रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय सुन्दरकाण्ड ५२३
इसी प्रकार- "मयि दृष्टे तु रक्षोभी रामस्य विदितात्मनः ।
भवेद् व्यर्थमिदं कार्यं रावणानर्थमिच्छतः ॥” (वा० रा० ५।२।४०)
के अनुसार हनुमान् ने स्वयं कहा था कि यदि मैं राक्षसों द्वारा देखा गया तो राम के कार्य में बाधा पड़
जायगी, इसका भी कोई विरोध नहीं है, क्योंकि वह सब वितर्कमात्र है । वितर्क में बहुत आरोप हो सकते हैं । अतः वही
कहा गया है कि यहाँ कोई व्यक्ति राक्षसरूप में भी राक्षसों से अविज्ञात नहीं रह सकता, फिर अन्यरूप में तो कहना ही
क्या है ? (सर्ग ४१) । वायु भी यहाँ अज्ञात नहीं रह सकता । भीमकर्म राक्षसों के लिए कुछ भी अज्ञात नहीं रह
सकता (सर्ग ४२) । फिर भी वहीं से विदित होता है कि वे कहते हैं मैं दिन में कहीं छिपकर रहूँगा और रात्रि में
अपने ही रूप में, किन्तु छोटे रूप में, लङ्का में प्रवेश करूँगा (सर्ग ४४ ) । और उन्होंने किया भी वैसा ही । इसके
अतिरिक्त सीता के अन्वेषण के पूर्व ही उन्होंने विज्ञात होने में अनर्थ की सम्भावना की थी, क्योकि विज्ञातरूप में
सब जगह जा सकना सम्भव नहीं था, परन्तु सीता के विज्ञात हो जाने के बाद और सीता की पूर्ण परिस्थिति जान
लेने पर फिर वैसी किसी सम्भावना का प्रश्न नहीं रह गया था ।
यह भी कहना निःसार है कि "राम के लौटने पर भरद्वाज ने अन्य सभी घटनाओं का वर्णन किया था,
पर लङ्का-दहन का वर्णन नहीं किया, इसलिए भी लङ्का-दहन प्रक्षेप है ।" क्योंकि बुल्के आदि पाश्चात्य विद्वान् अलो-
किकता से पूर्ण इस सर्ग को प्रमाण ही नहीं मान सकते । इसमें भरद्वाज कहते हैं कि मैंने तपस्या के बल पर सब
घटनाओं को जान लिया है-
"सर्वं ममैतद्विदितं तपसा धर्मवत्सल ।” (वा० रा० ६।१२४।१६)
इसके अतिरिक्त संक्षिप्त कथन में लङ्का-दहन का छूट जाना भी कोई आश्चर्य की बात नहीं है । वस्तुतस्तु
"कर्म वातात्मजस्य च” (वा० रा० ६।१२४।१२) इस अंश का यही अर्थ है कि हनुमान् का समुद्रलङ्घनादि
लङ्कादहनान्त कर्म भी मैंने जाना है। यदि "वातात्मज-कर्म" का उक्त अर्थ न करेंगे तो समुद्र-लङ्घन का भी भरद्वाज
द्वारा वर्णन न होने से हनुमान् के समुद्र-लङ्घन को भी प्रक्षेप कहना पड़ेगा । कहा जाता है कि "यद्यपि लङ्का-दहन का
वर्णन निश्चितरूप से प्रक्षिप्त है। फिर वह विभिन्न पाठों के पृथक् हो जाने के पूर्व प्राचीन काल से किष्किन्धाकाण्ड
का अङ्ग बन चुका था । इसका उल्लेख महाभारत के रामोपाख्यान ( ३।२६६-६८ ) तथा बालकाण्ड की अनु-
क्रमणिकाओं ( १।१।७७; १।३।३३ ) में भी मिलता है ।” परन्तु यह सब बुल्के का निराधार प्रलाप है, क्योंकि पूर्वोक्त
तर्कों एवं प्रमाणों से लङ्कादहन वाल्मीकिरामायण का अविभाज्य अंश ही है। उनके संकेतित प्रमाणों से यह भी नहीं
सिद्ध होता है कि लङ्का-दहन किष्किन्धाकाण्ड का अंश ही है। बालकाण्ड के १।१।७७ में काण्ड-भेद का प्रदर्शन है ही
नहीं । उसमें भी लङ्का-दहन कहा ही गया है ।
"ततो दग्ध्वा पुरीं लङ्कामृते सीताञ्च मैथिलीम् ।
रामाय प्रियमाख्यातुं पुनरायान्महाकपिः ॥" (वा० रा० १।१।७७ )
तीसरे सर्ग में भी श्लोक ३२, ३३ में वृक्षभङ्ग, किन्नरनिबर्हण, लङ्का-दाह आदि का वर्णन है ही। इसमें
भी अङ्गाङ्गिभाव का वर्णन नहीं है। अतः लङ्कादहन किष्किन्धाकाण्ड का अंश नहीं कहा जा सकता ।
इसी तरह ५६ वें सर्ग की आंशिक आवृत्ति अनावश्यक नहीं है, क्योंकि यह आवश्यक था कि अपने महान्
नेता जाम्बवान् से ज्यों की त्यों सभी बातें सुनायी जायें। फिर उनकी सम्मति से जितनी आवश्यक हों उतनी ही बातें
राम से कही जायें । जाम्बवान् ने विस्तार से सारा वृत्तान्त पूछा था । तुमने सीता देवी को कैसे देखा ? वह वहाँ
कैसे हैं ? क्रूर दशानन का उनके साथ कैसा व्यवहार है ? तुमने उनका अन्वेषण कैसे किया ? सीता ने क्या कहा ?