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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

“हेमाभया द्विभुजया सर्वालङ्कृतया चिता।
श्लिष्टः कमलधारिण्या पुष्टः कोशलजात्मजः ॥” (वा० ता० ४।९)
सकल सच्छास्त्रों का तात्पर्य श्रीसीता में है, क्योंकि सीतोपनिषद् के अनुसार ब्रह्मसत्तासामान्यरूप सीता
है। तभी धीपराशरभट्ट स्वामी ने कहा है—केवल श्रीसूक्त एवं रामतापनी उपनिषद् ही हाथ उठाकर आपको ही
जगत् की एकमात्र नियन्त्री नहीं कहते हैं, किन्तु रामायण महाग्रन्थ भी आपका चरित्र प्रतिपादन करके ही जीवन
धारण करता है जितने स्मृतियों के प्रणेता मन्वादि हैं वे सभी पुराणों के सहित वेदों को आपकी महिमा में ही
प्रमाण मानते हैं—
“उद्वाहुस्त्वामुपनिषदसावाहु नेकां नियन्त्रीं श्रीमद्रामायणमपि वरं प्राणिति त्वच्चरित्रे ।
स्मर्तारोऽस्मिञ्जननि यतमे सेतिहासाः पुराणैर्निन्युर्वेदानपि च ततमे त्वन्महिम्नि प्रमाणम् ।।”
(गुणरत्नकोश १४)
“काव्यं रामायणं कृत्स्नं सीतायाश्चरितं महत् ।”
वाल्मीकिरामायण के अनुसार सभी रामायण महाकाव्य सीता के ही महान् चरित्र हैं। सीताचरित्र होने
से ही श्रीराम ने रामायणश्रवण किया था। अन्यथा धीरोदात्त नायक राम के लिए अपनी राज्य-सभा में अपना
चरित्र सुनना सङ्गत न होता। शास्त्रों के अनुसार जैसे सम्राट् दर्पण में अपना प्रतिबिम्ब निहार कर अपने वैभव का
अनुभव करता है वैसे ही शिव शक्ति में निज प्रतिबिम्ब निहार कर अपनी पूर्णता एवं स्वतन्त्रता का अनुभव करते
हैं। ठीक वैसे ही सीता की अनन्त महिमा में राम अपनी पूर्णता का अनुभव करते हैं।
वैष्णवाचार्य भक्त तो स्पष्ट कहते हैं कि हे मातः मैथिली ! लङ्का में नित्य नया अपराध करनेवाली
राक्षसियों की रुष्ट हनुमान् से अनेक हेतुदर्शक वाक्यों द्वारा बिना शरण में आये ही रक्षा करके आपने राघवेन्द्र की
सभा को लघु बना दिया, क्योंकि राघवेन्द्र ने तो जयन्त एवं विभीषण की रक्षा शरण आने पर ही की थी, पर आप
तो अपने क्षमागुण के प्राबल्य से शरणागतिनिरपेक्ष ही अहैतुकी कृपा से रक्षा करती हैं—
“मातर्मैथिलि राक्षसीस्त्वयि तदैवार्द्रापराधास्त्वया
रक्षन्त्या पवनात्मजाल्लघुकृता रामस्य गोष्ठी कृता ।
काकं तं च विभीषणं शरणमित्युक्तिक्षमौ रक्षतः
सा नः सान्द्रमहागसः सुखयतु क्षान्तिस्तवाकस्मिकी ॥”
संमोहनतन्त्र के अनुसार गौर तेज के बिना श्याम तेज के भजन तथा ध्यान से पूर्ण सिद्धि आदि न मिल-
कर पातक ही हाथ लगता है—
“गौरतेजः परित्यज्य श्यामतेजः समर्चयेत् ।
जपेद् वा ध्यायते वापि स भवेत् पातकी शिवे ॥”
श्रीरामानुजाचार्य के अनुसार अरविन्दनयन भगवान् की प्राणेश्वरी भगवती के प्रसाद के बिना सांसारिक
वैभव, अक्षर ब्रह्म तथा वैष्णव-मार्ग की मुक्ति आदि भी नहीं मिलती—
“श्रेयो नह्यरविन्दलोचनमनःकान्ताप्रसादादृते
संसृत्यक्षरवैष्णवाध्वसु नृणां संभाव्यते कर्हिचित् ।”
शास्त्रों के अनुसार ब्रह्मसत्तासामान्य ही सीता एवं राम के रूप में प्रकट होता है, दोनों ही सच्चिदानन्द-
रस-सारसर्वस्व होने पर भी सौन्दर्यसारसर्वस्व का सीतारूप में एवं प्रेमसारसर्वस्व का रामरूप में प्रादुर्भाव है। लोक

अध्याय रामचरितसिंहावलोकन ६६१
में जैसे रूप, आलोक एवं नेत्र तीन होने पर भी मूलतः तीनों ही एक तेज हैं। वैसे ही लोक में सौन्दर्य, सौन्दर्यज्ञान
एवं सौन्दर्यज्ञानजनित प्रेम तीन होने पर भी मूल में तो एक ही सत्यं शिवं सुन्दरं हैं। रसास्वादन की दृष्टि से
सौन्दर्यसार सीता के रूप में एवं प्रेमसार राघवेन्द्र के रूप में प्रकट हैं। भक्तों ने यह भी माना है कि लीलाविग्रहदृष्टि
से युवत्वादि गुण दोनों में समान होने पर भी पुरुषत्व के अनुरूप स्वातन्त्र्य, शत्रुदमन, स्थैर्यादि गुण भगवान् में हैं
और स्त्रीत्व के अनुरूप मृदिमा, पतिपरायणता, करुणा, क्षमा आदि पराम्बा में हैं। इस तरह एक दूसरे के गुणों का
रसास्वादन करने के लिए ही एकरूप होने पर भी उन्होंने दो रूप धारण कर रखे हैं।
"युवत्वादौ तुल्येऽप्यपरवशताशत्रुदमन-
स्थिरत्वादीन् कृत्वा भगवति गुणान् पुंस्त्वसुलभान्।
त्वयि स्त्रीत्वैकान्तान् मृदिमपतिपराथिकरुणा-
क्षमादीन् वा भोक्तुं भवति युवयोरात्मनि भिदा ॥"
भक्त कहता है, हे जननि, आपके प्रेयान् राघवेन्द्र पिता के समान जीवों के हितार्थ उनके महान् अपराधों
को देखकर जब कभी-कभी खूब कुपित होते हैं और क्षमा न करके उन अशुभों को आसुरी योनियों में ही भेजने पर
प्रस्तुत हो जाते हैं—
"क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु।"
तब मैथिली भगवान् को रुष्ट देखकर प्रेम से प्रार्थना कर उन्हें समझा कर जीवों के अनुकूल बनाने का
प्रयास करती हुई कहती हैं—इस दोषागार संसार में निर्दोष कौन है, अतः पुत्रों (जीवों) पर क्रोध न करके अपने
सर्वरक्षक, सर्वशरण्य आदि विरुदावली के अनुसार कृपा ही करें। इस प्रकार विविध उपायों से प्रभु के समक्ष जीवों
के अपराधों की स्मृति प्रभु के मन से निकाल कर प्रभु को उनके अनुकूल बनाकर उन्हें अपनाती हैं। राक्षसों को
हनुमान् से बचाने के लिए भगवती सीता ने कहा था कि कोई पापी हो, पुण्यात्मा हो, चाहे वध के योग्य भी क्यों न
हो बड़ों को ऐसे जीवों पर भी कृपा ही करनी चाहिये, क्योंकि निरपराध कोई है नहीं—
"पापानां वाशुभानां वा वधार्हाणामथापि वा।
कार्यं कारुण्यमार्येण न कश्चिन्नापराध्यति ॥" (वा० रा० ६।११३।४५)
किं बहुना श्रीसीता और राम दोनों अत्यन्त अभिन्न होते हुए भी भगवान् की भक्ति, सेवा या आराधना
का आदर्श स्थापन करने और भक्तों को रसास्वादन कराने तथा स्वयं भक्ति, प्रेम एवं माधुर्य रस का आस्वादन करने
के लिए दो रूपों में प्रकट होते हैं। 'श्रिञ्' सेवायाम् धातु से 'श्रीशब्द' निष्पन्न होता है। उसके अनुरूप श्रीहरि की
सेवा करनेवाली श्री है। श्रयते हरि या सा श्रीः। चाहनेवालों से निरपेक्ष होकर श्री ने परमनिरपेक्ष हरि का वरण
किया था। सब देवता लोग श्री को चाहते थे, परन्तु हरि अत्यन्त निरपेक्ष थे। फिर भी सापेक्ष अन्य देवों का वरण
न करके निरपेक्ष हरि को ही श्री ने अपनाया। उनके इस लोकोत्तर गुण से श्रीहरि ने प्रसन्न होकर श्री को हृदय
(वक्षःस्थल) पर आवासस्थान देकर उन्हें अपने हृदय की अधीश्वरी बना लिया। इससे समस्त गुण श्री की
आराधना करने लगे। श्रीयते सर्वैर्गुणैर्य्या सा श्रीः। जो सब गुणों से सेवित हैं वही श्री हैं। अन्त में स्वयं हरि
भी उनकी उपासना करने लगे। श्रीयते हरिणापि या सा श्रीः। आह्लादिनीसारसर्वस्व भक्तिस्वरूपा भगवती
ही सर्वसेव्या हैं।
विष्णुपुराण के अनुसार जैसे विष्णु सर्वगत हैं वैसे ही उनकी अनपायिनी नित्या शक्ति भी सर्वगत एवं
नित्य ही हैं एवं विष्णु अर्थ हैं तो लक्ष्मी वाणी हैं, भगवती नीति हैं तो भगवान् नय हैं, विष्णु बोध हैं तो लक्ष्मी

६६२ रामायणमीमांसा विंश
बुद्धि है। भगवान् धर्म हैं तो भगवती सत्क्रिया हैं। किं बहुना देव, तिर्यक्, मनुष्य आदि में पुंनाम से प्रसिद्ध सब विष्णु
हैं एवं स्त्रीनाम से वाच्य सब श्री हैं—
“नित्यैवैषा जगन्माता विष्णोः श्रीरनपायिनी ।
यथा सर्वगतो विष्णुस्तथैवेयं द्विजोत्तम ॥
अर्थो विष्णुरियं वाणी नीतिरेषा नयो हरिः ।
बोधो विष्णुरियं बुद्धिर्धर्मोऽसौ सत्क्रिया त्वियम् ।।
देवतिर्यङ्मनुष्यादौ पुंनामा भगवान् हरिः ।
स्त्रीनाम्नी श्रीश्च विज्ञेया नानयोर्विद्यते परम् ।।” (वि० पु० १।८।१७-१९)
इन्द्र ने स्तुति करते हुए कहा था कि आप सब लोकों की माता हैं और देवाधिदेव विष्णु सब लोकों के
पिता हैं। यह सम्पूर्ण जगत् विष्णु एवं आप के द्वारा व्याप्त है—
त्वं माता सर्वलोकानां देवदेवो हरिः पिता ।
त्वयैतद्विष्णुना चाम्ब जगद् व्याप्तं चराचरम् ॥ (वि० पु० १।९।१२६)
“विप्राः प्राहुस्तथा चैतद् यो भर्ता सा स्मृताऽङ्गना ।” (मनु० ९।४५)
के अनुसार भी परब्रह्म एवं परब्रह्ममहिषी का अभेद ही है।
“राघवत्वेऽभवत् सीता रुक्मिणी कृष्णजन्मनि ।
एवं यदा जगत्स्वामी देवदेवो जनार्दनः ।।
अवतारं करोत्येषा तदा श्रीस्तत्सहायिनी ।
अन्येषु चावतारेषु विष्णोरेषानपायिनी ॥
देवत्वे देवदेहेयं मनुष्यत्वे च मानुषी ।
विष्णोर्देहानुरूपा सा करोत्येवात्मनस्तनुम् ।।”(वि० पु० १।९।१४२-१४५)
महालक्ष्मी ही विष्णु के राघव हो जाने पर सीता बन जाती हैं। कृष्ण होने पर रुक्मिणी बन जाती हैं।
जगत्स्वामी विष्णु जब जब अवतार धारण करते हैं, महालक्ष्मी उनकी सहायिनी बन कर प्रकट होती हैं। अन्य अव-
तारों में भी विष्णु के अनुरूप वे बन जाती हैं। मनुष्य बनने पर मानुषी बन जाती हैं। सर्वथापि विष्णु के अनुरूप
ही अपना स्वरूप बना लेती हैं ।
“कमलेयं जगन्माता लीलामानुषविग्रहा ।
देवत्वे देवदेहेयं मनुष्यत्वे च मानुषी ।।
विष्णोर्देहानुरूपां वै करोत्येषाऽऽत्मनस्तनुम् ।”
(स्कन्दपु० ब्राह्मख० सेतुमाहात्म्य २२।१६, १७ )
सीता मानुषविग्रहधारिणी कमला ही हैं। जब भगवान् देवरूप में होते हैं तब उनके अनुरूप ही देवदेहा
महालक्ष्मीरूप में व्यक्त होती हैं ।
“अनन्या हि मया सीता भास्करस्य प्रभा यथा ।” (वा० रा० ५।११।१६)
राम और सीता दोनों ने स्वीकार किया है कि सीता राम से वैसे ही अनन्य हैं जैसे भास्कर से उसकी
प्रभा अभिन्न होती है—
“अनन्या राघवेणाहं भास्करेण प्रभा यथा ।” (वा० रा० ५।२१।१६)

अध्याय रामचरितसिंहावलोकन ६६३
भगवान् शङ्कराचार्य ने 'स्मर्यतेऽपि च लोके' (३।१।१९) इस ब्रह्मसूत्र पर व्याख्या करते हुए शारीरिक-
भाष्य में कहा है—सीता, द्रौपदी तथा धृष्टद्युम्न बिना माता-पिता के ही उत्पन्न हुए थे । सर्वसाधारण की उत्पत्ति द्यौ,
पर्जन्य, पृथ्वी, पुरुष एवं योषित् क्रमशः पाँच अग्नियों के द्वारा होती है । परन्तु द्रोणाचार्य बिना माता के चार
अग्नियों से ही उत्पन्न हुए थे । सीता, द्रौपदी आदि माता और पिता दोनों के सम्बन्ध बिना तीन अग्नियों से ही
उद्भूत हुई थीं—
"द्रोणधृष्टद्युम्नप्रभृतीनां सीताद्रौपदीप्रभृतीनां चायोनिजत्वम् । तत्र द्रोणादीनां योषिद्विषये-
काहुतिर्नास्ति । धृष्टद्युम्नादीनान्तु योषित्पुरुषविषये द्वे अप्याहुती न स्तः ।" (शा० भा०)
वाल्मीकिरामायण में सीता ने अपने अयोनिज होने की चर्चा की है—
“अयोनिजां हि मां ज्ञात्वा नाध्यगच्छत् स चिन्तयन् ।
सदृशं चाभिरूपं च महीपालः पतिं मम ।।” (वा० रा० २।११८।३७)
मुझे अयोनिज जानकर मेरे अनुरूप पति न पाकर राजा चिन्तित हुए । यद्यपि कुछ लोगों के अनुसार—
“धन्या प्रिया द्वितीया तु योगिनी जनकस्य तु ।
तस्याः कन्या महालक्ष्मीः सीता नाम्ना भविष्यति ।”
इस शिवपुराण-वचन के अनुसार सीता जनक की धन्या नाम्नी योगिनी पत्नी के गर्भ से उत्पन्न हुईं ।
तथापि उक्त वचन में भी गर्भ से उत्पन्न होने की बात सिद्ध नहीं होती । अतः धन्या ने हलाग्र उत्पन्न अयोनिजा कन्या
का ही ममत्वातिशय से पालन किया था । इसी लिए उसकी महालक्ष्मी सीताविशेष पुत्री कहलायी । यदि कहीं वैसा
पाठ हो तो उसे कल्पान्तरीय कथा का समझना चाहिये । कूर्मपुराण के अनुसार यह भी विदित होता है कि सीता की
आराधना से अग्नि ने छायामयी सीता का निर्माण किया था । अतः रावण द्वारा हरण उसी का हुआ था, लङ्का की
अग्निपरीक्षा के पश्चात् पुनः स्वाभाविक अग्निपुरनिवासिनी सीता का अग्नि के द्वारा पुनः प्राकट्य हुआ था ।
“सीताराधितो वह्निश्च्छायासीतामजीजनत् ।
तां जहार दशग्रीवो सीता वह्निपुरं गता ।।
परीक्षासमये वह्नि छायासीता विवेश सा ।
वह्निः सीतां समानीय स्वपुरादुदनीनयत् ॥
(कूर्मपुराणीयं चैतन्यचरितामृतधृतं वचनम् २।९।१८७)
तुम पावक महु करहु निवासा। जब लगि करौं निसाचर नासां ।। (रा० मा० ३।२३।१)
एतावता सीता का अयोनिजा होना भक्तों की कल्पनामात्र है, बुल्के का यह कहना निर्मूल है । काशीकेदार-
माहात्म्य ( ब्रह्मवैवर्त खिल० ) आदि ग्रन्थों में सीता की लक्ष्मीरूपता तथा राम की विष्णुरूपता कही गयी है—
“विष्णोः पत्न्यौ धरालक्ष्म्यौ धराजाता हि जानकी ।
धर्मतः सा सुता विष्णोस्तामगृह्णाद् हरिः पुनः ।।
कौशल्यातनयो जातस्तत्र दोषोऽस्ति को वद ।” ( काशीके० मा० १२।४७,४८ )
माधवी ( पृथ्वी ) और लक्ष्मी दोनों ही विष्णु की पत्नियां हैं । जानकी भूमिजा भूमिपुत्री है, इस दृष्टि
से सीता विष्णु की पुत्री होती हैं । विष्णु कौशल्यानन्दवर्धन रामरूप धारण कर जानकीपति हो गये । देवताओं में भी
ऐसी ही स्थिति है । भिन्न क्षेत्रों में उत्पन्न होने से दाम्पत्य हो जाता है । ब्रह्मा की जिह्वा से उत्पन्न सरस्वती पार्वती
से उत्पन्न होकर ब्रह्मा की पत्नी हो सकी थी !

६६४ रामायणमीमांसा विश
स्वाध्यायोऽध्येतव्यः । अग्निहोत्रं जुहुयात् । दर्शपूर्णमासाभ्यां यजेत । सोमेन यजेत । अश्वमेधेन
यजेत । ऋतं च स्वाध्यायप्रवचने च सत्यं च तपश्च दमश्च शमश्च । सत्यं वद । धर्मं चर । स्वाध्यायान्मा
प्रमदः । आचार्याय प्रियं धनमाहृत्य प्रजातन्तुं मा व्यवच्छेत्सीः । सत्यान्न प्रमदितव्यम् । कुशलान्न
प्रमदितव्यम् । भूत्यै न प्रमदितव्यम् । स्वाध्यायप्रवचनाभ्यां न प्रमदितव्यम् । देवपितृकार्याभ्यां न प्रमदित-
व्यम् । मातृदेवो भव । पितृदेवो भव । आचार्यदेवो भव । अतिथिदेवो भव । यान्यनवद्यानि कर्माणि
तानि त्वया सेवितव्यानि नो इतराणि । यान्यस्माकं सुचरितानि तानि त्वयोपास्यानि ।” ( तैत्ति० आ०
१।९।११।१,२ )
“सहृदयं सांमनस्यमविद्वेषं कृणोमि वः ।
अन्यो अन्यमभि हर्यत वत्सं जातमिवाघ्न्या ॥
अनुव्रतः पितुः पुत्रो मात्रा भरतु संमनाः ।
जाया पत्ये मधुमतीं वाचं वदतु शान्तिवाम् ॥
मा भ्राता भ्रातरं द्विक्षन्मा स्वसारमुत स्वसा ।
सम्यञ्चः सव्रता भूत्वा वाचं वदत भद्रया ॥
ज्यायस्वन्तश्चित्तिनो मा वियोष्ट संराध्यन्तः मधुराश्चरन्तः ।
अन्यो अन्यस्मै वल्गु वदन्त एत सध्रीचीनान् वः संमनसस्कृणोमि ॥
समानी प्रपा सह वोन्नभागाः समाने योक्त्रे सह वो युनज्मि ।
सम्यञ्चोऽग्निं सपर्यतारा नाभिमिवाभितः ॥” ( अथ० सं० ३।१२,३,५,६ )
स्वाध्यायपदवाच्य सकल वेदराशि का अध्ययन करना । अग्निहोत्र करना । दर्श, पूर्णमास, ज्योतिष्टोम,
अश्वमेध आदि यज्ञ करना । सूनृता वाणी बोलना । स्वाध्याय तथा प्रवचन में संलग्न रहना । सत्य भाषण, तप, दम,
शम और स्वाध्याय आदि करना । सत्य बोलना । धर्म का आचरण करना । स्वाध्याय में प्रमाद न करना । आचार्य
को अभीष्ट दक्षिणा प्रदान कर के समावर्तन संस्कार कर गृहस्थ होकर प्रजातन्तु का व्यवच्छेद न करना, सत्य से, धर्म
से, शुभ कर्म से तथा ऐश्वर्यप्राप्ति से प्रमाद न करना । माता को देवता मानना, पिता को देवता मानना, आचार्य को
देवता मानना, अतिथि को देवता मानना, निर्दोष कर्म करना । सदोष कर्म से बचना । आचार्य जनों के सुचरितों
का अनुवर्तन करना ।
सांमनस्य सूक्तों द्वारा सबसे सहृदयता, सांमनस्य एवं अविद्वेष स्थापित करके परस्पर ऐसा प्रेम बढ़ाया
जाता है जैसे गौ अपने नवजात बछड़े में प्रेम करती है । पुत्र पिता के प्रति अनुवर्ती हो, माता के प्रति भक्तिमान् हो,
जाया पति के साथ मधुर तथा शान्तियुक्त वाणी बोले । भाई भाई से विद्वेष न करे, बहन बहन से द्वेष न करे । सभी
पवित्र व्रत धारण करके एक दूसरे से भद्रबुद्धि से व्यवहार करें । बड़ों के प्रति उत्तम विचार रखो । परस्पर विलग मत
होओ । सम्यक् कर्म करते हुए अग्रणी बनो । परस्पर मधुर भाषण करो । हम सबको सांमनस्य करते हैं । तुम लोगों
की प्रपा एवं अन्नभाग समान हो । हम समान सूत्र में तुम सबको संबन्धित करते हैं । तुम लोग सम्यक् प्रकार से
अग्नि तथा ज्योतिर्मय ब्रह्म की पूजा करो । जैसे रथचक्र की नाभि का आश्रयण अर करते हैं वैसे ही सब उस
परमेश्वर का आश्रयण करें ।
उक्त तथा अनुक्त सभी धर्म राम में परिलक्षित होते हैं । राम ने कहा था कि सत्य ही ईश्वर है । सत्य
में ही धर्म स्थित है । दत्त, इष्ट, हुत, तप सब सत्यमूलक ही हैं—
‘सत्यमेवेश्वरः’, ‘सत्ये धर्मः सदा स्थितः ।' ( वा० रा० २।१०९।१३ )

अध्याय रामचरितसिंहावलोकन ६६५
राम ने कहा था कि पिता के वचन से मैं पावक में प्रविष्ट हो सकता हूँ, समुद्र में गिर सकता हूँ। चन्द्रमा
से उसकी लक्ष्मी (शोभा) भले पृथक् हो जाय, हिमवान् हिमरहित हो जाय एवं समुद्र मर्यादा भले छोड़ दे, पर मैं
पिता की आज्ञा नहीं टाल सकता—
‘लक्ष्मीश्चन्द्रादपेयाद्वा हिमवान् वा हिमं त्यजेत् ।
अतीयात् सागरो वेलां न प्रतिज्ञामहं पितुः ॥” (वा० रा० २।११२।१८)
कैकेयी भी मानती हैं कि राम कौशल्या से अधिक मेरा मान करते हैं—
"कौशल्यातोऽतिरिक्तञ्च मम शुश्रूषते बहु ।"
अन्य माताओं ने भी अनुभव किया था कि राम झूठा कलङ्क लगाने पर भी क्रोध नहीं करते और स्वयं
क्रोध करानेवाली बातें नहीं करते। क्रुद्ध लोगों को भी प्रसन्न कर लेनेवाले तथा दूसरों के दुःख में समान दुःखवाले
राम अब कहाँ चले जा रहे हैं। महातेजा राम जैसे कौशल्या में भक्ति रखते हैं वैसे ही हम सब में भी भक्ति रखते हैं।
"न क्रुध्यत्यभिशस्तोऽपि क्रोधनीयानि वर्जयन् ।
क्रुद्धान् प्रसादयन् सर्वान् समदुःखः क्व गच्छति ॥
कौशल्यायां महातेजा यथा मातरि वर्तते ।
तथा यो वर्त्ततेऽस्मासु महात्मा क्व नु गच्छति ॥” (वा० रा० २।४१।३,४)
भाइयों के प्रति राम ने कहा था—लक्ष्मण, मैं प्रतिज्ञापूर्वक कहता हूँ कि मैं धर्म, अर्थ, काम और पृथ्वी
का राज्य तुम भाइयों के लिए चाहता हूँ। भ्राताओं के संग्रहार्थ एवं सुखार्थ ही मैं राज्य भी चाहता हूँ। यह मैं आयु-
धका स्पर्श कर सत्य कहता हूँ। बिना भरत के, बिना तुम्हारे और बिना शत्रुघ्न के जो भी सुख हो अग्निदेव उसे
जला कर भस्म कर दें—
“धर्ममर्थं च कामञ्च पृथिवीं चापि लक्ष्मण ।
इच्छामि भवतामर्थे एतत् प्रतिशृणोमि ते ॥
भ्रातॄणां संग्रहार्थं च सुखार्थं चापि लक्ष्मण ।
राज्यमप्यहमिच्छामि सत्येनायुधमालभे ॥
यद् विना भरतं त्वां वा शत्रुघ्नं वापि मानद ।
भवेन्मम सुखं किञ्चिद् भस्म तत्कुरुतां शिखी ॥” (वा० रा० २।९७।५-८)
विभीषण ने लङ्का-विजय के बाद राम से अनुरोध किया कि लङ्का में कुछ समय रह कर मेरा आतिथ्य
ग्रहण करके तब अयोध्या के लिए प्रस्थान किया जाय। इसपर शीलसिन्धु राम ने कहा कि मैं तुम्हारी बात न मानूं
यह सर्वथा असंभव है। परन्तु मेरा मन उस भाई भरत के लिए त्वरावान् हो रहा है, जिसने चित्रकूट तक आकर
मुझे लौटाने के लिए बहुत प्रार्थना की थी, किन्तु मैंने उसे स्वीकार नहीं किया था—
“न खल्वेतान्न कुर्यां ते वचनं राक्षसेश्वर ।
तं तु मे भ्रातरं द्रष्टुं भरतं त्वरते मनः ॥” (वा० रा० २।१२३।१८)
रामने बहुजनहिताय बहुजनसुखाय नहीं, किन्तु सर्वजनसुखाय सर्वजनहिताय अपनी प्राणेश्वरी स्वात्मभूता
जनकनन्दिनी जानकी को वनवास देकर भाईभतीजावाद या कुनबापरस्ती का स्पर्श नहीं होने दिया। सीताजी की
निन्दा करनेवाले का भी अघौघ नष्ट कर उसे भी बसाया—
"सिय निन्दक अघ ओघ नसाये। लोक विशोक बनाइ बसाये ॥”

६६६ रामायणमीमांसा विंश
देवताओं, वानरों और भालुओं के समक्ष होनेवाली अग्निपरीक्षा द्वारा सीताशुद्धि का प्रचार स्वयं न
कर के उसकी जिम्मेदारी अन्भक्ष, वायुभक्ष, वल्कलवसनधारी महर्षियों पर डालकर स्वयं कर्त्तव्य-पालन में ही व्यस्त
रहे और यह प्रतिज्ञा चरितार्थ कर दिखायी कि स्नेह, दया, सुख, राज्य आदि तथा जानकी को भी लोकरञ्जन के
लिए त्यागने में मुझे व्यथा नहीं होगी—
“स्नेहं दयांश्च सौख्यञ्च यदि वा जानकीमपि ।
आराधनाय लोकस्य मुञ्चतो नास्ति मे व्यथा ।।” ( उ० रा० च० )
इतने पर भी माधुर्य सारसर्वस्व की अधिष्ठात्री सीता के प्रति अखण्ड प्रेम ज्यों का त्यों बना ही रहा ।
राम की हृदयसिंहासनाधीश्वरी सीता ही रहीं। कुन्दमालाकार ने कितने सुन्दर शब्दों में राम के भावों का चित्रण
किया है—
“त्वं देवि चित्तनिहिता गृहदेवता मे
स्वप्नागता शयनमध्यसखी त्वमेव ।
दारान्तरग्रहणनिःस्पृहमानसस्य
यागे तव प्रतिकृतिर्मम धर्मपत्नी ॥” ( कुन्दमाला १।१४ )
हे देवि, तुम मेरे चित्त की अधिष्ठात्री गृहलक्ष्मी हो । स्वप्न में भी एकमात्र तुम्हीं मेरे शयन की सखी हो ।
मेरे मन में दूसरी पत्नी का ग्रहण करने की किञ्चिन्मात्र भी स्पृहा नहीं है। तुम्हारी सुवर्णमयी प्रतिमा ही यज्ञ में
मेरी धर्मपत्नी है ।
राम ने अपने सौशील्य से वानर एवं भालुओं को अपना सखा स्वीकार किया । और उनका परिचय
देते हुए अपने गुरु वसिष्ठ से कहा कि ये सब मेरे सखा हैं । समरसागर में इन्होंने बेड़े का काम किया है। मेरे हित
के लिए इन्होंने अपना जन्म ही लगा दिया है । ये भरत से भी अधिक मेरे प्रिय हैं—
“ये सब सखा सुनिय मुनि मेरे ।
भये समर सागर मह बेरे ॥ ( रा० मा० ७।७।४ )
राम ने वानरों को गुरु वसिष्ठजी का परिचय देकर प्रणाम करने को कहा—
“गुरु वसिष्ठ कुलपूज्य हमारे ।
इनकी कृपा दनुज रन मारे ॥” ( रा० मा० ७।७।३ )
मित्रता के लिए यह राम का आदर्श वाक्य है—
“जे न मित्र दुख होहिं दुखारी ।
तिनहिं विलोकत पातक भारी ॥” ( रा० मा० ४।६।१ )
आढ्य हो या दरिद्र हो, निर्दोष हो अथवा सदोष हो मित्र के लिए वही परम गति है—
“आढ्यो वापि दरिद्रो वा दुःखितः सुखितोऽपि वा ।
निर्दोषश्च सदोषश्च वयस्यः परमा गतिः ॥” ( वा० रा० ४।८।८ )
शरण में आये हुए को राम ने त्यागने में महान् दोष देखा है—
“शरणागत कहँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि ।
ते नर पामर पापमय तिन्हहि विलोकत हानि ॥ ( रा० मा० ५।४३ )

अध्याय रामचरितसिंहावलोकन ६६७
राम सदा प्रशान्तात्मा और मृदुता के साथ बोलते थे । कोई रूक्षता या कठोरता से बोलता था तो भी
वे उससे कठोर नही बोलते थे । वे भूल में भी किये गये एक उपकार से भी तुष्ट हो जाते थे । परन्तु सैकड़ों
अपकारों को वे स्मरण भी नहीं करते थे, क्योंकि आत्मवान् थे । वे बुद्धिमान्, मधुरभाषी और पहले ही बोलते थे ।
वीर्यवान् थे, परन्तु अपने वीर्य से गर्व का अनुभव नहीं करते थे—
“सदा नित्यं प्रशान्तात्मा मृदुपूर्वं प्रभाषते ।
उच्यमानोऽपि परुषं नोत्तरं प्रतिपद्यते ॥
कदाचिदुपकारेण कृतेनैकेन तुष्यति ।
न स्मरत्यपकाराणां शतमप्यात्मवत्तया ॥
बुद्धिमान् मधुराभाषी पूर्वभाषी प्रियंवदः ।
वीर्यवान् न च वीर्येण महता स्वेन विस्मितः ।।” (वा० रा० २।१।१०-१३)
राम कोई बात दो बार नहीं करते थे, जो कह दिया वह कह दिया । वह पाषाणरेखा के तुल्य अमिट
होता था । राम यद्यपि अङ्गुल्यग्रमात्र से संसार के सभी दानवों, यक्षों, गन्धर्वों तथा राक्षसों को मार सकते हैं—
“पृथिव्यां दानवान् सर्वान् पिशाचान् गुह्यकांस्तथा ।
अङ्गुल्यग्रेण तान् हन्यामिच्छन् हरिगणेश्वर ॥” ( वा० रा० ६।१८।२३ )
फिर क्या शत्रु-वध में वानर और भालुओं की सहायता अपेक्षित थी—
“किं तस्य शत्रुहनने कपयः सहायाः ।”
फिर भी राम की कृतज्ञता उदारता देखते ही बनती है । आप हनुमान् से कहते हैं, जो तुमने मेरे साथ
उपकार किया है उसका बदला मैं चुका नहीं सकता। यदि एक एक उपकार के बदले मैं प्राणों को भी समर्पण कर
दूँ तो भी तुम्हारे बहुत उपकार शेष ही रहेंगे । उनके लिए मैं सदा ही ऋणी रहूँगा । फिर भी मैं चाहता हूँ कि
वे ऋण मेरे अन्दर ही जीर्ण हो जायें मेरे लिए उनके बदले प्रत्युपकार करने का अवसर ही न आये । क्योंकि प्राणी
विपत्ति में ही प्रत्युपकार का पात्र बनता है। राम कभी यह नहीं चाहते हैं कि [कभी हनुमान् पर विपत्ति आये और
उस समय राम को उपकार के बदले में प्रत्युपकार करने का अवसर आये—
“एकैकस्योपकारस्य प्राणान् दास्यामि ते कपे ।
शेषस्योपकाराणां भवाम ऋणिनो वयम् ॥
मदङ्गे जीर्णतां यातु यत् त्वयोपकृतं कपे ।
नरः प्रत्युपकाराणां आपत्स्वायाति पात्रताम् ॥” (वा० रा० ७।४०।२३, २४)
“रामरावणयोर्युद्धं रामरावणयोरिव ।”
राम का पराक्रम दुर्धर्ष है । वैसे तो अनन्त ब्रह्माण्ड का उत्पादन, पालन तथा संहरण सबसे बड़ा पराक्रम
है ही । व्यवहार में भी राम और रावण के संग्राम की दूसरी उपमा नहीं है—
आरम्भिक युद्धों में रावण ने घोर संग्राम में लक्ष्मण को शक्ति से आहत करके विभिन्न वीरों को आहत
कर क्षत-विक्षत कर दिया । राम ने अपने तीक्ष्ण बाणों से धनुष तथा किरीट को ध्वस्त कर रावण को दयनीय
बनाकर अनुकम्पा दिखाते हुए कहा कि तुमने महाभीम कर्म किया है । तुमने हमारे बड़े-बड़े योद्धाओं को मार दिया
है। फिर भी तुम परिश्रान्त हो, इसलिए मैं इस समय तुम्हें नहीं मारता हूँ। जाओ लङ्का में विश्राम करो, रथी और
धन्वी होकर आओ, फिर मेरा बल देखना ।

६६८ रामायणमीमांसा विंश
राम के गुण तथा स्वभाव
“वज्रादपि कठोराणि मृदूनि कुसुमादपि ।
लोकोत्तराणां चेतांसि को हि विज्ञातुमर्हति ॥” ( उ० रा० च० )
उत्तररामचरित के अनुसार लोकोत्तर ईश्वरों के चरित वज्र से भी कठोर एवं कुसुम से भी कोमल होते
हैं । उन्हें कौन जान सकता है ।
‘अप्यहं जीवितं जह्यां त्वां वा सीते सलक्ष्मणाम् ।
न तु प्रतिज्ञां संश्रुत्य ब्राह्मणेभ्यो विशेषतः॥” (वा० रा० ३।१०।१८,१९)
राम कहते हैं—सीते, मैं लक्ष्मण और तुमको भी त्याग सकता हूँ, परन्तु मैं प्रतिज्ञा का, विशेषतः ब्राह्मणों
के प्रति की गयी प्रतिज्ञा का, त्याग नहीं कर सकता हूँ ।
“दद्यान्न प्रतिगृह्णीयात् सत्यं ब्रूयान्न चानृतम् ।
अपि जीवितहेतोर्वा रामः सत्यपराक्रमः ॥” ( वा० रा० ५।३३।२५ )
सत्यपराक्रमी राम देते ही हैं, प्रतिग्रह नहीं करते हैं । सत्य ही बोलते हैं, अनृत नहीं बोलते हैं ।
“नास्य क्रोधः प्रसादश्च निरर्थोऽस्ति कदाचन ।
हन्त्येष नियमाद् वध्यानवध्येषु न कुप्यति ॥” ( वा० रा० १।१।४५,४९ )
राम के क्रोध और प्रसाद निरर्थक नहीं होते अर्थात् उनके क्रोध और प्रसाद अमोघ हैं । वे वध्य व्यक्ति
का अवश्य वध करते हैं और निर्दोष अवध्य के प्रति कभी भी कुपित नहीं होते हैं ।
“धर्मे तत्परता मुखे मधुरता दाने समुत्साहता
मित्रेऽवञ्चकता गुरौ विनयिता चित्तेऽतिगम्भीरता ।
आचारे शुचिता गुणे रसिकता शास्त्रेऽतिविज्ञानता
रूपे सुन्दरता हरौ भजनिता चैते गुणा राघवे ॥” ( चाणक्य १२।१५ )
राम की धर्म में तत्परता एवं मुख में मधुरता स्तुत्य थी । दान में उनका समुत्साह तथा मित्र के प्रति
अवञ्चकता भी लोकोत्तर थी । गुरु के प्रति वे विनयी थे । उनके चित्त में गम्भीरता, आचार में पवित्रता, गुणों में
रुचि, शास्त्रों में अभिज्ञता, रूप में सुन्दरता एवं हरि में भक्ति भी अत्यन्त उत्कृष्ट था । इसी लिए ऋषियों की दृष्टि में
राम से भिन्न कोई काव्यों के यश का भाजन हो ही नहीं सकता—
“नह्यन्योऽर्हति काव्यानां यशोभाग् राघवादृते ।”
“आनृशंस्यमनुक्रोशः श्रुतं शीलं दमः शमः ।
राघवं शोभयन्त्येते षड्गुणाः पुरुषर्षभम् ॥” ( वा० रा० २।३३।१२ )
मृदुता, करुणा, श्रुत (परम्परा से वेदादि शास्त्रों का ज्ञान), शील, इन्द्रिय-निग्रह तथा मनोनिग्रह ये छः गुण
राघवेन्द्र राम को शोभित करते हैं ।
शोभा, कान्ति, छवि, वर्ण, लक्षण, लावण्य, आभिजात्य, सौभाग्य, राग आदि रूप के सभी भेद राम के
सम्बन्ध से ही शोभित होते हैं ।
“रूपं वर्णः प्रभा राग आभिजात्यं विलासिता ।
लावण्यं लक्षणं छाया सौभाग्यं चेत्यमी गुणाः ॥”

“अवयवानां रेखास्पाष्ट्यं रूपम्, गौरत्वादिधर्मविशेषो वर्णः, चाकचिक्यरूपा कान्तिः प्रभा,
नैसर्गिकस्मेरत्वादिः सर्वेषां चक्षुर्बन्धको रागः, कुसुमधर्मा मार्दवादिस्पर्शविशेष आभिजात्यम्, कटाक्षादिः
विलासः, तरलता लावण्यम् ।”
अङ्गों की रेखाओं की स्पष्टता रूप है, गौरत्वादि धर्मविशेष वर्ण है, चाकचिक्यादि कान्ति प्रभा है, चक्षुओं
को बाँधनेवाला स्मितमुखत्वादि ही राग है, कुसुम के समान कोमल स्पर्शविशेष आभिजात्य है, कटाक्षादि विलास है
एवं तरलता लावण्य है ।
गर्भिणी स्त्री जैसे गर्भस्थ शिशु की हित-दृष्टि से ही सब कार्य करती है वैसे ही राजा की सम्पूर्ण चेष्टाएँ
प्रजाहित की दृष्टि से ही होती हैं । फिर लोकदृष्टि से कुछ असम्मत भी क्यों न हो। ताटका (ताड़का) के मारने में
राम को स्त्रीवध के सम्बन्ध में अधिक संकोच था । तभी विश्वामित्र ने कहा था—
“नहि ते स्त्रीवधकृते घृणा कार्या नरोत्तम ।
चातुर्वर्ण्यहितार्थं हि कर्तव्यं राजसूनुना ॥
नृशंसमनृशंसं वा प्रजारक्षणकारणात् ।
पातकं वा सदोषं वा कर्तव्यं रक्षता सदा ॥” (वा० रा० १।२६।१७,१८)
तुम्हें स्त्रीवध के लिए घृणा नहीं करनी चाहिये, क्योंकि चातुर्वर्ण्य के रक्षण के लिए राजपुत्र को ऐसी
आततायी स्त्री का भी वध करना चाहिये । प्रजारक्षणार्थ राजा को नृशंस, अनृशंस, क्रूर, अक्रूर, पातकयुक्त, सदोष
सब कुछ करना पड़ सकता है । जैसे हाथी के पैर में सबका पैर आ जाता है वैसे ही राजधर्म में सब धर्म आ जाते
हैं । प्रजा एवं प्रजाकल्याणकारी वर्णाश्रमधर्म की रक्षा करना राजा का प्रधान कर्म है । और सब धर्मकर्म उसके ही
अङ्गोपाङ्ग हैं । प्रधान के अविरुद्ध ही अन्य धर्मों का महत्त्व है । रामचन्द्र परम ब्रह्मण्य थे । वाल्मीकिरामायण में
उन्हें ब्राह्मणों का उपासक कहा गया है—‘‘ब्राह्मणानामुपासिता’’ फिर भी ब्राह्मण द्वारा आहत निरपराध श्वान को
न्याय देने का जब प्रश्न आया तब राम को न्याय का ही पक्ष लेना पड़ा, क्योंकि उनकी दृष्टि में न्याय सबसे बड़ा था ।
इसी तरह २१ बार पृथ्वी को निःक्षत्र करनेवाले ब्राह्मण परशुराम का उग्ररूप जब राम के क्षात्र तेज को अभिभूत
करने लगा तब राम ने बड़ी बुद्धिमानी से अपनी ब्रह्मण्यता की रक्षा करते हुए क्षात्र धर्म की भी रक्षा की ओर कहा—
“वीर्यहीनमिवाशक्तं क्षत्रधर्मेण भार्गव ।
अवजानासि मे तेजः पश्य मेऽद्य पराक्रमम् ॥” ( वा० रा० १।७६।३ )
“ब्राह्मणोऽसीति पूज्यो मे विश्वामित्र कृतेन च ।
तस्माच्छक्तो न ते राम मोक्तुं प्राणहरं शरम् ॥
इमां वा त्वद्गतिं राम तपोबलसमर्जितान् ।
लोकानप्रतिमान् वापि हनिष्यामीति मे मतिः ॥” ( वा० रा० १।७६।६,७ )
भार्गव ! क्षात्रधर्मयुक्त होने पर भी मुझे आपने वीर्यहीन एवं असमर्थ समझकर क्षात्रतेज का अपमान किया
है, अतः अब आप मेरा पराक्रम देखिये । यह कहकर राम ने उनसे धनुष लेकर क्षण में उसे चढ़ाकर कहा—आप
ब्राह्मण होने से मेरे पूज्य हैं और विश्वामित्र की भगिनी सत्यवती के पौत्र हैं, इसलिए मैं आपके लिए प्राणहर बाण
छोड़ नहीं सकता, किन्तु आपकी दिव्यगति अथवा तपोबल से अर्जित लोकों को नष्ट करूँगा ।
किन्तु जहाँ धर्मोल्लङ्घन का प्रश्न राम के सामने आया वहाँ राम ने जैसे धर्मविमुख शम्बूक शूद्र का वध
कर ब्राह्मण शिशु को पुनर्जीवित किया वैसे ही धर्मविमुख ब्राह्मण रावण का वध कर सम्पूर्ण मानवता को जीवन
प्रदान किया ।

माता-पिता की आज्ञा के पालन के प्रसङ्ग में श्रीराम ने अखण्ड भूमण्डल के राज्य को तृणवत् त्यागकर
सहर्ष वनवास स्वीकार किया । बड़े आदरणीय कुलपूज्य महर्षि जाबालि से भी जब राम को लौटाने की दृष्टि से ही
उनके द्वारा कही गयी वेदशास्त्रविरुद्ध माता-पिता के श्राद्ध, तर्पण, यज्ञ, होम तथा परलोक के अपलाप से युक्त
नास्तिकता की बातें सुनीं तो राम क्षुब्ध हो उठे और उनके कथन का युक्तियुक्त खण्डन करके यहाँ तक कह दिया कि
इस प्रकार की बुद्धि से व्यवहार करनेवाले तथा धर्म-मार्ग से हटे हुए आप जैसे नास्तिक को मेरे पिता ने याजक
बनाया था मैं उनके उस कार्य की निन्दा करता हूँ—
“निन्दाम्यहं कर्म कृतं पितुस्तद् यस्त्वामगृह्णाद्विषमस्थबुद्धिम् ।
बुद्ध्यानयैवंविधया चरन्तं सुनास्तिकं धर्मपथादपेतम् ॥”
(वा० रा० २।१०९।३३ )
अपने प्रिय लक्ष्मण ने भी जब कैकेयी की उचित निन्दा की तो राम ने स्पष्ट कह दिया—तात, मेरी
मध्यमा अम्बा कैकेयी की निन्दा मत करो, भरत की ही चर्चा करो—
“न तेऽम्बा मध्यमा तात गर्हितव्या कदाचन ।” ( वा० रा ३।१६।३९ )
यद्यपि वाली ने राम का कोई अपराध नहीं किया था तो भी सुग्रीव का अपराध करने से ही राम ने उसे
अपना ही अपराधी माना और उसके वध की प्रतिज्ञा कर ली । वाली के वध के अनेक हेतुओं में राम ने उसका भी
उल्लेख किया है—
“प्रतिज्ञा च मया दत्ता तदा वानरसन्निधौ ।
प्रतिज्ञा च कथं शक्या मद्विधेनानवेक्षितुम् ॥” ( वा० रा० ४।१८।२६ )
“धनुर्वेदविदां श्रेष्ठो लोकेऽतिरथसम्मतः ।
अभियाता प्रहर्ता च सेनानयविशारदः ॥
अप्रधृष्यश्च संग्रामे क्रुद्धैरपि सुरासुरैः ।
अनसूयो जितक्रोधो न दृप्तो न च मत्सरी ॥” (वा० रा० २।१।२९,३०)
राम धनुर्वेदविदों में सर्वश्रेष्ठ थे एवं अतिरथियों में भी उनकी धाक थी । वे शत्रु-सेना पर आक्रमण और
प्रहार करने में दक्ष और सैन्यसंचालन में विशेष निपुण थे । संग्राम में क्रुद्ध देवता एवं दानव भी उनका कुछ बिगाड़
नहीं सकते थे । इतने पर भी वे दूसरों की असूया नहीं करते थे और न ही क्रुद्ध होते थे । घमण्ड एवं परोत्कर्ष की
असहिष्णुता उनमें नहीं थी । फिर भी उनकी युद्धकुशलता और दृढ़ प्रहार शत्रुओं पर अपना इतना गहरा प्रभाव
डालते थे कि वे सदा आतंकित रहते थे । तभी तो मारीच राम से इतना प्रभावित था कि वह रत्न, रथ आदि शब्दों
के रकार को सुनकर राम समझकर भयभीत हो जाता था—
“रकारादीनि नामानि रामत्रस्तस्य रावण ।
रत्नानि च रथांश्चैव वित्रासं जनयन्ति मे ॥” (वा० रा० ३।३९।१८)
रावण के गुप्तचर भी यह अनुभव करते हैं कि राम के कुपित होने पर उन्हें कोई वश में नहीं कर सकता ।
वे सम्पूर्ण लोकों का संहार करके नये सिरे से प्रजासृष्टि करने में समर्थ हैं । सब देवगण एवं असुर मिलकर भी उनका
वध नहीं कर सकते । राम के अनुसार शत्रु भी यदि शरण में आये एवं हाथ जोड़ कर दया की याचना करे तो आनृ-
शंस्य की दृष्टि से कभी भी उसपर प्रहार नहीं करना चाहिये । आर्त्त हो या दृप्त हो यदि वह शत्रु के शरण आया
हो तो शत्रु को अपने प्राणों का त्याग कर भी उसकी रक्षा ही करनी चाहिये—

अध्याय रामचरितसिंहावलोकन ६७१
"बद्धाञ्जलिपुटं दीनं याचन्तं शरणागतम् ।
न हन्यादानृशंस्यार्थमपि शत्रुं परन्तप ॥
आर्त्तो वा यदि वा दृप्तो परेषां शरणं गतः ।
अरिः प्राणान् परित्यज्य रक्षितव्यः कृतात्मना ।।" (वा० रा० ६।१८।२७, २८)
महर्षि वसिष्ठ, विश्वामित्र तथा अगस्त्य से राम को उत्तमोत्तम शस्त्रास्त्र प्राप्त थे। वे चाहते तो उन्हें
उपयोग में लाकर अनायास ही सबका संहार कर सकते थे, किन्तु राम ने कभी भी उन शस्त्रास्त्रों का प्रयोग नहीं
किया। मेघनाद छलपूर्वक ऐसे दिव्यास्त्रों का प्रयोग कर वानरों, मनुष्यों तथा राम और लक्ष्मण दोनों को परेशान
करता था। एक बार लक्ष्मण ने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करने की आज्ञा चाही, पर राम ने कहा एक के लिए पृथ्वी भर के
अयुद्धमान, प्रच्छन्न, प्राञ्जलि, शरणागत, पलायमान, मत्त सब राक्षसों को मारना उचित नहीं है। इन्द्रजित् के
मारने के लिए मैं प्रयत्न करता हूँ—
"नैकस्य हेतो रक्षांसि पृथिव्यां हन्तुमर्हसि ।
अयुध्यमानं प्रच्छन्नं प्राञ्जलिं शरणागतम् ॥
पलायमानं मत्तं वा न हन्तुं त्वमिहार्हसि ।
तस्यैव तु वधे यत्नं करिष्यामि महाभुज ।।" (वा० रा० ६।८०।३८-४०)
उसी आदर्श के अनुसार ब्रह्मास्त्र तथा पाशुपतास्त्र रहने पर भी अर्जुन ने भारत-युद्ध में उसका प्रयोग
नहीं किया था। इसी तरह यदि आज भी परमाणु बम तथा हाइड्रोजन बम बनाया जाय तो भी कोई आपत्ति
नहीं। आवश्यकता है उसके प्रयोग पर नियन्त्रण की। शक्ति का दुरुपयोग निन्य होने पर भी सदुपयोग प्रशंसनीय
ही है।
इतना ही क्यों राम ने तो श्रान्त, विरथ तथा निःशस्त्र रावण को भी अवसर दिया कि वह स्वस्थ, रथी
और धन्वी होकर आये, तब उससे युद्ध किया जाये। तभी मारीच जैसे राक्षस ने भी राम को निर्दोष विग्रहवान् धर्म
ही बतलाया था।
"रामो विग्रहवान् धर्मः साधुः सत्यपराक्रमः । (वा० रा० ३।३७।१३)
राम धर्म के मूर्त्तिमान् रूप हैं। साधु एवं सत्यपराक्रमी हैं। रावण-वध के बाद विभीषण ने पहले शोक
व्यक्त करते हुए रावण के गुणों का वर्णन किया, परन्तु अन्त में जब उसकी अन्त्येष्टि का प्रसङ्ग आया तब उसके सीता-
हरण आदि दुष्कृत्यों का स्मरण कर के अन्त्येष्टि करना उन्होंने अस्वीकार कर दिया। तब राम ने कहा—
"मरणान्तानि वैराणि निवॄत्तं नः प्रयोजनम् ।
क्रियतामस्य संस्कारो ममाप्येष यथा तव ।।" (वा० रा० ६।११९।१००, १०१)
मरने तक ही वैर रहता है। हमारा प्रयोजन सिद्ध हो चुका है। अब यह जैसा तुम्हारा भाई है वैसा ही
मेरा भी है। तुम इसका दाह्ादि संस्कार करो। राम ने उसकी प्रशंसा भी की। रावण अधर्मी, असत्यवादी होने पर
भी संग्राम में तेजस्वी, बलवान् तथा शूरवीर रहा है। इन्द्रादि देवता भी इसे परास्त नहीं कर सके थे। इसने अनेकों
दान, यज्ञ एवं श्रेष्ठ कर्म भी किये हैं। विराध के इच्छानुसार राम ने विराध का अवटनिक्षेप ( फारसी में दफन ) कर
तथा कबन्ध के इच्छानुसार उसका दाह कर उन्हें कृतार्थ किया।
लङ्का जैसे वैभवशाली राष्ट्र को जीतकर भी राम ने उसके वैभव पर दृष्टि नहीं डाली। रावण के भाई
विभीषण को ही लङ्का सौंप दी।

६७२ रामायणमीमांसा विंश
"द्विः शरं नाभिसन्धत्ते", "रामो द्विर्नाभिभाषते ।" (वा० रा० २।१८।३०)
राम दो बार बाण नहीं चलाते और दो बार नहीं बोलते अर्थात् एक ही बाण से सब अभीष्टों की सिद्धि
हो जाती थी। श्रीभागवत ने भी कृष्ण के सुदर्शन चक्र को राम के शर से उपमित किया है। ब्राह्मण-बालकों को
लाने के लिए कृष्ण का सुदर्शन चक्र गहन अन्धकार को विदीर्ण करता ऐसे वेग से बढ़ रहा था जैसे राम के धनुष की
प्रत्यञ्चा से छूटा हुआ बाण शत्रु-सेना में प्रविष्ट होता है—
"तमः सुघोरं गहनं कृतं महद् विदारयद् भूरितरेण रोचिषा ।
मनोजवं निर्विविशे सुदर्शनं गुणच्युतो रामशरो तथा चमूः ॥" ( १०।८९।५१ )
श्रीभागवत के अनुसार एक ही बाण से राम ने रावण का वध किया था—
"एवं क्षिपन् धनुषि सन्धितमुत्ससर्ज बाणं स वज्रमिव तद्धृदयं बिभेद ।
सोऽसृग्वमन् दशमुखैर्न्यपतद्विमानाद्धा हेति जल्पति जने सुकृतोव रिक्तः ।।" (भाग० १०।८९।५१)
अर्थात् इस तरह धनुष पर सन्धान किये हुए बाण का प्रक्षेप करते हुए राम ने उस बाण से वज्रतुल्य
रावण के हृदय को छिन्न-भिन्न कर डाला। वह दसों मुखों से रुधिर वमन करता हुआ वैसे ही विमान से गिर पड़ा
जैसे सुकृतक्षय होने पर लोगों के हाहाकार के बीच सुकृती विमान में गिर पड़ता है ।
पाश्चात्यों की धारणा
पाश्चात्य विद्वानों विशेषतः यहूदी, ईसाई तथा इस्लाम मतानुयायियों के लिए अवतारवाद कठिन पड़ता
है, क्योंकि उनके मतानुसार पुरुष मनुष्य को छोड़कर स्त्री आदि किसी प्राणी में आत्मा नहीं होती ।
उनके अनुसार वृक्ष, लता आदि भी आत्मविहीन हैं ।
मनुष्य-जन्म केवल एक ही बार होता है। इस जीवन के कर्मों के फलस्वरूप या तो अक्षय स्वर्ग या अनन्त
नरक मिलता है। सुदूर भविष्य में कभी जिब्रायल देवदूत तुरही बजायेंगे तब जितने मनुष्य हैं सबके सब कब्र से
पूर्ववत् रूप धारणकर ईश्वर के सिंहासन के सामने विचारार्थ उपस्थित होंगे। पुण्यवान् ईसाई, मुसलमान आदि दायीं
ओर तद्भिन्न हिन्दू आदि बायीं ओर खड़े होंगे । पुण्यवान् स्वर्ग जायेंगे। पापियों को दोजख की आग में झुलसना
पड़ेगा। इसी दृष्टि से देह को कफन में लपेट कर कब्र में गाड़ने की प्रथा है। अभी स्वर्ग और दोजख दोनों के द्वार
बन्द हैं या दोनों खाली पड़े हैं। इनके अनुसार स्वर्ग में देवी नहीं है। जुहोवा, गॉड या अल्लाह अकेले ही एकेश्वर हैं ।
रोमन कैथोलिक यद्यपि यीशु की कुमारी माता मेरी की उपासना करते हैं, परन्तु वह महामाया या
मूल प्रकृति नहीं है ।
निर्गुण ब्रह्म या मोक्ष भी उन मतों में नहीं है ! साधारण जीव शिव तो है ही नहीं । उसका
आत्मा नहीं है। जुहोवा, गॉड या अल्लाह देवदूतों की सहायता से पृथ्वी पर शासन चलाते हैं। ईसाइयों
के अनुसार यीशु या ख्रीष्ट ईश्वर का पुत्र है। ईश्वर, पुत्र तथा पवित्र आत्मा ये तीनों दैवी शक्तियां हैं,
जिनके ही जीव का उस मत में पुर्वजन्म नहीं होता तब फिर ईश्वर का अवतार कैसा ?
ईसाइयों के अनुसार ईश्वरपुत्ररूप यीशु मानवजाति के पाप ग्रहण करने के लिए अवतीर्ण हुए
हैं। मुसलमानों के अनुसार हजरत मुहम्मद एकमात्र पैगम्बर हैं। ईसाई-मत के अनुसार ई० पू० ४००४
अर्थात् आज से केवल ६ हजार वर्ष पूर्व ही जगत् की सृष्टि हुई थी। परन्तु आधुनिक वैज्ञानिकों के
अनुसार कोटि-कोटि वर्षों के प्राचीन प्रस्तर उपलब्ध होते हैं। समुद्र की क्षारता के आधार पर पृथ्वी
अरबों वर्ष पुरानी सिद्ध होती है। एक जन्म के कर्मों के फलस्वरूप अनन्त स्वर्ग या नरक की प्राप्ति

अध्याय रामचरितसिंहावलोकन ६७३
तथा मिश्रित पाप-पुण्यवालों की अनिश्चित गति आदि के कारण बुद्धिवादियों के मन में उक्त बातें बैठती
नहीं। इसी कारण हिन्दुओं के असंख्य देवी-देवता एवं अवतारवाद उनकी समझ में नहीं आते ।
विकासवादियों की सहायता से पाश्चात्य विद्वान् वेद, रामायण, महाभारत, पुराण आदि तथा ईश्वरावतार
आदि का छद्मपूर्वक खण्डन करते हैं। इनके अनुसार अमीबा हाइड्रा से प्राणियों की उत्पत्ति होती है। उसी से मत्स्य,
सरीसृप, बहुपद, चतुष्पद, द्विपद, स्तन्यपायी जीवों का विकास होता है । इनकी दृष्टि में मनुष्य बन्दर नहीं तो बन्दर
का चचेरा भाई अवश्य है । मनुष्य पहले असभ्य जङ्गली था । अब क्रमशः सभ्य हो रहा है। हिन्दुओं के पूर्व पुरुष आर्य
जाति से निकले । ग्रीक, रोमन, स्लाव, नर्दिक, पारसीक सब एक जाति, एक भाषा और एक धर्म के थे । यह कल्पना
एक शताब्दी के भीतर की ही है, परन्तु अब यह कल्पना विश्व के इतिहास को आधारशिला हो गयी है। आर्य, द्रविड़,
ब्राह्मण, शूद्र आदि कल्पना भी इन्हीं लोगों के मस्तक का फितूर है। इनके अनुसार वेद अनादि न होकर ई० पूर्व तीन
चार हजार वर्ष के आर्य कवियों के काव्यमात्र हैं । ऋग्वेद प्राचीन तथा यजुर्वेद और सामवेद अर्वाचीन हैं। अथर्ववेद
और भी निम्न श्रेणी का वेद है। ब्राह्मण ग्रन्थ वेद नहीं हैं । उपनिषद् क्षत्रियों द्वारा प्रणीत ग्रन्थ हैं ।
ब्राह्मण यज्ञसम्बन्धी कर्मकाण्ड के आडम्बर में व्यस्त रहते थे। वे बहुदेवपूजक होने से एकेश्वरवाद की
कल्पना नहीं कर सके । निर्गुण निराकार ब्रह्मवाद की कल्पना पहले नहीं थी। कई लोगों के अनुसार तो भीरु, जंगली
मनुष्यों की भूत-प्रेत की कल्पना ही सभ्यता के साबुन से धुल-धुलकर देवकल्पना और वही वैज्ञानिक चमत्कृति से
चमत्कृत होकर निर्विकार ब्रह्मकल्पना बन गयी । इन मतों का विस्तृत खण्डन मार्क्सवाद और रामराज्य के विकास
प्रकरण में तथा वेदस्वरूप एवं उसका प्रामाण्य में किया गया है ।
इनके अनुसार रामायण तथा महाभारत महर्षि वाल्मीकि एवं कृष्णद्वैपायन व्यास की कृति नहीं हैं, अपितु
चारण, भाट तथा काव्योपजीवी कुशीलवों द्वारा रचित गाथाएँ हैं, जो एक दूसरे के मुख से सुनकर कण्ठस्थ कर ली
जाती थीं। उनका संकलन ही ये दोनों ग्रन्थ हैं । १८ पुराण गुप्त-युग के बाद के हैं। जो व्यास के नाम से लिखे गये
हैं। सोलहवीं शती तक इनका विकास और परिवर्तन हुआ है। हिन्दुओं ने बौद्धों से संन्यास, मूर्तिपूजा, कथा आदि
सीखी थी । जन्म द्वारा जातियां पहले नहीं थीं। क्रमशः श्रमविभाग के आधार पर जातिभेद की सृष्टि हुई है। ब्राह्मणों
और क्षत्रियों का बराबर संघर्ष चलता रहता था । इस देश में प्राचीन आदिवासियों को ही दस्यु एवं क्रमेण दास संज्ञा
दी गयी थी । 'चातुर्वर्ण्यसंस्कृति-मीमांसा' में इन सब बातों का खण्डन किया गया है।
इन लोगों के अनुसार अवतारवाद मिथ्या है। अवतारवाद क्रमविकास का प्रतीक है। मत्स्य, कूर्म, जलचर;
कूर्म, वराह जलचर और स्थलचर; नृसिंह अर्द्धनर पशु, वामन असभ्य ह्रस्वकाय जाति, परशुराम निष्ठुर, दुर्दान्त, वन्य
लोग, राम कृषि का विस्तार करनेवाले, बलराम हलधर कृषिविशेषज्ञ, शिव, दुर्गा आदि असभ्य जातियों से वैदिक धर्म
में लिये गये हैं। राम और कृष्ण पहले विभिन्न जातियों के नेता थे। पश्चात् क्रमशः जातीय नायक हुए, अन्त में देव
मान लिये गये । इन अंशों का भी विस्तृत खण्डन उसी ग्रन्थ में देखिये । संक्षेप से यहाँ भी जगह जगह पर है ही ।
बेवर के अनुसार रामायण दाक्षिणात्य एवं सिंहलद्वीप स्थित आर्यसभ्यता के विकास की कहानी है । लासेन
के अनुसार आर्यों की दक्षिणविजय की प्रथम चेष्टा का रूपक इसमें वर्णित है ।
मैकडानल एवं याकोबी रामायण को प्राचीन भारतीय उपाख्यानों पर प्रतिष्ठित मानते हैं । उनके
अनुसार सीता ऋग्वेद के खेत की हल-सम्बन्धी रेखा थी । राम इन्द्र या पर्जन्य देवता थे । राम और रावण का युद्ध
इन्द्र तथा वृत्र के संग्राम की कहानी है । इन्द्रजित् या इन्द्रशत्रु ऋग्वेद में वृत्र का नाम है । इन्द्र की शुनी सरमा
रामायण की सीता को सान्त्वना देनेवाली सरमा राक्षसी है । वायुपुत्र हनुमान् मरुद्गण सहित इन्द्र के वैभव का
स्मरण दिलाते हैं ।

मैकडानल के अनुसार याकोबी की यह कल्पना ठीक मालूम पड़ती है कि हनुमान् के साथ कृषि-कार्य का
कुछ सम्पर्क था और वे वर्षा के एक उपदेवता थे ।
इन पाश्चात्यों के अनुसार रामायणग्रन्थ अयोध्याकाण्ड से लेकर युद्ध काण्ड तक ही था। मागध और
वन्दियों ने पीछे से बालकाण्ड और उत्तरकाण्ड उसमें जोड़ दिये हैं। उनके अनुसार मूल काव्यखण्ड के जातीय नायक
आगे जोड़े गये अंशों से जातीय नायक के रूप में परिवर्तित हो गये । वह समस्त जन-समाज के लिए नैतिक आदर्श
के प्रतीक बन गये । कुछ प्रक्षिप्त अंशों को छोड़कर मूल पाँच काण्डों में मनुष्यनायक बालकाण्ड और उत्तरकाण्ड में
देवता के रूप में परिणतः होकर भगवान् विष्णु के साथ एकाकार हो गये । प्रो० विंटरनित्स के अनुसार असल रामायण
में राम की भगवत्ता या विष्णु का अवतार होने का कोई उल्लेख नहीं था । कीथ के अनुसार रामायण दो उपाख्यानों
का तालमेल है । उनमें से दूसरा है सीताहरण के कारण राम और रावण का युद्ध ।
यह मूलतः एर्क प्राकृतिक आख्यान है। इनमें अनेक काल्पनिक घटनाओं का समावेश है। इन्हीं आधारों
पर कामिल बुल्के ने भी अनेक दुष्कल्पनाएँ की हैं ।
समाधान
वस्तुतः वेद अनादि अपौरुषेय नित्य ग्रन्थ हैं । मन्त्र, ब्राह्मण और उपनिषद् उन्हीं के भेद हैं । रामायण,
महाभारत, पुराण और आगम सब उन्हीं वेदों की व्याख्या एवं उपबृंहणमात्र हैं। पाश्चात्यों की कल्पनाएँ निर्मूल
एवं दुरभिसन्धिपूर्ण हैं । वेदों और उपनिषदों में राम की कथा है । वाल्मीकिरामायण में उसी का विस्तृत विवेचन है ।
वाल्मीकि राम के समसामयिक त्रिकालदर्शी महर्षि थे । कृष्णद्वैपायन कृष्ण के समय विद्यमान थे। फिर
भी इन महर्षियों ने समाधिजा ऋतम्भरा प्रज्ञा से सीता, राम, भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न, हनुमान् आदि के सभी स्थूल
तथा सूक्ष्म चरित्रों का साक्षात्कार कर रामायणकाव्य या आर्ष इतिहास लिखा है । रामायण के अनुसार ही बालकाण्ड
से लेकर युद्धकाण्ड तक ६ काण्ड और उत्तरकाण्ड वाल्मीकिकृत रामायण है । यह महर्षियों का उद्घोष परम्पराप्राप्त,
महाभारतादि ग्रन्थों से समर्थित एवं महान् भाष्य-टीकाकारों से आदृत है । उसके विरुद्ध पाश्चात्य-कल्पना निःसार हैं ।
अयोध्या से युद्धकाण्ड तक ५ काण्डों में भी राम की भगवत्ता का वर्णन करनेवाले सहस्रों श्लोक हैं । सबको प्रक्षिप्त कह
देना हठवादिता के सिवा और कुछ नहीं है । इस तरह बाइबिल आदि ग्रन्थों की भी प्रक्षिप्तता सिद्ध होगी ।
“ममापि सफलं चक्षुः स्मारितश्चास्मि राघवम् ।
रामाभिधानं विष्णुं हि जगद्धृदयनन्दनम् ॥
सीतावक्त्रारविन्दाकं दशास्यध्वान्तभास्करम् ।
मानुषं गात्रसंस्पर्शं गत्वा भीम त्वया सह ॥” (म० भा० ३।१५१।६–८)
हनुमान्‌जी भीमसेन से कहते हैं राम के दर्शन से मेरे चक्षु सफल हैं। आज पुनः मनुष्यगात्र के संस्पर्श से
जगत् के हृदय को आनन्दित करनेवाले, सीतामुखपङ्कज को प्रफुल्लित करनेवाले सूर्य एवं रावणरूपी अन्धकार को
मिटानेवाले भास्कर राम का स्मरण हो रहा है ।
ब्रह्मा ने कहा है, मेरी प्रार्थना से चतुर्भुज विष्णु अवतीर्ण हुए हैं । वे रावण-वधादि कार्य करेंगे—
“तदर्थमवतीर्णोऽसौ मन्नियोगाच्चतुर्भुजः ।
विष्णुः प्रहरतां श्रेष्ठः स तत्कर्म करिष्यति ॥” ( म० भा० ३।२७६।५ )
धौम्य ने कहा है, भीमकर्मा विष्णु ने दशरथ के गृह में अवतीर्ण होकर मनुष्यरूप से संग्राम में रावण को
मारा था—

अध्याय रामचरितसिंहावलोकन ६७५

“विष्णुना वसता चापि गृहे दशरथस्य च।
दशग्रीवो हतश्छन्नं संयुगे भीमकर्मणा ।” ( म० भा० ३।३१५।२ )
कि बहुना महाभारत में अनेक स्थलों पर राम का चरित्र एवं राम का परब्रह्म विष्णु होना वर्णित है ।
हरिवंश महाभारत का ही खिल है। उसमें भी रामायण महाकाव्य की चर्चा है।
“रामायणमहाकाव्यमुद्दिश्य नाटकं कृतम् ।
जन्म विष्णोरमेयस्य राक्षसेन्द्रवधेप्सया ॥” ( हरिवं० ९३।६ )
कालिदास ( ई० पू० १ म० श० ) ने रघुवंश में राम को विष्णु का अवतार कहा है ।
कौटिल्य चाणक्य ने ( ई० सन् ५४ में ) रावण-वध का उल्लेख किया है—
“मानाद्रावणः परदारानप्रयच्छन् ।” ( १।६।९ )
भास ( ई० पू० ५ श० ) ये मौर्ययुग के हैं। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में उनके प्रतिज्ञायौगन्धरायण नाटक
से 'नवं शरावं' श्लोक उद्धृत है । उनके यज्ञफलनाटक, प्रतिमानाटक तथा अभिषेकनाटक इन नाटकों की विषयवस्तु
रामायण की है। अभिषेकनाटक ( ४।१४ ) तथा अभिषेकनाटक ( ६।२८ ) में सीता के साथ राम के मायामानुषवेष
में अवतार का उल्लेख है । एतावता ई० पू० १ श० राम को विष्णु माना जाने लगा था, बुल्के आदि की ये कल्पनाएँ
सर्वथा मिथ्या हैं ।
चरक में विष्णुसहस्रनाम का पाठ विहित है। 'विष्णुसहस्रनाम' में “रामो विरामो विरतः” आदि में राम
का नाम आया है। चरक वैशम्पायन के समसामयिक हैं। आद्यशङ्कराचार्य स्वा० दयानन्द के अनुसार ई० पू० ३
शती के हैं । आधुनिक दृष्टिकोण से भी ई० ७वीं शती के हैं। किन्तु यह मत मिथ्या है। उन्होंने विष्णुसहस्रनाम-
भाष्य में रामः ३९४, क्षमा ४४२, सुमुखः ४५६, कपीन्द्रः ५०१, जितामित्रः ५२४, भूषयः ६२८, शूरसेनः ७०४;
धनुर्धरः ८५८ तथा क्षमिणांवरः ९१९ विष्णुनामों की रामवाचक व्याख्या की है। रामभुजङ्गप्रयात आदि अनेक
स्तोत्रों में उन्होंने सीताराम की विष्णुरूप में चर्चा की है ।
“राम दक्षिण भारत में आर्यसभ्यता फैलाते हैं, राम-रावणयुद्ध इन्द्र-वृत्रयुद्ध का प्रतीक है, इन्द्रजित्, इन्द्र-
शत्रु और वृत्र एक ही व्यक्ति के नाम हैं, देवशुनी सरमा और विभीषणपत्नी सरमा अभिन्न थीं एवं हनुमान् वर्षा के
उपदेवता थे ।” ये सब बातें पाश्चात्यों की निराधार अटकलमात्र हैं । विश्व की सृष्टि भारत से ही हुई हैं । “मनुष्य
इधर-उधर फैले, भारतीय हिन्दू कहीं बाहर से आये” यह कल्पना वेदादि शास्त्रों और इतिहासों से विरुद्ध है ।
सीता का आविर्भाव हलाग्र से होने के कारण उनका नाम सीता पड़ा, परन्तु राम का खेती से किसी
विशेष सम्बन्ध की कल्पना निराधार है । बलराम का हल से सम्बन्ध है, राम का नहीं । वे दोनों एक नहीं हैं ।
बलराम हलधर थे, पर हल और मुसल उनके आयुध थे । वे हलधर किसान नहीं थे । राम तो धनुर्धर थे, फिर उनका
कृषि से सम्बन्ध कैसा ? वे तो १४ वर्ष वनवास में रहे । कृषि करना तो दूर रहा, वे कृषि का अन्न भी ग्रहण नहीं
करते थे ।
पाश्चात्य लोग रामायण के वानर, भालू एवं राक्षसों को असभ्य जाति के मनुष्य ही मानते हैं । रामायण
से विदित होता है कि रावण को वरदान मिला था कि मनुष्य, वानर तथा भालुओं के सिवा तुम देवता, दानव, राक्षस
आदि से अवध्य होगे । इसी लिए उसके नाशार्थ विष्णु मायामानुष राम के रूप में प्रकट हुए थे । देवता भी ब्रह्मा के
आदेश से वानर और भालू रूप में अवतीर्ण हुए थे । वे कामरूपी, कामचारी, प्रचण्ड पराक्रमी तथा दीर्घायु थे ।
पवनसुत हनुमान् समुद्र लांघने में समर्थ हुए । द्वापर में गन्धमादन पर्वत पर उनका रूप देखकर भीम भी मोहग्रस्त
हो गये । वे अर्जुन की ध्वजा पर बैठकर पाण्डवों की सहायता करते थे ।

६७६ रामायणमीमांसा विंश
ब्रह्मा ऋक्षपति, इन्द्र वाली तथा सूर्य सुग्रीव के रूप में अवतीर्ण थे । ऋक्षपति की कन्या जाम्बवती कृष्ण
की एक पट्टमहिषी थी । यद्यपि यह सब अलौकिक, अविश्वसनीय प्रतीत होगा, परन्तु शङ्कराचार्य के “तस्मात् समूल-
मितिहासपुराणम्” ( ब्र० सू० १।३।३३ ) के भाष्य-वचन के अनुसार इतिहास-पुराण में विश्वास करना ही चाहिये
( देखिये देवताधिकरण ) । माता-पिता के गुण सन्तान में आते ही हैं । किसी में माता के और किसी में पिता के
अधिकांश गुण आते हैं । अतः हनुमान् आदि में मातृपक्ष से वानरी आकृति और वानरी भाषा आदि गुण प्राप्त हुए
तथा पितृपक्ष से देवताओं के जैसे अद्भुत तेज, पराक्रम तथा देवताओं की संस्कृत भाषा भी प्राप्त हुई । इसी प्रकार
वाली आदि में देवताओं के समान ही वेदादि शास्त्रों का प्रतिभान भी हुआ । हनुमान् ने विशिष्ट ज्ञानार्थ सूर्य से
अध्ययन भी किया । आज वैज्ञानिक प्राणियों एवं पौधों के जोड़-मेल से विलक्षण प्राणियों तथा पौधों की सृष्टि
करते ही हैं ।
राक्षस असुरों में ही योनिविशेष हैं। वे उग्र, कामरूपी और कामचारी थे । शूर्पणखा तथा हिडिम्बा ने
सुन्दर मानवीरूप धारण किया था । विभीषण एवं उसके मन्त्री मनुष्यवेष में ही युद्ध करते थे । राक्षस भी दीर्घायु
थे । तभी रावण ने मान्धाता एवं अनरण्य के साथ युद्ध किया था ।
राम की ऐतिहासिकता
हिन्दू जाति के धार्मिक सांस्कृतिक एवं पारिवारिक जीवन पर मर्यादापुरुषोत्तम राम का अमिट प्रभाव
है । हिन्दू-परिवार में जन्म एवं विवाह के अवसरों पर रामजन्म एवं राम-विवाह सम्बन्धी गीत गाये जाते हैं । शरीर
की अन्तिम यात्रा 'रामनाम सत्य है' की ध्वनि के साथ होती है । भारत के कोने-कोने में राम और उनके भक्त
हनुमान् के मन्दिर हैं । लाखों व्यक्ति प्रतिदिन रामायण का पाठ करते हैं तथा अयोध्या, रामेश्वर, पञ्चवटी, चित्रकूट,
आदि तीर्थों की यात्रा करते हैं । करोड़ों हिन्दुओं के ही नहीं श्याम, थाइलैण्ड आदि देशों के निवासियों के नाम भी
रामायण से सम्बन्धित होते हैं । राम प्रत्येक हिन्दू के जीवन में रम रहे हैं। ईश्वर के नामों में सर्वप्रसिद्ध नाम राम
ही है । भारत के बच्चे-बच्चे की जबान पर राम-नाम रहता है । काशी में जीवों को मुक्ति के लिए शिवजी राम-नाम
का उपदेश करते हैं। फिर भी राम की ऐतिहासिकता पर शङ्का करना केवल मतिविभ्रम ही है। वह आधुनिक
पाश्चात्य कूटनीतिज्ञों के दुष्प्रचार का परिणाम है । आधुनिक वैज्ञानिक आविष्कारों के चमत्कारों से तथा वेदादि
शास्त्रों, दर्शनों एवं तर्कशास्त्रों के अनभ्यासों से भारतीय प्रभावित से हो गये हैं। आत्मज्ञानशून्य देश परकीय चाक-
चिक्यों से प्रभावित होते ही हैं ।
वस्तुतः परम्पराप्राप्त इतिहास तथा जीवनवृत्तसम्बन्धी प्रामाणिक पुस्तकें तथा तत्कालीन या कालान्तरवर्ती
पुस्तकों में तत्सम्बन्धी चर्चाएँ, उसके द्वारा लिखित पुस्तकें या तन्निर्मित मन्दिर, सेतु तथा तत्सम्बन्धी शिलालेख,
ताम्रलेख या मुद्राएँ किसी के ऐतिहासिक होने में प्रमाण कही जाती हैं।
इस दृष्टि से देखने पर राम की भी ऐतिहासिकता सिद्ध है। राम के जीवन की प्रमुख घटनाएँ लोकपरम्परा
में अत्यन्त प्रसिद्ध हैं । भारत में उनका नाम प्रत्येक जिह्वा पर है। संसार के इतिहास में ऐसी प्रसिद्धि किसी की भी
नहीं है । भारत में ही नहीं सुदूरदेशों में भी राम के चरित्रों के आधार पर अनेक लीलाएँ तथा नाटक होते हैं।
चौबीस हजार श्लोकों की वाल्मीकिरामायण में उनके जीवनवृत्त का ही वर्णन है ।
वाल्मीकि के समान ही व्यास भी सर्वज्ञ थे। उनके महाभारत तथा पुराणों में राम व रामायण की भरपूर
चर्चा है । महाभारत के अनुसार भीम जैसे महावीर हनुमान् की पूँछ नहीं उठा सके । अन्त में भीम के प्रश्न पर
हनुमान् ने अपने परिचय में राम की कथा की चर्चा की ( म० भा० ३।१४७ ) । महर्षि मार्कण्डेय ने वनवास के
समय युधिष्ठिर से कहा था, आपकी यह विपत्ति देखकर मुझे रामचन्द्र का स्मरण हो आया । पिता की आज्ञा से

अध्याय रामचरितसिंहावलोकन ६७७
धनुष हाथ में लेकर घूमते हुए उन्हें ऋष्यमूक पर्वत पर मैंने देखा था। उन्होंने यह नहीं कहा कि मैंने केवल सुना
है ( म० भा० ३।२५।६-९ ) । गीता के कृष्ण कहते हैं कि शस्त्रधारियों में मैं राम हूँ । शङ्कराचार्य की रामपद की
व्याख्या में दाशरथि राम कहा गया है। लगभग सभी पुराणों तथा काव्यों में श्रीमद्भागवत भागवतों का परमा-
दरणीय ग्रन्थ है। प्रतिवर्ष जिसके हजारों सप्ताह होते हैं, उसमें भी रामायण एवं राम की चर्चा है ।
श्रीराम की नीति
“न रामसदृशो राजा पृथिव्यां नीतिमानभूत् ।
सुभृत्यता तु यन्नीत्या वानरैरपि स्वीकृता ।।” ( शु० नी० ४।६।१०।७८ )
शुक्रनीति के अनुसार राम सदृश कोई भी नीतिमान् नहीं हुआ । उनकी नीतिमत्ता से ही वानरों तथा
भालुओं ने भी उनकी सुभृत्यता स्वीकार की थी ।
“यान्ति न्यायप्रवृत्तस्य तिर्यञ्चोऽपि सहायताम् ।
अपन्थानं तु गच्छन्तं सोदरोऽपि विमुञ्चति ॥”
श्रीराम जैसे न्यायनिष्ठ के प्रभाव से वानर और भालु भी राम के साथी हो गये और दुर्मार्गनिष्ठता के
कारण ही रावण का भाई भी साथ छोड़कर उससे पृथक् हो गया ।
“ब्रह्मचर्येण तपसा राजा राष्ट्रं विरक्षति ॥” ( अथ० सं० ११।५।१७ )
ब्रह्मचर्य एवं तपस्या से राजा राष्ट्र की रक्षा करता है। इसके उदाहरण श्रीराम हैं।
“न हि तद्भविता राष्ट्रं यत्र रामो न भूपतिः ।
तद् वनं भविता राष्ट्रं यत्र रामा निवत्स्यति ॥ ( वा० रा० २।३७।२९ )
जहाँ राम राजा नहीं वह देश राष्ट्र नहीं है, जहाँ राम निवास करेंगे वह वन भी राष्ट्र होगा । भगवान्
के भक्त उनका मङ्गलाशासन करते हैं—
“मङ्गलं कोसलेन्द्राय महनीयगुणात्मने ।
चक्रवर्तितनूजाय सार्वभौमाय मङ्गलम् ॥”
भगवान् मङ्गलों के भी मङ्गल हैं। ब्राह्मण, गौ, अग्नि, हिरण्य, सर्पि, जल तथा राजा गरुड़पुराण
( ३०५।७४, ७५ ) के अनुसार मङ्गल हैं तथा सिंह, साँड, हाथी, कलश, व्यजन, वैजयन्ती, भेरी एवं दीप भी
मङ्गल हैं। दधि, दूर्वा आदि मङ्गलों के भी मङ्गल, देवताओं के दैवत, जो परन्तप एवं परमतेज हैं उन महनीय-
गुणागार चक्रवत्तित्सुत सार्वभौम कोसलेन्द्र के लिए मङ्गलाशासन करना महत्त्वपूर्ण है। राम से बढ़कर सन्मार्गस्थित
संसार में कोई है ही नहीं—
“नहि रामात् परो लोके विद्यते सत्पथे स्थितः ।” ( वा० रा० २।४४।२६ )
श्रीराम धर्मज्ञ, सत्यसन्ध, प्रजाहितनिरत, यशस्वी, ज्ञानसम्पन्न, सर्वपोषक, रिपुसूदन, सर्वजीवलोक के
रक्षक, तत्तद्वर्णाश्रममर्यादाओं का पालन करके धर्मका पालन करनेवाले, अपने यज्ञ, अध्ययन, दान आदि एवं युद्धादि
रूप धर्म का सादर अनुष्ठान करनेवाले तथा स्वभक्त जनों के अवश्यम्भावी अनिष्टों को भी मिटाकर मोक्ष प्रदान कर
रक्षण करनेवाले हैं । रघुवंश, भट्टिकाव्य आदि सैकड़ों काव्यों तथा नाटकों में राम की चर्चा है । अध्यात्मरामायण,
आनन्दरामायण, अगस्त्यसंहिता आदि संहिताओं में राम की चर्चा है ही । ऐसे बहुचर्चित राम को अनैतिहासिक
कहना अनभिज्ञता का ही परिचय देना है। भागवत आदि पुराणों के अनुसार रामसेतु एवं रामेश्वर की स्थापना

भी राम के ऐतिहासिक होने में ज्वलन्त प्रमाण हैं। रामसेतु के खण्डों पर ही रामेश्वर पहुँचने का रेलवे
मार्ग स्थित है।
राम की जन्मकुण्डली
यद्यपि पुराणों के अनुसार राम का जन्म २८ वें मन्वन्तर के २४ वें त्रेता में हुआ है फिर भी पाश्चात्यों
ने अपनी अटकल से उनका जन्म ईसा पूर्व कुछ शतियों या सहस्राब्दियों में ही माना है। जोन्स नामक अंग्रेज
इतिहासज्ञ राम का जन्म-काल ई० पूर्व २०२९ वर्ष मानता है। टॉड ने ई० पूर्व ११०० वर्ष राम का जन्म-समय
माना है। वैन्थली ने ई० पूर्व ९५० वर्ष ही स्वीकार किया है। विल्फर्ड नामक इतिहासज्ञ ने ई० पूर्व १३६० वर्ष
राम का जन्म-काल माना है।
महर्षि वाल्मीकि के अनुसार दशरथ के पुत्रेष्टियज्ञ की समाप्ति के १२ मास बीतने पर चैत्र शु० ९मी
पुनर्वसु नक्षत्र कर्क लग्न में तथा जब पांच ग्रह अपनी उच्च राशि में स्थित थे एवं गुरु चन्द्र के साथ थे उस समय
राम का अवतार हुआ—
“ततो यज्ञे समाप्ते तु ऋतूनां षट् समत्ययुः ।
ततश्च द्वादशे मासे चैत्रे नावमिके तिथौ ॥
नक्षत्रेऽदितिदैवत्ये स्वोच्चसंस्थेषु पञ्चसु ।
ग्रहेषु कर्कटे लग्ने वाक्पताविन्दुना सह ॥” (वा० रा० १।१८।८, ९ )
ज्योतिषियों के अनुसार रवि, भौम, गुरु, शुक्र और शनि ये पाँच ग्रह उच्च के थे। अर्थात् रवि मेष के,
मङ्गल मकर के, गुरु कर्क के, शुक्र मीन के एवं शनि तुला के थे। स्थूल रीति से सप्तर्षिगण लगभग सहस्र वर्ष,
वरुण ८४ वर्ष एवं शनि लगभग २॥ वर्ष एक राशि में रहते हैं। सूर्य एक राशि पर एक मास और गुरु एक राशि
पर एक वर्ष रहते हैं। सूर्य, गुरु और शनि के विचारसे पाँचों उच्चस्थ ग्रहों की गणना करने से रामचन्द्र का जन्म-
काल १,८५,०७१ वर्ष पूर्व हुआ था। इन्हीं ग्रहों के अनुसार रामराज्य की महनीयता तथा राम के लोकोत्तर बल,
वैभव, प्रताप आदि अतुलनीय थे। मङ्गल उच्च गृहस्थ होने पर शुभप्रद नहीं होता, इसी लिए स्त्रीकष्ट आदि की
प्राप्ति हुई। यह भी एक मत ही है। परन्तु पुराण प्रमाण के अनुसार जब चौबीसवीं त्रेता राम का काल है तब तो
उसी के आधार पर विचार करना उचित है। वाल्मीकिरामायण में वर्णित ग्रहस्थिति उस समय भी रही होगी।
राम की नीतिमत्ता
वाल्मीकिरामायण के अनुसार राजतन्त्र होते हुए भी भारत में लोकतन्त्र था। इसी लिए महाराज दशरथ
को राम को यौवराज्य देने के लिए जनस्वीकृति अपेक्षित हुई थी। इंग्लैण्ड तथा जापान में आज भी राजतन्त्र होते हुए
भी जनतन्त्र हैं ही। शासन में भ्रष्टाचार तथा भाई-भतीजावाद या कुनवापरस्ती न पनपने देने के लिए राजा और
प्रजा दोनों पर ही धर्म का नियन्त्रण होता था। मन्त्रों, ब्राह्मणों तथा मन्वादिधर्मशास्त्रों, शुक्र, बृहस्पति आदिनिर्मित
नीतिशास्त्रों ने इसके लिए राजा को सदाचारी, जितेन्द्रिय, आन्तरिक षड्रिपूओं का विजेता तथा कामज, क्रोधज
अष्टादश व्यसनों से रहित बनाने पर पूर्ण बल दिया है। श्रीदशरथ ने पृथिवी भर के समस्त प्रधान लोगों को
बुलाया था—
“समानािनाय मेदिन्यां प्रधानान् पृथिवीपतिः ।” ( वा० रा० २।१।४६ )
मन्त्री वही होते थे जो पौरों एवं जानपादों के विश्वासभाजन होते थे—
“तस्मै मन्त्रः प्रयोक्तव्यो दण्डमाधित्सता सता ।
पोरजानपदा यस्मिन् विश्वासं धर्मतो गताः ॥” ( म० भा० १२।८३।४५, ४६ )

अध्याय रामचरितसिंहावलोकन ६७१
शुक्रनीति के अनुसार राजा क्रोध तथा लोभ से विवर्जित होकर धर्मशास्त्र के अनुसार न्यायाधीश, मन्त्री,
एवं पुरोहित की सम्मति से शासन करता था ।
"धर्मशास्त्रानुसारेण क्रोधलोभविवर्जितः ।
सप्राड्विवाकः सामात्यः सब्राह्मणपुरोहितः ॥" ( शु० नी० ४।५।१२ )
राजा की सभा में सभी जाति के मुख्य लोग सभ्य होते थे—
"सभ्याः सर्वासु जातिषु ।" ( शु० नी० )
"जातिजानपदान् धर्मान् श्रेणीधर्मांश्च धर्मवित् ।
समीक्ष्य कुलधर्मांश्च स्वधर्मं प्रतिपादयेत् ॥" ( मनु० ८।४१ )
के अनुसार राम जातिधर्म, देशधर्म, श्रेणीधर्म तथा कुलधर्मों को यथावत् जानते एवं उनका पालन करते
थे । भारतीय नीति एवं राजधर्म में राजा का आचरण ही आदर्श राज्य का आधार होता है । राजा चाहे व्यक्ति हो
चाहे दल, वह अपने व्यवहार से समाज का उन्नायक होता है । अतएव राम ने अपने आचरण द्वारा प्रजा तथा समाज
को आदर्शरूप में ढाला था । यद्यपि वैयक्तिक आचरण का निजी जीवन से ही सम्बन्ध होता है, परन्तु वस्तुतः राम का
वैयक्तिक जीवन भी समाज के लिए ही था । जैसी गर्भिणी स्त्री का निजी व्यवहार भी गर्भस्थ शिशु के हित की दृष्टि
से होता है । तभी वे लोकाराधन के लिए वैयक्तिक स्नेह, दया, सौख्य तथा जानकी तक को त्यागने को तैयार थे ।
यज्ञ आदि के प्रसङ्ग से राम निरन्तर दान तथा त्याग में ही लगे रहे । जहाँ आज देने में संकोच है तो चारों तरफ से
लेने का ही संघर्ष है । पर राम के समय राम के आदर्शानुसार सब में देने की ही होड़ थी । लेने का संघर्ष सर्वथा
समाप्त था । संग्रह-वृत्ति में ही संघर्ष होता है । तुलसीदासजी के अनुसार प्रजा के सुभाग से ही भानु जैसा भूपति होता
है । भानु धरती से कब कितना रस खींचता है यह किसी को नहीं मालूम पड़ता है, पर भानुजनित मेघ से रसमय जल
बरसते देखकर सभी हर्षित होते हैं—
"तुलसी प्रजासुभाग ते भूप भानु सो होय ।
बरसत हरषत लोग सब करखत लखै न कोय ॥"
कालिदास के अनुसार 'सहस्रगुणमुत्स्रष्टुमादत्ते हि रसं रविः' हजारों गुना अधिक करके देने के लिए जैसे
सूर्य पृथ्वी से अप्रत्यक्ष रसादान करता है वैसे ही राजा हजारों गुना अधिक देने के लिए प्रजा से सीमित अप्रत्यक्ष कर
ग्रहण करता है । भारतीय नीति एवं रामराज्त में अलग से कोई विधान नहीं था । विधि या संविधान वेद ही हैं ।
आर्ष धर्मग्रन्थ एवं नीतिग्रन्थ उनकी व्याख्या थे । तुलसी के अनुसार—"श्रुतिपथ पालक धर्मधुरन्धर ।" ( रा०
मा० ७।२३।१ ) राम ने अनादि श्रुतिसिद्ध धर्म के सर्वमान्य रूप को, उसका पालन करके, व्यवहार की वस्तु बनाया ।
तभी तो भरत कहते हैं—
"चाहिय धर्मशील नरनाहू ।" ( रा० मा० २।१७७।१ )
जब शासक ही विधायक बन जाता है तब निरङ्कुशता ही फैलती है । आजकल भी कार्यपालिका और
विधायिका एवं न्यायपालिका को पृथक्-पृथक् रखने का नाटक किया जाता है । राम ने विधान नहीं बनाया, किन्तु
आदर्श आचरण उपस्थित किया । तुलसी के राम ने राजधर्म का सर्वस्व यही कहा था—
"मुखिआ मुखु सो चाहिअइ खान पान कहूँ एक ।
पालइ पोसइ सकल अंग तुलसी सहित विवेक ॥" ( रा० मा० २।३१४ )