रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
५१६ रामायणमीमांसा षोडश
यहाँ कुछ टीकाकार मानते हैं कि परस्पर जय की इच्छा से ही प्रथम आदित्य को जो प्राप्त कर ले वही
प्रबल मान्य होगा । इस प्रतिज्ञा से आदित्य के पास दोनों गये । परन्तु उनके मतानुसार आवृत्त्या इस पर और इन्द्र-
कर्तृक वृत्रवध-प्रसङ्ग की असंगति होगी । बुल्के ने भी वृत्र-वध के बाद ( इन्द्र पर ) विजय प्राप्त करने की इच्छा से
आकाश-मार्ग से स्वर्ग जा रहे थे, यह अर्थ किया है। उनके अर्थ में इन्द्रप्रसंग की संगति तो हो जाती है, परन्तु जा
रहे थे, यह उक्त श्लोक के किसी भी शब्द का अर्थ नहीं है । “स्वर्गतौ” शब्द का अर्थ तो यही है कि आकाश मार्ग
से स्वर्ग पहुँच गये । साथ ही ‘आवृत्त्या' शब्द का उन्होंने स्पर्श भी नहीं किया । अतः आवृत्त्या का यही अर्थ
ठीक है कि लौटते समय दर्प से हम दोनों आदित्य के पास पहुँच गये । इस तरह पहली कथा में ही इन्द्रविजय
की इच्छा से हम दोनों स्वर्ग गये । लौटते समय दर्प से हम लोग आदित्य के पास गये । अर्थात् विजय करके लौट
रहे थे ।
दूसरी बार उसी कथा का सम्पाति ने विस्तार से वर्णन किया । वहीं उसका कारण भी कहा गया है—
अध्याय किष्किन्धाकाण्ड ५१७
अनुगमन से विन्ध्यगिरि में पतन आदि सुनाया। भगवन्, इन्द्रयुद्ध में हुए वज्रपातजनित व्रणों के कारण परिश्रान्त
होने से सूर्य्यानुगमन से होनेवाले पक्षनाश के कारण लज्जा से व्याकुल होने से उत्तर देने में मैं समर्थ नहीं हूँ। इससे
भी स्पष्ट है कि इन कथाओं में पूर्वापर विरोध नहीं है। पङ्खों की पुनरुत्पत्ति तथा स्वास्थ्य-लाभ में निशाकर के वचन
का प्रभाव होते हुए भी राम और लक्ष्मण के प्रभाव का भी अपलाप नहीं किया जा सकता है ।
“उत्पेततुस्तदा पक्षौ समक्षं वनचारिणाम् ।
स दृष्ट्वा स्वां तनुं पक्षैरुद्गतैररुणच्छदैः ॥
प्रहर्षमतुलं लेभे वानरांश्चेदमब्रवीत् ।
निशाकरस्य राजर्षेः प्रसादादमितौजसः ॥” (वा० रा० ४।६२।८-९)
वानरों के देखते देखते उसके पङ्ख पुनः उत्पन्न हो गये । अरुणपत्रतुल्य उगते पङ्खों से युक्त अपने शरीर
को देखकर उसे अतुल प्रसन्नता हुई और उसने कहा कि अमिततेजा मुनि के प्रभाव से आदित्य-किरणों से दग्ध मेरे
पङ्ख पुनः नवीन हो गये हैं। यौवन काल में जो बल था वही फिर मुझमें हो गया है। मेरे पङ्खों की पुनरुत्पत्ति आप
लोगों की सिद्धि की प्रत्यायक है।
जैसे गुरु का कृतज्ञ भी ईश्वर का कृतज्ञ माना जाता है वैसे ही निशाकर मुनि की कृतज्ञता स्वीकार करने-
वाला सम्पाति राम और लक्ष्मण का भी कृतज्ञ है ही। मुनि ने भी कहा था कि तुम्हारे पुनः उत्तम नवीन पङ्ख हो
जायेंगे । पुराण में मैंने सुना है बहुत बड़ा कार्य होनेवाला है। मैंने तप से भी सब कुछ जाना है। राजा दशरथ के
महातेजस्वी पुत्र राम होंगे। वे लक्ष्मण और सीता के साथ दण्डकारण्य में आयेंगे । देवताओं तथा दानवों से अवध्य
राजा रावण सीता का हरण करेगा। वह सीता को नाना प्रकार का प्रलोभन देगा । परन्तु वह महाभागा यशस्विनी
सीता अन्न-पान का त्याग कर देगी। इन्द्र उन्हें देवदुर्लभ अमृतप्रख्य परमान्न प्रदान करेंगे। सीता अग्राशन राम और
लक्ष्मण के नाम पर भूमि में निर्वापकर उसे ग्रहण करेंगी । रामदूत वानर तुम्हारे पास आयेंगे। तुम उनसे राममहिषी
सीता का समाचार कहना । तुम कहीं न जाकर देश और काल की प्रतीक्षा करो। तुम्हें पुनः पङ्ख प्राप्त होंगे। हम
तुम्हें अभी सपङ्ख बना सकते हैं। परन्तु तुम यहाँ रहकर लोकों का परम कार्य करोगे। तुम्हें दोनों राजकुमारों राम
और लक्ष्मण का, ब्राह्मणों का, गुरुओं का, मुनियों का, देवताओं का और इन्द्र का भी काम करना है। अर्थात् राम-
दूतों को सीता का पता बताने से रावण का वध होगा। उससे सभी का हित होगा। मैं भी राम और लक्ष्मण को
देखना चाहता हूँ। परन्तु अब अधिक काल तक प्राणों का धारण करना नहीं चाहता । अतः कलेवर त्याग रहा हूँ
(सर्ग ६२) । इससे स्पष्ट है कि महर्षि भी राम और लक्ष्मण का महत्त्व मानते थे। राम का कार्य करने के अनन्तर
ही उसका सपङ्ख होना वे उचित समझते थे ।
इस सर्ग से सीता के लिए इन्द्रदत्त पायस की प्रामाणिकता भी सिद्ध होती है और बुल्के का पक्ष खण्डित
होता है । इसीलिए बुल्के ने इन सर्गों को ही प्रक्षिप्त मान लिया है।
कम्बरामायण (४।१५) के अनुसार सूर्य ने सबसे पहले सम्पाति को आश्वासन दिया था कि जब
वानर राम का नाम उच्चारण करेंगे उस समय तुम्हारे पङ्ख फिर से निकल आयेंगे । भावार्थरामायण (४।१६)
में भी सूर्य के इस आश्वासन का उल्लेख है। अध्यात्मरामायण में मुनि का चन्द्रमा नाम है। उन्होंने सम्पाति को
उपदेश देकर उसे शरीर त्यागने से रोका और नारायणावतार राम के दूतों की प्रतीक्षा करने का आदेश दिया । पङ्खों
के पुनः निकलने से सम्पाति ने वानरों से कहा—जिनके नामस्मरणमात्र से दुष्ट जन भी इस अपार संसारसागर को
पारकर विष्णु के शाश्वत स्थान को प्राप्त करते हैं। तुम लोग उन्हीं भगवान् के भक्त हो। फिर समुद्र के पार करने
५१८ रामायणमीमांसा षोडश
में क्यों असमर्थ होओगे । बुल्के कहते हैं इस प्रकार हम देखते हैं कि सम्पाति की कथा धीरे-धीरे अलौकिक घटनाओं
के परिवर्धन से विकसित होकर अन्त में भगवान् राम के गुणगान में परिणत हुई । इससे स्पष्ट है, बुल्के इसे वस्तुस्थिति
नहीं मानते, किन्तु द्वितीय कथा को भक्तकृत कल्पनामात्र मानते हैं । परन्तु यह उनकी केवल दुरभिसन्धि है, क्योंकि
जब आर्ष विज्ञान पर आधारित वाल्मीकिरामायण में सम्पाति की विस्तृत कथा विद्यमान है तब केवल अलौकिक
घटनाओं के कारण उसे प्रक्षेप या कल्पनामात्र कैसे कहा जाय ? क्या बाइबिल की कथाओं में अलौकिक घटनाओं के
कारण बाइबिल का प्रामाण्य मान्य नहीं है ?
❖
सप्तदश अध्याय
सुन्दरकाण्ड
५२८ अनुच्छेद, लङ्का में हनुमान् का प्रवेश—लङ्का-वर्णन, लङ्कादेवी को परास्त करना, नगर, महल,
पुष्पक विमान, शयनागार आदि का वर्णन एवं सीता का दर्शन न होने से अशोकवन में प्रवेश, सीता का दर्शन, सीता-
रावण-संवाद, सीता द्वारा रावण के अनुरोध को ठुकराया जाना, दो महीने की अवधि का दिया जाना, राक्षसियों की
रावण द्वारा नियुक्ति, त्रिजटा का राक्षसपराजयसूचक स्वप्नवर्णन, हनुमान्-सीता का संवाद, सीता को शकुन होना,
हनुमान् द्वारा राम-कथा का वर्णन, सीता का भयभीत होना, हनुमान् का प्रकट होना, सीता-सन्देह, हनुमान् द्वारा
राम का वर्णन, सीता का विश्वास होना, हनुमान् द्वारा मुद्रिका देना और शीघ्र दुःख-निवृत्ति का आश्वासन, हनुमान्
की पीठ पर बैठकर जाने का सीता द्वारा अस्वीकार करना, अभिज्ञानस्वरूप काक-वृत्तान्त सुनाना और चूड़ामणि देना,
विदा, अशोकवन और चैत्य का विध्वंसन, जम्बूमाली और अक्षयकुमार का वध, दण्डरूप में हनुमान् की पूंछ का
जलाया जाना, लङ्का-दहन की चारणों की बात-चीत से हनुमान् को सीता-रक्षा का आश्वासन, हनुमान् का लौटना,
समुद्र का लङ्घन, मधुवन में वानरों का उत्पात तथा राम को सुखद समाचार सुनाना ।
यहाँ भी बुल्के ने पाठभेद की चर्चा की है। सिद्धान्ततः पाठभेद मान्य ही हैं।
५३० वें अनु० में सुन्दरकाण्ड में भी प्रक्षेप कल्पना की गयी है । दाक्षिणात्य पाठ के प्रथम सर्ग का अन्य
पाठों की अपेक्षा विस्तृत वर्णन, २-११ सर्गों में पुनरावृत्ति के अतिरिक्त दीर्घ छन्दों में कई अनावश्यक सर्ग मिलते
हैं। पुष्पक-वर्णन अर्वाचीन है। सर्ग १४ अशोकवन का पहले विध्वंस, सर्ग २३-२६ भीषण राक्षसियों का वर्णन
और उनकी धमकियाँ; सर्ग २८, २९ में पूर्वापरसम्बन्ध का अभाव तथा बहुत सी प्रतिलिपियों में इन ( २८, २९ )
दो सर्गों का अभाव है, परन्तु उक्त तर्क निःसार हैं। दाक्षिणात्य पाठ भी प्रामाणिक ही है। उसपर तिलक व्याख्या
है । व्याख्याकार प्रक्षिप्त सर्गों एवं श्लोकों का पृथक् निर्देश कर देते हैं। उक्त श्लोकों के सम्बन्ध में कोई ऐसा निर्देश
नहीं है। दीर्घ छन्द बुल्के की दृष्टि में भले अनावश्यक हों परन्तु टीकाकारों की दृष्टि में प्रत्येक श्लोक संगत ही है
एवं काव्य की दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं। दीर्घ छन्दों का भी साहित्यिक महत्त्व है। स्थूल प्रयोजन तो अन्य
काव्य ग्रन्थों के भी साहित्यिक छन्दों में भी नहीं उपलब्ध होते हैं। दूत के लिए लङ्का की आवश्यक जानकारी
महत्त्वपूर्ण है। नगरवर्णन भी काव्य का एक अङ्ग है। वस्तुतः २-११ सर्ग अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं। उनका
अपलाप करना अरसज्ञता ही है। सर्ग १४ को भी अनावश्यक कहना असंगत है। कवि साहित्यिक ढङ्ग से जिस
वस्तु का विस्तृत वर्णन करता है वह संक्षेप में एक या दो श्लोकों में भी कही जा सकती है। सर्ग २३-२६ का वर्णन
घटना का ही वर्णन है। कोई भी घटना बुद्धिसापेक्ष नहीं होती। भारत का विभाजन अभीष्ट नहीं था। फिर भी
घटना घट गयी। उसका वर्णन करना पड़ता है। सर्ग २३-२६ का पूर्वापरसम्बन्ध भी अवश्य है। २७ वें सर्ग में
त्रिजटा के स्वप्नवर्णन द्वारा प्रसन्न होकर सीता आश्वासन देती है कि यदि स्वप्न की बात सत्य हुई तो मैं अवश्य तुम
सबका रक्षण करूँगी—
"अवोचद् यदि तत्तथ्यं भवेयं शरणं हि वः ॥” ४७ ॥
पुनश्च दुःख का अन्त न देखकर जो सीता ने व्याकुलता में प्रलाप किया है, उसी का वर्णन २७ वें सर्ग में
है । तिलककार ने कहा है—
“पुनर्दुःखपारमदृष्ट्वैव सीताप्रलापः” यह इतना स्वाभाविक वर्णन है कि कोई भी समझदार अनावश्यक
कहकर इसे क्षेपक नहीं कह सकता । शोकसन्तप्त होकर सीता जब अपनी वेणी द्वारा फाँसी लगाकर देहत्याग कर यम-
लोक जाने के लिए वृक्ष की शाखा पकड़ कर समीप में खड़ी होती है तब उसको शोकरहित करनेवाले और धैर्य
बँधानेवाले लोकप्रसिद्ध एवं पहले भी जिनका फल अनुभूत हो चुका है ऐसे विभिन्न शकुन होने लगे—
“तस्या विशोकानि तदा बहूनि धैर्यार्जितानि प्रवराणि लोके ।
प्रादुर्निमित्तानि तदा बभूवुः पुरापि सिद्धान्युपलक्षितानि ।” (२८।१९)
स्वाभाविक बात है, अत्यन्त संताप होने पर देहत्याग की प्रवृत्ति होती है । उस अवसर पर शुभ कर्मों के
फलस्वरूप धैर्य धारण करानेवाले शुभ शकुन होते हैं । सर्ग २९ में उन्हीं शुभ शकुनों का वर्णन है। ३० वें सर्ग में
हनुमान् ने तत्त्वतः सीता तथा त्रिजटा के कथोपकथन को और राक्षसियों के तर्जन-गर्जन को सुना—
“हनुमानपि विक्रान्तः सर्वं शुश्राव तत्त्वतः ।”
इस तरह पूर्वापर की स्पष्ट संगति है। कुछ हस्तप्रतिलिपियों में दोनों सर्गों का न होना लेखक का प्रमाद
ही है । तिलककार ने इन्हें प्रामाणिक मानकर ही इनकी व्याख्या की है ।
इस प्रकार सीता और हनुमान् के संवाद की बहुत-सी सामग्री को प्रक्षिप्त कहना भी प्रमाद ही हैं । ३२ वें
सर्ग का दीर्घ छन्दों में वर्णन अनावश्यक है, यह कहना भी प्रमाद ही है । जिस ऋषि ने उस घटना का दर्शन किया
वह उस वर्णन को आवश्यक समझकर ही उसके वर्णन में प्रवृत्त हुआ था । ३१ वें सर्ग के अन्त में सीता ऊपर, नीचे
और तिर्यक् निरीक्षण करती हुई उन अचिन्त्यबुद्धि वातात्मज हनुमान् को उदयाचल स्थित सूर्य के समान देखती है,
यह संक्षेप में निरूपण करके तत्सम्बन्धी विशेष वृत्तान्त का निरूपण ३२ वें सर्ग में किया गया है । उस भीमसत्त्व
वानर के दुरासद और दुर्निरीक्ष्य रूप को देखकर सीता को मोह हो गया और वह भय से मोहित होकर राम और
लक्ष्मण का नाम लेकर रोने लगी । वह विचार करने लगी कि मैंने यह विकृत स्वप्न ही देखा है और वह
अनिष्टाशङ्की चित्त होने के कारण ही राम, लक्ष्मण तथा जनक की स्वस्ति मनाती है और फिर—
‘नमोऽस्तु वाचस्पतये सवज्रिणे’ (वा० रा० ५।३२।१८) रूप मङ्गलाचरण करती है । और प्रार्थना
करती है कि वानर ने जो सुनाया वह वैसे ही हो । इतने में विद्रुमप्रतिम लाल मुख वाले विनीतवेष हनुमान् उस द्रुम
से उतर कर प्रणाम कर के समीप आ गये । ऋतम्भरा प्रज्ञा से इस घटना का अनुभव करनेवाले ऋषि उसका वर्णन
कैसे न करेंगे ।
सर्ग ३३ में सीता के विश्वस्त हो जाने के पूर्व उनका आत्मपरिचय देना अस्वाभाविक है, यह कथन भी
ठीक नहीं है, क्योंकि यह काव्यमय इतिहास है। अर्धमात्रा के लाघव से पुत्रोत्सव मनानेवाले वैयाकरणों का व्याकरण
ग्रन्थ नहीं है । तिलककार कहते हैं लिङ्गों से सीता का निश्चय हो जाने पर भी उनके द्वारा कहलाने के लिए अनजान
से होकर हनुमान् ने प्रश्न किया था ।
पद्मपलाशाक्षि, क्लिष्टकौशेयवासिनि, आप कौन हैं और पुण्डरीक पलाशों से विप्रकीर्ण उदक के तुल्य
आपके नेत्रों से शोकजनित जल क्यों बह रहा है इत्यादि । श्रीसीता ने अगले श्लोकों में उत्तर दिया । इसी वस्तुस्थिति
का महर्षि ने वर्णन किया । इस तरह सर्ग ३५ में सर्ग ३१ की आवृत्ति तथा अनावश्यक विस्तार कहना भी अन-
भिज्ञता ही है ।
क्योंकि कोई भी शोकव्याकुल प्राणी विशेषतः स्त्री अपने प्रिय से वियुक्त होकर बहुत काल के अनन्तर प्रिय
का समाचार पाकर संक्षिप्त समाचारमात्र से सन्तुष्ट हो यह सम्भव नहीं है । उसे अवश्य ही विस्तृत वर्णन सुनने की
अध्याय सुन्दरकाण्ड ५२१
इच्छा होगी । विशेष जानकारी के लिए पुनः पुनः प्रश्न करना स्वाभाविक ही है । विशेष निश्चय के लिए राम के
साथ तुम्हारा कहाँ समागम हुआ ? वानरों का और नरों का संगम कैसे हुआ ? तुमने राम और लक्ष्मण को कैसे
जाना ? राम के और लक्ष्मण के कौन कौन विशेष चिह्न हैं ? इत्यादि प्रश्न एवं हनुमान् द्वारा उन महत्त्वपूर्ण प्रश्नों
का उत्तर अत्यन्त संगत है । इस वर्णन में राम के महत्त्वपूर्ण बाह्य तथा आन्तर लक्षण और उनके स्वभाव का
वर्णन है ।
इसी तरह सर्ग ४० में ३८ वें सर्ग की आवृत्ति मानना भी अनभिज्ञता ही है। सीता का हनुमान् से पुनः
पुनः प्रिय की चर्चा करना, प्रिय के लिए पुनः पुनः सन्देश कहना और हनुमान् द्वारा पुनः पुनः आश्वासन देना
स्वाभाविक ही है ।
अनु० ५३०. अतएव याकोबी के अनुसार आदिरामायण में लङ्का-दहन सर्ग ४१-५५ का वर्णन नहीं मिलता
था, यह कथन तथा उनके तीन तर्क सर्वथा असङ्गत हैं ।
सीता का हनुमान् को बिदा करने का वर्णन लङ्का-दहन के पूर्व ३९ वें तथा लङ्का-दहन के पश्चात् ५६ वें
और राम-हनुमान्-संवाद में ६८ वें सर्ग में उचित ही है । वृत्तान्त का वर्णन करनेवाला यदि वृत्तान्त न होने पर वर्णन
करे तभी दोषी है । यथाभूत वृत्तान्त का वर्णन करना सर्वथा उचित ही है। अतएव यह कहना भी निरर्थक है कि
बिदा वर्णन का ३९ वाँ सर्ग ही मौलिक स्थान है, क्योंकि इसमें सीता हनुमान् से एक रात रहने का अनुरोध करती
हैं । वह लङ्का-दहन के पश्चात् स्वाभाविक नहीं कहा जा सकता । लङ्का-दहन के पूर्व यह नितान्त स्वाभाविक
प्रतीत होता है, क्योंकि ३९ वें सर्ग में हनुमान् की बिदा का वर्णन और उनसे एक रात रहने के लिए अनुरोध
करने का अपलाप कैसे किया जा सकता है। ३९वें सर्ग में बिदा करती हुई सीता का यह प्रश्न भी उचित ही था
कि राम, लक्ष्मण और वानर सैनिक इस भीषण समुद्र को पार कर सकेंगे ? हनुमान् द्वारा इसका उत्तर देना भी
उचित ही है । ४० वें सर्ग में पुनः सीता राम के प्रति अपनी अभिलाषाएँ प्रकट करती हुई सन्देश कहती हैं । ४१वें
सर्ग में हनुमान् सीता के पास से कुछ दूर चलकर यह विचार करते हैं कि सीता का दर्शन हो गया । यह प्रधान
कार्य तो हो गया, परन्तु शत्रु का बल-ज्ञानरूप कार्य शेष ही है । उसका साधन साम, दान और भेद छोड़कर चतुर्थ
दण्ड ही हो सकता है । प्रधान कार्य के सम्पादन के साथ ही पूर्व कार्य के अविरोधेन अन्य बहुत कार्यों का सम्पादन
करना है इत्यादि बहुत बातें सोचकर हनुमान् तोड़-फोड़ कर रावण के प्रमदवन को उजाड़ने लगे । तदनन्तर जम्बू-
माली, अक्षयकुमार, मेघनाद आदि से युद्ध और बन्धन, लङ्का-दहन आदि कार्यों का सम्पादन किया । लङ्का-दहन के
बाद सीता के जल जाने की आशङ्का होती है और उससे उन्हें महती आत्मग्लानि होती है। पुनः उन्हें शुभ निमित्त
दर्शन से यह विचार आता है कि सीता अपने तेज से ही सुरक्षित होंगी । अग्नि के दहनार्थ अग्नि की प्रवृत्ति नहीं
हो सकती । धर्मात्मा राम की भार्या सीता अपने चरित्र से सर्वथा सुरक्षित हैं । पावक उनका स्पर्श नहीं कर सकता ।
राम के प्रभाव और वैदेही के पुण्य प्रभाव से दहन-कर्मा अग्नि ने मुझे नहीं जलाया । फिर भरत आदि तीनों भ्राताओं
की जो देवता हैं और जो राम की मनःकान्ता हैं वह कैसे अग्नि द्वारा नष्ट हो सकती हैं । इतने में चारणों के द्वारा
सीता की रक्षा का समाचार सुनकर पुनः प्रत्यक्षतः सीता को देखकर लौटना उचित ही था । एवं इतना महत्त्वपूर्ण
कार्य करके भी सीता-दर्शन उचित ही था । मिलने पर सीता द्वारा पुनः दैन्य और छुटकारा पाने की अभिलाषा
व्यक्त करना भी स्वाभाविक है और हनुमान्-राम-संवाद में भी वही बात ज्यों की त्यों सुनाना भी उचित ही था ।
परन्तु इसका यह निष्कर्ष निकालना कि लङ्का-दहन की विस्तृत कथा प्रक्षेप है अत्यन्त असङ्गत है । पूर्वोक्त प्रकार
से प्रकरण-सङ्गति में कोई कठिनाई है ही नहीं । सङ्गति की परिभाषा और उसके प्रकारभेद न जानने के कारण ही
पाश्चात्यों को इस प्रकार दुष्कल्पना का अवकाश प्राप्त होता है । लङ्का-दहन के प्रक्षेप होने का यह भी कारण कहा
गया है कि "हनुमान् सीता से दो बार भेंट करते हैं, लेकिन लङ्का-दहन का कोई उल्लेख नहीं करते । इसके अतिरिक्त
६६
५२२ रामायणमीमांसा सप्तदश
लङ्कावरोध के समय लङ्का के सौन्दर्य का वर्णन किया गया है, जिसमें कहीं भी दहन का निर्देश नही मिलता
( ६।३८-३९) ।" परन्तु यह सब निस्सार ही है, क्योंकि पहली बार तो लङ्का-दहन हुआ ही नहीं था। सीता से
बिदा लेने के बाद ही हनुमान् के मन में पर-बलजिज्ञासा से वन उजाड़ने आदि में प्रवृत्ति हुई। आत्मश्लाघा या
आत्मोत्कर्ष पर्यवसायी आत्मकृत्य वर्णन में प्रवृत्ति अल्पसत्त्व को हो सकती थी। महासत्त्व हनुमान् की वैसी प्रवृत्ति
नहीं हो सकती थी, अतः दूसरी बार मिलने पर भी हनुमान् ने लङ्का-दहन आदि आत्मकृत्य का वर्णन नहीं किया ।
इसके अतिरिक्त लङ्का-दहन जैसा व्यापक और ज्वलन्त कार्य स्वयं प्रख्यात था। उसके वर्णन की आवश्यकता भी
हनुमान् ने नहीं समझी । राक्षसियों ने पहले ही सीता को सुनाया था कि हनुमान् को राक्षसों ने पकड़ लिया है और
अब उनकी पूँछ में अग्नि लगायी जा रही है। उस समय सीता ने अपने प्रभाव से हनुमान् के प्रति शीतल हो जाने का
अग्नि से अनुरोध किया था—
“यद्यस्ति गुरुशुश्रूषा यदि वाचरितं तपः ।
यदि वाप्येकपत्नीत्वं शीतो भव हनूमतः ।।'' (वा० रा० ५।५३।२६,२७)
रावण महाप्रभावशाली था। चन्द्र, इन्द्र, पवन, पर्जन्य आदि भी उसके आज्ञाकारी थे। अतः उसने शीघ्र
ही परिष्कार कराकर पुनः लङ्का का सौन्दर्य सम्पादित कर लिया था। इसलिए अवरोध के समय का सौन्दर्य-वर्णन
भी सङ्गत ही है। आधुनिक काल में भी भीषण बमवर्षा के बाद भी पेरिस आदि नगरों को शीघ्र ही सुन्दर बना
लिया गया था। शब्दप्रामाण्यवादी आपात विरोधमात्र से शब्द का अप्रामाण्य नहीं मानते, किन्तु उपपत्ति के अनुकूल
कल्पना करते हैं; जैसे किसी व्यक्ति के दिन में न खाने पर भी पीनता देखकर उसके रात्रिभोजन की कल्पना कर
ली जाती है। घर में न देखकर भी देवदत्त जीवित है, इस प्रामाणिक श्रवण के बल पर ही उसके बाहर अस्तित्व
की कल्पना होती है। इसी प्रकार लङ्कादहन के कुछ दिनों बाद भी लङ्का की शोभा का वर्णन श्रवण करके मध्य में
उसके पुनरुद्धार तथा पुनर्मार्जन की कल्पना करनी ही चाहिये। इतने मात्र से किसी वर्णन को अप्रामाणिक कहना
साहसमात्र है। अतएव सेरीराम के अनुसार एक महर्षि के प्रार्थनानुसार एवं बलरामदास के अनुसार देवताओं ने
विश्वकर्मा को भेजकर लङ्का का पुनर्निर्माण किया था। मिथ्या कल्पना की आदत भारतीय मानवों विशेषतः ऋषियों
को तो नहीं थी। सुन्दरकाण्ड सर्ग ५४ में लङ्का का दाह वर्णित है। प्रमुख-प्रमुख महापार्श्व, वज्रदंष्ट्र, शुक, सारण,
इन्द्रजित्, जम्बूमाली, सुमाली, रश्मितनु, सूर्यशत्रु, ह्रस्वकर्ण, रोमश, युद्धोन्मत्त, मत्त, विद्युज्जिह्व, हस्तिमुख, कराल,
विशाल, शोणिताक्ष, कुम्भकर्ण, नरान्तक, कुम्भ, निकुम्भ आदि के भवनों के साथ ही राक्षसेन्द्र रावण के भवन का
दाह किया गया था। महापवन से उद्दीप्त अग्नि ने इस प्रकार लङ्का-दहन किया कि अग्नि के कारण काञ्चनमय,
मुक्तामणिमय एवं महान् रत्नों से युक्त बहुत से भवन विशीर्ण हो गये। भूषण, वसन, अन्न आदि सभी वस्तुएँ
प्रज्वलित हो गयी थीं। अगणित राक्षस भी जल गये थे। यह सब होने पर भी इन्द्र, वरुण आदि को जीतने की
सामर्थ्य रखनेवाले राक्षसों में निर्माण-क्षमता की भी कमी नहीं थी। इसी लिए थोड़े ही दिनों में लङ्का की शोभा
पूर्ववत् पुनः सम्पादित कर ली गयी थी। कहा जाता है कि विरूपाक्ष तथा यूपाक्ष के वध का वर्णन लङ्का-दहन
प्रसङ्ग में ( ४६ वें सर्ग में ) किया गया है। पुनश्च युद्धकाण्ड सर्ग ७५ श्लो० ४७ में यूपाक्ष का तथा सर्ग ७६
श्लोक ३४ में मैन्द द्वारा विरूपाक्ष का वध वर्णित है। विरूपाक्ष की चर्चा सर्ग ९६ में है, अतः लङ्का-दहन क्षेपक
ही है। परन्तु यह कथन भी असङ्गत है, क्योंकि उक्त लेखानुसार ही अनेक यूपाक्ष तथा विरूपाक्ष का मानना
उचित है।
यदि लङ्का-दहन का प्रसङ्ग प्रक्षेप होता तो अक्षयकुमार का भी वध पृथक् से युद्धकाण्ड में वर्णित होना
चाहिये था—
अध्याय सुन्दरकाण्ड ५२३
इसी प्रकार- "मयि दृष्टे तु रक्षोभी रामस्य विदितात्मनः ।
भवेद् व्यर्थमिदं कार्यं रावणानर्थमिच्छतः ॥” (वा० रा० ५।२।४०)
के अनुसार हनुमान् ने स्वयं कहा था कि यदि मैं राक्षसों द्वारा देखा गया तो राम के कार्य में बाधा पड़
जायगी, इसका भी कोई विरोध नहीं है, क्योंकि वह सब वितर्कमात्र है । वितर्क में बहुत आरोप हो सकते हैं । अतः वही
कहा गया है कि यहाँ कोई व्यक्ति राक्षसरूप में भी राक्षसों से अविज्ञात नहीं रह सकता, फिर अन्यरूप में तो कहना ही
क्या है ? (सर्ग ४१) । वायु भी यहाँ अज्ञात नहीं रह सकता । भीमकर्म राक्षसों के लिए कुछ भी अज्ञात नहीं रह
सकता (सर्ग ४२) । फिर भी वहीं से विदित होता है कि वे कहते हैं मैं दिन में कहीं छिपकर रहूँगा और रात्रि में
अपने ही रूप में, किन्तु छोटे रूप में, लङ्का में प्रवेश करूँगा (सर्ग ४४ ) । और उन्होंने किया भी वैसा ही । इसके
अतिरिक्त सीता के अन्वेषण के पूर्व ही उन्होंने विज्ञात होने में अनर्थ की सम्भावना की थी, क्योकि विज्ञातरूप में
सब जगह जा सकना सम्भव नहीं था, परन्तु सीता के विज्ञात हो जाने के बाद और सीता की पूर्ण परिस्थिति जान
लेने पर फिर वैसी किसी सम्भावना का प्रश्न नहीं रह गया था ।
यह भी कहना निःसार है कि "राम के लौटने पर भरद्वाज ने अन्य सभी घटनाओं का वर्णन किया था,
पर लङ्का-दहन का वर्णन नहीं किया, इसलिए भी लङ्का-दहन प्रक्षेप है ।" क्योंकि बुल्के आदि पाश्चात्य विद्वान् अलो-
किकता से पूर्ण इस सर्ग को प्रमाण ही नहीं मान सकते । इसमें भरद्वाज कहते हैं कि मैंने तपस्या के बल पर सब
घटनाओं को जान लिया है-
"सर्वं ममैतद्विदितं तपसा धर्मवत्सल ।” (वा० रा० ६।१२४।१६)
इसके अतिरिक्त संक्षिप्त कथन में लङ्का-दहन का छूट जाना भी कोई आश्चर्य की बात नहीं है । वस्तुतस्तु
"कर्म वातात्मजस्य च” (वा० रा० ६।१२४।१२) इस अंश का यही अर्थ है कि हनुमान् का समुद्रलङ्घनादि
लङ्कादहनान्त कर्म भी मैंने जाना है। यदि "वातात्मज-कर्म" का उक्त अर्थ न करेंगे तो समुद्र-लङ्घन का भी भरद्वाज
द्वारा वर्णन न होने से हनुमान् के समुद्र-लङ्घन को भी प्रक्षेप कहना पड़ेगा । कहा जाता है कि "यद्यपि लङ्का-दहन का
वर्णन निश्चितरूप से प्रक्षिप्त है। फिर वह विभिन्न पाठों के पृथक् हो जाने के पूर्व प्राचीन काल से किष्किन्धाकाण्ड
का अङ्ग बन चुका था । इसका उल्लेख महाभारत के रामोपाख्यान ( ३।२६६-६८ ) तथा बालकाण्ड की अनु-
क्रमणिकाओं ( १।१।७७; १।३।३३ ) में भी मिलता है ।” परन्तु यह सब बुल्के का निराधार प्रलाप है, क्योंकि पूर्वोक्त
तर्कों एवं प्रमाणों से लङ्कादहन वाल्मीकिरामायण का अविभाज्य अंश ही है। उनके संकेतित प्रमाणों से यह भी नहीं
सिद्ध होता है कि लङ्का-दहन किष्किन्धाकाण्ड का अंश ही है। बालकाण्ड के १।१।७७ में काण्ड-भेद का प्रदर्शन है ही
नहीं । उसमें भी लङ्का-दहन कहा ही गया है ।
"ततो दग्ध्वा पुरीं लङ्कामृते सीताञ्च मैथिलीम् ।
रामाय प्रियमाख्यातुं पुनरायान्महाकपिः ॥" (वा० रा० १।१।७७ )
तीसरे सर्ग में भी श्लोक ३२, ३३ में वृक्षभङ्ग, किन्नरनिबर्हण, लङ्का-दाह आदि का वर्णन है ही। इसमें
भी अङ्गाङ्गिभाव का वर्णन नहीं है। अतः लङ्कादहन किष्किन्धाकाण्ड का अंश नहीं कहा जा सकता ।
इसी तरह ५६ वें सर्ग की आंशिक आवृत्ति अनावश्यक नहीं है, क्योंकि यह आवश्यक था कि अपने महान्
नेता जाम्बवान् से ज्यों की त्यों सभी बातें सुनायी जायें। फिर उनकी सम्मति से जितनी आवश्यक हों उतनी ही बातें
राम से कही जायें । जाम्बवान् ने विस्तार से सारा वृत्तान्त पूछा था । तुमने सीता देवी को कैसे देखा ? वह वहाँ
कैसे हैं ? क्रूर दशानन का उनके साथ कैसा व्यवहार है ? तुमने उनका अन्वेषण कैसे किया ? सीता ने क्या कहा ?
५२४ रामायणमीमांसा सप्तदश
यह सब सुनकर हम सब निर्णय करेंगे कि राम, लक्ष्मण और सुग्रीव के पास जाकर क्या कहना है और क्या नहीं
कहना है—
“यथार्थस्तत्र वक्तव्यो गतेरस्माभिरात्मवान् ।
रक्षितव्यं च यत्तत्र तद् भवान् व्याकरोतु नः ॥” (वा० रा० ५।५८।६)
रामसम्बन्धी विस्तृत चरित्र जहाँ आध्यात्मिक, धार्मिक एवं शिक्षाप्रद है वहीं श्रवणमात्र से कल्याणप्रद भी
है, अतः संक्षेप तथा विस्तार दोनों ही प्रकार का वर्णन है । ५९, ६० में भी परमावश्यक ही आंशिक पुनरावृत्ति है ।
मधुवन का उत्पात कथावस्तु की गति में बाधक नहीं है, किन्तु कथा का अङ्ग ही है । आज भी महान् कार्य करने के
बाद कुछ आमोद-प्रमोद की खुली छूट देखी ही जाती है । विजयोत्सव में भी ऐसी स्थितियाँ आती हैं । वाल्मीकि-
रामायण महाकाव्य है, अतः प्रासङ्गिक हास्य भी महाकाव्य का पूरक ही है । कोई भी कार्य सीधा नहीं होता, बीच
में कई अन्य कार्य और समस्याएँ आती ही हैं ।
इस तरह आधुनिक नास्तिक एवं विधर्मी लोगों ने अनेक अनर्गल दुष्कल्पनाओं द्वारा प्रचलित रामायण को
संदिग्ध बनाने का प्रयास किया है । उनकी तथाकथित आदिरामायण नाम की वस्तु खपुष्पतुल्य ही है । उसका कोई
सर्वसम्मत रूप है ही नहीं । उनका अन्वेषण केवल अव्यवस्था का ही मूल है । जिन पाँच काण्डों को वे प्रामाणिक
मानते हैं जब उन काण्डों के सम्बन्ध में यह स्थिति है तब फिर अनभिमत दो काण्डों के सम्बन्ध में तो कहना
ही क्या है ?
५३१ वें अनु० में दाक्षिणात्य पाठ में समुद्रलङ्घन के विस्तार के सम्बन्ध में भी बुल्के की दुर्द्दृष्टि है । परन्तु
वह सर्वथा असङ्गत है । वाल्मीकिरामायण में मैनाक, सुरसा और सिंहिका के मिलने का क्रम है । वाल्मीकिरामायण
गौडीय पाठ में, अध्यात्मरामायण, आनन्दरामायण तथा भावार्थरामायण में एवं कृत्तिवासरामायण आदि में सुरसा,
मैनाक और सिंहिका के मिलने का क्रम है । कम्बरामायण, उड़िया बलरामदासरामायण तथा तोरवेरामायण में
दाक्षिणात्य पाठ का ही क्रम रखा गया है । श्याम के रामजातक में हनुमान् और अङ्गद दोनों का साथ लङ्का जाना
लिखा है । सेरीराम के अनुसार कोई दृढ़ आधार न देखकर हनुमान् राम की बाहु से ही समुद्र का लङ्घन करते हैं ।
इस कथा में समुद्र में हनुमान् का वीर्य गिर गया है, उसे समुद्र की रानी मछली ने खाकर मकरध्वज को
उत्पन्न किया ।
बिर्होर तथा सन्ताल आदिवासियों की कथा के अनुसार राम द्वारा चलाये गये बाण के आधार पर
हनुमान् ने समुद्र पार किया था । एक अन्य कथा के अनुसार हनुमान् पहले एक बाण चलाते हैं तब कूद कर उस पर
सवार होते हैं । अनेक वृत्तान्तों के अनुसार हनुमान् अपने लक्ष्य से बहुत दूर आगे जाकर उतरते हैं । सेरीराम के
अनुसार वे किसी महर्षि के आश्रम में जाकर उनका आतिथ्य ग्रहण करते हैं । पुनः उनके मार्ग-प्रदर्शन में लङ्का-प्रवेश
करते हैं । रामकियेन के अनुसार नारद के आश्रम में उतरकर उनके अनुग्रह से लङ्का-प्रवेश करते हैं । तोरवेरामायण
के अनुसार हनुमान् लङ्का से ७०० योजन दूर एक टापू पर उतर कर तृणबिन्दु मुनि के निर्देश से पुनः पीछे लौटकर
लङ्का गये ।
आनन्दरामायण ( १।९।१७ ) के अनुसार हनुमान् परलङ्का में पहुँचकर रावण की बहन क्रौञ्चा का वध
करते हैं । भावार्थरामायण ( ५।१८ ) के अनुसार लङ्का की उपनगरी परलङ्का थी । वहाँ रावण की विधवा
बहन अपनी १८०० दासियों के साथ निवास करती थी । हनुमान् ने दासियों को समुद्र में फेंककर क्रौञ्चा का वध
किया । समुद्र-लङ्घन को बुल्के ने प्रक्षेप नहीं कहा, यही गनीमत है । मूल कथा वाल्मीकिरामायण का ही कहीं
विकास और कहीं विकृति हुई समझना उचित है । हनुमान् का छद्मवेश वाल्मीकिरामायण के अनुसार बिडाल के
अध्याय सुन्दरकाण्ड ५२५
आकार के छोटे बन्दर का रूप था। उसी रूप को धारण कर हनुमान् लङ्का में प्रवेश करते हैं—
“सूर्ये चास्तं गते रात्रौ देहं संक्षिप्य मारुतिः ।
वृषदंशकमात्रोऽथ बभूवादभुतदर्शनः ॥” ( वा० रा० ५।२।४७ )
वृहद्धर्मपुराण ( पू० ख० अ० २०१२ ), पद्मपुराण ( वंगीय पाठ १८४२ पृ० ११२६ ) आदि में बिडाल
के रूप में ही हनुमान् का लङ्का-प्रवेश कहा गया है। रामचरितमानस के अनुसार मशक के समान रूप धारण कर
हनुमान् ने लङ्का-प्रवेश किया—
“मशक समान रूप कपि धरी । लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी ॥” ( रा० मा० ५।३।१ )
सम्भवतः लङ्का के मच्छर भी छोटे बन्दरों के तुल्य रहे होंगे । उत्तरपुराण ( ६८।२९८ ) में भ्रमरतुल्य
रूप धारण कहा गया है। रामकियेन ( अ० २४ ) के अनुसार राक्षसरूप धारण करके हनुमान् ने लङ्का-प्रवेश किया
था । अध्यात्मरामायण ( ५।३।२० ) के अनुसार चटक पक्षी के तुल्य बन्दर होकर वे प्रविष्ट हुए थे । आनन्दरामायण
( ८।७।२९ ) के अनुसार छोटे बालक के रूप में वे सीता के सामने प्रकट हुए थे। धनञ्जयकृत गणकचरित्र के
अनुसार हनुमान् क्रमशः भ्रमर, बिडाल तथा ज्योतिषी का रूप धारण करते हैं । कई कथाएँ कल्पभेद से संगत हो
सकती हैं।
लङ्कादेवी
वाल्मीकिरामायण ( दाक्षिणात्य पाठ प्रक्षेप ३।२०-५१ ) के अनुसार लङ्कादेवी राक्षसी के रूप में हनुमान्
को रोक लेती है । हनुमान् से पराजित होकर वह कहती है, स्वयंभू ने कहा है कि तुम्हारी पराजय के बाद राक्षसों
का विनाश होगा ।
अध्यात्मरामायण ( ५।१।५७ ) में वह कहती है आज बहुत दिनों के बाद मुझे संसार-बन्धन से मुक्ति
देनेवाली राघव की स्मृति हुई है । उनके भक्त का अति दुर्लभ सत्संग मिला है। मैं धन्य हूँ । आनन्दरामायण
( १।९।२१ ) में लङ्कादेवी हनुमान् से सीता के रहने के स्थान का रहस्य प्रकट करती है। रामचन्द्रिका ( १३।४४ )
के अनुसार हनुमान् से पराजित होने के बाद वह ( सुन्दरी नारी ) हो जाती है ।
रामदूत हनुमान् का दर्शन पाकर उसके मन में भी भक्तिभावना उत्पन्न हुई हो यह असम्भव नहीं है । तभी
रामचरितमानसकार ने भी इसे स्वीकार किया है—
“तात मोर अति पुण्य बहूता । देखिउँ नयन राम कर दूता ॥” ( रा० मा० ५।३।४ )
तात स्वर्ग अपवर्ग सुख धरिय तुला इक अंग ।
तुलै न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग ॥” ( रा० मा० ५।४ )
“प्रबिसि नगर कीजै सब काजा । हृदय राखि कोसलपुर राजा ॥” ( रा० मा० ५।४।१ )
पउमचरियं के अनुसार लङ्कासुन्दरी के साथ हनुमान् रात भर प्रेमक्रीड़ा करते हैं । यह वाल्मीकिरामायण
आदि से स्पष्टतः विरुद्ध ही है । बृहद्धर्मपुराण ( अध्याय २० ) के अनुसार चण्डिकादेवी लङ्का में निवास करती थी ।
शिवावतार हनुमान् उनसे लङ्का त्याग देने की प्रार्थना करते हैं । सीता के अपमान के कारण वह लङ्का त्याग
देती हैं।
लङ्का में सीता की खोज
वाल्मीकिरामायण में कहा गया है कि हनुमान् ने मुख्य राक्षसों के महलों में तथा रावण के अन्तःपुर में
सीता की खोज की ( सर्ग १०,११ ) । फिर अशोकवन में चले गये । परन्तु परवर्ती कथाओं में वे विभीषण से भेंट
५२६ रामायणमीमांसा सप्तदश...
करते हैं। पउमचरियं के अनुसार विभीषण ने हनुमान् का स्वागत किया और सीता को लौटाने के लिए रावण से
आग्रह करने की प्रतिज्ञा की थी। गुणभद्र के अनुसार हनुमान् दूसरी बार जाकर विभीषण से मिलते हैं। विभीषण
रावण को समझाते हैं और हनुमान् को रावण के पास ले जाते हैं। उनके समझाने पर भी वह नहीं मानता, यह सब
नवीनता लाने का प्रयत्नमात्र है। तुलसीदास के अनुसार विभीषण के रामनामस्मरण से उसे भक्त जानकर हनुमान्
उससे पहिचान करते हैं और राम की महिमा का वर्णन करते हैं—
“राम नाम तेहि सुमिरन कीन्हा। हृदय हरषि कपि सज्जन चीन्हा॥
एहि सन हठि करिहउ पहिचानी। साधु ते होइ न कारज हानी॥”
(रा० मा० ५।५।२)
“प्रात लेइ जो नाम हमारा। तेहि दिन ताहि न मिले अहारा॥”
(रा० मा० ५।६।४)
“अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर।
कीन्ही कृपा सुमिरि गुन भरे विलोचन-नीर॥” (रा० मा० ५।७)
तत्त्वसंग्रहरामायण के अनुसार हनुमान् रावण तथा उसकी पत्नियों के सब वस्त्र समेट कर ले गये थे।
रामकेर्ति और रामजातक के अनुसार हनुमान् ने रावण तथा मन्दोदरी के बालों को बाँधकर मन्त्र पढ़कर लिख
दिया था कि जब मन्दोदरी रावण को थप्पड़ मारेगी तभी यह गाँठ खुलेगी। भावार्थरामायण के अनुसार हनुमान्
ने रावण के सामने ही अनेक उत्पात किये थे। रावण की सभा के दीपकों को बुझा दिया था।
सीता-रावण-संवाद
५४० वाँ अनु० सीता को लङ्का में न पाकर अशोकवन में प्रवेश कर हनुमान् सीता को देखते हैं।
रावण अपनी पत्नियों के साथ दीनतापूर्वक सीता से निवेदन करता है कि वह उसे पति के रूप में स्वीकार कर लें।
सीता ने उसके इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर उसको उपदेश दिया कि मुझको राम के पास पहुँचा दे, अन्यथा राम
अवश्य उसका वध करेंगे। रावण ने क्रुद्ध होकर दो मास की अवधि दी कि यदि तुम दो महीने में मेरा प्रस्ताव स्वीकार
नहीं करोगी तो तुम्हारा शरीर काटकर राक्षस लोग उसे मेरे प्रातः भोजन (कलेवा) के लिए तैयार करेंगे यह कह-
कर उसने राक्षसियों को आदेश दिया कि वे सब सीता को वश में लाने का प्रयत्न करती रहें।
वाल्मीकिरामायण (५।१८।५) के अनुसार रावण का यह अशोकवन में आगमन कामवासनामूलक ही था।
परन्तु अध्यात्मरामायण, आनन्दरामायण, तत्त्वसंग्रहरामायण आदि के अनुसार रावण उत्सुकतापूर्वक राम के आगमन
की प्रतीक्षा करता था, क्योंकि उसे विष्णु के हाथों से मरकर मुक्ति प्राप्त करने की अभिलाषा थी। उसी दिन उसने
स्वप्न देखा था कि राम का सन्देश लेकर कोई कामरूपी वानर वृक्ष की शाखा पर बैठकर सीता को देख रहा है।
स्वप्न की सत्यता की सम्भावना से ही वह वाग्बाणों से सीता को दुःख पहुँचाने के लिए गया, जिससे वानर यह सब
देखकर राम को सुनावे और मुझे शीघ्र ही मुक्ति मिल जाय। यह कहा जा चुका है कि वाल्मीकिरामायण में लौकिक
ऐतिहासिक वर्णन की प्रधानता होने से उसमें अधिकांश लौकिक ही वर्णन मिलता है; किन्तु अध्यात्मरामायण आदि
आध्यात्मिक रहस्यों का भी वर्णन करते हैं। अतः बाह्यरूप से रावण की काममूलक प्रवृत्ति होने पर अन्तरङ्ग
अभिरुचि मुक्ति की ही थी।
धर्मखण्ड (अ० १०५) के अनुसार रावण सीता को मार डालना चाहता था, किन्तु मन्दोदरी उसे
वैसा करने से रोक देती है। हनुमान् प्रकट होकर उसकी छाती पर मुष्टिप्रहार करते हैं। जिससे वह भयभीत होकर
भाग जाता है।
प्रसन्नराघव (अङ्क ६।३४) में यह दिखाया गया है कि रावण सीता का वध करना ही चाहता था
कि हनुमान् ने रावण के हाथ पर अक्षयकुमार का मस्तक रख दिया। जिसे देखकर वह मूच्छित होकर गिर पड़ा।
बाद में सचेत होकर हनुमान् को पकड़ने के लिए सीता को छोड़कर चला गया। यह सब वर्णन चमत्कृति की अभि-
व्यक्ति के उद्देश्य से ही है।
वाल्मीकिरामायण के अनुसार सीता को प्रलोभन देने के लिए उसने लङ्का का वैभव दिखाया था।
परवर्ती रचनाओं में अनेक उपायों का सहारा लिया गया है। उत्तरपुराण के अनुसार मञ्जरिका नाम की रावण-दूती
की चर्चा है। गणकचरित में रावण ने मायामय राम और लक्ष्मण की सृष्टि की। रावण चाहता था कि वे राम और
लक्ष्मण सीता से अनुरोध करें कि वह रावण को पति मान लें। इतने में हनुमान् ज्योतिषी के रूप में लङ्का में प्रवेश
कर गये। बाद में वह भ्रमर बनकर मालिनी के फूलों पर बैठकर मन्दोदरी के महल में पहुँच गये। मन्दोदरी के
यहाँ हनुमान् ने बिडाल का रूप धारण कर लिया। मन्दोदरी ने बिडाल को खिलाया। बिडाल उसका माणिक्य
छीनकर उसके स्तनों पर नखक्षत कर भाग गया। तब हनुमान् अशोकवन में पहुँचे ! जब मायामय राम रावण से
जीवन की भिक्षा माँग रहे थे। रावण को ज्योतिषी के गले में कण्ठमाणिक्य देखकर आश्चर्य हुआ। हनुमान् ने कहा
यह माणिक्य एक गन्धर्व से मिला है। जिसका मन्दोदरी से अनुचित सम्बन्ध है। उसने मन्दोदरी के स्तनों में नखक्षत
किया है। इसपर रावण ने क्रुद्ध होकर ज्योतिषी को पकड़ लिया और कहा कि यदि तुम्हारा अभियोग सच निकलेगा
तो इनाम मिलेगा। अन्यथा तुम्हारा वध होगा। अन्त में हनुमान् का कहा सच निकला। नखक्षत मिल गया ! बाद
में हनुमान् सीता के पास आकर उनका समाचार लेकर राम के पास लौटे। रावण के तिरस्कार के कारण विरक्त
होकर मन्दोदरी नारायण का स्मरण करती थी।
बाद में उसने अपने सतीत्व की शपथ खाकर भूकम्प उत्पन्न किया। सूर्य को रोक लिया। इन्द्र द्वारा
पुष्पवृष्टि करा दी। फिर भी रावण का सन्देह दूर न हुआ। मन्दोदरी की अग्निपरीक्षा हुई। अग्नि लगाई गयी, तब-
तक दुबरी नाम की स्त्री ने रावण को विश्वास दिलाया कि हनुमान् का अभियोग मिथ्या है। मन्दोदरी ने कहा कि
तुमने सीता का अपहरण किया है। इसी लिए हनुमान् ने मेरा अपमान किया है। सीता को लौटाओ। बिहौर जाति
की कथाओं में सीता ने रावण के बलप्रयोग से बचने के लिए जादू द्वारा अपने शरीर में भयंकर फोड़े उत्पन्न कर
लिए। उक्त अनेक कल्पनाओं में वस्तुस्थितिनिरपेक्ष अपनी अपनी भावनाओं को जोड़ा गया है। इसी प्रकार ५४३ वें
अनु० में कहा गया है, वाल्मीकिरामायण (प्रक्षिप्त सर्ग ५८) में जब रावण सीता को मारने उठा तो मन्दोदरी ने
उसे रोका। इस वृत्तान्त के आधार पर परवर्ती रचनाओं में रंगनाथरामायण (५।७), धर्मखण्ड (अ० १०५),
अध्यात्मरामायण (५।२।३८), आनन्दरामायण (१।९।८४), भावार्थरामायण (५।८) तथा रामचरितमानस
(५।१०) के अनुसार भी मन्दोदरी सीतावध को रोकती है। बलरामदासरामायण के अनुसार त्रिजटा रोकती है।
काश्मीरीरामायण के अनुसार हरण के बाद ही सीता को मन्दोदरी की देख-रेख में रखा गया था।
५४४ वें अनु० में बुल्के कहते हैं कि प्रामाणिक वाल्मीकिरामायण में रावण-वध के पूर्व मन्दोदरी के
हस्तक्षेप का उल्लेख नहीं था। सुन्दरकाण्ड के एक प्रक्षेप, जो तीनों पाठों में मिलता है, के अनुसार मन्दोदरी ने
रावण को सीता का वध करने से रोका था। उत्तरपुराण के अनुसार मन्दोदरी ने यह भी याद दिलाया था कि किसी
पतिव्रता का स्पर्श करने से तुम्हारी आकाशगामिनी विद्या नष्ट हो जायेगी। उदीच्य पाठ के अनुसार प्रहस्तवध के बाद
भी मन्दोदरी ने परामर्श दिया था। राम से युद्ध मत करो, क्योंकि राम मनुष्यमात्र नहीं हैं। पश्चिमोत्तर पाठ के
अनुसार यज्ञध्वंस के प्रसङ्ग में मन्दोदरी के केशग्रहण का भी वर्णन है।
पीछे कहा जा चुका है कि सुन्दरकाण्ड का ५८ वाँ सर्ग प्रक्षेप नहीं है। बुल्के के अनुसार भी जब वह
तीनों पाठों में विद्यमान है और उसपर टीकाकारों ने टीकाएँ की हैं। जो सर्ग परम्पराप्राप्त नहीं उनपर टीकाकारों ने
५२८ रामायणमीमांसा सप्तदश
टीकाएँ नहीं लिखी हैं। अन्य राम-कथाओं में उसी का विस्तार हुआ है।
"नह्यमूलं प्ररोहति" सर्वथा निर्मूल का प्ररोहण नहीं हो सकता है। ५८ वें सर्ग को प्रामाणिक रामायण
में अविद्यमान कहना बुल्के का साहस ही है।
भावार्थरामायण (६।५५) में इन्द्रजित्-वध के बाद रावण मन्दोदरी को धमकी देकर बाध्य करता है
कि वह अशोकवन में जाकर रावण की इच्छा-पूर्ति के लिए सीता से अनुरोध करे। कई रचनाओं में उसी समय
मन्दोदरी ने सीता-वध से रावण को रोका था। अध्यात्मरामायण तथा आनन्दरामायण में यज्ञविध्वंस के बाद भी
मन्दोदरी ने सीता को लौटाने का रावण से अनुरोध किया था। रामचरितमानस में वह तीन बार रावण को
भगवान् की शरण लेने को कहती है। वाल्मीकिरामायण युद्धकाण्ड (सर्ग १११) में रावण-वध के बाद मन्दोदरी का
विलाप विस्तृतरूप से वर्णित है। पर बुल्के इसे भी प्रक्षेप कहकर आर्ष काव्य में उसका अभाव मानते हैं, जो कि
निराधार प्रलापमात्र है। वस्तुतः वह सर्ग भी प्रामाणिक ही है। अतएव टीकाएँ उसपर भी उपलब्ध होती हैं।
भावार्थरामायण (६।५५) के अनुसार मन्दोदरी रावण के साथ सती हो गयी। पर कहीं-कहीं विभीषण के साथ
उसके विवाह का भी वर्णन है। काश्मीरीरामायण के अनुसार मन्दोदरी एक अप्सरा थी, जो रावण के विनाशार्थ
पृथ्वी पर आयी थी।
त्रिजटा
वाल्मीकिरामायण के अनुसार त्रिजटा सीता का चरित्र देखकर उनकी ओर आकर्षित हुई थी। रावण के
चले जाने पर राक्षसियाँ सीता को डरा रही थीं तब त्रिजटा ने डाँट कर उनसे कहा, मैंने ऐसा स्वप्न देखा है जिससे
राक्षसों का विनाश और राम की विजय की सूचना मिलती है। तुम लोग सीता की शरण ग्रहण करो। यही तुम
लोगों को महान् भय से बचा सकती है—
“प्रणिपातप्रसन्ना हि मैथिली जनकात्मजा ।
अलमेषा परित्रातुं राक्षस्यो महतो भयात् ॥” (वा० रा० ५।२७।३९ )
युद्धकाण्ड में जब इन्द्रजित् ने राम और लक्ष्मण को नागपाश में बाँधा था तब रावण ने सीता तथा त्रिजटा
को पुष्पक पर बैठा कर रणभूमि में निःसहाय पड़े हुए राम और लक्ष्मण को दिखाया था। सीता दोनों को मृत
समझकर करुण विलाप करने लगी थी तब त्रिजटा ने आश्वासन दिया था कि राम और लक्ष्मण जीवित हैं। सीता
के प्रति उसने स्नेह को व्यक्त किया था—
“स्नेहादेतद् ब्रवीमि ते।” (वा० रा० ६।४८।२८ )
रामायणककविन (सर्ग २१) के अनुसार सीता राम को शरपाश में बँधा देखकर चिता तैयार करने का
निवेदन करती है, किन्तु त्रिजटा अपने पिता विभीषण से मिलने जाती है और राम के कुशल-क्षेम का शुभ समाचार
लेकर लौटती है।
५४६ वें अनु० में बुल्के कहते हैं कि “सीता की त्रिजटा से अन्य हितैषिणी राक्षसियों की भी चर्चा है।
वाल्मीकिरामायण सुन्दरकाण्ड में विभीषण की पुत्री तथा पत्नी की चर्चा है। सीता कहती है कलानामक विभीषण
की ज्येष्ठा पुत्री ने अपनी माता के आदेशानुसार मुझसे कहा है कि विभीषण तथा अविन्ध्य के सत्परामर्शों की अवज्ञा
करके रावण ने सीता को लौटाना हठपूर्वक अस्वीकार कर दिया है। उदीच्य पाठ के अनुसार उसका नाम नन्दा था।
जानकीपरिणय में उसका अनला नाम उल्लिखित है। रावण ने राम का मायामय शीर्ष दिखलाया था। किन्तु सरमा
ने सीता के पास आकर रावण के छल-कपट का रहस्य प्रकट किया था। सरमा ने सीता को यह शुभ समाचार दिया
अध्याय सुन्दरकाण्ड ५२९
कि राम समुद्र पार कर लङ्का के निकट आ गये हैं। उसने यह भी समाचार दिया कि रावण ने अपनी माता और
सभासदों का अनुरोध ठुकरा कर सीता को लौटाना अस्वीकार कर दिया है। सरमा सीता की प्रणयिनी सखी है।
उसके साथ सीता की मैत्री थी ( वा० रा० ६।३३।३ ) । उदीच्य पाठ तथा गौड़ीय पाठ ५।५२ एवं पश्चिमोत्तरीय
पाठ ५।५१ में "सरमावाक्य" नामक सर्ग पाया जाता है, जिससे सरमा सीता के लिए लङ्का-दहन का वर्णन करती
है। उपर्युक्त वृत्तान्तों में सरमा तथा विभीषण का कोई सम्बन्ध नहीं प्रतीत होता है। सीता-हनुमान्-संवाद के
अन्तर्गत सीता हितकारिणी के रूप में विभीषण की पत्नी का उल्लेख है। बाद में सीता की प्रिय सखी सरमा के उन
उपकारों का वर्णन मिलता है। बुल्के कहते हैं उत्तरकाण्ड के व्यासों ने सरमा को विभीषण की पत्नी घोषित कर
दोनों को अभिन्न माना है। उत्तरकाण्ड के अनुसार धर्मज्ञा सरमा गन्धर्वराज शैलूष की पुत्री है। उसके नाम की
व्युत्पत्ति के विषय में कहा गया है कि सरोवर की बाढ़ आते देख कर शिशु रोने लगा तो माँ ने कहा था "सरो मा
वर्धत" इसी लिए शिशु का नाम सरमा हो गया ( वा० रा० ७।१२।२४-२६ ) ।"
वस्तुतः बुल्के भारतीय विचारपद्धति से अपरिचित हैं; इसी लिए वे जैसी तैसी शङ्काएँ उठाते हैं और
उन्हीं के आधार पर कुछ का कुछ निर्णय कर बैठते हैं। पहले उनकी यह कल्पना ही असंगत है कि उत्तरकाण्ड और
बालकाण्ड वाल्मीकिरामायण के अंश नहीं हैं। वस्तुतः पूर्वकथनानुसार सातों काण्ड रामायण वाल्मीकिकृत है। जब
वाल्मीकिरामायण में ही एक स्थल में विभीषण के पत्नीमात्र का उल्लेख है और अन्य स्थल में उसके नाम का भी
उल्लेख है। ऐसी स्थिति में दोनों का समन्वय हो कर लेना उचित है। संदिग्ध वाक्यों के अर्थ का वाक्यशेष से निर्णय
किया ही जाता है। जैसे—'यवैर्यजेत्' वाक्य में 'यवों' से यजन करने का उल्लेख है, परन्तु 'यव' शब्द से कई स्थलों
में प्रियङ्गु का ग्रहण होता है। परन्तु—
"वसन्ते सर्वसस्यानां जायते पत्रशातनम् ।
मोदमानाश्च तिष्ठन्ति यवाः कणिशशालिनः ॥"
इस वाक्य के अनुसार वसन्त में होनेवाला कणिशशाली औषधि यव है। प्रियङ्गु तो वसन्त में रहती ही
नहीं। यह निर्णय होता है। वाल्मीकिरामायण में न सही अन्य पुराणों में भी अगर विभीषण-पत्नी का नाम सरमा
निश्चित हो तो भी उसके अनुसार वाल्मीकिरामायण में विभीषण-पत्नी का वही नाम निश्चित किया जा सकता है,
क्योंकि सामान्य का विशेष के साथ समन्वय होता है। विभीषण-पत्नी का कोई नाम होगा ही। उपलब्ध विशिष्ट
नाम से सामान्य की विशेष आकांक्षा पूर्ण हो जाती है। अतः विभीषण की पत्नी का 'सरमा' नामनिर्धारण उचित
ही है और यह व्यासों का निर्णय न होकर उत्तरकाण्ड वाल्मीकिरामायण का ही निर्णय है। उसे वाल्मीकिरामायण
न मानना दुराग्रह ही है।
५४७ वें अनु० में बुल्के कहते हैं, "रामायण और महाभारत में कहीं भी विभीषण और त्रिजटा के
सम्बन्ध का उल्लेख नहीं है। किन्तु परवर्ती साहित्यों में सीता के प्रति कला तथा सरमा के उपकारों का श्रेय त्रिजटा
को दिया गया है। फलस्वरूप त्रिजटा को विभीषण की पत्नी या पुत्री माना गया है। उदाहरणार्थ—गोविन्दराजटीका
(५।२७।४), कम्बरामायण ( ५।६ ) तथा आनन्दरामायण में त्रिजटा को विभीषण की पत्नी माना है—
"त्रिजटानाम्नी विभीषणप्रियानुगा" ( आ० रा० १।९।११ ) । रामकियेन के अनुसार रावण ने विभीषण
को निर्वासित कर उसकी पत्नी त्रिजटा को सीता की सेवा में नियुक्त किया था।" किन्तु इस सम्बन्ध में यह भी ध्यान
देना उचित है कि आपातमात्र विरोध विरोधाभास ही कहा जाता है। उस विरोधाभास का परिहार करना उचित
है। अतएव गोविन्दराज त्रिजटा को सरमा से अन्य विभीषण की दूसरी पत्नी कहते हैं। महाभारत रामोपाख्यान में
सीता ने हनुमान् से कहा था कि त्रिजटा ने मुझे अविन्ध्य का यह सन्देश दिया है कि राम और लक्ष्मण सकुशल हैं।
६७
५३० रामायणमीमांसा समदश
वे वानर-सेना लेकर तुम्हें छुड़ाने आ रहे हैं। रावण से मत डरना, क्योंकि नलकूबर के शाप के कारण वह तुम्हारा
कुछ भी बिगाड़ नहीं सकता है (म० भा० ३।२६४।५८)।
बुल्के कहते हैं "वाल्मीकिरामायण के अनुसार सीता ने कला नामक विभीषण की पुत्री की चर्चा की है।
त्रिजटा के स्वप्न के प्रसङ्ग के अतिरिक्त महाभारत के अन्य स्थल पर त्रिजटा का उल्लेख है। रावणवध के बाद
लङ्का से चलने के समय राम ने त्रिजटा को अर्थ और सम्मान प्रदान किया था—
“त्रिजटां चार्थमानाभ्यां योजयामास राक्षसीम् ।” (म० भा० ३।२७५।३९)”
परन्तु वस्तुतः इससे भी रामायणोक्त वृत्तान्त का बाध नहीं होता है। विभीषण-पत्नी होने के नाते और
सीता की अधिक प्रिय होने के कारण त्रिजटा का अधिक सम्मान असङ्गत नहीं है।
रघुवंश (१२।७४), सेतुबन्ध (सर्ग ११) आदि में मायाशीर्ष के प्रसङ्ग में त्रिजटा ही सरमा का स्थान
लेती है। प्रसन्नराघव में सीता के अनुरोध से त्रिजटा आकाश में स्थित होकर मेघनाद द्वारा हनुमान् के बन्धन और
लङ्का-दहन का वर्णन करती है। उदीच्य पाठ में इस प्रसङ्ग में सरमा की चर्चा है। बुल्के इसमें इस निष्कर्ष पर
पहुँचते हैं कि “वाल्मीकिरामायण के अनुसार विभिन्न राक्षसियों ने जो कुछ भी उपकार किया था, वह सब बाद में
त्रिजटा का उपकार माना गया है। राम-कथा के कवियों ने इतने से ही सन्तुष्ट न होकर कथानक में त्रिजटा का
महत्त्वपूर्ण स्थान बना दिया है।” परन्तु बुल्के को यह जानना चाहिये कि वस्तुस्थितिहीन कल्पना का कोई महत्त्व नहीं
होता। वाल्मीकिरामायण में ही त्रिजटा का महत्व वर्णित है। त्रिजटा के स्वप्न को ही ले लिया जाय तो केवल
एक वही त्रिजटा का महत्त्व ख्यापन के लिए पर्याप्त है। अतएव महाभारत रामोपाख्यान में भी त्रिजटा को महत्त्व
दिया गया है। सरमा और कला का भी राम-भक्तों के हृदय में आदर है। परन्तु संक्षेप की दृष्टि से सब का वर्णन
सम्भव नहीं होता। वाल्मीकिरामायण तो सबका आकर ग्रन्थ है ही। उसमें सरमा तथा कला का भी महत्त्व-
वर्णन है ही।
यह ठीक है कि त्रिजटा ने गुप्तचर बनकर सीता को रावण की सभा के समाचार भी दिये थे। बाल-
रामायण (अंक ८) के अनुसार सुमुख तथा दुर्मुख द्वारा नरान्तक-वध, कुम्भकर्ण-जागरण तथा इन्द्रजित् के
निकुम्भिला-प्रवेश आदि के समाचार भी सीता को त्रिजटा ने दिये थे। इन्द्रजित्-वध के बाद लक्ष्मण का शङ्खनाद सुन-
कर सीता ने त्रिजटा को भेज दिया था और उससे युद्ध का सब समाचार सुनकर प्रसन्न हुई थी। रामचरितमानस के
अनुसार वह रामचरणरत एवं विवेकनिपुण थी, इत्यादि बातें वाल्मीकिरामायण के अविरुद्ध होने तथा परम्पराप्राप्त
होने से प्रामाणिक ही हैं।
यहीं बुल्के ने जैनी राम-साहित्य की रचनाओं की चर्चा करते हुए बतलाया है कि “यद्यपि पउमचरियं और
उत्तरपुराण में त्रिजटा का उल्लेख नहीं है। तथापि स्वयम्भूदेवकृत पउमचरियं (४९।१०) में त्रिजटा को सीता की
हितैषिणी नहीं माना गया है। जब हनुमान् द्वारा गिरायी गयी राम-मुद्रिका को देखकर सीता आह्लादित हो उठी
तो त्रिजटा रावण के पास जाकर कहती है कि आज आपका जीवन सफल है। आपकी प्रतिज्ञा पूरी होगी, क्योंकि
भट्टारिका सीता हँस रही है। हेमचन्द्र के ग्रन्थों में भी ऐसी ही बातें हैं। उनके अनुसार सीता को उपवन में रखने
के बाद सीता प्रलोभन देने के लिए त्रिजटा को ही रखा गया है (योगशास्त्र १ ११७) ।” प्रायः वाल्मीकिरामायण
के विरुद्ध और विलक्षण रचना के लिए जैन विद्वान् प्रस्तुत ही रहते हैं, अतः वैसा होना आश्चर्य की बात नहीं है,
किन्तु यह सब जैनों का पाखण्ड।
१. यह योगशास्त्र जैनों का है। पातञ्जल योगदर्शन नहीं है।
संध्यार्थ सुन्दरकाण्ड ५३१
रामायणककविन के अनुसार ३०० राक्षसियां तो सीता को डराने धमकाने के लिए नियुक्त की गयी थीं।
उनमें एक त्रिजटा भी थी, जो सीता का पक्ष लेती थी। उसकी सहानुभूति पाकर सीता ने अपनी कथा उसे सुनायी
थी। दोनों मन्दिर में प्रार्थना करने गयी थीं। राम और लक्ष्मण के मायामय शीर्ष देखकर सीता अग्नि में प्रवेश
करने के लिए प्रस्तुत हुई थी, किन्तु त्रिजटा ने उनका साथ दिया। उसने विभीषण से समाचार लेकर राम और
लक्ष्मण के जीवित रहने का समाचार देकर सीता को अग्नि-प्रवेश से विरत किया। ऐसे ही शरबन्ध से बँधे हुए राम
और लक्ष्मण को देखकर भी सीता विकल हुई थी। उस समय भी त्रिजटा ने विभीषण से मिलकर सीता को
आश्वासन दिया था। अग्निपरीक्षा के समय भी त्रिजटा ने सीता के सतीत्व का साक्ष्य दिया था। वह बाद में सीता
के साथ अयोध्या चली आयी थी (सर्ग २४)। वाल्मीकिरामायण से अनुप्राणित कथाओं में त्रिजटा का महत्त्व-वर्णन
होना स्वाभाविक ही है।
५४८वें अनु० में बुल्के का यह कहना असङ्गत ही है कि “रामायण के प्रक्षिप्त सर्ग २८, २९ के अनुसार
सीता हनुमान् के आगमन के ठीक पहले देहत्याग के लिए फाँसी लगाने का विचार कर रही थी। इतने में शुभ शकुन
प्रकट हुए”, क्योंकि उक्त दोनों सर्ग प्रक्षेप नहीं हैं। उनकी सङ्गति है, अतएव उनपर टीकाएँ हैं। इसी लिए अध्यात्म-
रामायण, आनन्दरामायण आदि में भी उक्त वर्णन है। रामकियेन के अनुसार सीता फाँसी लगा चुकी थी। हनुमान्
ने फाँसी की गाँठ खोल दी ।
सीता-हनुमान्-संवाद
वाल्मीकिरामायण के अनुसार यह ठीक ही है कि हनुमान् अशोकवाटिका में सीता को देखकर बहुत प्रसन्न
हुए और सोचने लगे कि यदि मैं सीता से बिना भाषण किये एवं उन्हें आश्वस्त बिना किये जाता हूँ तो सीता ने
क्या कहा है ? राम के यह पूछने पर क्या उत्तर दूंगा ? इसके अतिरिक्त आश्वासन दिये बिना जाने से सीता राम के
आगमन से पहले ही प्राणत्याग कर सकती हैं। फिर सेनासहित राम का लङ्का आगमन ही व्यर्थ हो जायेगा, अतः
मैं सूक्ष्म वानरतनु से सीता से मानुषी संस्कृता वाणी से भाषण करूँगा। यदि मैं द्विजाति के समान संस्कृत देववाणी
बोलूंगा तो मुझे रावण समझकर सीता भयभीत हो सकती हैं। अतः अवश्य ही मुझे मानुष-वाक्य ही बोलना
चाहिये—
“वाचं चोदाहरिष्यामि मानुषीमिह संस्कृताम् ।
यदि वाचं प्रदास्यामि द्विजातिरिव संस्कृताम् ।।
रावणं मन्यमाना मां सीता भीता भविष्यति ।
अवश्यमेव वक्तव्यं मानुषं वाक्यमर्थवत् ।।
- मया सान्त्वयितुं शक्या नान्यथेयमनिन्दिता ।।” (वा० रा० ५।३०।१७–१९)
हनुमान् ने सीता के सुनने योग्य स्वर में रामचरित का संक्षिप्त वर्णन किया। उसे सुनकर सीता को
विस्मय हुआ। उन्होंने आँखें उठाकर शिंशपा वृक्ष पर हनुमान् को देखा। हनुमान् ने अपने को रामदूत कहकर राम
के कुशल-क्षेम का समाचार सुनाया। सीता को हर्ष हुआ। पश्चात् कामरूपी रावण समझकर सीता सन्देह में पड़
गयीं। हनुमान् ने सीता को राम की मुद्रिका अर्पित की तथा आश्वासन दिया कि राम शीघ्र आनेवाले हैं। सीता
विश्वस्त होकर यह सन्देश देने लगी कि राम मुझे जीवित पाना चाहें तो दो महीनों के अन्दर आ जायें । हनुमान् सीता
को अपनी पीठ पर ले जाने का प्रस्ताव करते हैं। सीता पहले तो हनुमान् की सामर्थ्य पर सन्देह करती हैं। जब
हनुमान् ने अपनी शक्ति को प्रमाणित किया तो पीछे अनेक अन्य न जाने के हेतु देकर अन्त में कहती हैं, मैं राम को
छोड़कर स्वतः दूसरे का शरीरस्पर्श नहीं करना चाहती—
“भर्तृभक्तिं पुरस्कृत्य रामादन्यस्य वानर ।
नाहं स्प्रष्टुं स्वतो गात्रमिच्छेयं वानरोत्तम ॥” ( वा० रा० ५।३७।६२ )
हनुमान् ने यह तर्क मान लिया ( सर्ग ३९) । सीता ने पुनः कहा—राम ही रावण को परास्त कर
मुझे ले जायें—
“रावणमुत्पाट्य राघवो मां नयतु ॥” ( वा० रा० ५।५८।१०१ )
लुक छिपकर मुझे ले जाना राम को शोभा नहीं देगा । उनकी कीर्ति के लिए आवश्यक है कि रावण पर
विजय प्राप्त कर लें—
“बलैः समग्रैर्युधि मां रावणं जित्य संयुगे ।
विजयी स्वपुरीं यायात् तत्तस्य सदृशं भवेत् ॥” ( वा० रा० ५।३९।२९ )
“बलैः समग्रैर्यदि मां हृत्वा रावणमाहवे ।
विजयी स्वपुरं रामो नयेत्तत्स्याद्यशस्करम् ॥” ( वा० रा० ५।६८।१२ )
“यथाहं तस्य वीरस्य वनादुपधिना हृता ।
रक्षसा तद्भयादेव तथा नार्हति राघवः ॥” ( वा० रा० ५।६८।१३ )
बुल्के इस सर्ग को भी प्रक्षेप कहते हैं । परन्तु यह भी उनकी धारणा गलत है। यह सर्ग टीकाकारसम्मत
तथा परम्पराप्राप्त है ।
अभिज्ञान
बुल्के कहते हैं, वाल्मीकिरामायण के प्रामाणिक सर्गों में चूड़ामणि तथा काकवृत्तान्त दो अभिज्ञानों की
चर्चा है । महाभारत के रामोपाख्यान में भी दो का ही वर्णन है ( ३।२६६।६६, ६७) । वाल्मीकिरामायण के
अनुसार हनुमान् मैनशिल के तिलक का स्मरण दिलाकर राम को एक तीसरा अभिज्ञान देते हैं—
“मनःशिलायास्तिलको गण्डपार्श्वे निवेशितः ।” ( वा० रा० ५।४०।५ )
लङ्का-दहन
लङ्का-दहन अंश को भी बुल्के प्रक्षेप मानते हैं, पर उनका यह मन्तव्य असङ्गत है । यह बात पहले
कही जा चुकी है। रावण के बल का परिज्ञान एक सफल दूत के लिए परम आवश्यक था। इसी उद्देश्य से हनुमान्
ने अशोकवन नष्ट किया और रावण के भेजे योद्धाओं जम्बूमाली, सात मन्त्रि-पुत्रों, पाँच सेनापतियों तथा रावण-पुत्र
अक्षय का वध किया । इन्द्रजित् द्वारा ब्रह्मास्त्र से बद्ध होकर हनुमान् ने रावण के पास पहुँच कर अपने को सुग्रीव
द्वारा भेजा हुआ राम-दूत बतलाया और सीता को लौटाने का अनुरोध किया । रावण क्रुद्ध होकर उन्हें वध का दण्ड
देना चाहता था, पर विभीषण की आपत्ति पर ध्यान देकर घृत और तेल युक्त वस्त्रों से वेष्टित पूँछ में आग लगा
देने का निर्णय हुआ । सीता को समाचार मिलने पर उन्होंने अग्निदेव से प्रार्थना की कि वह हनुमान् के लिए ठण्डे
हो जायें—“शीतो भव हनूमते” ( वा० रा० ५।५३।२७ ) । फलस्वरूप हनुमान् ने शीतलता का अनुभव किया ।
उन्होंने इसे सीता की दयालुता, राम का प्रभाव तथा अग्नि से अपने पिता की मित्रता का परिणाम माना । हनुमान्
ने अपना शरीर बढ़ा कर पुनः लघु करके उस बन्धन से अपने को मुक्त कर लिया और फिर आकार बढ़ा कर विभी-
षण का गृह छोड़ कर शेष लङ्का को भस्म कर डाला ।
अन्त में जलती हुई पूँछ समुद्र में बुझा ली । तब उन्हें सीता की कुशल के सम्बन्ध में चिन्ता हुई । किन्तु
शकुनों तथा चारणों के गीतों से उन्हें आश्वासन मिला ( वा० रा० ५।५५।२९-३४ ) । अध्यात्मरामायण के अनुसार
हनुमान् को भूख लगी थी। उन्होंने सीता की अनुमति लेकर अशोकवन के फल खाये और प्रणाम करके चले गये, कुछ
दूर चले जाने पर उन्होंने सोचा कि रावण से मिलकर जाना अच्छा है। इसलिए वे अशोकवन उजाड़ने लगे। आनन्द-
रामायण के अनुसार उन्होंने सीता की आज्ञा लेकर पूँछ से वृक्षों को हिलाकर फल गिरा दिये और खाये। वृक्ष भी
गिरा दिये।
रामचरितमानस के अनुसार—
'रहा न नगर वसन घृत तेला।
बाढ़ी पूँछ कीन कपि खेला॥' ( रा० मा० ५।२४।३ )
आनन्दरामायण आदि कई ग्रन्थों के अनुसार हनुमान् की पूंछ में आग लगाने के सब प्रयास व्यर्थ होने पर
हनुमान् ने कहा—यदि रावण स्वयं फूंक मारे तो अग्नि प्रदीप्त हो सकेगी। रावण ने वैसा किया तो उसके दसों सिरों
और मूंछ दाढ़ी में अग्नि लग गयी। मुंह पर थप्पड़ मार कर वह बुझाने लगा जिससे सब राक्षस खिलखिला कर
हँसने लगे।
आनन्दरामायण ( १।९।२०९-२११) के अनुसार दस करोड़ राक्षसों को लेकर रावण लड़ने निकला।
हनुमान् ने लोहस्तम्भ से सबको मारा। पूंछ में करोड़ों राक्षसों को लपेट कर उन्हें रावण के सिर पर दे मारा जिससे
वह मू्र्च्छित हो गया। उसी समय देवकन्याओं एवं देवताओं की मुक्ति की चर्चा भी है। वस्तुतः रामायण की अवि-
भाज्य अङ्गभूत लङ्का-दहन की घटना महत्वपूर्ण वस्तु है। उस समय अनेक घटनाएँ घटी होंगी। शतकोटिप्रविस्तर
रामायण में उनका विस्तार होगा ही। उपलब्ध वाल्मीकिरामायण में तो उसका संक्षेप ही हो सकता है। अनेक लोगों
ने उसको विकृत करके अन्यथा भी वर्णन किया ही है।
५५३ वें अनु० में बुल्के कहते हैं, "लङ्का-दहन के पश्चात् केवल दो ही सर्ग प्रामाणिक हैं। उनके अनुसार
लङ्का की घटनाओं के सम्बन्ध में हनुमान् ने यही कहा कि मैंने सीता को देखा, परन्तु यह कितनी अस्वाभाविक बात
है यह बताने की आवश्यकता नहीं। सर्ग ६५ में में हनुमान् चूड़ामणि देकर राम से अपनी लङ्का-यात्रा का यों वर्णन
करते हैं—समुद्र-लङ्घन करके मैंने रावण के यहाँ सीता को देखा। वह राक्षसियों से घिरकर आप ही का चिन्तन
करती हैं। वह आपका समाचार पाकर अत्यन्त प्रसन्न हुईं तथा अभिज्ञान स्वरूप उन्होंने चूड़ामणि के अतिरिक्त काक-
वृत्तान्त तथा मैनशिल के तिलक के विषय में आपको स्मरण दिलाने को कहा है तथा यह भी निवेदन किया है कि मैं
केवल एक महीने तक ही जीवित रह सकूँगी। अन्त में हनुमान् ने राम से यह प्रस्ताव किया कि 'समुद्र पार करने की
तैयारियाँ प्रारम्भ हो जायँ।" वस्तुतः बुल्के आदि लेखक के अभिप्राय से नहीं, किन्तु अपने दृष्टिकोण से उसके लेख की
छान-बीन और काट-छाँट करते हैं, पर यह सङ्गत नहीं है। समालोचकों की दृष्टि भी एक-सी नहीं होती है। एक
साहित्यिक और दार्शनिक तथा न्यायवादी की दृष्टि समान नहीं हो सकती।
संक्षेप और विस्तार की भी पृथक्-पृथक् दृष्टियाँ होती हैं। एक न्यायवादी एडवोकेट विषय के अनुसार
अन्यूनानतिरिक्त शब्दों का प्रयोग करना चाहेगा। वैयाकरण एक मात्रा के लाघव से पुत्रोत्सव मनायेगा। परन्तु
साहित्यिक और दार्शनिक अपनी बातों को रोचकता के साथ हृदयङ्गम कराने के लिए शब्ददारिद्र्य और ग्रन्थदारिद्र्य
का आदर कदापि नहीं करेगा। महर्षि वाल्मीकि महान् दार्शनिक एवं साहित्यिक हैं। हमें उनकी कृतियों का
विश्लेषण, अर्थलाघव तथा गुण-दोष-विचार का अधिकार हो सकता है, परन्तु अपनी दृष्टि के अनुसार यह कहने का
अधिकार नहीं है कि अमुक सर्ग अनावश्यक है, अतएव वह प्रक्षेप है। पुनरावृत्ति अनेक स्थलों में दूषण नहीं होती और
आंशिक पुनरावृत्ति तो उत्तम लेखकों में भी होती है। वेदों एवं उपनिषदों में भी वह दृष्ट है। हनुमान् ने ५७ वें सर्ग
में पहले सीता को देखा इतना ही कहा, इसपर वानरों में खुशी की लहर दौड़ गयी। कोई किलकिला शब्द तो कोई
गर्जन करते हुए उछल-कूद करने एवं पूँछ पटकने लगे और सब एकस्वर से हनुमान् की प्रशंसा करने लगे। ५८ वें
सर्ग में जाम्बवान् ने सारा वृत्तान्त विस्तार सहित कहने का अनुरोध किया। क्रूरकर्मा रावण का सीता से कैसा
व्यवहार है ? तुमने सीता को कैसे ढूँढ़ा ? उन्होंने क्या कहा ? सब सुनकर हम लोग विचार करेंगे कि राम के पास
जाकर क्या कहना है एवं क्या नहीं कहना है--
यश्चार्थस्तत्र वक्तव्यो गतैरस्माभिरात्मवान् ।
रक्षितव्यं च यत्तत्र तद् भवान् व्याकरोतु नः ॥”
यह सुनकर हनुमान् ने रोमाञ्चयुक्त होकर हर्ष से उन सीतादेवी को नमस्कार कर अपनी यात्रा का सम्पूर्ण
वृत्तान्त सुनाया । इसी में मैनाक, सुरसा, सिंहिका तथा लङ्किनी का वृत्तान्त भी कहा। सीतान्वेषण, सीतादर्शन,
सीता-रावण-संवाद, सीता की दृढ़ता, त्रिजटा का स्वप्न एवं उसके द्वारा सीता का आश्वासन, सीता से संभाषण,
मुद्रिकासमर्पण, सीता का आश्वासन, अभिज्ञानग्रहण, अशोकवन का उत्सादन, राक्षसों से युद्ध, मेघनाद से युद्ध, ब्रह्मास्त्र
से बन्धन, रावण-भाषण, लङ्का-दहन, पुनः सीतादर्शन और लौटने का वर्णन किया। पुनः सीतामाहात्म्य और उनकी
स्थिति का वर्णन ५९ वें सर्ग में किया है। ६० वें सर्ग में अङ्गद ने कहा कि हम सब लङ्का को नष्ट करके, रावण
को मारकर एवं सीता को लेकर राम के सामने रख दें; यही ठीक है। परन्तु जाम्बवान् की बात मानकर सब लोगों
ने राम, लक्ष्मण और सुग्रीव के पास जाना ही उचित समझा। जाम्बवान्, अङ्गद, हनुमान् आदि के साथ सभी बलवान्
वानर आनन्द एवं आह्लाद के उद्रेक में मधुवन में जाकर रक्षकों एवं दधिमुख आदि को निगृहीत कर
मधु-पान, फल-भक्षण आदि करके आमोद-प्रमोद करने लगे । परिस्थिति के अनुसार मधुवन में प्रवेश कर
मधु तथा फल आदि का खान-पान करना असङ्गत नहीं है । महान् कार्य सम्पादित करने के अनन्तर खुशियों
में ऐसे कार्य होते ही हैं। रक्षकों के पुकार करने पर सब समाचार जानकर सुग्रीव ने सारी स्थिति का अनुमान
कर लिया एवं रक्षकों के द्वारा ही सबको बुलाया। ६४ वें सर्ग में अङ्गद और हनुमान् को पुरस्कृत कर (नेता
बनाकर ) सब लोग राम के पास आये । सुग्रीव ने कमलोचन रामको बतलाया कि अङ्गद की प्रसन्नता से स्पष्ट होता
है कि कार्य करके वे लोग आये हैं, बिना कार्य किये मधुवनध्वंस करने का साहस नहीं हो सकता था और वह कार्य
हनुमान् से ही हो सकता है। उनमें सिद्धि, मति, अध्यवसाय एवं शौर्य सब प्रतिष्ठित हैं। जहाँ जाम्बवान् नेता हो,
हनुमान् और अङ्गद अधिष्ठाता हों वहाँ कार्यसिद्धि में अन्यथा मति नहीं हो सकती । ६५ वें सर्ग में राम के सन्निधान में
आकर हनुमान् ने सीता का वृत्तान्त बतलाया। सीता कहाँ हैं ? मेरे प्रति उनका कैसा भाव है ? राम के इस कथन
को सुनकर हनुमान् ने जिधर सीता थीं उस दिशा की ओर सीता को प्रणाम करके सीता का दर्शन बताया और
देदीप्यमान काञ्चनमय दिव्यमणि राम को प्रदान की और हाथ जोड़कर राम से कहा कि सौ योजन समुद्र का लङ्घन
कर मैं सीता-दर्शन की इच्छा से लङ्का गया। वहाँ दुरात्मा रावण के यहाँ मैंने सीता को देखा । वह आप में ही जीवन
अर्पित करके राक्षसीगण द्वारा बार बार तर्जित होकर रह रही हैं। वे एकवेणीधारिणी, चिन्तापरायण, भूमिशयन
से विशीर्णाङ्गी होकर हिमागम से पद्मिनी के समान मुरझायी हुई, मरने का निश्चय किये हुए, रावण से सर्वथा विमुख
तथा आप में मन लगा कर स्थित हैं। मैंने शनैः शनैः इक्ष्वाकुवंश का कीर्तन करते हुए उन्हें आश्वासन दिया और
उनसे भाषण किया । उन्हें यहाँ की स्थिति बतलायी । राम और सुग्रीव के सख्य का समाचार सुनकर वह बहुत
प्रसन्न हुईं । उनका उदात्त समाचार नियत है। आपमें उनकी सदा स्थिर भक्ति है। उग्र तपस्या और आपकी भक्ति
से युक्त जनकनन्दिनी को मैंने देखा। यह काञ्चन मणिरूप अभिज्ञान देकर उन्होंने काकवृत्तान्त भी कहा। मनःशिला
के तिलक का भी स्मरण दिलाया और कहा है कि मैं मास भर से अधिक जीवन नहीं रख सकूँगी । हनुमान् ने कहा,
अतः शीघ्र ही सागर पारकर प्रस्थान करना चाहिये ।
बुल्के तो अप्टूडेट वकालती वर्णन चाहते हैं। वस्तुस्थिति या तो समझते ही नहीं या भूल जाते हैं।
स्वाभाविक वर्णन को भी प्रक्षेप कहने का निराधार साहस करते हैं। ६६ वें सर्ग में हनुमान् की बात सुनकर मणि
को हृदय से लगाकर राम रोने लगे और अश्रुपूर्ण नयनों से मणि को देखते हुए सुग्रीव से कहते हैं जैसे वत्स को
देखकर वत्सला धेनु स्नेहस्रुत होती है वैसे ही इस मणिश्रेष्ठ को देखकर मेरा हृदय स्रुत होता है। यज्ञ से सन्तुष्ट होकर
देवराज ने जनक को यह मणि प्रदान की थी। जनक ने विवाहकाल में सीता की माता के हाथ से लेकर मेरे पिता
दशरथ के हाथ में दी थी। उन्होंने वैदेही के मूर्धा को उससे अलङ्कृत किया था। आज उस मणि के दर्शन से मैं
वैदेही के मिलने के सुख का अनुभव कर रहा हूँ। राम पुनः हनुमान् से पूछने लगे, वैदेही ने और क्या कहा है।
सौमित्रे, वैदेही के बिना आयी हुई मणि को मैं देख रहा हूँ। इससे अधिक क्या दुःख होगा। वैदेही मास भर जीवित
रहेगी यह तो बहुत है मैं तो क्षणभर भी उनके बिना जीवित नहीं रह सकता। इस प्रकार ६६ वें सर्ग में राम ने
विलाप किया। हनुमान् ने पुनः ६७ वें सर्ग में सविस्तर सीता का सन्देश सुनाया। राम सेना सहित आकर लङ्का
को विध्वस्त करके मुझे ले जायें, यही उनके स्वरूप के अनुरूप है। परन्तु समुद्र पारकर यहाँ सेना सहित राघव का
आना कैसे हो सकेगा। इसपर मैंने कहा देवि, वानरों और भालुओं के राजा सुग्रीव के पास बहुत बड़े बलशाली तथा
विक्रम-संपन्न योद्धा हैं। उनकी गति ऊपर, नीचे तथा तिर्यक् कहीं भी रुद्ध नहीं होती। मैं तो उनमें से एक बहुत
छोटा हूँ। एक छलाँग में हरिवीर यहाँ आ जायेंगे। राम और लक्ष्मण दोनों सूर्य और चन्द्र के तुल्य मेरे पृष्ठ पर
आरूढ़ होकर आ जायेंगे। देवि, तुम नख-दंष्ट्रा आयुधवाले वीरों का गर्जन शीघ्र ही सुनोगी और शीघ्र ही वनवास की
अवधि पूरी कर अयोध्या में अभिषिक्त राम को देखोगी। इस तरह कल्याणमयी अभीष्ट उदारवाणी द्वारा प्रसादित
होकर अदीनभाषिणी एवं आपके विरह से अतिपीड़ित सीता ने शान्ति प्राप्त की (सर्ग ६८)।
कानूनी लिखा-पढ़ी की बात पृथक् है। व्यावहारिक स्वाभाविक बात यही है कि बहुत काल के अनन्तर
प्रियजन के सम्बन्ध में समाचार मिलने पर उससे बार-बार पूछा जाता ही है। सविस्तर जानकारी की इच्छा होती
ही है। उन्हीं स्वाभाविक व्यावहारिक चरित्रों का चित्रण वाल्मीकि ने किया है। यह भूमिका भी न भूलनी चाहिए
कि सीता वाल्मीकि के आश्रम में थीं। सीता के चरित्रों के सम्बन्ध में कुछ विपरीत चर्चाओं के कारण उन्हें बनवास
दिया गया था। उसके लिए अनेक अन्य उपायों के बदले आप्तकाम, पूर्णकाम, अभ्रक्ष, वायुभक्ष, कन्दमूलफलाशी,
वल्कलवसनधारी, वीतराग महर्षि के द्वारा सीता के पवित्र चरित्रों का सत्य वर्णन किया जाय। इसी दृष्टि से पुनः
पुनः विभिन्न प्रसङ्गों द्वारा सीता के चरित्रों का वर्णन करना आवश्यक था। जाम्बवान् तथा राम की भी जिज्ञासा
के प्रसङ्ग से महर्षि ने सीता की जीवनचर्या, वार्तालाप, सीता-रावण-संवाद तथा सीता की दृढ़ तपस्या और उनके
तनिक तनिक व्यवहारों और वार्तालापों का वर्णन किया है। इसी दृष्टि से विभिन्न घटनाओं का भी यथावत् वर्णन
किया गया है, जिससे उस समय के उन लोगों को जिन्होंने उन घटनाओं को आँखों से देखा था, आँखों देखी
घटनाओं का यथावत् वर्णन सुनकर उस इतिहास या काव्य में विश्वास होना स्वाभाविक था। उसी सम्बन्ध से
उन लोगों ने सीतासम्बन्धी घटनाओं की भी सच्चाई जानना चाहा होगा और महर्षि वाल्मीकि द्वारा ठीक वर्णन
सुनकर उन्हें अवश्य ही समाधान प्राप्त हुआ होगा।