रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
सभा में उन्हें इस काव्य के गान के लिए प्रेरित किया। तब कुश और लव ने विचित्र अर्थ और पदवाले उत्तम
रामायण महाकाव्य का तन्त्रीलय के साथ अपने मधुर कण्ठों से सबके सर्व गात्र, श्रोत्र, मन और हृदयों को आह्लादित
करते हुए गायन किया। सभासदों सहित उस समय राम भी सङ्गीत-श्रवण में दत्तचित्त हो गये। उक्त काव्यश्रवण से
सीता और राम आदि के गुप्त एवं प्रकट दिव्य चरित्रों का स्फुट प्रकाश हुआ। सीता के प्रति कुछ लोगों के मन में
उत्पन्न विविध संशय, विपर्यय आदि का समूल उन्मूलन हो गया; सीता का निर्मल चरित्र सबके हृदय में प्रकाशित
हो गया।
उत्तरकाण्ड के ९४वें सर्ग के प्रसङ्गानुसार राम ने अश्वमेध यज्ञ के प्रसङ्ग से महामुनियों, राजाओं तथा
नैगमों, वैदिकों, पौराणिकों, शब्दविदों, वृद्धों, द्विजातियों तथा स्वरों के लक्षणज्ञों, उत्कृष्ट द्विजसत्तमों, लक्षणज्ञों,
गान्धर्वतत्त्वज्ञों तथा पाद-अक्षर-समास-विदों, छन्दपरिनिष्ठित जनों, कलातत्त्वज्ञों, ज्योतिषविशेषज्ञों, क्रियाकल्पज्ञों,
कार्यविशारदों, हेतूपचारकुशल जनों, चित्रकलानिपुण जनों, वृत्तिसूत्रज्ञों तथा नृत्य-गीतविशारदों आदि सब श्रेणी के
विशेषज्ञों को निमन्त्रित कर उनकी महतो सभा में कुश और लव को रामायण का गान करने के लिए आमन्त्रित
किया। कुश और लव के अतिमानुष मधुर गन्धर्व-स्वर से सभी श्रोता मन्त्र-मुग्ध हो गये। मुनिगण एवं पार्थिवगण
बारम्बार चक्षु से पान करते हुए वे उन दोनों बालकों, कुश और लव को बारम्बार देखते हुए आपस में कह रहे थे
कि ये दोनों इस तरह राम के तुल्य लगते हैं जैसे सूर्यविम्ब से दूसरा सूर्य-बिम्ब ही उदित हुआ हो। यदि ये दोनों
बालक जटायुक्त और वल्कलधारी न होते तो राघवेन्द्र राम और इन दोनों बालकों में कोई भेद अवगत न होता —
“जटिलौ यदि न स्यातां न वल्कलधरौ यदि।
विशेषं नाधिगच्छामो गायतो राघवस्य च॥” (वा० रा० ७।९४।१४)
उपर्युक्त सम्पूर्ण वक्तव्य से स्पष्ट है कि कुश और लव दोनों ही राम के पुत्र, राजकुमार थे न कि तथा-
कथित कुशीलव नृत्यगीत-काव्योपजीवी जातिविशेष।
उत्तरकाण्ड के ९५वें सर्ग में कहा गया है राम ने बहुत दिनों तक परम शुभ गीत मुनियों, राजाओं एवं
सुग्रीव-हनुमान् वानर आदिकों के साथ सुना और उस गानप्रसङ्ग में ही कुश और लव को सीता पुत्र जान लिया—
“तस्मिन् गीते तु विज्ञाय सीतापुत्रौ कुशीलवौ।
तस्याः परिषदो मध्ये रामो वचनमब्रवीत्॥” (वा० रा० ७।९५।२)
यदि बुल्के ने इन सब वचनों को ध्यान से पढ़ा होता तो निश्चय ही वे ऐसी विपरीत कल्पना नहीं कर
सकते थे। अपने काल्पनिक मन्तव्य की रक्षा के लिए ही बुल्के ने इन सब सर्गों को प्रक्षेप कहा है। उपर्युक्त प्रकरणों
से यह भी स्पष्ट हो जाता है कि वाल्मीकिरामायण का निर्माणकाल राम का सिंहासनारूढ़ होने का काल ही था,
क्योकि राम द्वारा किये गये अश्वमेध यज्ञ के अवसर पर ही कुश और लव द्वारा इसका गान हुआ था, अतः निश्चय
के साथ कहा जा सकता है कि इसका निर्माणकाल ई० पू० दूसरी शती कदापि नहीं हो सकता।
आश्चर्य तो यह है कि जिन प्रसङ्गों के आधार पर 'कुशीलव' शब्द को मान लेते हैं उन्हीं प्रसङ्गों से व्यक्त,
उन्हीं से सम्बद्ध अन्य बातों को, कुश और लव का सीता-पुत्र या राम-पुत्र होना, राम-सभा में रामायण का सुना
जाना आदि को, प्रक्षेप मान लेते हैं यही अर्ध-जरतीय न्याय है।
इसी सर्ग में यह भी उल्लेख है कि उसी महापरिषद् में शुद्ध समाचारवाले दूतों को बुलाकर राम ने
उनसे कहा “भगवान् बाल्मीकि के समीप जाकर यह कहो कि यदि सीता शुद्धसमाचारा हैं, वीतकल्मषा हैं, तो मुनि
की अनुमति से आत्मशुद्धि को प्रमाणित करें; यदि मुनि की इच्छा हो तो उनके मनोगत भावों को जानकर बताओ।
कल प्रातः समय जनकात्मजा मैथिली अपनी और मेरी शुद्धि के लिए सभा में सबके समक्ष शपथ करें।” उन दूतों ने
अध्याय रामकथा का प्रारम्भिक विकास २३९
जाकर अमितप्रभ महात्मा वाल्मीकि से सब कुछ कहा। मुनि ने सब सुनकर और राम की इच्छा को जानकर कहा
कि ठीक है जैसा राम कहते हैं वैसा ही होगा। सीता वैसा ही करेगी, क्योंकि स्त्री का परम दैवत पति ही होता
है। राजदूतों ने आकर राम को मुनि का कथन सुनाया। राम प्रसन्न हुए और एकत्रित ऋषियों और राजाओं से
उन्होंने कहा, शिष्यों सहित सभी ऋषि तथा अपने परिकरों सहित नृपतिगण तथा और भी जो चाहते हों सभी
आकर सीता का शपथ लेना (पातिव्रत्य तथा शुद्धि का प्रमाण, प्रत्यय) देखें। महात्मा राघव के उक्त वचन सुनकर
महर्षियों तथा राजाओं में महान् साधुवाद हुआ। प्रभावशाली महान् राजा तथा मुनिश्रेष्ठगण राघव की प्रशंसा
करने लगे।
इसी काण्ड के ९६ वें सर्ग के उल्लेखात्नुसार रात के बीतते ही राम ने वसिष्ठ, विश्वामित्र, वामदेव,
जाबालि, कश्यप, दीर्घतमा, दुर्वासा, पुलस्त्य, शक्ति, भार्गव, दीर्घायु मार्कण्डेय, महायशा मौद्गल्य, गर्ग, च्यवन,
शतानन्द, भरद्वाज, अग्निपुत्र सुप्रभ, नारद, पर्वत, गौतम आदि आदि मुनिवरों को बुलवाया और वे सब आये।
महावीर्य राक्षस तथा महाबल वानर एवं अन्य सभी लोग कौतूहलवश आये। सहस्रों क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र तथा नाना
देशों के ब्राह्मण सीता का शपथ देखने के लिये आये। सबके आने की बात जानकर सीता के साथ मुनिवर वाल्मीकि
वहाँ आये। ऋषि के पीछे-पीछे राम को मन में रखकर अवाङ्मुखी कृताञ्जलि, बाष्पकलायुक्त सीता आयीं। ब्रह्मा का
अनुगमन करती हुई श्रुति के समान मुनि के पीछे-पीछे आती हुई सीता को देखकर जन-समूह में महान् साधुवाद
हुआ। सीता और राम के जन्म से लेकर होनेवाले विशाल दुःख-परम्परा का चिन्तन करके सभी के अन्तःकरण क्षुब्ध
हो उठे। कोई राम का और कोई सीता का साधुवाद करने लगे। कोई प्रेक्षक दोनों का साधुवाद करने लगे। उस
समय उस महान् जनौघ में सीता को साथ लिए हुए वाल्मीकि बोले, "दाशरथे ! सीता सुव्रता एवं धर्मचारिणी है;
अपवादभय से आप द्वारा मेरे आश्रम के समीप परित्यक्ता होकर मेरे आश्रम में रही, सीता आप के समक्ष अपने
सतीत्व का प्रमाण, प्रत्यय देगी। ये दोनों बालक, कुश और लव जानकी में उत्पन्न तुम्हारे पुत्र हैं। मैं प्रचेता का
दसवाँ पुत्र हूँ—मैंने कभी अनृत वाक्य कहा हो तो इसका मुझे स्मरण नहीं होता; बहुत वर्षों तक मैंने तपश्चर्या की
है; यदि मैथिली दुष्टा हो तो मैं उन तपश्चर्याओं का फल न पाऊँ । मनसा, वाचा और कर्मणा मुझसे कभी किल्बिष
नहीं हुआ। यदि मैथिली निष्पाप है तो मैं उसका फल भोगूँगा, पञ्च ज्ञानन्द्रियों सहित मन से चिन्तन करके सीता
को अत्यन्तशुद्धसमाचार एवं निष्पाप जानकर ही मैंने वन में उसे अपने आश्रम में रखा है। यद्यपि आप भी सीता
को शुद्ध मानते हैं तो भी सीता प्रत्यय देगी।
सर्ग ९७ में उल्लेख है; राम ने कहा ब्रह्मन्, आप के अकल्मष वचनों में मुझे पूर्ण विश्वास है। देवताओं
के सन्निधान में जानकी ने पहले भी, लङ्का में, प्रत्यय दिया है तो भी लोकापवाद के भय से मैंने जानकी को
निष्पाप जानते हुए भी उनका त्याग किया था। ये कुश और लव मेरे पुत्र हैं, यह भी मैं जानता हूँ। मेरा आशय
जानकर सीता-शपथ के प्रसङ्ग में सभी देवगण आये हैं। लोकपितामह ब्रह्मा को आगे कर आदित्य, वसु, रुद्र, विश्वे-
देव, मरुद्गण तथा साध्य देवता एवं सभी परम महर्षि, नाग, सुपर्ण और सिद्ध सब आये हैं। राघव ने सबको
देखकर कहा, "ऋषि के निष्कल्मष वाक्यों में हमें सीता के प्रति पूर्ण प्रत्यय (विश्वास) है और संसार में परम
पवित्र सीता में मेरी स्थिर प्रीति है। उस समय दिव्य, शीतल, मन्द, सुगन्ध वायु जनौघ को आह्लादित करने
लगा। सभी राष्ट्रों से आये हुए मानवों ने सत्ययुगीय उस अद्भुत शीतल, मन्द, सुगन्ध दिव्य वायु का अनुभव किया।
काषायवसना सीता ने चतुर्दश भुवनस्थ जनसमुदाय को देखकर अवाङ्मुखी तथा अधोदृष्टि प्राञ्जलि-बद्ध होकर
कहा मैं राघव से अन्य किसी का कभी मन से भी चिन्तन नहीं करती, यदि यह सत्य है तो माधवी धरित्री देवी
मुझे अवकाश प्रदान करे। इस तरह सीता शपथ कर रही थी कि एक अद्भुतचमत्कार हुआ भूतल से एक अत्यन्त
उत्तम दिव्य सिंहासन प्रकट हुआ। जिसे अमित विक्रमवाले दिव्य रत्नभूषित नागों ने अपने फणों पर धारण कर रखा
२४० रामायणमीमांसा सप्तम
था। धरणी देवी उसी अलौकिक दिव्य सिंहासन पर स्वागत और अभिनन्दन पूर्वक मैथिली को अपनी बाहुओं से
ग्रहण कर दिव्य आसन पर बैठाती है। उस दिव्य आसन पर समासीन होकर रसातल में प्रविष्ट होती हुई सीता पर
देवताओं द्वारा महान् जय-जयकार तथा साधुकार के साथ अविच्छिन्न रूप से मुक्त दिव्य पुष्प-वृष्टि हुई।
“तथा शपन्त्यां वैदेह्यां प्रादुरासीत् तदद्भुतम् ।
भूतलादुत्थितं दिव्यं सिंहासनमनुत्तमम् ॥
ध्रियमाणं शिरोभिस्तु नागैरमितविक्रमैः ।
दिव्यं दिव्येन वपुषा दिव्यरत्नविभूषितैः ॥
तस्मिंस्तु धरणी देवी बाहुभ्यां गृह्य मैथिलीम् ।
स्वागतेनाभिनन्द्यैनामासने चोपवेशयत् ॥
तामासनगतां दृष्ट्वा प्रविशन्तीं रसातलम् ।
पुष्पवृष्टिरविच्छिन्ना दिव्या सीतामवाकिरत् ॥
साधुकारश्च सुमहान् देवानां सहसोत्थितः ।
साधु वै साध्विति सीते यस्यास्ते शीलमीदृशम् ॥” (वा० रा० ७।९६।१७-२१)
“सीते ! साधु—तुम्हारा शील लोकोत्तर है” इस प्रकार अन्तरिक्षस्थ देवताओं की बहुविध वाणियां
प्रकट हुई—यज्ञवाट के सभी राजागण विस्मित हुए। अन्तरिक्ष तथा भूमि के सभी स्थावर, जङ्गम तथा महाकाय
दानव एवं पाताल के पन्नगेन्द्र विस्मयान्वित होकर, कोई प्रहृष्ट होकर ‘जय जय’ एवं ‘साधु साधु’ नाद करने लगे;
कोई ध्यानपरायण हो गये। कोई राम को और कोई सीता को देखते हुए विसंज्ञ हो रहे थे। सीता के रसातल
प्रवेश से वानर, राक्षस, मानव सभी संतप्त हुए । श्रीराम अत्यन्त संतप्त हुए । ब्रह्माजी देवताओं के साथ आकर राम
और सीता के दिव्य वैष्णव माहात्म्य का वर्णन करके सान्त्वना देते हैं।
पद्मपुराण के उल्लेखानुसार सीता के लिए रसातल से गरुड़जी प्रकट हुए और अपनी पीठ पर रत्नमय
सिंहासन को लेकर आये। उसपर धरणी देवी विराजमान थीं। उन्होंने मैथिली का स्वागत और अभिनन्दन कर
उन्हें सिंहासन पर बैठाया। सनातनी सीता देवादिकों से पूज्यमान होकर योगिगम्य सनातन परम धाम को चली गयीं—
“नानारत्नमयं पीठं पृष्ठे कृत्वा खगेश्वरः ।
रसातलादाविरभूद्विस्मयं जनयन्नृणाम् ॥
तस्मिन् पीठे महादेवीं हस्ताभ्यां गृह्य मैथिलीम् ।
स्वागतेनाभिनन्द्येमां संनिवेश्य तिरोदधे ॥
सा च दिव्याप्सरोभिस्तु पूज्यमाना सनातनी ।
वैनतेयं समारुह्य अचिरादिपथाद् रमा ॥
दासीगणैः पूर्वभवैः संवृता जगदीश्वरी ।
संप्राप्ता परमं धाम योगिगम्यं सनातनम् ॥”
रामाभिरामीटीकायां समुद्धृताः श्लोकाः ।
पूर्वापर प्रसङ्ग का भलीभांति विचार करने पर स्पष्टतः विदित होता है कि वाल्मीकि महर्षि श्रीराम के
समकालिक ही हैं। सीता के निर्मल चरित्र का वर्णन और प्रचार कर वे मिथ्या लोकापवाद का समूल उन्मूलन ही
करने में सफल हुए हैं। उस दृष्टि से राम ने देवताओं, ऋषियों, राजाओं तथा नाना देशागत मानवों की सभा में
रामायण का सबके साथ ही श्रवण किया और रामायण द्वारा वर्णित कथावस्तु की यथार्थता और सीता के वास्तविक
अध्याय रामकथा का प्रारम्भिक विकास २४१
जीवन-वृत्तान्त का स्वयं अनुभव किया और सबको वैसा ही अनुभव करने का अवसर दिया। सीता के शपथ के
प्रभाव से दिव्य सिंहासन के आविर्भाव आदि से तो उसकी सत्यता और भी निखर उठी।
लङ्का में सीता की अग्नि-परीक्षा हो चुकी थी। ब्रह्मा, रुद्र, इन्द्र, वायु, अग्नि आदि देवताओं, वानरों,
राक्षसों ने वहाँ का चमत्कार देखा था, परन्तु चतुर्दश भुवन के सभी प्राणी और देश-देशान्तर के सभी मानवों ने
वह सब नहीं देखा था। राम द्वारा उसका प्रचार कराकर मिथ्या-लोकापवाद मिटाने का प्रयत्न किया जा सकता
था, परन्तु विप्रतिपन्न व्यक्ति उसे राजकीय प्रचार (प्रोपगेण्डा) कहकर महत्त्वहीन बता सकते थे। परन्तु एक
अरण्यवासी, वल्कलधारी, कन्दमूलफलाशी, आप्तकाम, वीतराग महर्षि के अमर काव्य के सम्बन्ध में किसी को कुछ
कहने का साहस नहीं हो सकता था। महर्षि का राम से कोई भी आर्थिक सम्बन्ध नहीं था। रामायण के प्रचारक
कुश और लव भी कोई कथाकाव्योपजीवी साधारण व्यक्ति नहीं थे। वे दोनों मुनिवेष राजकुमार, श्रीराम के ही
पुत्र थे। उनमें वक्ता के सर्वोत्तम गुण विद्यमान थे। वक्ता में उत्तम रूप, सौन्दर्य, कण्ठमाधुर्य, सौस्वर्य तथा वेदादि
शास्त्र-विज्ञान के साथ ही साथ गान्धर्व कला-कौशल भी आवश्यक होता है। उपर्युक्त सब गुण कुश और लव में
थे। उनमें राम के समान ही लोकोत्तर सुन्दरता थी, वे वेद-शास्त्रों में पारङ्गत, धनुर्वेद, गन्धर्ववेद आदि में पूर्ण
निष्णात थे। उनमें उत्तम कण्ठ-माधुर्य, सौस्वर्य एवं सङ्गीतकौशल विद्यमान था। वीतराग ऋषिमुनि भी उनके
रामायण-गान से मुग्ध हो गये। इतने पर भी यदि वक्ता सस्पृह (लोभी) हो तो महान् से महान् गुण भी फीके
पड़ जाते हैं। उनका प्रभाव महत्त्वहीन हो जाता है। अतः महर्षि ने उन्हें दिव्य, मधुर फलमूल खिलाकर कह दिया
था कि अपने लोग कन्दमूलफलाशी वनवासी हैं, हम लोगों को धन से कोई प्रयोजन नहीं; अतः किसी के देने पर भी
कुछ लेना नहीं। पर जो सादर सुनना चाहें उन्हें सुनाना। प्रथम दिन की कथा श्रवण कर ही राम ने प्रभूत सुवर्णराशि
देने का प्रयत्न किया, परन्तु कुश-लव ने उसको स्वीकार नहीं किया। ये सब ऐसे गुण थे जिनका प्रभाव अनिवार्यरूप
से सब पर पड़ा।
रामायण द्वारा वर्णित कथावस्तु इतनी सत्य थी कि अयोध्या के वृद्ध लोग उसे सुनकर चिरवृत्त वृत्तान्त
को प्रत्यक्ष सा अनुभव करने लगे—
“चिरनिर्वृत्तमप्येतत् प्रत्यक्षमिव दर्शितम् ।
प्रविश्य तावुभौ सुष्ठु तथाभावमगायताम् ॥
सहितौ मधुरं रक्तं सम्पन्नं स्वरसम्पदा ।” (वा० रा० १।४।१८)
नैमिषारण्य में श्रीराम का अश्वमेध यज्ञ हो रहा था। अयोध्यावासी नागरिक अधिक मात्रा में आये हुए
थे। अयोध्याकाण्ड की घटनाओं में उन्हें प्रत्यक्ष अनुभूति थी। वे लोग प्रथमतः तो कुश-लव के त्याग, निःस्पृहता,
दिव्य सौन्दर्य तथा तन्त्रीवादनपूर्वक मधुर सुस्वर सङ्गीत पर मुग्ध हुए। फिर, स्वानुभूत कथावस्तु का यथावत् वर्णन
सुनकर आश्चर्यमग्न होकर चित्रलिखित से स्तब्ध रह गये। चिरप्रवृत्त वृत्तान्त का यथावत् वर्णन रामायण में सुनकर
उन्हें आश्चर्य हुआ। वाल्मीकिरामायण आर्ष कथा होते हुए आर्ष इतिहास भी है। सीता-चरित्र की स्वच्छता की
अभिव्यक्ति उसका प्रथम उद्देश्य था, अतः उसमें अप्रिय सत्य का भी स्पष्ट उल्लेख हुआ है। राजा दशरथ का भरत
के प्रति शङ्का करना तथा कौशल्या का मातुल-कुल से प्रत्यागत भरत के प्रति व्यवहार अप्रिय सत्य की अभिव्यक्ति
ही है। स्वानुभूत घटनाओं के यथावत् वर्णन से अत्यन्त प्रभावित अयोध्यावासियों के मन में इस महाकाव्य के
रचयिता के सम्बन्ध में भी जिज्ञासा होना स्वाभाविक ही था। कोई वीतराग निःस्पृह वनवासी महर्षि वाल्मीकि
उसके रचयिता हैं यह जानकर और अधिक विश्वास हुआ। स्वभावतः राम के वनवासकालिक वृत्तान्तों और
सीताहरण, सुग्रीव-मैत्री, बालि-वध, सेतु-बन्धन, रावण-सीता-संवाद आदि के सम्बन्ध की सत्यता जानने की भी
३१
२४२ रामायणमीमांसा सप्तम
उत्सुकता होनी स्वाभाविक थी। कुछ लोग जिनकी संख्या नगण्य ही थी सीता के प्रति शङ्का भी करते थे । स्वभावतः
निःस्पृह मुनि द्वारा निर्मित तथा निःस्पृह वक्ता द्वारा वर्ण्यमान रामायण से अरण्य एवं लङ्का की घटनाओं के प्रति
शङ्का की निवृत्ति सम्भव हो सकती थी । इस तरह विविध दृष्टियों तथा भावनाओं से रामचरित्र की ओर लोगों
का आकर्षण हुआ । तुलसीदास के अनुसार नीति, प्रीति, परमार्थ तथा स्वार्थ के सम्बन्ध में राम से अधिक कोई नहीं
जान सकता है—
“नीति प्रीति परमारथ स्वारथ कोउ न राम सम जान जथारथ ।”
( रा० मा० २।२५३।३ )
जनापवाद सुनकर राम विचलित नहीं हुए । वे जानते थे कि दण्ड देकर जनता का मुख बन्द नहीं किया
जा सकता । दो एक मुख बन्द कर देने पर वही आवाज सैकड़ों मुखों से निकलने लगती है; अतः उन्होंने बहुजन-
हिताय बहुजनसुखाय ही नहीं किन्तु सर्वजनहिताय सर्वजनसुखाय का ही सिद्धान्त अपनाकर स्वयं अपने विरुद्ध
अल्पमत का भी सम्मान कर परम विशुद्ध जानते हुए भी सीता को वनवास
विशेषकस्य लक्ष्मीपतेः साम्यांशस्य लक्ष्मीवतो राजाधिराजस्य लोकाभिरामस्य निकटोक्योः श्रीरामात्मज-
योरादिकविशिष्ययोः कुशलवयोराख्याने श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये चतुर्विंशत्साहस्रिकायां
संहितायां श्रीमद्युद्धकाण्डे पञ्चविंशेऽह्नि वर्तमानकथाप्रसङ्गः समाप्तः ।"
इस पुष्पिका में 'कुशीलव' का प्रयोग न होकर 'कुशलवयोः' का प्रयोग है और इसमें उन्हें राम के
आत्मज कहा गया है । कुशीलव शब्द का उल्लेख बालकाण्ड और उत्तरकाण्ड में ही मिलता है, परन्तु बुल्के की दृष्टि
से वे दोनों ही काण्ड प्रक्षेप हैं । यदि बुल्के उपर्युक्त काण्डों को प्रक्षेप मानते हैं तो यह भी मानना पड़ेगा कि कुशीलव
ने रामायण का प्रचार किया अंश भी प्रक्षेप है, अतः प्रामाणिक नहीं है । यदि उन दोनों काण्डों से कुशीलव शब्द
को स्वीकार करना है तो उन्हीं काण्डों के आधार पर कुशीलव का व्यक्तित्व भी समझना पड़ेगा—तद्नुसार अत्यन्त
स्पष्ट है कि कुशीलव नृत्य-गीत-काव्योपजीवी कोई जातिविशेष न होकर राम के आत्मज, राजकुमार आदिकवि
वाल्मीकि के शिष्यद्वय कुश और लव थे—वे ही अश्विनौ के समान कुशीलवौ शब्द से निर्दिष्ट हुए हैं ।
इसी तरह महर्षि वाल्मीकि ने कैसे रामायण की रचना की यह भी बालकाण्ड और उत्तरकाण्ड से ही
सिद्ध होता है । यदि उक्त दोनों काण्ड और पुष्पिका अमान्य हो तो रामायण वाल्मीकि-निर्मित है यह सिद्ध करना
बुल्के के लिए भी असम्भव है । यदि प्रसिद्धि के आधार पर ऐसा मान लिया जाय तो फिर स्वभावतः वाल्मीकि कुश
और लव के गुरु और राम के समकालीन थे तथा उनकी रचना वाल्मीकिरामायण का निर्माण सिंहासनारूढ़ राम
के काल में ही हुआ था इन प्रसिद्धियों को भी निश्चितरूप से मानना ही युक्तिसङ्गत होगा ।
यह स्वाभाविक है कि ग्रन्थकर्ता ग्रन्थ में ही कहीं न कहीं अपने ग्रन्थ का नाम और स्वात्मसम्बन्ध
सूचित करता है । तदनुसार उपर्युक्त दोनों काण्डों में रामायण की उत्पत्ति, भूमिका, लेखक तथा प्रचारक का नाम
दिया गया है ।
साथ ही उक्त पुष्पिका से स्पष्टरूप से विदित होता है कि सीता लक्ष्मीरूप से और राम विष्णुरूप से
वाल्मीकि को मान्य थे । कुश और लव दोनों भाई राम के आत्मज तथा आदिकवि के शिष्य थे । उन्हीं के द्वारा
रामायण आर्ष महाकाव्य श्रीराम को सुनाया गया था । फलतः राम के समय में ही रामायण का निर्माण हो चुका
था । लोकापवाद-निवृत्ति और सीता के दिव्य चरित्रों का प्रकाश सीता और राम के समकाल में ही अपेक्षित भी
था । तभी महर्षि की प्रचार में इतनी तत्परता तथा सर्वगुणसम्पन्न योग्य कुश और लव जैसे शिष्यों द्वारा सभी श्रेणियों
के लोगों में प्रभावी ढङ्ग से प्रचार की बात सङ्गत हो सकती थी ।
१३८ वें अनु० में बुल्के लिखते हैं, "बहुत से प्रक्षेप पुनरुक्तिमात्र से उत्पन्न हुए हैं । उदाहरणार्थ—
रावण का मारीच के यहाँ जाना ( ३, सर्ग ३१ और सर्ग ३५ ),
रावण के गुप्तचर का वृत्तान्त ( ६, सर्ग २० और सर्ग २५-३० ),
सीता की गंगा-यमुना से प्रार्थना ( २।५२ और ५५ ),
आश्रमों में आगमन । अत्रि, वाल्मीकि, शरभंग, सुतीक्ष्ण, अगस्त्य के आश्रमों का उल्लेख आदिरामायण
में नहीं मिलता था,
विराध तथा अयोमुखी राक्षसी का वध,
राम के मायामय सिर का वृत्तान्त ( ६।३१ ) मायामयी सीता के वध के वृत्तान्त ६।८१ का
अनुकरणमात्र है ।"
उपर्युक्त कथन मिथ्या है । वस्तुतः अरण्यकाण्ड के सर्ग ३१ में अकम्पन ने रावण के समीप जाकर
जनस्थान का समाचार सुनाया था । उसे सुनकर रावण मारीच के निकट गया । मारीच के तत्त्वोपदेश से लौट आया ।
३५ वें सर्ग में शूर्पणखा से समाचार पाकर इतिकर्तव्य का निर्णय कर रावण पुनः मारीच के पास गया। आज भी
राजाओं को घटनाओं के सम्बन्ध में विभिन्न सूत्रों से समाचार मिलते हैं और यथासमय विभिन्न प्रतिक्रियाएँ भी
होती हैं। इतनेमात्र से उसे प्रक्षेप नहीं कहा जा सकता। आदिरामायण का प्रमाण देना भी उचित नहीं है,
क्योंकि इस नाम का कोई प्रामाणिक ग्रन्थ उपलब्ध नहीं है। अनुपलब्ध प्रमाण के आधार पर किसी अंश के सम्बन्ध
में भी 'इदमित्थम्' कहना सर्वथा तर्क-विरुद्ध है।
३१वें सर्ग में जनस्थान से जाकर अकम्पन ने वहाँ के बहुत से राक्षसों तथा खर के मारे जाने का समाचार
बताया। रावण ने क्रुद्ध होकर कहा, जिसने मेरा विप्रिय किया है वह कौन है ? मेरा विप्रिय कर इन्द्र, कुबेर, यम
तथा विष्णु भी सुखपूर्वक नहीं रह सकते । मैं पावक को भी दग्ध कर सकता हूँ, मृत्यु को भी मार सकता हूँ। मैं काल
का भी काल हूँ।" अकम्पन ने यह सुनकर अभय वर माँगकर रावण के सामने राम का पराक्रम वर्णन किया। सब
कुछ सुनकर रावण मारीच के पास गया और उससे राम-भार्या के हरण में सहायता माँगी। मारीच ने राम के पराक्रम
का वर्णन कर उसे समझाया तब वह लङ्का लौट गया।
३४वें सर्ग की कथा के अनुसार रावण ने शूर्पणखा के मुख से राम का पराक्रम, आयुध और सीता के
महत्त्व का विधिवत् श्रवण किया।
३५वें सर्ग की कथा के अनुसार रावण अपने मन्त्रियों से कर्तव्याकर्त्तव्य पर विचार कर इति-कर्तव्यता का
निर्णय कर स्थिर बुद्धि और स्वस्थता के साथ वनों और पर्वतों का अवलोकन करता हुआ पुनः मारीच के पास गया।
यह स्वाभाविक घटना-क्रम है, जिसका महर्षि ने यथावत् उल्लेख किया है। इस घटनाक्रम में पुनरुक्ति का आभास भी
नहीं है। उपर्युक्त वर्णन को क्षेपक कहना निराधार है।
इसी तरह अत्रि, वाल्मीकि, शरभङ्ग आदि के आश्रमों का वर्णन भी समुचित ही है। वन एवं आश्रमों का
वर्णन काव्य का विषय भी होता है। विराध, अयोमुखी आदि राक्षसों के वध का वर्णन क्यों प्रक्षेप है ? इसका कोई
कारण नहीं दिया गया। राम के मायामय सिर का वृत्तान्त ( ६।३१ ), मायामयी सीतावध के वृत्तान्त ( ६।८१ )
का अनुकरणमात्र है, ऐसी मान्यता का आधार भी क्या है ? क्या दोनों पृथक् पृथक् घटनाएँ नहीं हैं ? केवल प्रतिज्ञा-
मात्र से कोई वस्तु सिद्ध नहीं होती; हेतु का उपन्यास आवश्यक है। इसी तरह अद्भुत रस की सामग्री, लङ्का-दहन
जिसमें हास्य रस का भी समावेश है, ओषधि-पर्वत को दो बार ले आना, अग्निपरीक्षा आदि सब बुल्के के अनुसार
क्षेपक हैं। करुणात्मक स्थलों की पुनरुक्ति, विलाप ( ३, सर्ग ६०, ६१, ६३ ), हनुमान् का सीता से विदा लेना
( ५।५८-६० ) तथा हनुमान् द्वारा सीता के भेंट के वर्णन ( ५।६६-६८ ) को भी बुल्के प्रक्षेप मानते हैं। वह भी
निराधार है, कारण पाश्चात्य लोग वस्तुस्थिति का विचार न कर अपनी भावना की कसौटी पर प्राचीन ग्रन्थों को
कसना चाहते हैं। जब विभिन्न प्राणियों के बुद्धि-वैभव और दृष्टि-कोण पाये ही जाते हैं तब यह कैसे कहा जा सकता है
कि प्राचीन लोगों के विचार हमारे विचारों जैसे ही रहे होंगे। वस्तुतः ग्रन्थ देख कर उनके विचारों तथा उनकी
पद्धतियों का निर्णय करना चाहिये। इतिहास घटना के औचित्य-अनौचित्य का विचार न कर उनकी यथार्थता का ही
अनुसरण करता है। व्यक्तिविशेष के विचार अतीत घटनाक्रम के नियामक नहीं हो सकते ।
इस दृष्टि से देखने पर ही गङ्गा का वर्णन ( २।५२ ), वर्षाऋतु का वर्णन ( ४।२८ ) तथा शरदऋतु का
वर्णन ( ४।३० ) उचित हैं। रामायण को ज्ञान का भण्डार बनाने की प्रवृत्ति ( २।१०० ) नीति के उपदेश, जाबालि
का लोकायतदर्शन प्रस्तुत करना ( २।१०८ ), दिग्वर्णन ( ४।४०-४३ ) तथा राम का बालिवध को न्यायसङ्गत सिद्ध
करने का प्रयास ( ४।१७,१८ ) प्रक्षेप हैं, यह कहना अशुद्ध है। वस्तुतः इन्हीं श्लोकों के अनुसार वाल्मीकि के भावों,
विचारों तथा पद्धति का निर्णय करना उचित है। किसी के विचारों के अनुसार यह विश्रृङ्खल प्रतीत हो तो भी इससे
अध्याय रामकथा का प्रारम्भिक विकास २४५
किसी घटना का अपलाप नही हो सकता। किसी समय कुछ लोगों को शङ्कराचार्य के भाष्य की शैली असङ्गत प्रतीत
हो सकती है, परन्तु एतावता शाङ्करभाष्य या उसका कोई अंशविशेष प्रक्षेप नहीं कहा जा सकता। वालिवध के औचि-
त्यानौचित्य का प्रश्न भी स्वाभाविक ही है; फिर वाल्मीकि के अनुसार यह मानने में आपत्ति ही क्या है कि वालि ने
राम के इस कार्य को अनुचित कहा और राम ने उसका उत्तर दिया। ऐसी स्थिति में वाली के वध का औचित्य-
प्रतिपादन के कारण ही उस अंश को प्रक्षेप कहना भी निष्प्रमाण ही है।
इसी प्रकार बालकाण्ड, उत्तरकाण्ड और अवतारवाद की सामग्री को प्रक्षेप कहना भी निराधार है। आदि-
रामायण खपुष्पतुल्य है, अतः उसमें वर्णित अथवा अवर्णित विषयों के आधार की चर्चा भी निराधार ही है। जब
अयोध्याकाण्ड में राम को वनवास क्यों और कैसे हुआ आदि का वर्णन हुआ तो सीता-राम कौन थे, उनका विवाह कब
और कैसे हुआ ? इन प्रश्नों को जब बुल्के भी नितान्त स्वाभाविक समझते हैं तो यह कैसे कहा जा सकता है कि
वाल्मीकि ने इस प्रश्न पर प्रकाश नहीं डाला होगा । अतः उपर्युक्त अंशों को अन्य की रचना कहना दुष्टता ही है।
इतर काण्डों से भी सुन्दरकाण्ड की शैली का भी भेद है। क्या इस आधार पर उसे भी प्रक्षेप माना
जाय ? पौराणिक सामग्री के सम्मिश्रण की कल्पना भी निराधार है। ब्राह्मणों का प्रभाव तो वैदिक संस्कृति के
ग्रन्थों में होना स्वाभाविक ही है। अवतार भी वस्तु-स्थिति है; वेदों, पुराणों तथा वैदिक संस्कृति की असाधारण
वस्तु है। अतः वेद के उपबृंहणभूत वाल्मीकिरामायण में उसका वर्णन अत्यन्त स्वाभाविक है। रामायण में पौराणिक
कथाओं का उद्धरण नहीं है, अपितु रामायण से ही पुराणों में उन कथाओं का आना कहीं अधिक युक्ति-युक्त है,
क्योंकि रामायण पुराणों से अधिक प्राचीन है। सार यह है कि जहाँ-जहाँ अवतार का वर्णन, सीता का लक्ष्मी
होना कहा गया है और ब्राह्मणों का महत्त्व वर्णन है उन सब स्थलों को बुल्के प्रक्षेप कहते हैं। उक्त वर्ण्य-विषय ही
उनकी कसौटी है। अस्तु, कहना पड़ता है कि यह बुल्के और पाश्चात्यों की सनकमात्र है, इसका कोई आधार
नहीं है।
अवतारवाद पर विचार करते हुए १४० वें अनु० में बुल्के लिखते हैं, “अवतारवाद की भावना हमें
पहले पहल शतपथ-ब्राह्मण में मिलती है। प्रारम्भ में विष्णु की अपेक्षा प्रजापति को इस सम्बन्ध में अधिक महत्त्व
दिया जाता था। शतपथब्राह्मण के अनुसार प्रजापति ने ही मत्स्य ( १।८।१।१ ), कूर्म (७।५।१।५; १४।१।२।११)
तथा वराह ( १४।१।२।११ ) का अवतार लिया था। प्रजापति के वराहरूप धारण करने की कथा तैत्तिरीयसंहिता
( ७।१।५।१ ), तैत्तिरीयब्राह्मण ( १।१।३।६ ), तैत्तिरीय आरण्यक ( १०।१।८ ) तथा काठकसंहिता ( ८।१ )
में भी प्रारम्भिकरूप में विद्यमान हैं। रामायण के दाक्षिणात्य पाठ में इसका उल्लेख है—
“ततः समभवद् ब्रह्मा स्वयंभूदैवतैः सह ।
स वराहस्ततो भूत्वा प्रोज्जहार वसुन्धराम् ॥”
अन्य दो पाठों में इस स्थल पर परवर्ती भावना के अनुसार विष्णु का नाम लिया गया है। १
शतपथब्राह्मण के अतिरिक्त तैत्तिरीय आरण्यक में भी कूर्म को प्रजापति का अवतार माना गया है ( दे०
१।२३।३ )। महाभारत में समुद्रमन्थन के प्रसङ्ग में कूर्मराज का उल्लेख तो हुआ है, किन्तु इसमें कहीं भी किसी
देवता की ओर निर्देश नहीं मिलता। सुरासुर कूर्मराज से निवेदन करते हैं कि वे मन्दराचल के आधार बनने की
कृपा करें—
“ऊचुश्च कूर्मराजानमकूपारे सुरासुराः ।
गिरेरधिष्ठानमस्य भवान् भवितुमर्हति ॥”
१. दे० गौ० रा० २।११९ और प० रा० २।११३ ।
२४६ रामायणमीमांसा सप्तमं
रामायण के उदीच्य पाठ में समुद्र-मन्थन के वृत्तान्त में कूर्म का उल्लेख नहीं है, १ किन्तु दाक्षिणात्य पाठ
के एक प्रक्षेप में इस अवसर पर विष्णु के वराह अवतार लेने की कथा मिलती है। २ मत्स्य अवतार तथा प्रजापति का
सम्बन्ध महाभारत में उल्लिखित है—
“अहं प्रजापतिर्ब्रह्मा मत्परं नाधिगम्यते ।
मत्स्यरूपेण यूयं च मयास्मान्मोक्षिता भयात् ॥” ( म० भा० ३।१८७।५२ )
विष्णुपुराण में भी मत्स्य, कूर्म तथा वराह तीनों प्रजापति के अवतार माने गये हैं—
“तोयान्तःस्थां महीं ज्ञात्वा जगत्येकार्णवीकृते ।
अनुमानात्तदुद्धारं कर्तुकामः प्रजापतिः ॥
अकरोत्स्वतनूमन््यां कल्पादिषु यथा पुरा ।
मत्स्यकूर्मादिकां तद्वद्वाराहं वपुरास्थितः ॥” (वि० पु० १।४।७,८)
किन्तु विष्णुपुराण में विष्णु तथा ब्रह्मस्वरूप नारायण की अभिन्नता का प्रतिपादन किया जाता है; अतः
इसी चतुर्थ अध्याय में विष्णु के रूप में वराह की स्तुति की गयी है तथा एक अन्य अध्याय में कूर्म को भी विष्णु का
अवतार माना गया है ( दे० १।९ )।
इस प्रकार हम देखते हैं कि मत्स्य, कूर्म तथा वराह अवतार प्रारम्भ में प्रजापति से सम्बन्ध रखते थे,
किन्तु बाद में विष्णु का महत्त्व बढ़ जाने के कारण तीनों विष्णु के ही अवतार माने जाने लगे। महाभारत के
नारायणीय उपाख्यान ( दे० म० भा० १२।३३६।७२ तथा १२।३३७।३६ ) तथा हरिवंशपुराण ( १।१।४१ ) में
वराह तथा विष्णु का सम्बन्ध मान लिया गया है। आगे चलकर तीनों का नाम लेकर एक-एक महापुराण की सृष्टि
हुई जिसमें विष्णु से उनकी अभिन्नता प्रतिपादित है ।” ३
उपर्युक्त विचार भारतीय ग्रन्थों की वस्तुस्थिति न जानने का ही दुष्परिणाम है। बुल्के की दृष्टि से विष्णु
या उनका उत्कर्ष या अवतार कोई वास्तविक वस्तु नहीं है, किन्तु विचारविकास का ही सब परिणाम है। परन्तु
वस्तुस्थिति ठीक इससे विपरीत है। वेद अनादि अपौरुषेय प्रमाणभूत ग्रन्थ हैं। जैसे रूप-ज्ञान में नेत्र स्वतन्त्र प्रमाण
हैं, वैसे ही धर्म, ब्रह्म और ज्ञान के लिए स्वतन्त्र एवं एकमात्र वेद ही प्रमाण हैं ( देखें वेदप्रामाण्यवाद )।
विष्णु कौन हैं ? प्रजापति कौन हैं ? उनका कौन-कौन अवतार कब-कब हुआ यह सब किसने देखा ?
इत्यादि प्रश्नों का उत्तर प्रत्यक्ष तथा अनुमान के आधार पर नहीं दिया जा सकता। आधुनिक इतिहास इस सम्बन्ध में
कुछ बताने में समर्थ नहीं है। मन्त्र, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद् सब वेद हैं, अपौरुषेय हैं। रामायण, महाभारत,
पुराण, उपपुराण, मन्वादि धर्मशास्त्र, दर्शन सब वेदमूलक होने के कारण ही प्रमाण होते हैं। उन सब का समन्वय
है; वे विशृङ्खलित नहीं हैं। जैसे किसी संविधान की एक धारा का अन्य धाराओं के साथ विरोध नहीं होता, साथ
ही उनका समन्वय भी अभीष्ट होता है उसी तरह इन सभी ग्रन्थों का समन्वय अभीष्ट होता है। रामायण, महाभारत
आदि सभी ग्रन्थों का वेद के साथ समन्वय होता है। वेद में भी आपाततः प्रतीत विरोधों को ऋषियों ने समन्वित
कर उनका वास्तविक अविरोध ही बताया है। किसी शाखा में पञ्चाग्नि में ६ अग्नियों का निर्देश है तो किसी में
५ ही अग्नियों का विधान है। गुणोपसंहारानुपसंहार प्रकरण द्वारा महर्षि व्यास ने ऐसे विरोधाभासों का समाधान
१. दे० गौ० रा० १।४६; प० रा० १।४१ ।
२. दे० रा० १।४५।२७–३२ ।
३. रामकथा, पृष्ठ १४५–१४७ दे० मत्स्य, कूर्म तथा वराह पुराण ।
अध्याय रामकथा का प्रारम्भिक विकास २४७
किया है। तदनुसार विचार करने से स्पष्ट विदित होता है कि अवतारवाद भावनामात्र नहीं है। वह कल्पनामात्र
नहीं है अथवा कोई दिमागी फितूर भी नहीं है, किन्तु सूर्य-चन्द्र से भी ज्वलन्त सत्य है जिसका परम प्रमाणभूत वेदों
में वर्णन है। उसमें प्रारम्भ और अन्त में कोई भेद नहीं है। अतएव प्रारम्भ में "विष्णु की अपेक्षा प्रजापति को उस
सम्बन्ध में अधिक महत्त्व दिया जाता था" यह कल्पना निस्सार है। प्रकृत में विष्णु और प्रजापति में भेद नहीं है,
नाम-भेद से लक्ष्य भेद नहीं होता, किन्तु लक्षण-भेद से लक्ष्य-भेद होता है। जैसे ब्रह्मसूत्रों में 'जन्माद्यस्य यतः'
'प्रकृतिश्च प्रतिज्ञादृष्टान्तानुपरोधात् । यह ब्रह्म का लक्षण कहा गया है, उक्त लक्षण जिसमें घटता हो वह ब्रह्म है, फिर
नाम भले ही आकाश, प्राण आदि भिन्न-भिन्न हों ।
१४५ वें अनु० में बुल्के कहते हैं "रामकथाविषयक गाथाओं से लेकर प्रचलित वाल्मीकिरामायणरूप तक
रामकथा के प्रारम्भिक विकास की रूपरेखा अङ्कित करने का प्रयत्न प्रस्तुत अध्याय में किया गया है। यह उत्तरोत्तर
विकास ही रामकथा की लोकप्रियता का प्रमाण है।" परन्तु बुल्के को यह समझना चाहिए कि भारत में काल्पनिक
किसी विकास को महत्त्व नहीं दिया जाता है। क्योंकि वह निराधार होता है। इसी लिए आगम प्रमाण पर विचार
करते हुए पौरुषेय तथा अपौरुषेय विविध आगमों पर विचार कर अपौरुषेय आगम का ही मुख्य प्रामाण्य माना गया
है। पौरुषेय उसी आगम को प्रमाण माना गया है, जो कि अपौरुषेयवेदमूलक है। पुरुषों में भ्रम, प्रमाद, विप्रलिप्सा,
करणापाटव आदि दोषों की सम्भावना प्रायः होती है; इसी लिए पौरुषेय ग्रन्थों का स्वतन्त्र प्रामाण्य मान्य नहीं होता
है। नैयायिक, वैशेषिक आदि भी आप्तवाक्य का ही प्रामाण्य मानते हैं। ईश्वर सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् आप्त है उसके
वचन होने से वेद प्रमाण हैं। अन्य ऋषि, महर्षि वेदानुयायी वेदानुसारी होने से आदरणीय होते हैं। अतएव जिस
किसी के ग्रन्थ का प्रामाण्य नहीं माना जाता है।
मार्क्सवादी विकासवादी कहते हैं, "आदिम मानव वनवासी था, जङ्गली जानवरों के समान ही वह भी
वृक्षों पर या कन्दराओं में जीवन व्यतीत करता था। प्राकृत अग्नि, वायु, बादल और बिजली से प्रभावित होता
रहता था। उसका भीरु मस्तिष्क अपने इर्द-गिर्द बहुत भूत, प्रेत, पिशाच आदि आत्माओं की कल्पना करता हुआ
उनकी पूजा-स्तुति कर आत्मरक्षा की आशा करता था। वही भूत-प्रेत की कल्पना विकसित मानव के मस्तिष्क
में सभ्यता के साबुन से धुल-धुलकर देवकल्पना बन गयी। वही वैज्ञानिक विविध चमत्कृतियों से चमत्कृत होकर
ईश्वर-कल्पना या ब्रह्म-कल्पना का रूप धारण कर सकी है। समझदार व्यक्ति सहज ही में समझ जायगा कि वस्तुतः
भीरु मस्तिष्क की भूत-प्रेत-कल्पना ही देव, ईश्वर या ब्रह्म कल्पना का मूल है। वास्तविक वह कुछ भी नहीं है।
इसी तरह विकास-क्रम के अनुसार महिमा का विस्तार है।" किन्तु ईश्वरत्व का विकास किसी में हो जाये एतावता
वह ईश्वर नहीं हो सकता। इसी तरह यदि राम वस्तुतः मनुष्यमात्र थे, ईश्वर नहीं थे तो कालक्रम या विकासक्रम
से उनकी महिमा बढ़ जाने पर भी उनकी ईश्वरत्व-ख्याति हो जाने पर भी उनको ईश्वर मानना उचित नहीं
है और उससे कोई वास्तविक लाभ नहीं हो सकता। उलटा अनीश्वर में ईश्वरत्वभ्रान्ति का दोष भी हो सकता है।
अतः स्पष्ट है कि राम का ईश्वरत्व, परब्रह्मत्व, श्रीराम का अनन्त कल्याणगुणगणास्पदत्व स्वाभाविक ही था और
यह अपौरुषेय मन्त्रों, ब्राह्मणों, उपनिषदों से ही सिद्ध है। उन्हीं आधारों पर वाल्मीकि ने शतकोटिप्रविस्तर
रामायण का आविर्भाव किया। उसी का सार वर्तमान चतुर्विंशतिसाहस्रिका संहिता वाल्मीकिरामायण है। उसी
आधार पर पुराणों में अध्यात्मरामायण, अद्भुतरामायण, आनन्दरामायण, महारामायण आदि रामायणों तथा
संहिताओं का निर्माण हुआ है। उसी आधार पर अनेक संस्कृत, प्राकृत, देशी, विदेशी भाषाओं में विविध रामकथाओं
का आविर्भाव हुआ है। एकस्वर से सर्वत्र राम का परमेश्वरत्व, ब्रह्मत्व प्रसिद्ध है। कोटि-कोटि नर-नारी राम की
उपासना करते हैं। केवल मिथ्या विकासवादी कल्पना के आधार पर यह सब नहीं हो सकता था।
२४८ रामायणमीमांसा सप्तम
“रामायणं महाकाव्यमुद्दिश्य नाटकं कृतम् ।
जन्म विष्णोरमेयस्य राक्षसेन्द्रवधेप्सया ।।” (ह० पु० विष्णुपर्व अ० ९२)
बुल्के ने हरिवंश के उक्त श्लोक का उद्धरण कर कहा है कि प्राचीन काल में रामकथा का अभिनय होता
था । किन्तु उसी श्लोक से स्पष्टतः राम को अप्रमेय विष्णुस्वरूप भी कहा गया है, पर उसे बुल्के स्वीकार नहीं करते
हैं । श्लोकार्थ यह है—रामायण महाकाव्य के आधार पर नाटकों का निर्माण हुआ है । उसमें राक्षसेन्द्र रावण के
वधार्थ अप्रमेय विष्णु के जन्म आदि का वर्णन है ।
रामकथा की लोकप्रियता राम के स्वाभाविक महत्त्व, परमेश्वरत्व तथा विशेषतः रामावतार के
स्वाभाविक मर्यादामयी लीलाओं के कारण थी, किसी के मानने न मानने के आधार पर नहीं । राम के विद्यमान
गुणों का भी वर्णन असम्भव है फिर महत्त्व वृद्ध्यर्थ अविद्यमान गुणों के वर्णन का प्रसङ्ग ही कैसे सम्भव है ? किसी
व्यक्ति में अविद्यमान गुणों का आरोप कर वर्णन करना स्तुति कही जाती है । जैसे राजा को सूर्यतुल्य कहा जाता
है । ‘रविरिव राजते राजा ।’ परन्तु ईश्वरस्वरूप राम में विद्यमान ही अनन्त गुण हैं जिनका सामस्त्येन वर्णन नहीं
हो सकता । जैसे आकाश में अपनी शक्ति के अनुसार मच्छर और गरुड़ दोनों ही उड़ते हैं, परन्तु आकाश का अन्त
कोई नहीं पाता—
“नभः पतन्त्यात्मसमं पतत्रिणः ।”
उसी तरह अपनी-अपनी शक्ति भर ब्रह्मादि एवं सामान्य जन भी भगवद्गुणों का वर्णन करते हैं पर
अन्त कोई नहीं पाता । अपनी वाणी पवित्र करना ही भगवद्गुण-गणवर्णन करने का उद्देश्य है । स्तुति न सम्भव ही
है न उद्देश्य ही है ।
बुल्के कहते हैं “रामकथा की लोकप्रियता का एक और महत्त्वपूर्ण प्रमाण बौद्ध तथा जैन साहित्य में
मिलता है । बौद्धों ने ईसवी सन् की कई शताब्दियों पहले राम को बोधिसत्त्व मानकर रामकथा की लोकप्रियता,
आकर्षकता का साक्ष्य दिया है । जैनियों ने वाल्मीकि की रचना को मिथ्या कहकर कथा के एक नये रूप में राम को
( जैनी रूप में ) अपनाने का प्रयत्न किया है । इसी तरह रामकथा प्रारम्भ से ही भारत की संस्कृति में इतनी फैल
गयी कि राम ने उस समय के प्रचलित तीन धर्मों में प्रमुख स्थान प्राप्त किया ब्राह्मणधर्म में विष्णु के अवतार, बौद्ध-
धर्म में बोधिसत्त्व तथा जैनधर्म में आठवें बलदेव के रूप में । आगे चलकर संस्कृतसाहित्य की प्रत्येक शाखा में, अन्य
भारतीय भाषाओं के साहित्य में एवं भारत के निकटवर्ती देशों में सर्वत्र रामकथा का प्रभाव दिखलायी देता है ।”
परन्तु यह सब सर्वप्राणिपरप्रेमास्पद राम और उनकी कथा में आकर्षण स्वाभाविक है, विकास-क्रम के अनुसार
काल्पनिक विशेषता के आधार पर नहीं । बौद्धों और विशेषकर जैनों ने तो राम की कथा की ओर जन-प्रवृत्ति
देखकर बौद्ध तथा जैन जनता की स्वाभाविक रामकथा में प्रवृत्ति होने से वेदप्रामाण्य तथा ईश्वरवाद का खतरा
देखकर रामकथा को विकृत कर राम को बौद्ध और जैन बनाकर अपनी जनता को अपना अनुयायी बनाये रखने
के उद्देश्य से वैसा किया था । फिर भी सत्यान्वेषी बौद्ध और जैन भी वाल्मीकिरामायण की ओर आकृष्ट हुए
बिना नहीं रहे हैं ।
अष्टम अध्याय
अवतार-सामग्री
“मनवे ह वै प्रातः। अवनेज्यमुदकमाजह्रर्यथेदं पाणिभ्यामवनेजनायाहरन्त्येवं तस्यावने-
निजानस्य मत्स्यः पाणी आपेदे ॥१॥ स हास्मै वाचमुवाद। बिभृहि मा पारयिष्यामि त्वेति कस्मान्मा
पारयिष्यसीत्यौघ इमाः सर्वाः प्रजा निर्वोढा ततस्त्वा पारयिताऽस्मीति। कथं ते भृतिरिति ॥२॥ स
होवाच। यावद्वै क्षुल्लका भवामो बह्वी वै नस्तावन्नाष्ट्रा भवत्युत मत्स्य एव मत्स्यं गिलति कुम्भ्यां माग्रे
बिभरासि स यदा तामतिवर्धा अथ कर्षू खात्वा तस्यां मा बिभरासि स यदा तामतिवर्धा अथ मा समुद्रम-
भ्यवहरासि तर्हि वा अतिनाष्ट्रो भवितास्मीति ॥३॥ शश्वद्ध झष आस। स हि ज्येष्ठं वर्धतेऽथेतिथीं समां
तदौघ आगन्ता। तन्मा नावमुप कल्प्योपासासे स औघ उत्थिते नावमापद्यासै ततस्त्वा पारयितास्मीति ।”
(श० ब्रा० १।८।१।१-४)
उपर्युक्त वचनों में कहा गया हैं कि मनु ने अवनेजन के लिए दोनों हाथों में जल लिया तो उसमें एक मत्स्य
आ गया और उसने मनु से कहा, 'मेरी रक्षा करो, मैं प्रजा सहित तुम्हें प्रलय के महौघ से पार करूँगा।' तब मनु ने
कहा 'कैसे तुम्हारा भरण हो ?' तो मत्स्य ने कहा जब तक मत्स्य छोटे रहते हैं तभी तक उनके नाश का भय रहता
है। एक मत्स्य ही दूसरे मत्स्य का भक्षण करता है, अतः कुम्भी में रखकर मेरा पालन करो। मनु ने कुम्भ में मत्स्य
को रखा।” जब वह अधिक बढ़ गया तो उसने कहा, “बड़ा कर्षू 'सरोवर' बनाकर हमें उसमें रखो।” मनुजी ने
वैसा ही किया। जब उससे भी अधिक बढ़ गया तब उसने कहा, "अब समुद्र में मुझे रखो।” तब मनु ने समुद्र में
रख दिया। मत्स्य अत्यधिक बढ़ गया और उसने मनु से कहा, “अमुक समय में महौघ आयेगा तब नौका की
कल्पना कर उसमें आरूढ़ होना। मैं पार करूँगा।”
“तमेवं भृत्वा समुद्रमभ्यवजहार। स यतिथीं तत्समां परिदिदेश ततिथीं समां नावमुपकल्प्योपा-
सांचक्रे। स औघ उत्थिते नावमापेदे। तं स मत्स्य उपन्यापुप्लुवे तस्य शृङ्गे नावः पाशं प्रतिमुमोच तेनैत-
मुत्तरं गिरिमधिदुद्राव ॥५॥ स होवाच अपीपरं वै त्वा वृक्षे नावं प्रतिबध्नीष्व तं तु त्वा मा गिरौ
सन्तमुदकमन्तश्छेत्सीद्यावदुदकं समवायात्तावत्तावदन्ववसर्पासीति । स ह तावत्तावदेवान्ववसर्प तदप्येत-
दुत्तरस्य गिरेर्मनोरवसर्पणमित्यौघो ह ताः सर्वाः प्रजा निरुवाहायेह मनुरेवैकः परिशिशिषे ॥६॥”
(श० ब्रा० १।८।१।५,६)
मनु ने समुद्र में मत्स्य को डाल दिया। जितने दिनों में महौघ आने को मत्स्य ने कहा था उतने ही दिनों
में महौघ आया। मनु ने पृथिवी को नाव बनाकर उसमें स्थान प्राप्त किया और उसी मत्स्य के शृङ्ग में नाव को बाँध
दिया। उसी मत्स्य के द्वारा मनु उत्तर गिरि हिमालय पहुँचे। तत्पश्चात् महामत्स्य ने कहा—मैंने तुम्हें पार कर दिया
नाव को वृक्ष में बाँध दो।
“ऊचुश्च कूर्मराजानमकूपारे सुरासुराः।
अधिष्ठानं गिरेरस्य भवान् भवितुमर्हति ॥
कूर्मेण तु तथेत्युक्त्वा पृष्ठमस्य समर्पितम्।
तं शैलं तस्य पृष्ठस्थं यन्त्रेणेन्द्रो न्यपीडयत् ॥
३२
२५० रामायणमीमांसा अष्टम
मन्थानं मन्दरं कृत्वा तथा नेत्रं च वासुकिम् ।
देवा मथितुमारब्धाः समुद्रं निधिमम्भसाम् ॥” ( म० भा० १।१८।११-१३ )
महाभारत के उपर्युक्त वचनों में कूर्मावतार का वर्णन है। देवताओं की प्रार्थना से उस कूर्म ने अपने
पृष्ठ पर मन्दराचल को धारण किया था जिसको मन्थान दण्ड बनाकर देवताओं एवं असुरों ने समुद्रमन्थन किया था।
निम्नोक्त वचनों में परशुराम आदि अवतारों का वर्णन है—
“त्रेतायुगे भविष्यामि रामो भृगुकुलोद्भवः ।
क्षत्रं चोत्सादयिष्यामि समृद्धबलवाहनम् ॥
सन्ध्यांशे समनुप्राप्ते त्रेताया द्वापरस्य च।
अहं दाशरथी रामो भविष्यामि जगत्पतिः॥
द्वापरस्य कलेश्चैव सन्धौ पर्यवसानिके ।
प्रादुर्भावः कंसहेतोर्मंथुरायां भविष्यति ॥
हंसः कूर्मश्च मत्स्यश्च प्रादुर्भावा द्विजोत्तम ।
वराहो नरसिंहश्च वामनो राम एव च ॥
रामो दाशरथिश्चैव सात्वतः कल्किरेव च ।
यदा वेदश्रुतिर्नष्टा मया प्रत्याहृता पुनः॥
सवेदाः सश्रुतीकाश्च कृताः पूर्वं कृते युगे ।
अतिक्रान्ताः पुराणेषु श्रुतास्ते यदि वा क्वचित् ॥”
( म० भा० १२।३३९।८४-८९; १०१-१०५ )
“जन्माद्यस्य यतः” ( ब्र० सू० १।१।२), “प्रकृतिश्च प्रतिज्ञादृष्टान्तानुपरोधात् ।” ( ब्र० सू० १।४।२३ )
इत्यादि ब्रह्मसूत्रों से सम्पूर्ण जगत् के अभिन्न निमित्तोपादान कारण को ब्रह्म कहा गया है। उपनिषदों, मन्त्रों, ब्राह्मणों
एवं आरण्यकों में जहाँ कहीं भी जिसमें उक्त लक्षण घटता हो वह चाहे जिस नाम से व्यपदिष्ट हो उसे ब्रह्म ही समझना
चाहिये। इसी लिये “आकाशस्तल्लिङ्गात्” ( ब्र० सू० १।१।२२ ), “प्राणस्तथानुगमात्” ( ब्र० सू० १।१।२८ ),
“अन्तस्तद्धर्मोपदेशात्” ( ब्र० सू० १।१।२४ ) इत्यादि सूत्रों में आकाश, प्राण तथा आदित्यमण्डलस्थ पुरुष को
ब्रह्म ही कहा गया है, क्योंकि श्रुतिप्रमाण से उनमें जगत्कारणता सिद्ध है। इस दृष्टि से प्रकृत में विष्णु और प्रजापति
अभिन्न ही तत्त्व हैं ।
अतएव वाल्मीकिरामायण में प्रजापति नाम का निर्देश न होकर ब्रह्म का उल्लेख हुआ है। दक्षादि
प्रजापति अवान्तर प्रजापति होते हैं। मुख्य प्रजापति ब्रह्मा ही होता है। वही विश्व की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय का
हेतु होता है। वह यद्यपि एक ही है तो भी कार्य भेद से उसके पृथक्-पृथक् भी नाम होते हैं। उत्पादक ब्रह्मा, पालक
विष्णु एवं संहारक रुद्र या शिव कहे जाते हैं। इस दृष्टि से प्रजापति ईश्वर या महाविराट् त्रिमूर्ति होता है। त्रिमूर्ति
में भी विष्णु की प्रधानता होने से इन शब्दों द्वारा विष्णु का ही उल्लेख हुआ है। स्वयम्भू ब्रह्मा का देवताओं के साथ
आविर्भाव हुआ और उन्होंने वाराह रूप धारण कर पृथ्वी का उद्धार किया। पूर्वापर के सभी ग्रन्थों के समन्वित
निष्कर्ष से यह सिद्धान्त सिद्ध होता है कि भगवान् विष्णु ही शतपथ, तैत्तिरीय, काठक आदि में प्रजापति, ब्रह्म आदि
शब्दों से उक्त हैं और उन्हीं से मत्स्य, कूर्म, वराह आदि अवतार हुए ।
हर ग्रन्थ में हर बात का निरूपण सम्भव नहीं होता, अपने-अपने अनुसार हि कोई ग्रन्थ मत्स्यावतार का
एवं कोई वराहावतार का वर्णन करते हैं। रामायण का कोई पाठ परवर्ती नहीं है। सभी पाठ प्रामाणिक एवं
परम्पराप्राप्त हैं। जैसे वेदों में शाखाभेद से सभी पाठभेद प्रामाणिक हैं। सप्तशती के परम्पराप्राप्त सभी पाठ
प्रामाणिक हैं। वही स्थिति रामायण के पाठ-भेदों की भी है। महाभारत में कूर्मराज से देवताओं ने और असुरों ने
मन्दराचल का आधार बनने को कहा। परन्तु जब तैत्तिरीय आरण्यक में ही कूर्म को प्रजापति ईश्वर का अवतार
कहा गया है तब उन कूर्मराज को प्रजापति के अवतारभूत कूर्म से अभिन्न ही मानना स्वाभाविक है। यदि वेदों
और आर्ष ग्रन्थों का प्रामाण्य न माना जाय तब तो किसी कच्छप से देवताओं द्वारा प्रार्थना और उसके द्वारा
मन्दराचल का धारण आदि सिद्ध ही नहीं हो सकता। उस स्थिति में यह सब कुछ पागल का प्रलापमात्र समझा
जायगा ।
महाभारत एवं विष्णुपुराण का समन्वय करने से भी यही निष्कर्ष निकलता है। महाभारत का प्रजापति
विष्णुरूप ही है। महाभारत के वचन में 'मत्परं नाधिगम्यते' कहा गया है। जिससे स्पष्ट है कि वह प्रजापति
वेदान्तवेद्य ब्रह्म ही है। वही विष्णु भी हैं। 'अहं प्रजापतिर्ब्रह्मा' इत्यादि का श्लोकार्थ यों है—मैं सृष्टिकर्ता प्रजापति
ब्रह्मा हूँ। मुझसे पर (उत्कृष्ट) कोई भी प्रमाण से ज्ञात नहीं है। मैंने ही मत्स्यरूप से महान् भय से तुम देवताओं
की रक्षा की थी। विष्णुपुराण के वचन का अर्थ निम्नोक्त है। जगत् का प्रलय होने पर 'तोयान्तःस्थां महीं ज्ञात्वा'
अनुमान से पृथ्वी को जल के भीतर जानकर उसका उद्धार करने की कामना से प्रजापति ने पूर्व कल्पों के समान ही
मत्स्य, कूर्म आदि के समान वराहरूप धारण किया।
पूर्वोक्त दृष्टि से ही विष्णुपुराण में विष्णु तथा ब्रह्मस्वरूप नारायण एवं ब्रह्मा के साथ अभिन्नता कही गयी
है, अतएव मत्स्य, कूर्म आदि विष्णु के ही अवतार हैं। आप कहते हैं विष्णु का महत्त्व बढ़ जाने से प्रजापति के
अवतार मत्स्य, कूर्म आदि विष्णु के माने जाने लगे ? पर यह कल्पना सर्वथा निराधार है। किसी की इच्छा या
भावना से विष्णु का महत्त्व घटता अथवा बढ़ता नहीं है। शास्त्रों के आधार पर ही विष्णु का महत्त्व है। विष्णुपुराण,
हरिवंशपुराण तथा महाभारत में विष्णु का खूब महत्त्व भी कहा गया है और उन्हीं ग्रन्थों में प्रजापति के अवतारों
में मत्स्य, कूर्म आदि का वर्णन भी है। अतः कब से क्यों किस प्रमाण से विष्णु का महत्त्व बढ़ा ? यह कहना और
सिद्ध करना असम्भव ही है। महाभारत तथा हरिवंश में बुल्के के अनुसार भी वराह तथा विष्णु का सम्बन्ध माना
गया है। वस्तुतः हेमाद्रि, पराशरमाधव, मिताक्षरा, निर्णयसिन्धु आदि में जैसे मन्त्र, ब्राह्मण, आरण्यक, विविध
स्मृतियों, पुराणों और आगमों का समन्वय करके ही निष्कृष्ट अर्थ निकाला जाता है वैसे ही अवतारों और रामकथाओं
के सम्बन्ध में भी सबका समन्वय करके ही किसी निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है। जब महाभारत, हरिवंश तथा
विष्णुपुराण जैसे प्रामाणिक ग्रन्थों में प्रजापति और विष्णु को एक मानकर मत्स्यादि अवतारों और राम और कृष्ण
को विष्णु के अवतार कहा ही जा रहा है तब हठधर्मी के कारण वाल्मीकिरामायण में राम को अवतार बतलानेवाले
अंशों को क्षेपक कहने में क्या तुक है ?
१४१ वें अनु० में बुल्के कहते हैं, "वामनावतार और नृसिंहावतार प्रारम्भ से विष्णु से ही सम्बन्ध रखते
हैं। वामनावतार का उल्लेख तैत्तिरीयसंहिता (२।१।३।१), शतपथब्राह्मण (१।२।५।५), तैत्तिरीयब्राह्मण
(१।७।१७) एवं ऐतरेयब्राह्मण (६।३।७) में हुआ है। यह अवतार ऋग्वेद की एक कथा से विकसित माना जाता
है (दे० ऋ० सं० १।२२) और शतपथब्राह्मण (१।२।५।१) । नारायणीय उपाख्यान महाभारत (१२।३२६।७५)
तथा हरिवंश (१।४१) में इसका विष्णु के अन्य अवतारों के साथ उल्लेख हुआ है। नृसिंहावतार की कथा
पहले पहल तैत्तिरीय आरण्यक के परिशिष्ट (१०।१।६) में मिलती है। नारायणीय उपाख्यान महाभारत
(१२।३२६।७३ और ३३७।३६) तथा हरिवंशपु० (१।४१) में इसका उल्लेख है। परशुराम विष्णु के अवतार का
प्रारम्भिक कथाओं में उल्लेख नहीं है। उदाहरणार्थ महाभारत (३।११५-११७), किन्तु नारायणीय उपाख्यान
२५२ रामायणमीमांसा अष्टमं
महाभारत ( १२।३२६।७७ ), हरिवंश पु० ( १।४१।११२-१२० ) तथा विष्णुपुराण ( १।९।१४३ ) में उनको
विष्णु का अवतार माना गया है ।"
वस्तुतः उक्त सभी ग्रन्थ प्रामाणिक हैं । उनमें कहीं भी किसी अवतार की चर्चा है तो वह प्रामाणिक है ।
निष्कर्षरूप में सभी विष्णु के अवतार हैं, पर इन पृथक्-पृथक् उक्तियों से अवतारों के विकास की बात सिद्ध नहीं
होती । अतः बुल्के का यह निष्कर्ष कि "ब्राह्मणों में तथा अन्य प्राचीन साहित्यों में अवतारवाद विद्यमान है, किन्तु
उक्त ग्रन्थों के रचनाकाल में न तो अवतारों की कोई विशेष पूजा की जाती थी और न उनमें विष्णु का प्राधान्य ही
था" सर्वथा असङ्गत है । प्रजापति तथा विष्णु का विभिन्न यज्ञों में देवताओं के रूप में उल्लेख है ही । कई स्थलों में
इन्द्र और विष्णु का साथ-साथ देवतात्व है, कहीं विष्णु का ही प्राधान्य भी । पीछे दिखलाया जा चुका है कि विष्णु
की पूज्यता से ही उनसे अभिन्न अवतारों की पूज्यता सिद्ध होती है। वस्तुतः जैसे अग्निहोत्र, ज्योतिष्टोम आदि कर्मों
का ज्ञान और अनुष्ठान किसी एक ग्रन्थ पर आश्रित नहीं होता, वह तो मन्त्र, ब्राह्मण और कल्पसूत्र तीनों का
समन्वय करके ही समझा जा सकता है । केवल मन्त्र या ब्राह्मण के आधार पर उनका अनुष्ठान नहीं हो सकता ।
इतना ही क्यों, तीनों के आधार पर बनी हुई परम्पराप्राप्त पद्धतियों के आधार पर ही ज्योतिष्टोमादि का प्रयोग हो
सकता है। इसी तरह मन्त्रों, ब्राह्मणों, आरण्यकों, उपनिषदों तथा रामायण, भारत, पुराणों एवं आगमों के आधार
पर बने पूजाविधानों के आधार पर ही राम, कृष्ण आदि की आराधनाएँ होती हैं, पर इसका यह अर्थ कदापि नहीं
है कि इनकी पूजा पहले नहीं होती थी, विकास-क्रम के बाद में चल पड़ी ।
"अतएव कृष्णावतार के साथ-साथ अवतारवाद के विकास में एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन प्रारम्भ हुआ ।
उस समय से लेकर अवतारवाद भक्ति-भाव से ओत-प्रोत होने लगा ।" बुल्के का यह कथन भी निराधार है, क्योंकि
महाभारत, हरिवंश, विष्णुपुराण, श्रीमद्भागवत आदि ग्रन्थों से ही कृष्णावतार की सामग्री प्राप्त होती है और
उन्हीं ग्रन्थों में विष्णु की, राम आदि की भक्ति की भी चर्चा है ही। रामतापनीय, गोपालतापनीय आदि उपनिषदों
में भी राम, कृष्ण आदि अवतारों की भक्ति एवं पूजा आदि का उल्लेख है ।
यह कहना सर्वथा निराधार है कि "वासुदेव कृष्ण भागवतों के इष्ट देव थे । प्रारम्भ में उनका विष्णु
से कोई सम्बन्ध नहीं था ।" यह भी कहना गलत है, "तीसरी शती ई० पू० में वासुदेव और कृष्ण की अभिन्नता
की भावना उत्पन्न हुई । बौद्ध धर्म तथा भागवत साम्प्रदाय का भक्तिमार्ग दोनों समानरूप से ब्राह्मण-साहित्य, कर्मकाण्ड
तथा यज्ञप्रधान धर्म की प्रतिक्रिया के रूप में उत्पन्न और विकसित हुए । इसके फलस्वरूप धर्म के क्षेत्र में ब्राह्मणों का
एकाधिकार लुप्त हो गया था । बौद्ध-धर्म का अधिकाधिक प्रसार देखकर ब्राह्मणों ने भागवतों को अपनी ओर आकर्षित
करने के लिए भागवतों के इष्टदेव वासुदेव कृष्ण को विष्णु नारायण का अवतार मान लिया । इससे अवतारवाद को
बहुत प्रोत्साहन मिला । साथ ही साथ विष्णु का भो महत्त्व बढ़ने लगा । इस तरह अवतारवाद की सारी भावना धीरे-
धीरे विष्णु नारायण में केन्द्रित होने लगी और वैदिक साहित्य के अन्य अवतारों के कार्य विष्णु में ही आरोपित हुए,"
क्योंकि उक्त कल्पना को सिद्ध करनेवाला कोई प्रमाण नहीं है । बौद्ध धर्म वैदिक धर्म का प्रतिक्रियारूप था । इसमें तो
प्रमाण बौद्ध ग्रन्थ ही है । बुद्ध तथा बौद्धों ने प्रत्यक्ष तथा अनुमान दो ही प्रमाण माने हैं । आगम प्रमाण नहीं माना ।
फलतः उनके मत में वेदों की मान्यता नहीं है । बौद्ध बुद्ध को ही सर्वज्ञ मानकर बुद्ध-वचन को ही धर्म में प्रमाण
मानते हैं । सुतरां वे लोग वैदिक नित्यात्मवाद तथा यज्ञ, याग आदि विशेषतः पश्वादिसमवेत यज्ञ के विरोधी थे ।
वे जन्मना जाति नहीं मानते थे । सुतरां ब्राह्मण जाति का भी उनकी दृष्टि में कोई महत्त्व नहीं था । परन्तु भागवत भी
ऐसे थे यह नहीं कहा जा सकता, क्योंकि भगवान् वासुदेव ने महाभारत तथा गीता में वेद का, आत्मा का तथा
वैदिक धर्मों का महत्त्व वर्णन किया है। ऐसी स्थिति में कृष्णभक्त वेद, यज्ञ आदि का विरोधी कैसे हो सकता था ?
अध्याय अवतार-सामग्री २५३
नारायणीयोपाख्यान, श्रीमद्भागवत तथा सर्वोपरि रामायण में वेद, यज्ञों और ब्राह्मणों का प्रभूत
महत्त्व वर्णित है। अतः भागवतों के भक्तिसम्प्रदाय को बौद्धों के समान वेद, यज्ञ तथा ब्राह्मणों का विरोधी समझना
निरी भ्रान्ति ही है। साथ ही भागवतों के उक्त ग्रन्थों में ही जब वासुदेव कृष्ण को विष्णु का अवतार माना गया
है तब तो कृष्ण और वासुदेव की भिन्नता की कल्पना को कोई अवकाश ही नहीं मिलता। ब्राह्मणों ने भागवतों को
आकर्षित करने के लिए वासुदेव को विष्णु का अवतार मान लिया, इसका भी कोई आधार नहीं है। उलटा
‘विष्णुर्गोपा अदाभ्यः’ (ऋ० सं० १।२२।१८) इत्यादिरूप से दोनों में ही विष्णु को गोप (कृष्ण) कहा गया
है। ‘गोपवेषस्य विष्णोः’ मेघदूत (१।१५) में कालिदास ने भी विष्णु को गोपवेषधारी कहा है। वस्तुतः विष्णु-
पुराण आदि ग्रन्थ ब्राह्मणसम्प्रदाय की स्वार्थपूर्ण कल्पना नहीं हैं, किन्तु महर्षि व्यास द्वारा वेदार्थ के उपबृंहण या
वेद के भाष्यरूप में ही निर्मित हैं—
“इतिहासपुराणाभ्यां वेदार्थमुपबृंहयेत् ।”
वस्तुस्थितिमूलक होने के कारण ही पुराणों में वेदविरोधी बुद्ध को भी विष्णु का अवतार माना गया
है। फिर जब वेदस्वरूप तैत्तिरीय आरण्यक (१०।१।६) में वासुदेव और विष्णु की एकता का प्रमाण मिलता है।
वह किसी के संसर्ग से बढ़ने लगा, यह कल्पना भी निर्मूल है।
१४३ वें अनु० में बुल्के का कहना कि “इधर अवतारवाद की भावना फैलती जा रही थी; उधर कई
शतियों से राम का आदर्श चरित्र भारतीय जनता के सामने आ रहा था। रामायण की लोकप्रियता के साथ-साथ
राम का महत्त्व भी बढ़ रहा था। उनकी वीरता के वर्णन में अलौकिकता की मात्रा बढ़ने लगी। रावण पाप और
दुष्टता का प्रतीक बन गया और राम पुण्य और सदाचरण के, अतः इस विकास की स्वाभाविक परिणति यह हुई
कि कृष्ण की तरह राम भी विष्णु के अवतारों में गिने जाने लगे। राम तथा विष्णु की अभिन्नता की धारणा कब
उत्पन्न हुई इसका ठीक समय निर्धारित करना असम्भव है। फिर भी अवतारवाद उत्तरकाण्ड में इतना व्याप्त है कि
इसे उत्तरकाण्ड की अधिकांश सामग्री के पूर्व का मानना चाहिए। अतः बहुत सम्भव है कि पहली शती ई० पू० से
ही रामावतार की भावना प्रचलित होने लगी थी। रामायण के प्रक्षेपों के अतिरिक्त महाभारत, वायु, ब्रह्माण्ड,
विष्णु, मत्स्य, हरिवंश आदि प्राचीनतम पुराणों में अवतारों की तालिका में दाशरथि राम का भी नाम आया है।”
यह कथन नितान्त भ्रम एवं दुरभिसन्धिपूर्ण है। कारण कहा जा चुका है कि वेदों, उपनिषदों में
अनादिकाल से ही राम के अवतार तथा उनकी उपासना का वर्णन है। जब मन्त्रों, ब्राह्मणों, उपनिषदों तथा ब्रह्म-
सूत्रों में परमात्मा का सगुण साकार होना वस्तुस्थिति है तब अवतार केवल भावना की वस्तु कैसे कहा जा सकता है।
बुल्के का कथन केवल प्रतिज्ञामात्र है, उसमें कोई हेतु नहीं है। बिना हेतु के अनुमान अकिञ्चित्कर ही
होता है। जैसे धूम का अग्नि से कार्य-कारणभाव होने से निश्चित व्याप्ति है तभी धूम से वह्नि का अनुमान होता है।
इस प्रकार राम विष्णु के अवतार नहीं हैं इसकी किसी हेतु के साथ व्याप्ति नहीं है। विष्णु और राम दोनों ही
पाश्चात्यों एवं बुल्के दोनों के लिए अप्रत्यक्ष ही हैं। फिर, उनका भेद या अभेद भी अप्रत्यक्ष ही है। अप्रत्यक्ष साध्य
के साथ साधन की व्याप्ति का प्रत्यक्ष कैसे हो सकता है। जिन ग्रन्थों के आधार पर विष्णु एवं राम का अस्तित्व
सिद्ध होता है, उन्हीं से उनका अभेद भी सिद्ध होता है। अतएव जब प्रामाणिक वेदों, आर्ष रामायण तथा महाभारत
इतिहासों से राम की ब्रह्मरूपता सिद्ध है, तब तो तद्विरुद्ध नगण्य जनों की निराधार कल्पना का महत्त्व हो ही नहीं
सकता। प्रामाणिक आधार के बिना केवल वीरता एवं लोकप्रियता के कारण ही किसी को अवतार नहीं माना जाता है।
सिद्धान्ततः महाभारत, भागवत तथा अन्य पुराणों की अपेक्षा भी रामायण अति प्राचीन तथा प्रामाणिक सद्ग्रन्थ है।
अवतार रूप से प्रथम ही राम का अवतार प्रसिद्ध है। इसलिए संसार में राम का नाम सर्वाधिक प्रसिद्ध है। भारत
२५४ रामायणमीमांसा अष्टम
में तो बच्चे-बच्चे आस्तिक-नास्तिक सभी की जिह्वा पर राम का नाम प्रख्यात है। कृष्ण की कथाओं में भी आता
है कि कृष्ण की माता यशोदा कृष्ण को राम की कथा सुना रही थी, जब सीताहरण की बात आयी तो सोते-सोते
कृष्ण बोल पड़े "सौमित्रे क्व धनुर्धनुर्ध्नुरिति व्यग्रा गिरः पान्तु वः।" वस्तुतः जब वेद, उपनिषद् तथा रामायण
से अवतारवाद सिद्ध है तब वह भावनामात्र कैसे हो सकता है? यदि वेद आदि प्रमाण नहीं तो बुल्के जैसे लोगों
के नगण्य वचनों का ही क्या प्रमाण हो सकता है। कुछ व्यक्तियों की तुच्छ कल्पनाओं के बल पर वेद, उपनिषद्,
महर्षियों के रामायण, महाभारत, विष्णुपुराण तथा श्रीमद्भागवत को झूठा मान लेना सर्वथा अनुचित है।
१४४वें अनु० में बुल्के कहते हैं—"छठी या सातवीं शती ई० से महात्मा बुद्ध भी विष्णु के अवतार
माने जाने लगे।" इसके लिए उन्होंने दिखाया है कि अवतारों की सूची में एकरूपता नहीं है, किन्तु यह तर्क
अकिञ्चित्कर है। यह आवश्यक नहीं कि सब बातें सभी जगह लिखी जायें। कहा जा चुका है कि ऐसी अनेकरूपता
वेदों और उपनिषदों के कर्मों एवं उपासनाओं में भी आती है और इसी लिए मीमांसा के अनुसार समन्वय करके ही
सूत्रों के अनुसार पद्धतियाँ बनती हैं। फिर भी नारायणोय उपाख्यान में विष्णु के दस अवतारों की सूची मिलती है।
उसके प्रक्षिप्तत्व की कल्पना निराधार है। श्रीमद्भागवत परम प्रामाणिक ग्रन्थ है। वोपदेव ने श्रीमद्भागवत के
आधार पर ही मुक्ताफल नामक ग्रन्थ लिखा है और वे हेमाद्रि के समय के हैं। श्रीभागवत में विष्णु के दस अवतारों
का वर्णन है। उसमें बुद्ध की भी गणना है। अतः बुद्ध को छठी शती ई० से अवतार माना जाने लगा यह कल्पना
सर्वथा अप्रमाण है।
१४५वें अनु० में बुल्के कहते हैं, "बौद्धों ने ई० सन् के कई सौ वर्ष पूर्व राम को बोधिसत्त्व मानकर राम-
कथा की लोकप्रियता का साक्ष्य दिया है। जैनियों ने भी वाल्मीकि की रचना को मिथ्या कहकर रामकथा के एक
नये रूप में राम को अपनाने का प्रयत्न किया है।" एतावता बुल्के ने यह स्वीकार किया है कि जैनियों ने वाल्मीकि-
रामायण को ही उलट कर रूपान्तर देने की चेष्टा की है, परन्तु रामकथा का प्रारम्भ ई० सन् की कई शतियों
पूर्व में हुआ और राम ने ब्राह्मण-धर्म में विष्णु के अवताररूप में निश्चित स्थान प्राप्त कर लिया, इत्यादि बुल्के की
उक्तियां निराधार हैं। राम ईसा से लाखों वर्ष पूर्व ही वस्तुतः विष्णुरूप में प्रसिद्ध हैं। इसमें सम्पूर्ण भारतीय साहित्य
प्रमाण है। परन्तु बुल्के के कथन में कुछ पाश्चात्यों की अटकलबाजियों को छोड़कर कोई भी प्रमाण नहीं हैं।
वस्तुतस्तु भारतीय साहित्यों के अनुसार राम विष्णु के अवतार ही नही किन्तु किसी दृष्टि से अनन्त-
अनन्त ब्रह्मा, विष्णु एवं रुद्र राम के अंश से प्रकट होते हैं—
"शम्भु विरञ्चि विष्णु भगवाना, उपजहि जासु अंश ते नाना।"
( रा० मा० १।१४३।३ )
श्रीभागवत के अनुसार ब्रह्माजी ने ही स्पष्ट कहा है कि तम, महान्, अहं, आकाश आदि अष्ट आवरणों
से आवृत सप्तवितस्तिकायवाला कहाँ मैं और कहाँ आप जिनके रोमकूपों में इसी प्रकार के अगणित ब्रह्माण्ड-परमाणु
निरन्तर परिभ्रमण करते रहते हैं। भारतीय दृष्टिकोण के अनुसार विभिन्न ब्रह्माण्डों के उत्पादक, पालक और
संहारक ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र कार्यब्रह्म हैं, परन्तु अनन्त ब्रह्माण्डों के उत्पादक, पालक और संहारक ब्रह्म कारण-
ब्रह्म हैं। ऐसी स्थिति में कार्यब्रह्म कारणब्रह्म के अंश ही ठहरते हैं, अतः विष्णुपुराण के विष्णु, शिवपुराण के शिव,
रामायण के राम, श्रीभागवत के कृष्ण तथा शाक्तागमों की शक्ति एक ही कारण वस्तुरूप हैं। परन्तु विष्णुपुराणोक्त
विष्णु के अंशभूत अनन्त ब्रह्मा, विष्णु, शिवादि कार्यब्रह्म ही हैं। इसी तरह शिवपुराणोक्त शिव के अंशभूत विष्णु आदि
भी कार्यब्रह्म ही हैं। इसी दृष्टि से रामायण एवं भागवत के राम और कृष्ण भी कारणब्रह्म रूप हैं। फलतः उनके
रोमकूपों में कार्यब्रह्मरूप अनन्त ब्रह्माण्डों के उत्पादक, पालक और संहारक कार्यरूप ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र आदि उनके
अध्याय अवतार-सामग्री २५५
अंश ही हैं। इस दृष्टि से राम का स्वतःसिद्ध लोकोत्तर महत्त्व प्रख्यात है। फिर ईसा की अमुक शती में राम ने
ब्राह्मणधर्म में विष्णु के अवतार का पद प्राप्त कर लिया, यह कहना धृष्टतामात्र है ।
दसवें अध्याय में, १६४वें अनुच्छेद में बुल्के कहते हैं, "रामकथा-साहित्य में अवतारवाद की उत्तरोत्तर
बढ़ती हुई व्यापकता के साथ-साथ भक्ति-भावना भी उत्पन्न हुई और धीरे-धीरे विकसित होने लगी। बुल्के की दृष्टि
में अवतारवाद एक भावनामात्र है। राम के आदर्शचरित्र के कारण उनमें विष्णु अवतार होने की कल्पना हो गयी,
वस्तुतः राम विष्णु अवतार नहीं थे। परन्तु अवतारभावना के साथ-साथ राम-भक्ति भी विकसित होने लगी।"
परन्तु विष्णु, राम, कृष्ण अनादि काल से ही भारतीय साहित्य में परब्रह्म रूप से प्रसिद्ध हैं। अतः उनकी भक्ति
भी अनादिकाल से ही सिद्ध है। उसका विकास या कल्पना नहीं है।
बुल्के कहते हैं, "भारतीय भक्ति-मार्ग का सूत्रपात और विकास राम-भक्ति के शताब्दियों पूर्व हुआ था ।
वेदों में इसका बीजारोपण हुआ और भागवत धर्म में वह पल्लवित हुआ। बौद्ध धर्म और जैन-धर्म की भाँति
भागवतों का भक्ति-मार्ग भी कर्मकाण्ड तथा यज्ञप्रधान ब्राह्मण-धर्म की प्रतिक्रिया रूप में उत्पन्न हुआ। लेकिन इसमें
वेदों की निन्दा को स्थान नहीं मिला और इस प्रकार बाद में ब्राह्मण तथा भागवत धर्म के समन्वय के साथ वैष्णव
धर्म की उत्पत्ति सम्भव हो सकी । इसमें भागवतों के देवता वासुदेव कृष्ण प्राचीन वैदिक देवता विष्णु के अवतार माने
गये हैं। भक्ति-भावना इन्हीं विष्णु नारायण वासुदेव कृष्ण में केन्द्रीभूत होकर उत्तरोत्तर विकसित होने लगी ।
विष्णु के अवतार भी माने जाने लगे । जिनमें से रामावतार भारतीय संस्कृति के दृष्टिकोण से सबसे महत्त्वपूर्ण है ।
फिर भक्तिमार्ग के इतिहास में भागवत धर्म तथा पाञ्चरात्र के साहित्य में शाण्डिल्यभक्तिसूत्र, नारदीयभक्तिशास्त्र,
रामानुज, निम्बार्क, मध्व तथा वल्लभाचार्य के सम्प्रदायों में कृष्णावतार को प्रायः एकाधिकार मिला है।"
परन्तु अपने उक्त कथन की पुष्टि में बुल्के ने कोई प्रमाण नहीं दिया। टिप्पणी में इनसाइक्लोपीडिया
आव रिलीजन एण्ड एथिक्स के भक्तिमार्ग, हेमचन्द्रराय चौधरी के अर्ली हिस्ट्री आव वैष्णव सेक्ट, बलदेवप्रसाद
मिश्र के तुलसीदर्शन को ही अपने कथन का आधार बताया है, जो कि स्वयं में ही प्रमाण नहीं हो सकते, क्योंकि
उक्त कथन भारतीय साहित्य के विरुद्ध ही हैं। बुल्के भी वेदों में भक्तिमार्ग का बीज मानते हैं। पर वेद नित्य एवं
अनादि हैं (दे० वेदप्रामाण्य ) । भागवतों का भक्तिमार्ग ब्राह्मण-धर्म की प्रतिक्रिया के रूप में नहीं, किन्तु वह ब्राह्मण-
धर्म का ही एक अंग है। साथ ही वैदिक धर्म से भिन्न कोई ब्राह्मण-धर्म है यह केवल पाश्चात्यों की कल्पना है।
वेदों के आरण्यक, उपनिषद् भागों में ही उपासना और ज्ञान काण्ड का प्रतिपादन है। इसी लिए वेद त्रिकाण्ड कहा
जाता है। वेदों में कर्मकाण्ड की तथा कर्मकाण्ड में भी अनेक निन्दाएँ मिलती हैं पर उन निन्दाओं का तात्पर्य
विविक्षित अर्थ की स्तुति में ही होता है :
"नहि निन्दा निन्यं निन्दितुं प्रवर्तते अपितु विधेयं स्तोतुम् ।
यस्तं न वेद किमृचा करिष्यति ॥"
"अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते ।
ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायां रताः ॥" (यजु० सं० ४०।९)
उक्त प्रसङ्गों में वेदोक्त कर्मकाण्ड और उपासनात्मक ज्ञान दोनों की निन्दा है । पर यह निन्दा दोनों के
समुच्चयानुष्ठान विधि के प्रशंसार्थ ही है। इस तरह कहीं कर्मकाण्ड की निन्दा देखकर इसे प्रतिक्रिया समझना भ्रान्ति
ही है। महाभारत वेद का उपबृंहणमात्र है। श्रीभागवत में कहा गया है कि भगवान् व्यास ने भारत के व्यपदेश से
वेदार्थ ही प्रदर्शित किया है। फलतः भागवत-धर्म का मूल नारायणीयोपाख्यान आदि भी वेदार्थ का ही उपबृंहणमात्र
है। विष्णुपुराण, हरिवंश, भागवत आदि सभी पुराण भी वेदार्थ के उपबृंहण और वेद के विस्तृत आर्ष भाष्यमात्र हैं ।
२५६ रामायणमीमांसा अष्टम
शैव, वैष्णव, शाक्त आदि विभिन्न आगम एवं तन्त्र आदि भी वैदिक धर्म की ही शाखा-प्रशाखाओं के ही उपबृंहक हैं।
सर्वत्र ही न केवल विष्णु या कृष्ण की ही भक्ति वर्णित है बल्कि शिव, शक्ति, विष्णु एवं राम तथा कृष्ण आदि की
भक्ति का स्पष्ट वर्णन है। जैसे उपनिषदों में रामतापनीय है वैसे ही गोपालतापनीय, नृसिंहतापनीय आदि हैं।
रामानुज, निम्बार्क, मध्व आदि ने रामायण, महाभारत, विष्णुपुराण, श्रीमद्भागवत आदि ग्रन्थों को परम प्रमाण
माना है। सुतरां उनमें वर्णित राम की भक्ति को भी पूर्णरूप से आदृत किया है। श्रीमद्भागवत के नवें स्कन्ध में
रामचरित का सर्वोत्तम वर्णन है।
'भक्ति का सूत्रपात ई० सन् के प्रारम्भ के आसपास हुआ' यह कहना सर्वथा असङ्गत है। वेद एवं वेदोक्त
भक्ति अनादि है। आधुनिक इतिहास की दृष्टि में भी वेद, वैदिक सभ्यता तथा शिवभक्ति ईसा से हजारों वर्ष पूर्व का
है। ऋग्वेद में रुद्र शब्द का प्रयोग शिव के लिए मिलता है और जो विशेषण शिवजी के लिए प्रयुक्त हुए हैं, वे प्रायः
रुद्र के लिए मिलते हैं। शिव शब्द भी है ही।
आधुनिक मोहनजोदड़ो और हरप्पा की खुदाई ने भारतीय धार्मिक इतिहास पर बहुत प्रभाव डाला है।
वहाँ दो प्रकार की शिव-मूर्तियाँ मिली हैं, पहली जो मोहनजोदड़ो की मुहरों में मिली है, उसमें योगावस्था में बैठे
ध्यानी शिव हैं। इसमें शिवजी बीच में बैठे हैं ओर चारों ओर पशुओं की आकृतियाँ हैं। शिव को पशुपतिनाथ कहा ही
जाता है, अतः बाघ, हाथी, गेंडा और भैंसा ध्यानी शिव के चारों तरफ खड़े हैं। त्रिशूल की जगह पर शिव के मस्तक
पर तीन आकृतियाँ हैं। उसमें शिव के सिंहासन के नीचे दो मृग भी हैं। दूसरी मुहर में शिव के तीन मुख हैं जो ब्रह्मा,
विष्णु तथा महेश त्रिरूप के बोधक हैं। हरप्पा में बहुत सी पत्थर की सामग्रियाँ मिली हैं जो शिव-लिङ्ग जैसी हैं।
एतावता शिव-लिङ्ग की पूजा स्वतः प्रमाणित हो जाती है। ऋग्वेद में शिश्नदेवाः शब्द (ऋ० सं० ७।२१।५ और
१०।१०।१९) आया है। पाश्चात्य लोग इसके आधार पर कहते हैं कि अनार्य लोग शिव-लिङ्ग के पूजक थे, आर्यों
में उन्हीं से वह ली गयी है। परन्तु पाश्चात्यों की उक्त धारणा गलत है। यास्क तथा सायण ने इसका 'अब्रह्मचर्य'
अर्थ लिया है। शिश्नोदरपरायण विषयी लोग शिश्नदेव माने जाते थे। अब भी वैसे ही माने जाते हैं। इस आधार
पर कम से कम ६ हजार वर्ष पहले शिव-पूजा प्रचलित थी, यह सिद्ध होता है।
ईसा से २०० वर्ष पूर्व पुष्यमित्र शृङ्ग ने वैदिक धर्म का प्रसार किया। ईसा के पूर्व पहली शती में
बैंक्ट्रियन तथा शक राजाओं ने उत्तर पश्चिम भारत पर राज्य किया था। उनके सिक्कों पर वृषभ के चिह्न हैं।
ईसा की पहली शती में कुषाणवंशीय नरेशों ने एक बहुत बड़ा राज्य स्थापित किया था जिसका विस्तार
वाराणसी तक था। राजा बीम कड फाइसीस तो शैव धर्म स्वीकार कर महादेव का पूर्ण उपासक हो गया था। उसके
सिक्कों से यह स्पष्ट है। उनमें एक तरफ राजा का चित्र है दूसरी तरफ महादेव नन्दी को साथ लिए खड़े हैं। उनमें
शिवजी त्रिशूल और डमरू लिये दिखाये गये हैं। कनिष्क ने भी वैसे ही सिक्के चलाये थे। उसके सिक्कों में शिवजी
ईशो या ईश नाम से अङ्कित हैं। उस मूर्ति में महादेव की चार भुजाएँ हैं।
काशीप्रसाद जायसवाल ने नागवंशीय राजाओं का पता लगाया है। यह वंश कुषाणों के बाद और गुप्तकाल
के पहले का है। इसके शिलालेखों से विदित होता है कि इस वंश के आदि पुरुष ने शिवलिङ्ग को अपने कन्धे पर रखकर
शिवजी को परितुष्ट कर राज्य-स्थापना की थी। अंसभारसंनिवेशितशिवलिङ्गोद्वहनशिवसुपरितुष्टसमुत्थापित-
राजवंशानां पराक्रमाधिगतभागीरथ्यमलजलमूर्धाभिषिक्तानां दशाश्वमेधावभृथस्नानानां भारशिवानाम्।
(ना० प्र० पत्रिका भाग १२ अङ्क १)। इस वंश का नाम ही भारशिव था। इसके बाद भी गुप्तकाल में और उसके
बाद भी शिव की उपासना चलती रही।
।४ )-> wait, is it ७।१०।४? Yes,७।१०।४`.
Line 10-12:
“योजनौ रुद्रो यो अप्स्वन्तर्य ओषधीर्वीरुध य इमा विश्वा भुवनानि चाक्लृपे तस्मै रुद्राय
नमोऽअस्त्वग्नये ।” ( अथ० सं० ७।९२।१ ), “भुवनस्य पितरं गीर्भिराभी रुद्रं दिवा वर्धया रुद्रमक्तौ ।
बृहन्तमृष्वमजरं सुषुम्न मृध्नुवेम कविनेषितासः ॥” ( ऋ० सं० ६।४९।१० )
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Line 13-16:
जो रुद्र अग्न्यादि वेदों का कारण है, जो विश्व का एकमात्र स्वामी है, महाज्ञानी और अतीन्द्रियार्थदर्शी है
और जो हिरण्यगर्भ को उत्पन्न करता है वह हमें शुभ बुद्धि दे । जो रुद्र अग्नि में, जल में, ओषधियों और वनस्पतियों
में है और जो भुवनों का निर्माण करता है उस तेजस्वी रुद्र को हमारा नमस्कार हो। जो भुवनों का रक्षक है तथा जो
`बड़ा ज्ञानी है, प्रेरक