े एवं साध्वी-सती पुरन्ध्रियां होती थीं । राष्ट्र के रथी विजेता होते थे । राष्ट्र के यजमान सभा में बैठने
योग्य सभ्य युवक उत्पन्न करनेवाले होते थे । राष्ट्र में समय-समय पर वृष्टि होती थी । औषधियाँ फलदायिनी परिपाक
को प्राप्त होती थीं। राष्ट्र के योग एवं क्षेम ( अप्राप्त की प्राप्ति एवं प्राप्त की रक्षा ) की पूर्ण व्यवस्था
थी । राम गौओं और ब्राह्मणों के रक्षणार्थ तथा देश के हितार्थ अप्रमेय गुरु के अनुसार सदा ही महत्कर्म की साधना
में उद्यत रहे--
'गोब्राह्मणहितार्थाय देशस्य च हिताय वै ।
तव चैवाप्रमेयस्य वचनं कर्तुमुद्यतः ॥” ( वा० रा० १।२६।५ )

अध्याय रामचरितसिंहावलोकन ६८१
भौतिक समानता में भी आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक तापों की निवृत्ति नहीं होती ।
त्रितापनिवृत्ति धर्म-ब्रह्मनिष्ठा से सम्भव है । कर्मनिष्ठा से ही ब्रह्मनिष्ठा होती है । उससे भौतिक प्रपञ्च ही बाधित
हो जाता है । तभी रामराज्य में भौतिक आदि ताप किसी को नहीं व्यापते थे ।
“दैहिक दैविक भौतिक तापा । रामराज्य नहिं काहुहि व्यापा ॥” ( रा० मा० ७।२०।१ )
उच्च धर्म-ब्रह्मनिष्ठा का ही परिणाम था कि किसी की अपमृत्यु नहीं होती थी । किसी को कोई पीड़ा
नहीं होती थी । सब सुन्दर एवं नीरोग होते थे । कोई दुखी, दरिद्र एवं दीन नहीं होता था । कोई मूर्ख एवं दुर्लक्षण-
वाला नहीं होता था—
“अलप मृत्यु नहिं कवनेउ पीरा ।
सब सुन्दर सब निरुजसरीरा ॥
नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना ।
नहिं कोउ अबुध न लच्छनहीना ॥” ( रा० मा० ७।२०।३ )
धार्मिक आध्यात्मिक अभ्युत्थान के बिना केवल भौतिक समानता एवं सौविध्य से यह सम्भव नहीं था ।
जहाँ राजा त्यागी, उदार तथा आदर्शचरित्रवाला होता है वहाँ प्रजा भी वैसी बन जाती है । यह स्वाभाविक बात है
कि श्रद्धेय बड़े लोग जैसा आचरण करते हैं जनता भी वैसे ही आचरणवाली हो जाती है । तभी रामराज्य की जनता
भी उदार, परोपकारी विप्रचरणरत थी । राम के समान ही सब एकनारीव्रत थे । नारियाँ भी मन, वचन और
कर्म से पतिहितैषिणी थीं—
“सब उदार सब पर उपकारी ।
विप्रचरन सेवक नर नारी ॥
एकनारिव्रत रत सब झारी ।
ते मन वच क्रम पतिहितकारी ॥” ( रा० मा० ७।२१।४ )
सत्ययुग में राज्य, राजा एवं विधान के बिना ही धर्म के प्रभाव से प्रजा के लोग परस्पर एक दूसरे का
रक्षण करते थे । सब एक दूसरे के रक्षक, पोषक एवं हितचिन्तक होते थे । कोई किसी का शोषक तथा भक्षक था
ही नहीं, किन्तु रामराज्य में विधान, न्यायालय और कार्यपालिकाएं थीं, परन्तु कोई अपराधी, अपराध तथा कोई
समस्या नहीं थी, क्योंकि सब उदार तथा सब परोपकारी थे, अतः विधानकृत बाध्यता का प्रश्न ही नहीं था ।
वाल्मीकिरामायण के अनुसार श्रीराम का मन्त्रिमण्डल था । जिसमें विनयशील, सलज्ज, कार्यकुशल, जितेन्द्रिय, शस्त्र-
शास्त्रकुशल, सुदृढ़, पराक्रमी, यशस्वी तथा सावधान एवं राजाज्ञानुसार कार्य करनेवाले तेजस्वी, क्षमावान्, कीर्त्तिमान्,
स्मितपूर्वाभिभाषी धृष्ट, जयन्त, विजय, सुराष्ट्र, राष्ट्रवर्धन, अकोप, धर्मपाल तथा सुमन्त्र ये आठ मन्त्री थे । वसिष्ठ,
वामदेव, सुयज्ञ, जाबालि, कश्यप, गौतम, मार्कण्डेय तथा कात्यायन इन आठ महर्षियों का परामर्श सर्वोपरि होता था ।
राम के मन्त्री काम, क्रोध तथा स्वार्थवृत्ति और मिथ्यावादी नहीं थे । स्वराष्ट्र तथा परराष्ट्र के अतीत के ज्ञाता, वर्त्त-
मान के अनुभविता तथा अनागत के अनुमाता थे । स्वराष्ट्र एवं परराष्ट्र का इतिवृत्त जानने से अतीत का ज्ञान होता है ।
वृत्तपत्रों एवं गुप्तचरों द्वारा स्वराष्ट्र और परराष्ट्र की वर्तमान स्थिति ज्ञात होती है । अतीत तथा वर्तमान के अनुसार
ही भविष्य का अनुमान लगाया जा सकता है । आत्मदोष जानने एवं प्रजा के गुप्त भावों को जानने में भी गुप्तचरों
का उपयोग होता है । राम की ओर से ऐसे गुप्तचर क्रियाशील रहते थे । राम के मन्त्री पूर्ण परीक्षित थे । वे अन्याय-
शील अपने पुत्रों को भी दण्डित करने में हिचकते नहीं थे तथा निरपराध शत्रु को भी दण्डित नहीं करते थे । वे उत्साह-
वान्, शूर, राजनीतिज्ञ, सत्पुरुषों के रक्षक, न्यायोचित ढंग से राजकोशपूरक तथा यथोचित दण्ड के विधानज्ञ थे ।
८६

६८२ रामायणमीमांसा विंश
सन्धि, विग्रह के अवसर में दूरदर्शी, मन्त्रसंवरण में समर्थ, सूक्ष्मबुद्धिसम्पन्न, नीतिशास्त्र के विशेषज्ञ तथा
प्रियवादी थे—
"मन्त्रसंवरणे शक्ताः शक्ताः सूक्ष्मासु बुद्धिषु ।
नीतिशास्त्रविशेषज्ञाः सततं प्रियवादिनः ॥" (वा० रा० १।७।१९)
हे राघव, नीतिशास्त्रों में मन्त्रणा को ही राजाओं के विजय का मूल माना गया है ।
शुक्र तथा कौटिल्य ने भी मन्त्रियों की आवश्यकता पर बल दिया है । दे० शुक्रनीति (२।८१) तथा
कौटिल्य अर्थशास्त्र (१।३) । कुशलप्रश्न के ब्याज से भरत को उपदेश करते हुए राम ने कहा था—
"मन्त्रो विजयमूलं हि राज्ञां भवति राघव ।" (वा० रा० २।१००।१६)
हे राघव, तुम किसी गूढ़ विषय पर अकेले ही तो विचार नहीं करते अथवा बहुत लोगों के साथ बैठकर तो
गुप्त मन्त्रणा नहीं करते, तुम्हारी निश्चित मन्त्रणा फूटकर शत्रुओं तक तो नहीं फैल जाती एवं तुम्हारे सब कार्य पूरे
होने के समीप पहुँचने के पहले तो लोग नहीं जान जाते ? (वा० रा० २।१००।१३-२०) । वहीं कहा गया है कि
एक भी मन्त्री शूर, चतुर, नीतिज्ञ हो तो वह राजा या राजकुमार को महती श्री प्राप्त करा सकता है—
"एकोऽप्यमात्यो मेधावी शूरो दक्षो विचक्षणः ।
राजानं राजपुत्रं वा प्रापयेन्महतीं श्रियम् ॥" (वा० रा० २।१००।२४)
सहस्र एवं दश हजार मूर्खो की भी सहायता संकटकाल में अकिञ्चित्कर होती है । मीठी बात करनेवाले
पुरुष सुलभ होते हैं पर अप्रिय पथ्य के वक्ता दुर्लभ होते हैं ( वा० रा० ६।१६।२१) । नन्दिनी धेनु चराने के प्रसङ्ग
से दिलीप के वन में पहुँचते ही बिना वर्षा के ही दावाग्नि प्रशान्त हो गयी, जङ्गल में फलों, फूलों की भरमार हो
गयी एवं प्रबल सत्त्व दुर्बलों को बाधित करना भूल गये । राम के सागर पार कर कटक में आने से—
"सब तरु फलेउ रामु हित लागी ।
ऋतु अनरितुहिं कालगति त्यागी ॥" (रा० मा० ६।४।३)
"शशाम वृष्ट्यापि बिना दवाग्निरासीद्विशेषा फलपुष्पवृद्धिः ।
ऊनं सत्त्वेष्वधिको बबाधे तस्मिन् वनं गोप्तरि गाहमाने ॥" (रघुवं० २।१४)
इसलिए रामराज्य में दण्ड यतियों के ही हाथ में दिखता था । भेद गतिभेद, ताल, मूर्च्छना आदि के रूप
में नर्तक-नृत्य-समाज में ही परिलक्षित होता था । मन के विजय में ही विजय शब्द सुनायी पड़ता था—
"दंड जतिन्ह कर भेद जहँ नर्तक नृत्य समाज ।
जीतहु मनहिं सुनिअ अस रामचंद्र के राज ॥" (रा० मा० ७।२२)
रामराज्य में अभीष्ट वस्तु का अभाव नहीं था । काननों में फलों-फूलों की भरमार थी । मनुष्यों की कौन
कहे चूहा-बिल्ली, बाघ-बकरी, हाथी-सिंह साथ-साथ क्रीडा करते थे । वृक्ष और लताएं इच्छानुसार मधु प्रदान करती
थीं । गायें इच्छानुसार दूध देती थीं । चन्द्रमा अपनी अमृत रश्मि से मही को आप्यायित करते थे । सूर्य आवश्यकता
के अनुसार ही ताप पहुँचाते थे । बादल मनचाही वर्षा देते थे—
"फूलहिं फलहिं सदा तरु कानन । रहहिं एक सँग गज पंचानन ॥
लता विटप माँगे मधु चवहीं । मन भावतो धेनु पय स्रवहीं ॥" (रा० मा० ७।२२।१,३)
"विधु महि पूर मयूखन्हि, रवि तप जेतनहिं काज ।
माँगे बारिद देहिं जल, रामचंद्र के राज।" (रा० मा० ७।२३)

अध्याय रामचरितसिंहावलोकन ६८३
केवल बाह्य भौतिक शासनों एवं व्यवस्थाओं से ही संसार की सभी समस्याओं का समाधान नहीं होता है।
बाह्य शासन के बल पर बाघ-बकरे एक घाट पानी नहीं पी सकते और न ही उतनेमात्र से प्राकृतिक स्वभाव में
परिवर्तन ही होता है। राजा राम के पहुँचने पर गुह ने राम का पूर्ण स्वागत किया और कहा मेरा सारा राज्य
आपका है। हम सभी आपकी आज्ञाओं का अनुवर्तन करेंगे। आप स्वामी की तरह शासन करें। ये भक्ष्य, भोज्य, पेय,
लेह्य, शयन एवं घोड़ों की पूर्ण खाद्यसामग्री भी उपस्थित हैं—
“स्वागतं ते महाभाग तवेयमखिला मही।
वयं प्रेष्या भवान् स्वामी साधु राज्यं प्रशाधि नः ॥
भक्ष्यं भोज्यं च पेयं च लेह्यं चैतदुपस्थितम् ।
शयनानि च मुख्यानि वाजिनां खादनं च ते ॥ (वा० रा० २।५०।३९)
आधुनिक दृष्टि से मित्र का ही क्यों शत्रु का भी भोजन, पान आदि ग्रहण न करना असभ्यता समझी जाती
है। पर परिस्थिति के अनुसार यद्यपि राम ने निषादराज का भोजन, पान आदि कुछ भी ग्रहण नहीं किया, फिर भी
अपने व्यवहार एवं स्नेह से उन्हें निहाल कर दिया। राम ने कहा आप मेरे पास पैदल ही चले आये, हम आपके
परमोत्कृष्ट प्रेम से अत्यन्त प्रसन्न एवं अचित हो गये हैं। राम अपनी सुन्दर दोनों भुजाओं के पाश में गुह को निपीडित
करते हुए बोले—हम कितने भाग्यशाली हैं जो स्वस्थ एवं प्रसन्न बान्धवों से युक्त आप जैसे मित्र का दर्शन कर रहे
हैं। आपके मित्रों, वनों तथा राष्ट्र में कुशल तो है? आप जो कुछ भी भेंट लाये हैं वह सब मुझे स्वीकार हैं। आप
स्वयं समझ लें कि मैंने तपस्वी वनचारी का व्रत धारण कर रखा है। मैं वल्कलवसन, कुश एवं अजिन धारण,
कन्दमूल-फलाशन करता हूँ। अतः अन्य सब वस्तुएँ प्रत्यावर्तित कर दें। केवल घोड़ों के लिए चारा दाना ही मुझे
अपेक्षित है। ये मेरे पिता के अत्यन्त प्रिय हैं, अतः इनको खिलाने पिलाने से ही मेरा पूर्ण सत्कार हो जावेगा—
“गुहमेवं ब्रुवाणं तु राघवः प्रत्युवाच ह।
अर्चिताश्चैव हृष्टाश्च भवता सर्वदा वयम् ॥
पद्भ्यामभिगमाच्चैव स्नेहसंदर्शनेन च।
भुजाभ्यां साधुवृत्ताभ्यां पीडयन् वाक्यमब्रवीत् ॥
दिष्ट्या त्वां गुह पश्यामि ह्यरोगं सह बान्धवैः ।
अपि ते कुशलं राष्ट्रे मित्रेषु च वनेषु च ॥
यत् त्विदं भवता किञ्चित् प्रीत्या समुपकल्पितम् ।
सर्वं तदनुजानामि नहि वर्ते प्रतिग्रहे ॥
कुशचीराजिनधरं फलमूलाशनं च माम् ।
विद्धि प्रणिहितं धर्मे तापसं वनगोचरम् ॥
अश्वानां खादनेनाहमर्थी नान्येन केनचित् ।
एतावतात्र भवता भविष्यामि सुपूजितः ॥
एते हि दयिता राज्ञः पितुर्दशरथस्य मे।
एतैः सुविहितैरश्वैर्भविष्याम्यहमर्चितः ॥ (वा० रा० २।५०।४०-४७)
शुक और सारण रावण के मन्त्रिमण्डल के प्रभावशाली सदस्य थे। वे राम की सैन्यशक्ति की टोह लेने
के लिए आये थे। दोनों गुप्त वेष में थे, पर पकड़ लिये गये। आधुनिक दृष्टि से उनका वध ही उचित था। जब वे
राम के सामने लाये गये, राम ने उनसे कहा—यदि आपने हमारी सैन्य-शक्ति का पता पा लिया और सुसमाहित हम

६८४ रामायणमीमांसा विंश
लोगों को भी देख लिया और अपने राजा का कार्य कर लिया है तो आप स्वेच्छा से जा सकते हैं । यदि कुछ देखना
बाकी बचा है तो फिर से देख लो । विभीषण पूर्णरूप से सब कुछ तुम्हें पुनः दिखा देंगे—
“यदि दृष्टं बलं सर्वं वयं वा सुसमाहिताः ।
यथोक्तं वा कृतं कार्यं छन्दतः प्रतिगम्यताम् ॥
अथ किञ्चिददृष्टं वा भूयस्तद् द्रष्टुमर्हथः ।
विभीषणो वा कार्त्स्न्येन पुनः संदर्शयिष्यति ।।” (वा० रा० ६।२५।१८,१९)
राम रावण से अपनी पतिव्रता पत्नी के उद्धार के लिए एवं क्षात्र तेज की रक्षा के लिए लड़े और सानुबन्ध
रावण का वध किया, परन्तु उसके हितैषी ही रहे ।
“अरिहुँ क अनभल कीन्ह न रामा ।” ( रा० मा० २।१८१।१ )
विजय के बाद उसकी प्रशंसा करते हुए राम ने कहा था—ये प्रचण्ड पराक्रमी थे । निश्चेष्ट होकर नहीं
मरे । इनका महोत्साह अत्यन्त उन्नत था । ये निर्भीक होकर रणाङ्गण में जूझे हैं । इस प्रकार क्षात्र धर्म में व्यवस्थित
होकर जो युद्ध में मरते हैं, युद्धभूमि में अपनी विजय के लिए आकांक्षा करते हुए मारे जाते हैं वे शोचनीय नहीं होते ।
युद्ध में सदैव किसी की विजय नहीं होती । युद्ध में वीर या तो दूसरों से मारा जाता है या दूसरों को मारता है । यह
पूर्वजों से निर्दिष्ट क्षत्रियसम्मत गति है कि क्षत्रिय युद्ध में निहत होकर शोचनीय नहीं होता है—
“नायं विनष्टो निश्चेष्टः समरे चण्डविक्रमः ।
अत्युन्नतसमुत्साहः पतितोऽयमशङ्कितः ॥
नैवं विनष्टाः शोच्यन्ते क्षत्रधर्मव्यवस्थिताः ।
वृद्धिमाशंसमाना ये निपतन्ति रणाजिरे ॥
नैकान्तविजयो युद्धे भूतपूर्वः कदाचन ।
परैर्वा हन्यते वीरः परान् वा हन्ति संयुगे ॥
इयं हि पूर्वैः संदिष्टा गतिः क्षत्रियसम्मता ।
क्षत्रियो निहतः संख्ये न शोच्य इति निश्चयः ॥” (वा०रा०६।१११।१४-१८)
शिष्टों में सार्वभौम प्रसिद्धि है कि राम के समान बर्ताव करना चाहिये रावण जैसा नहीं। भावी राजाओं
से भी राम ने धर्मसेतु की रक्षा का अनुरोध किया था—
“भूयो भूयो भाविनो भूमिपाला नत्वा नत्वा याचते रामचन्द्रः ।
सामान्योऽयं धर्मसेतुर्नराणां काले काले पालनीयो भवद्भिः ॥”
( स्कन्द० ब्राह्मख० धर्मारण्य ३४।४ )
“आन्वीक्षिक्यात्मविद्या स्यादीक्षणात् सुखदुःखयोः ।
ईक्षमाणस्तया तत्त्वं हर्षशोकौ व्युदस्यति ॥” ( काम० नीति० २।३१ )
“प्रसन्नतां या न गताऽभिषेकतस्तथा न मम्लौ वनवासदुःखतः ।
मुखाम्बुजश्री रघुनन्दनस्य सदास्तु सा मञ्जुलमङ्गलप्रदा ॥”
न वनं गन्तुकामस्य त्यजतश्च वसुन्धराम् ।
सर्वलोकातिगस्येव लक्ष्यते चित्तविक्रिया ॥ ( वा० रा० २।१९।३३ )
“आपद्यभग्नधैर्यंत्वं सम्पद्यनभिमानिता ।
यदुत्साहस्य चात्यागः तद्धि सत्पुरुषव्रतम् ॥”

अध्याय रामचरितसिंहावलोकन ६८५
“देखन कहँ प्रभु करुनाकांदा । प्रकट भये बहु जलचर वृंदा ॥” ( रा० मा० ६।३।२ )
“यह सुधि कोल किरातन पाई । हरषे जनु नव निधि घर आई ॥” ( रा० मा० २।१३३।१ )
“देखि दखिन दिशि हय हिहिनाहीं । जनु बिनु पंख बिहग अकुलाहीं ॥” (रा० मा० २।१४०।४)
“नहिं तृन चरहिं न पियहिं जल मोचहिं लोचनबारि ।
ब्याकुल भये निहारि सब रघुबर बाजि निहारि ॥” ( रा० मा० २।२४। )
“काम कोटि छबि श्याम शरीरा । नील कंज वारिद गंभीरा ॥” ( रा० मा० १।१९८।१ )
“सोभा कोटि मनोज लजावन ।” ( रा० मा० १।३२६ )
“धरमधुरीन भानुकुलभानू ।” ( रा० मा० २।२५२।१ )
“बेद पुरान बसिष्ठ बखानहिं । सुनहिं राम जद्यपि सब जानहिं ॥” ( रा० मा० ७।२५।१ )
“जौ अनीति कछु भाषौं भाई । तो मोहि बरजहु भय बिसराई ॥
नहि अनीति नहि कछु प्रभुताई । सुनहु करहु जो तुम्हहि सुहाई ॥” (रा० मा० ७।४२।३,२)
प्राण तृणाग्रलग्न जलबिन्दु के समान हैं । धर्म ही सब का सुहृत् है, अतः उसका विरोध नहीं करना चाहिये—
“वाताभ्रविभ्रममिदं वसुधाधिपत्यं प्राणास्तृणाग्रजलबिन्दुसमा नराणाम् ।
आपातमात्रमधुरा विषयोपभोगा धर्मः परं सुहृदहो न विरोधनीयः ॥”
“मातरं रक्ष कैकेयीं मा रोषं कुरु तां प्रति ।
मया च सीतया चैव शपतोऽसि रघुनन्दन ॥” ( वा०रा० २।११२।२७ )
“व्यसनेषु मनुष्याणां भृशं भवति दुःखितः ।
उत्सवेषु च सर्वेषु पितेव परिरक्षति ॥” ( वा० रा० २।२।४०,४१ )
“इदं राज्यं च सकलं जीवितं च हृदि स्थितम् ।
सर्वमेतद् द्विजार्थं मे सत्यमेतद् ब्रवीमि वः ॥” ( वा० रा० ७।६०।१९ )
“साक्षाद् रामाद् विनिर्वृत्तो धर्मश्चापि श्रिया सह ।” (वा० रा० २।२।२९ )
“सत्यं दानं तपस्त्यागो मित्रता शौचमार्जवम् ।
विद्या च गुरुशुश्रूषा ध्रुवाण्येतानि राघवे ॥” ( वा० रा० २।१८।३० )
“न तं पश्याम्यहं लोके परोक्षमपि यो नरः।
स्वमित्रोऽपि निरस्तोऽपि योऽस्य दोषमुदाहरेत् ॥” ( वा० रा० २।२।१५ )
“रक्षिता स्वस्य धर्मस्य स्वजनस्य च रक्षिता ॥” ( मू० रा० १।१।१४)
भारतीय परम्परा के अनुसार राजा या राजनीतिज्ञ को दण्डनीति से पहले आन्वीक्षिकी से ब्रह्मविद्या
प्राप्त करनी चाहिये, जिसके प्रभाव से सुख और दुःख का तत्त्व जानकर शोक तथा मोह का अपाकरण किया जा
सकता है । अपने अचिन्त्य तथा अनन्त ब्रह्मानन्दसुधासिन्धु में तृप्त रहने के कारण ही राम के राज्याभिषेक से
मुखाम्बुज पर कोई प्रसन्नता नहीं हुई और वनवास-दुःख से कोई विक्रिया नहीं आयी । वसुधाधिपत्य त्यागकर वन
जाते समय लोकातीत जैसी निर्विकारिता राम में परिलक्षित होती थी । आपत्ति में धैर्य-भङ्ग न हो यही तो महासत्त्व
का लक्षण है । सदा प्रसन्न राम को निहारने के लिए समुद्र के जलचरवृन्द भी प्रकट होकर विभोर हो जाते हैं।
वन के कोल-किरात नव निधि समझ कर राम में अनुरक्त होते हैं । राम के वियोग में रथ के घोड़े व्याकुल होकर
तृण और जल लेने से विरक्त हो जाते हैं । वे छविधाम श्रीराम मर्यादा-पालनार्थ स्वयं वेद, पुराण आदि सुनते हैं

और प्रजाको धर्माचरण का नम्र मधुर उपदेश देते हैं। भरत को अपनी और श्रीसीताजी की शपथ देकर कैकेयी के
प्रति सौमनस्य ही बर्तने का अनुरोध करते हैं। जनदुःख में दुःखी तथा उत्सव में पिता के समान परितुष्ट होकर
सबके साथ तादात्म्य का अनुभव करते हैं।
श्रीरामजी का अपना राज्य तथा सम्पूर्ण जीवित ही द्विजार्थ अर्पित है। इतना ही क्यों, सम्पूर्ण श्री
वैभव के साथ साक्षात् धर्म ही श्रीरामजी से सुसम्पन्न होकर प्रकट हुआ है। सत्य, दान, तप, त्याग, मित्रता, शुचिता,
विद्या, गुरु-शुश्रूषा आदि धर्म श्रीरामजी में ध्रुव रूप से सुस्थिर हैं। गुरुजन कहते हैं हम संसार में ऐसे किसी राम
के सुनिरस्त अपमानित घोर शत्रु को भी नहीं देखते हैं जो परोक्ष में भी राम का दोष या द्रोह बतलाता हो।
इतना ही नहीं, राम अमित्रों की भी दृष्टि एवं मन का हरण करते हैं—
“अप्यमित्राणां दृष्टिश्रुतिमनोहरः ।” (म० भा० रामोपाख्यान )
सर्वलोकप्रिय राम
श्रीरामजी धर्म तथा स्वजन के रक्षिता, सर्वलोकप्रिय, द्रष्टा, स्मर्त्ता, सभी लोगों के हितकारक, सहज
असाधारण क्षात्रस्वभाव से अदीनात्मा, अतिदुःख, व्यसनादि परम्परा में भी अक्षुब्धस्वभाव एवं विचक्षण हैं। जैसे
नदियां सदैव समुद्र की ओर जाती हैं वैसे ही राम सदैव सत्पुरुषों द्वारा सेवित होते हैं। वे आर्य, सर्वप्रियदर्शन,
सर्वगुणोपेत, कौशल्यानन्दवर्धन हैं—
“सर्वलोकप्रियः साधुरदीनात्मा विचक्षणः ।
सर्वदाभिगतः सद्भिः समुद्र इव सिन्धुभिः ॥
आर्यः सर्वसमश्चैव सदैव प्रियदर्शनः ।
स च सर्वगुणोपेतः कौशल्यानन्दवर्धनः ॥” (वा० रा० १।१।१५-१७ )
राम गंभीरता में समुद्र जैसे, धैर्य में हिमवान् जैसे, वीर्य (पराक्रम) में विष्णु जैसे तथा चन्द्रमा के समान
प्रियदर्शन हैं। क्रोध में कालाग्नि के तुल्य, क्षमा में पृथिवी के तुल्य, त्याग में कुबेर के तुल्य एवं सत्य में धर्म के तुल्य
हैं। वनगमन तथा अखण्ड भूमण्डल के राज्य का त्याग करने में सर्वलोकातीत जीवन्मुक्त जैसे उनके चित्त में कोई
विक्रिया परिलक्षित नहीं होती—
“न चास्य महतीं लक्ष्मीं राज्यनाशोऽपकर्षति ।
लोककान्तस्य कान्तत्वाच्छीतरश्मेरिव क्षयः ॥
न वनं गन्तुकामस्य त्यजतश्च वसुन्धराम् ।
सर्वलोकातिगस्येव लक्ष्यते चित्तविक्रिया ॥” (वा० रा० २।१९।३२, ३३ )
राम के समुचित रूपसंनिवेश, लक्ष्मी (शोभा), सौकुमार्य, सुवेषता आदि गुणों को विस्मित होकर
वनवासी देखने लगे—
“रूपसंहननं लक्ष्मीं सौकुमार्यं सुवेषताम् ।
ददृशुर्विस्मिताकारा रामस्य वनवासिनः ॥” ( वा० रा० ३।१।१३ )
रामचरितमानस के अनुसार राम की देह चिदानन्दमय है—
“चिदानन्दमय देह तुम्हारी ।” ( रा० मा० ३।१।१३ )
तुलसीदास ने बड़ी बुद्धिमानी से राम की शोभा का वर्णन किया है। देवताओं का सौन्दर्य तो प्रसिद्ध है।
फिर ब्रह्मा, विष्णु और शिव के सौन्दर्य का तो कहना ही क्या है ? पर सखियां कहती हैं—विष्णु में चार भुजा और

अध्याय रामचरितसिंहावलोकन ६८७
ब्रह्मा में चार मुख होने और विकटवेष शिवजी के पाँच मुख होने से वे राम के समान कहाँ हो सकते हैं ? फिर और
कौन तनुधारी देव उनके समान हो सकता है—
"विष्णु चारि भुज विधि मुख चारी । विकटभेष मुख पंच पुरारी ।
अपर देव अस को जग माहीं । यह छवि सखि पटतरिये जाहीं ॥” ( रा० म० १।२१९।४ )
वे राम के एक-एक अङ्ग पर कोटि-कोटि शत कामों को निछावर करती हैं। वाल्मीकिरामायण के अनुसार
तो राम सूर्य के सूर्य, अग्नि के अग्नि, प्रभु के भी प्रभु, श्री-शोभा के भी शोभा, कीर्ति के कीर्ति तथा क्षमा के
क्षमा हैं—
“सूर्यस्यापि भवेत् सूर्यो ह्यग्नेरग्निः प्रभोः प्रभुः ।
श्रियाः श्रीश्च भवेदग्रया कीर्त्याः कीर्तिः क्षमा-क्षमा ॥” ( वा० रा० २।४४।१५ )
श्रीभागवत के अनुसार अलङ्कारों से भगवान् के अङ्ग अलङ्कृत नहीं होते हैं, अपितु भगवान् के अङ्गों से
ही अलङ्कार अलङ्कृत होते हैं--"भूषणभूषणाङ्गम्" वाल्मीकिरामायण के अनुसार अपार सौन्दर्यसिन्धु राम के
स्वरूप से कोई भी अपने मन एवं चक्षु को लौटा ही नहीं सकता था । राम के सामने से पधार जाने पर भी उनका
मङ्गलमय रूप मन एवं नेत्रों में जगमगाता रहता था--
“नहि तस्मान्मनः कश्चिचक्षुषी वा नरोत्तमात् ।
नरः शक्नोत्यवाक्रष्टुमपक्रान्तेऽपि राघवे ॥” ( वा० रा० २।१७।१३ )
जिसने राम को न देखा और राम ने जिसे नहीं देखा वे दोनों सब लोकों में निन्दित हैं । इतना ही नहीं
उसकी अन्तरात्मा भी उसको धिक्कारती है--
“यश्च रामं न पश्येत्तु यं च रामो न पश्यति ।
निन्दितः सर्वलोकेषु स्वात्माप्येनं विगर्हति ॥” ( वा० रा० २।१७।१४ )
वे कहती हैं, सखि ऐसा कौन तनधारी है जो इस रूप पर मोहित न हो जाय । इसी लिए शङ्कर को १५
नेत्रों से राम के अनुपम रूप-सौन्दर्य का रसास्वादन करने के कारण १५ नेत्र अतिप्रिय लगे—
“संकर राम रूप अनुरागे । नयन पंचदस अतिप्रिय लागे ॥” (रा० मा० १।३१६।१)
ब्रह्मा ८ नेत्रों से राम के माधुर्य का आस्वादन करते हुए शिव से कम अपने ८ ही नेत्र जानकर पछताने
लगे । रमासहित रमापति भी रामरूप देखकर मोहित हो गये--
“हरि हित सहित राम जब जोहे । रमा समेत रमापति मोहे ॥” (रा० मा० १।३१६।२)
बारह नेत्रों से राम के सौन्दर्य का रसास्वादन करके कार्तिकेय प्रसन्न हो रहे थे और इन्द्र सहस्र नेत्रों से
भगवान् का रूप देखकर अपने को धन्य-धन्य मान रहे थे । जनकादि जैसे ज्ञान-विज्ञान सम्पन्न भी रामसौन्दर्य पर
मोहित हो गये—
“सहज विराग रूप मन मोरा । थकित होत जिमि चंद चकोरा ॥
इन्हहि बिलोकत अति अनुरागा । बरबस ब्रह्मसुखहि मन त्यागा ॥” (रा० मा० १।२१५।२,३)
कि बहुना जिसने स्वप्न में भी एक बार भी राम-मुख-माधुर्य का अनुभव कर लिया है। वह ब्रह्मसुख को
भी नहीं गिनता । सूर्यनारायण ने कोटि-कोटि किरणों से राम के रूप-सौन्दर्य को निहारते-निहारते मास भर अवध
में बिता दिया ।

६८८ रामायणमीमांसा विंश
“मासदिवस कर दिवस भा मरम न जाना कोइ । रथ समेत रबि थाकेउ निसा कवन बिधि होइ ॥
( रा० मा० १।१९५)
"सोइ सुख लवलेस जिन सपनेहु बारेक लहेउ । ते नहिं गनहिं खगेस ब्रह्मसुखहि सज्जन सुमति ॥”
( रा० मा० ७।८८ )
सनकादि भी भगवान् की अनुपम छवि देखकर विह्वल हो जाते हैं ।
“मुनि रघुपतिछबि अतुल बिलोकी । भये मगन मन सके न रोकी ।।" ( रा० मा० ७।३२।१ )
ज्ञानी भक्त सात्त्विक लोग ही नहीं खरदूषण जैसे क्रूरप्रकृति के लोग भी राम की शोभा देखकर मोहित
होकर कहने लगते हैं—
“जद्यपि भगिनी कीन्ह कुरूपा । बध लायक नहिं पुरुष अनूपा ।।" ( रा० मा० ३।१८।३ )
उनसे भी अधिक तीक्ष्ण विषवाली सर्पिणी एवं वृश्चिक आदि भी रामरूप देखकर अपनी सहज तामसी
तीक्ष्णता को त्यागकर प्रेमपरिप्लुत हो जाते हैं—
"जिनहिं निरखि मग सांपिनि बीछी ।
तजहिं सहज बिष तामस तीछी ॥ ( रा० मा० २।२६०।४ )
फिर जिनकी निधि वही हैं उनके लोचन रामरूप पर क्यों न ललचा उठें ?
"देखि रूप लोचन ललचाने । हरषे जनु निज निधि पहिचाने ॥” ( रा० मा० १।२३१।२ )
"लाजहिं तनु शोभा निरखि कोटि-कोटि सत काम ।” ( रा० मा० १।१४६ )
श्रीभागवत के अनुसार भगवान् की चपला लक्ष्मी भगवान् के पादारविन्द का माधुर्यामृतरसास्वादन करने
गयी । रसास्वादन करने में उसे शोभासिन्धु की थाह नहीं मिली । उसे उत्तरोत्तर क्षणों में पूर्व-पूर्व क्षण की शोभा से
कोटि-कोटि गुणित अधिक शोभा अनुभूत होने लगी । अतः चला लक्ष्मी श्रीभगवान् के पादारविन्द को पाकर अचला
हो गयी । अनन्तकाल तक अनुभव करने पर भी उत्तरोत्तर कोटि-कोटि गुणित शोभा की अनुभूति बढ़ती ही गयी—
“चलापि यच्छ्रीर्न जहाति कर्हिचित् ।” ( भाग० ११।२।३३ )
और तो और स्वयं भी सर्वज्ञशिरोमणि मणिमय स्तम्भों में प्रतिफलित निजप्रतिबिम्ब को निहारकर
प्रेमोद्रेक में स्वयं भी नाच उठे—
“रूपरासि छबि अजिर बिहारी । नाचहिं निज प्रतिबिम्ब निहारी ॥” ( रा० मा० ७।७६।४ )
वेद, उपनिषद्, महाभारत तथा अनेक रामायणों में रामचरित्र का वर्णन है । अग्निपुराण में २ से १२
और २४० से २६० अध्यायों में राम द्वारा राजनीति का वर्णन है । आदिपुराण, कल्किपुराण तथा कालिकापुराण के
६२ वें अध्याय में विस्तृत रामकथा है। कूर्मपुराण, गरुड़पुराण तथा नरसिंहपुराण में रामकथा है । पद्मपुराण में
अनेक बार सविस्तर रामकथा वर्णित है । इसी में रामाश्वमेध ७० अध्यायों में वर्णित है । बृहन्नारदीयपुराण, बृहद्धर्म-
पुराण, ब्रह्मपुराण, ब्रह्माण्डपुराण, भविष्यपुराण, श्रीमद्भागवत, देवीपुराण तथा महाभागवत में भी रामकथा है ।
मार्कण्डेयपुराण, लिङ्गपुराण, वामनपुराण, वायुपुराण, वाराहपुराण, विष्णुपुराण, शिवपुराण, स्कन्दपुराण तथा
हरिवंशपुराण में रामकथा वर्णित है । हनुमत्संहिता, शिवसंहिता, लोमशसंहिता, बृहद्ब्रह्मसंहिता, महाशम्भुसंहिता,
अगस्त्यसंहिता, वाल्मीकिसंहिता, शुकसंहिता, वसिष्ठसंहिता, सदाशिवसंहिता, हिरण्यगर्भसंहिता, महासदाशिवसंहिता,
ब्रह्मसंहिता, पुराणसंहिता, बृहत्सदाशिवसंहिता, सनत्कुमारसंहिता आदि महत्त्वपूर्ण ग्रन्थों में राम की उपासनाओं
का वर्णन है ।

अध्याय रामचरितसिंहावलोकन ६८९
अनादि काल से वाराणसी में मरनेवालों को शिवजी रामनाम का उपदेश करते हैं—
“पेयं पेयं श्रवणपुटके रामनामाभिरामं
ध्येयं ध्येयं मनसि सततं तारकं ब्रह्मरूपम् ।
जल्पन् जल्पन् प्रकृतिविकृतौ प्राणिनां कर्णमूले
वीथ्यां वीथ्यामटति जटिलः कोऽपि काशीनिवासी ।।” ( काशीरहस्य )
भक्तवर प्रह्लाद भी रामनाम का महत्त्व मानते हैं—
“रामनाम जपतां कुतो भयं सर्वतापशमनैकभेषजम् ।
पश्य तात मम गात्रसन्निधौ पावकोऽपि सलिलायतेऽधुना ।।” ( नृ० पु० )
प्रह्लाद कहते हैं राम-नाम जपनेवालों को भय कहाँ ? क्योंकि राम-नाम सब तापों की निवृत्ति का
एकमात्र औषध है । हे तात ! देखिये मेरे शरीर के निकट आग भी जल के समान ठण्डी प्रतीत होती है । भक्तगण
उन्हीं का आश्रयण करते हैं—
“अपराधसहस्रभाजनं पतितं भीमभवार्णवोदरे ।
अगतिं शरणागतं हरे कृपया केवलमात्मसात्कुरु ।।”
नाथ, मैं सहस्रों अपराधों का भाजन हूँ, अतएव भयङ्कर भवार्णव में पड़ा हूँ । मेरा कोई सहारा नहीं है,
मैं आपकी शरण में आया हूँ । हे हरे ! आप मुझे अपना लेने की कृपा करें ।
“न धर्मनिष्ठोऽस्मि न चात्मवेदी न भक्तिमांस्त्वच्चरणारविन्दे ।
अकिञ्चनोऽनन्यगतिः शरण्यं त्वत्पादमूलं शरणं प्रपद्ये ।।”
न मैं धर्मनिष्ठ हूँ, न आत्मवेदी हूँ और न ही आपके चरणों में भक्तिमान् हूँ । अकिञ्चन एवं अनन्यगति मैं
आपके शरणागतरक्षणपरायण चरणों की शरण में प्रपन्न हूँ ।
स्कन्दयामल तन्त्र के निर्वाणखण्ड में रुद्रवाक्य है—
“रेफोऽग्निरहमेवोक्तो विष्णुः सोमो म उच्यते ।
आवयोर्मध्यगो ब्रह्मा रविराकार उच्यते ।।”
राम-नाम का रेफ ( र ) अग्नि का वाचक है, वह अग्नि मैं ही हूँ । रामनाम का 'म' सोमात्मक 'विष्णु
का वाचक है, दोनों के मध्य में रहनेवाले आकार का अर्थ ब्रह्मा है । वही आदित्य भी है । इस तरह प्रणव के समान
ही रामनाम भी ब्रह्मविष्णुरुद्रात्मक है ।
“चिन्मयेऽस्मिन् महाविष्णो जाते दाशरथौ हरौ ।
रघोः कुलेऽखिलं राति राजते यो महीस्थितः ।।
स राम इति लोकेषु विद्वद्भिः प्रकटीकृतः ।” ( रा० पू० ता० १।२ )
रघुकुल में महाविष्णु के दाशरथि राम के रूप में प्रकट होने पर जो अखिल अभीष्ट देते हैं और भूमि में
स्थित होकर देदीप्यमान हैं, उनका नाम राम पड़ा ।
“रमन्ते योगिनो यस्मिन्नित्यानन्दे चिदात्मनि ।
इति रामपदेनैतत्परं ब्रह्माभिधीयते !!” ( रा० उ० ता० १।६ )

६९० रामायणमीमांसा विंश
योगी जिस नित्य चिदानन्द आत्मा में रमण करते हैं वही राम हैं अथवा जो ज्ञानादि लक्ष्मी प्रदान
करते हैं वही राम हैं। “रां ज्ञानादिलक्ष्मीम् अमति ददातीति रामः, ज्ञानादीनां प्राप्तिर्यस्मात्स रामः ।” विविध
ऐश्वर्यों, धनों, लक्ष्मी आदि की जिससे प्राप्ति होती है, वही राम है।
“यथैव वटबीजस्थः प्राकृतश्च महान् द्रुमः।
तथैव रामबीजस्थं जगदेतच्चराचरम्॥
रेफारूढमूर्तयः स्युः शक्तयस्तिस्र एव च।”
जैसे महान् वटवृक्ष वटबीज में रहता है, वैसे ही यह चराचर प्राकृत महान् जगत् राम के बीज 'रां' मन्त्र
में रहता है। तीनों उत्पादिनी, पालिनी तथा संहारिणी शक्तियाँ रेफसमन्वित हैं।
“राम एव परं ब्रह्म राम एव परं तपः।
राम एव परं तत्त्वं श्रीरामो ब्रह्म तारकम्॥” (रा० उ० ता० १।६ )
राम ही परम ब्रह्म हैं, राम ही परम तप हैं, राम ही परम तत्त्व हैं एवं राम ही तारक ब्रह्म हैं।
“कांस्यघण्टानिनादस्तु यथालीयति शान्तये।
ॐकारस्तु तथा योज्यः शान्तये सर्वमिच्छता॥
यस्मिन् विलीयते शब्दस्तद् ब्रह्म परिगीयते।”
कांस्य घण्टा का नाद जैसे क्रमेण लीन हो जाता है उसी तरह प्रणव के उच्चारण में अ, उ और म के
समाप्त होने पर अनुस्वार ध्वनि नाद से शान्ति की अनुभूति होती है। वही की वही स्थिति राम में होती है।
“राशब्दो विश्ववचनो मश्चापीश्वरवाचकः।
विश्वानामीश्वरो यो हि तेन रामः प्रकीर्तितः ॥”
रा शब्द विश्व का वाचक है और म ईश्वर का वाचक है तथा विश्वों का ईश्वर ही राम है।
“रा चेति लक्ष्मीवचनो मश्चापीश्वरवाचकः।
लक्ष्मीपति गतिं रामं प्रवदन्ति मनीषिणः ॥”
इसी तरह 'रा' लक्ष्मी का वाचक है और 'म' ईश्वर का वाचक है। लक्ष्मी का ईश्वर ही राम है।
“तरुणादित्यसंकाशं चतुर्वर्गप्रदायकम्।
पञ्चदेवमयं वर्णं पञ्चप्राणमयं तदा॥
त्रिशक्तिसहितं रामं त्रिबिन्दुसहितं सदा।
आत्मादितत्त्वसंयुक्तं हृदिस्थं प्रणमाम्यहम् ॥” (कामधेनुतन्त्र )
तरुण आदित्य के समान 'रा' और 'म' वर्ण चतुर्वर्गप्रद एवं पञ्चदेवमय तथा पञ्चप्राणमय हैं। रामनाम
की महिमा से निर्गुण एवं सगुण रामब्रह्म का प्राकट्य होता है।
“कदा पुनः शङ्खरथाङ्गकल्पकध्वजारविन्दाङ्कुशवज्रलाञ्छनम्।
त्रिविक्रम त्वच्चरणाम्बुजद्वयं मदीयमूर्धानमलङ्करिष्यति ॥”(आलवन्दारस्तोत्र ३४)
श्रीयामुनाचार्य कहते हैं- शङ्ख, चक्र, ध्वज, कमल, अङ्कुश और वज्र के चिह्नों से अङ्कित आपके
चरणारविन्द कब मेरे मस्तक को अलङ्कृत करेंगे? अन्य भक्तों के अनुसार भगवच्चरणारविन्द में आकाश, गोष्पद,
स्वस्तिक, जम्बूफल, कलश, सुधासरोवर, अर्धचन्द्र, षट्कोण, मीनबिन्दु, ऊर्ध्वरेखा आदि के भी चिह्न हैं।

अध्याय रामचरितसिंहावलोकन ६२१
“अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या।
तस्यां हिरण्मयः कोशः स्वर्गो ज्योतिषावृतः ॥” ( अथर्वसं० १०।२।३१ )
आठ आवरणोंवाली तथा नव द्वारवाली देवताओं की पुरी अयोध्या है। उसमें हिरण्मय ज्योतिर्मय स्वर्ग कोश
है। वह ज्योति के द्वारा आवृत है।
“अयोध्या नगरी नित्या सच्चिदानन्दरूपिणी ।
यस्यांशांशेन वैकुण्ठो गोलोकादिः प्रतिष्ठितः ॥” ( व० सं० )
वसिष्ठसंहिता के अनुसार अयोध्या नगरी सच्चिदानन्दरूपिणी है। वैकुण्ठ, गोलोकादि सब उसी के
अंश हैं।
“तस्मिन् हिरण्मये कोशे त्र्यरे त्रिप्रतिष्ठिते तस्मिन् ।
यद् यक्षमात्मन्वत् तद् वै ब्रह्मविदो विदुः ॥” ( अथर्वसं० १०।२।३२ )
उस प्रकाशमय तीन अरों, तीन गुणों या सत्, चित् और आनन्द पर आधृत हिरण्मय कोश में आत्मतुल्य
परमपूज्य राम ब्रह्म स्थित हैं।
“प्रभ्राजमानां हरिणीं यशसा सम्परीवृताम् ।
पुरं हिरण्मयीं ब्रह्माविवेशापराजिताम् ॥” ( अथर्वसं० १०।२।३ )
अत्यन्त देदीप्यमान मन को हरण करनेवाली यश से परिवृत अपराजिता सर्वथा अजेय उस हिरण्मयी
अयोध्या पुरी में ब्रह्म राम सम्यक् विराजमान हैं।
वाल्मीकिरामायण में उसी प्रेमपरिप्लुत अयोध्या पुरी का वर्णन है।
“तत्समाकुलसंभ्रान्तं मत्तसंकुपितद्विपम् ।
हयशिक्षितनिर्घोषं पुरमासीन्महास्वनम् ॥” ( वा० रा० २।४०।१९ )
राम के वियोग से वह पुर ही व्याकुल एवं संभ्रान्त हो गया। मत्त गज भी राम के वियोग की
सम्भावना से कुपित हो गये। घोड़ों के हिनहिनाने एवं उनके भूषणों के निःस्वनों से सारा नगर कोलाहलपूर्ण
हो गया।
पुरवासी कहते हैं—
“अनुगन्तुमशक्तास्त्वां मूलैरुद्धतवेगिनः ।
उन्नता वायुवेगेन विक्रोशन्तीव पादपाः ॥” ( वा० रा० २।४५।३० )
अपनी जड़ों के कारण वेगहीन पादप तुम्हारा अनुगमन करने में असमर्थ हैं। वायुवेग से स्वनवान् ये उन्नत
पादप आप से लौटने के लिए चीत्कार कर रहे हैं।
“लीनपुष्करपत्राश्च नद्यश्च कलुषोदकाः ।
संतप्तपद्माः पद्मिन्यो लीनमीनविहङ्गमाः ॥” ( वा० रा० २।५९।७ )
नदियों के जल मलिन हो गये हैं एवं उनके कमलों के पत्ते निलीनप्राय हो गये हैं (सूख गये हैं)।
नदियों, सरोवरों के कमल एवं कमलिनियां संतप्त हो गयी हैं। उनके मीन एवं विहंगमगण लुप्त हो गये हैं।
“मम त्वश्वा निवृत्तस्य न प्रावर्तन्त वर्त्मनि ।
उष्णमश्रु विमुञ्चन्तो रामे संप्रस्थिते वनम् ॥

६९२ रामायणमीमांसा विंश

विषये ते महाराज महाव्यसनकर्शिताः ।
अपि वृक्षाः परिम्लानाः सपुष्पाङ्कुरकोरकाः ॥
उपतप्तोदका नद्यः पल्वलानि सरांसि च ।
परिशुष्कपलाशानि वनान्युपवनानि च ॥
न च सर्पन्ति सत्त्वानि व्याला न प्रसरन्ति च ।
रामशोकाभिभूतं तन्निष्कूजमिव तद्वनम् ॥
जलजानि च पुष्पाणि माल्यानि स्थलजानि च ।
न विभान्त्यल्पगन्धीनि फलानि च यथापुरम् ॥
अत्रोद्यानानि शून्यानि प्रलीनविहगानि च ।
न चाभिरामानारामान् पश्यामि मनुजर्षभ ॥” (वा०रा० २।५९।२, ३–६, ८, ९)

सुमन्त्र ने कहा—राम के वन को प्रस्थित होने पर मैं जब लौटा रथ के घोड़े उष्ण आँसू गिराते हुए मार्ग
पर चलने को प्रवृत्त नहीं हुए । महाराज, महाव्यसन से दुःखित आपके देश के वृक्ष पुष्पों, पल्लवों, अङ्कुरों तथा
पुष्पमुकुलों के साथ परिम्लान (कुम्हलाये हुए) हो गये हैं। नदियों, सरोवरों तथा छोटे सरोवरों के जल तप्त एवं
शुष्क हो गये हैं । वनों एवं उपवनों के पत्ते सूख गये हैं। कोई प्राणी आहार के लिए भी गमनागमन नहीं कर रहे
हैं । व्याल भी प्रसर्पण नहीं कर रहे हैं। सारा वन रामशोक से अभिभूत होकर निःशब्द सा हो रहा है। जल और
स्थल के सभी पुष्प पहले के समान सौन्दर्य तथा सौगन्ध्य से युक्त नहीं हैं। सारे उद्यान विहंगादिहीन हो शून्य से
प्रतीत होते हैं । आराम और क्रीडोद्यान भी अभिरामताशून्य हो रहे हैं। इस तरह अचेतन वृक्ष और लताएँ भी
रामप्रेम से व्याप्त हैं ।

जो कहते हैं कि भले पुष्करनाभ के अनेक एक से एक अच्छे अवतार हैं तो भी लताओं में प्रेम प्रदान
करनेवाला कृष्ण से अन्य कौन है ?
“सन्त्ववतारा बहवः पुष्करनाभस्य सर्वतो भद्राः ।
कृष्णादन्यः को वा लतास्वपि प्रेमदो भवति ॥”

उन्हें उपर्युक्त वाल्मीकिरामायण के श्लोकों का अध्ययन करना चाहिये । इस तरह राम, उनका मङ्गल-
मय धाम तथा मङ्गलमय नाम एवं राम की मङ्गलमयी कथा सभी स्वप्रकाश ब्रह्मरूप ही हैं और प्रत्येक के परम
कल्याण के स्रोत हैं ।

रघुवंश के अनुसार कुश ने अयोध्या का जीर्णोद्धार किया था ।
“ऋषभं प्राप्य राजानं निवासमुपयास्यति ।” (वा० रा० ७।१११।२०)
के अनुसार पूर्णरूप से वह जननिवास स्थान ऋषभ राजा के काल में ही हो सकी थी । सन्ध्याकरनन्दिकृत
रामचरित (सर्ग ४) में वर्णित है कि कुश का कुमुद्वती के साथ विवाह हुआ था । आनन्दरामायण में भी कुश के
अनेक विवाहों का वर्णन है । राम के २००० पौत्रों तथा २४ पौत्रियों का उल्लेख है । सेरीराम के अनुसार लव ने इन्द्र-
जित् की पुत्री, इसके बाद विभीषण की पुत्री से विवाह कर के लङ्का का राज्य स्वीकार किया था । परन्तु यह सब
रामायणविरुद्ध होने से चिन्त्य है । राम ने लङ्का का राज्य विभीषण को दिया था । रामपुत्र उसे स्वीकार करते यह
कथमपि सम्भव नहीं ।

रावण ब्राह्मण था । उसके कुल की कन्या से विवाह क्षत्रिय कुल के लिए दोषावह ही था ।

अध्याय रामचरितसिंहावलोकन ६९३
कुश और लव की जन्म-कथा
राम द्वारा परित्यक्त किये जाने के बाद सीता ने वाल्मीकि के आश्रम में यमल पुत्रों को जन्म दिया।
वाल्मीकिरामायण (७।६६।३-९) के अनुसार कुशों के अग्रभाग से अग्रज का निर्मार्जन करने का तथा अनुज का कुशों
के लव (अधोभाग) से मार्जन करने का आदेश महर्षि वाल्मीकि ने दिया था। अतः क्रम से दोनों का नाम कुश और
लवपड़ा था—
'यस्तयोः पूर्वजो जातः स कुशैर्मन्त्रसत्कृतैः ।
निर्मार्जनीयस्तु तदा कुश इत्यस्य नाम तत् ॥
यश्चावरो भवेत्ताभ्यां लवेन सुसमाहितः ।
निर्मर्जनीयो वृद्धाभिर्लवेति च स नामतः ॥' (वा० रा० ७।६६।७,८)
इससे भी स्पष्ट है कि गानोपजीवी कुशीलव की यहाँ चर्चा नहीं है। यहाँ कुश और लव नाम के दो
राजकुमार हैं और वे सीतापुत्र हैं। अतः बुल्के की यह कल्पना निरर्थक है कि कुशीलव गानविद्योपजीवी थे।
भवभूति के अनुसार लक्ष्मण के चले जाने पर सीता को वन में प्रसव-पीड़ा होती है। उससे निराश होकर
वे आत्महत्या के विचार से गङ्गा में कूद पड़ती हैं। जल में ही उनके दो पुत्र होते हैं। पृथिवी तथा गङ्गा देवियाँ
सीता को दो पुत्रों के साथ रसातल ले जाती हैं। बाद में कुछ बड़े होने पर गङ्गा दोनों पुत्रों को शिक्षा देने के लिए
वाल्मीकि महर्षि को सौंप देती हैं। इसके अनुसार कुश और लव अपने माता-पिता के बारे में कुछ भी नहीं जानते थे ।
अन्तिम अङ्क में वाल्मीकि की आज्ञा से सीता प्रकट होकर राम के साथ अयोध्या लोटती हैं। कुन्दमाला के अनुसार
राम कुश और लव से उनके माता-पिता के सम्बन्ध में प्रश्न करते हैं। तो वे अपनी माता वनदेवी को बताते हैं।
परन्तु पिता के सम्बन्ध में कुश ने कहा कि मैं नहीं जानता। लव ने कहा मैं जानता हूँ। मेरे पिता का नाम निरनुक्रोश
है, क्योंकि एक दिन माँ ने क्रुद्ध होकर कहा था "निरनुक्रोशतनयौ"। यह सुनकर राम के नेत्रों में अश्रु आ गये।
यह कथा कल्पान्तर की हो सकती है। वाल्मीकिरामायण के अनुसार तो वाल्मीकि के आश्रम में ही कुश और
लव का जन्म हुआ था एवं वेदादि की शिक्षा भी उन्हें वहीं मिली थी। कथासरित्सागर तथा तिब्बती रामायण के
अनुसार सीता ने एक ही पुत्र को जन्म दिया था। उसका नाम लव था। सीता लव को लेकर नदी में स्नान करने
गयी। वाल्मीकि ने कुटी में आकर सोचा कि कोई हिंस्र पशु बालक को उठा ले गया, इसलिए उन्होंने तपोबल
द्वारा कुश से एक बालक की सृष्टि की। लौटने पर सीता ने उसे पुत्रवत् ग्रहण किया। इस प्रकार सीता के कुश और
लव दो पुत्र हुए।
काश्मीरीरामायण (९।११८३-९३) के अनुसार दशरथ स्वप्न में पुत्र के लिए राम से अनुरोध करते हैं।
राम वसिष्ठ की सम्मति से अश्वमेधयज्ञ करते हैं। फलस्वरूप सीता गर्भवती होती है। यह भी कल्पान्तरीय कथा है।
वाल्मीकिरामायण के अनुसार तो अश्वमेधयज्ञ में ही कुश और लव ने रामायण का गान किया था। किसी कथा के
अनुसार सीता कुश को वाल्मीकि की रक्षा में छोड़ कर जाती है, किन्तु मार्ग में वानरियों का उपदेश सुनकर लौट
आती हैं। वाल्मीकि नया पुत्र बनाकर देते हैं। आनन्दरामायण के अनुसार भी एक वानरी पाँच पुत्रों को ढोती है।
इसपर सीता लौटकर वाल्मीकि को बिना बताये पुत्र को ले जाती हैं।
रामकियेन में वानरियों से सीता के मिलने का वृत्तान्त है। सीता वानरियों को बच्चों के साथ कूदती देख
कर बच्चों की समुचित सुरक्षा न करने के कारण उनकी भर्त्सना करती हैं। वानरियों ने उत्तर दिया कि तुम तो
अपना पुत्र ध्यानमग्न ऋषि के पास छोड़ कर आयी। तुम हमसे भी अधिक असावधान हो। यह सुनकर सीता अपने
पुत्र को लेने के लिए लौट पड़ती है। अन्य वृत्तान्त के अनुसार सुग्रीव-सेना के वानर वन में सीता की सेवा करते हैं।
वानर उनके पुत्र को टहलाने ले जाते थे। किसी दिन सीता नदी तट पर सो गयी। इतने में एक वानरी उनके पुत्र