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सर्वकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 769

६९२ रामायणमीमांसा विंश

विषये ते महाराज महाव्यसनकर्शिताः ।
अपि वृक्षाः परिम्लानाः सपुष्पाङ्कुरकोरकाः ॥
उपतप्तोदका नद्यः पल्वलानि सरांसि च ।
परिशुष्कपलाशानि वनान्युपवनानि च ॥
न च सर्पन्ति सत्त्वानि व्याला न प्रसरन्ति च ।
रामशोकाभिभूतं तन्निष्कूजमिव तद्वनम् ॥
जलजानि च पुष्पाणि माल्यानि स्थलजानि च ।
न विभान्त्यल्पगन्धीनि फलानि च यथापुरम् ॥
अत्रोद्यानानि शून्यानि प्रलीनविहगानि च ।
न चाभिरामानारामान् पश्यामि मनुजर्षभ ॥” (वा०रा० २।५९।२, ३–६, ८, ९)

सुमन्त्र ने कहा—राम के वन को प्रस्थित होने पर मैं जब लौटा रथ के घोड़े उष्ण आँसू गिराते हुए मार्ग
पर चलने को प्रवृत्त नहीं हुए । महाराज, महाव्यसन से दुःखित आपके देश के वृक्ष पुष्पों, पल्लवों, अङ्कुरों तथा
पुष्पमुकुलों के साथ परिम्लान (कुम्हलाये हुए) हो गये हैं। नदियों, सरोवरों तथा छोटे सरोवरों के जल तप्त एवं
शुष्क हो गये हैं । वनों एवं उपवनों के पत्ते सूख गये हैं। कोई प्राणी आहार के लिए भी गमनागमन नहीं कर रहे
हैं । व्याल भी प्रसर्पण नहीं कर रहे हैं। सारा वन रामशोक से अभिभूत होकर निःशब्द सा हो रहा है। जल और
स्थल के सभी पुष्प पहले के समान सौन्दर्य तथा सौगन्ध्य से युक्त नहीं हैं। सारे उद्यान विहंगादिहीन हो शून्य से
प्रतीत होते हैं । आराम और क्रीडोद्यान भी अभिरामताशून्य हो रहे हैं। इस तरह अचेतन वृक्ष और लताएँ भी
रामप्रेम से व्याप्त हैं ।

जो कहते हैं कि भले पुष्करनाभ के अनेक एक से एक अच्छे अवतार हैं तो भी लताओं में प्रेम प्रदान
करनेवाला कृष्ण से अन्य कौन है ?
“सन्त्ववतारा बहवः पुष्करनाभस्य सर्वतो भद्राः ।
कृष्णादन्यः को वा लतास्वपि प्रेमदो भवति ॥”

उन्हें उपर्युक्त वाल्मीकिरामायण के श्लोकों का अध्ययन करना चाहिये । इस तरह राम, उनका मङ्गल-
मय धाम तथा मङ्गलमय नाम एवं राम की मङ्गलमयी कथा सभी स्वप्रकाश ब्रह्मरूप ही हैं और प्रत्येक के परम
कल्याण के स्रोत हैं ।

रघुवंश के अनुसार कुश ने अयोध्या का जीर्णोद्धार किया था ।
“ऋषभं प्राप्य राजानं निवासमुपयास्यति ।” (वा० रा० ७।१११।२०)
के अनुसार पूर्णरूप से वह जननिवास स्थान ऋषभ राजा के काल में ही हो सकी थी । सन्ध्याकरनन्दिकृत
रामचरित (सर्ग ४) में वर्णित है कि कुश का कुमुद्वती के साथ विवाह हुआ था । आनन्दरामायण में भी कुश के
अनेक विवाहों का वर्णन है । राम के २००० पौत्रों तथा २४ पौत्रियों का उल्लेख है । सेरीराम के अनुसार लव ने इन्द्र-
जित् की पुत्री, इसके बाद विभीषण की पुत्री से विवाह कर के लङ्का का राज्य स्वीकार किया था । परन्तु यह सब
रामायणविरुद्ध होने से चिन्त्य है । राम ने लङ्का का राज्य विभीषण को दिया था । रामपुत्र उसे स्वीकार करते यह
कथमपि सम्भव नहीं ।

रावण ब्राह्मण था । उसके कुल की कन्या से विवाह क्षत्रिय कुल के लिए दोषावह ही था ।