रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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राम के गुण तथा स्वभाव
“वज्रादपि कठोराणि मृदूनि कुसुमादपि ।
लोकोत्तराणां चेतांसि को हि विज्ञातुमर्हति ॥” ( उ० रा० च० )
उत्तररामचरित के अनुसार लोकोत्तर ईश्वरों के चरित वज्र से भी कठोर एवं कुसुम से भी कोमल होते
हैं । उन्हें कौन जान सकता है ।
‘अप्यहं जीवितं जह्यां त्वां वा सीते सलक्ष्मणाम् ।
न तु प्रतिज्ञां संश्रुत्य ब्राह्मणेभ्यो विशेषतः॥” (वा० रा० ३।१०।१८,१९)
राम कहते हैं—सीते, मैं लक्ष्मण और तुमको भी त्याग सकता हूँ, परन्तु मैं प्रतिज्ञा का, विशेषतः ब्राह्मणों
के प्रति की गयी प्रतिज्ञा का, त्याग नहीं कर सकता हूँ ।
“दद्यान्न प्रतिगृह्णीयात् सत्यं ब्रूयान्न चानृतम् ।
अपि जीवितहेतोर्वा रामः सत्यपराक्रमः ॥” ( वा० रा० ५।३३।२५ )
सत्यपराक्रमी राम देते ही हैं, प्रतिग्रह नहीं करते हैं । सत्य ही बोलते हैं, अनृत नहीं बोलते हैं ।
“नास्य क्रोधः प्रसादश्च निरर्थोऽस्ति कदाचन ।
हन्त्येष नियमाद् वध्यानवध्येषु न कुप्यति ॥” ( वा० रा० १।१।४५,४९ )
राम के क्रोध और प्रसाद निरर्थक नहीं होते अर्थात् उनके क्रोध और प्रसाद अमोघ हैं । वे वध्य व्यक्ति
का अवश्य वध करते हैं और निर्दोष अवध्य के प्रति कभी भी कुपित नहीं होते हैं ।
“धर्मे तत्परता मुखे मधुरता दाने समुत्साहता
मित्रेऽवञ्चकता गुरौ विनयिता चित्तेऽतिगम्भीरता ।
आचारे शुचिता गुणे रसिकता शास्त्रेऽतिविज्ञानता
रूपे सुन्दरता हरौ भजनिता चैते गुणा राघवे ॥” ( चाणक्य १२।१५ )
राम की धर्म में तत्परता एवं मुख में मधुरता स्तुत्य थी । दान में उनका समुत्साह तथा मित्र के प्रति
अवञ्चकता भी लोकोत्तर थी । गुरु के प्रति वे विनयी थे । उनके चित्त में गम्भीरता, आचार में पवित्रता, गुणों में
रुचि, शास्त्रों में अभिज्ञता, रूप में सुन्दरता एवं हरि में भक्ति भी अत्यन्त उत्कृष्ट था । इसी लिए ऋषियों की दृष्टि में
राम से भिन्न कोई काव्यों के यश का भाजन हो ही नहीं सकता—
“नह्यन्योऽर्हति काव्यानां यशोभाग् राघवादृते ।”
“आनृशंस्यमनुक्रोशः श्रुतं शीलं दमः शमः ।
राघवं शोभयन्त्येते षड्गुणाः पुरुषर्षभम् ॥” ( वा० रा० २।३३।१२ )
मृदुता, करुणा, श्रुत (परम्परा से वेदादि शास्त्रों का ज्ञान), शील, इन्द्रिय-निग्रह तथा मनोनिग्रह ये छः गुण
राघवेन्द्र राम को शोभित करते हैं ।
शोभा, कान्ति, छवि, वर्ण, लक्षण, लावण्य, आभिजात्य, सौभाग्य, राग आदि रूप के सभी भेद राम के
सम्बन्ध से ही शोभित होते हैं ।
“रूपं वर्णः प्रभा राग आभिजात्यं विलासिता ।
लावण्यं लक्षणं छाया सौभाग्यं चेत्यमी गुणाः ॥”