सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 323, कुल 1049 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 323

२४६ रामायणमीमांसा सप्तमं
रामायण के उदीच्य पाठ में समुद्र-मन्थन के वृत्तान्त में कूर्म का उल्लेख नहीं है, १ किन्तु दाक्षिणात्य पाठ
के एक प्रक्षेप में इस अवसर पर विष्णु के वराह अवतार लेने की कथा मिलती है। २ मत्स्य अवतार तथा प्रजापति का
सम्बन्ध महाभारत में उल्लिखित है—
“अहं प्रजापतिर्ब्रह्मा मत्परं नाधिगम्यते ।
मत्स्यरूपेण यूयं च मयास्मान्मोक्षिता भयात् ॥” ( म० भा० ३।१८७।५२ )
विष्णुपुराण में भी मत्स्य, कूर्म तथा वराह तीनों प्रजापति के अवतार माने गये हैं—
“तोयान्तःस्थां महीं ज्ञात्वा जगत्येकार्णवीकृते ।
अनुमानात्तदुद्धारं कर्तुकामः प्रजापतिः ॥
अकरोत्स्वतनूमन््यां कल्पादिषु यथा पुरा ।
मत्स्यकूर्मादिकां तद्वद्वाराहं वपुरास्थितः ॥” (वि० पु० १।४।७,८)
किन्तु विष्णुपुराण में विष्णु तथा ब्रह्मस्वरूप नारायण की अभिन्नता का प्रतिपादन किया जाता है; अतः
इसी चतुर्थ अध्याय में विष्णु के रूप में वराह की स्तुति की गयी है तथा एक अन्य अध्याय में कूर्म को भी विष्णु का
अवतार माना गया है ( दे० १।९ )।
इस प्रकार हम देखते हैं कि मत्स्य, कूर्म तथा वराह अवतार प्रारम्भ में प्रजापति से सम्बन्ध रखते थे,
किन्तु बाद में विष्णु का महत्त्व बढ़ जाने के कारण तीनों विष्णु के ही अवतार माने जाने लगे। महाभारत के
नारायणीय उपाख्यान ( दे० म० भा० १२।३३६।७२ तथा १२।३३७।३६ ) तथा हरिवंशपुराण ( १।१।४१ ) में
वराह तथा विष्णु का सम्बन्ध मान लिया गया है। आगे चलकर तीनों का नाम लेकर एक-एक महापुराण की सृष्टि
हुई जिसमें विष्णु से उनकी अभिन्नता प्रतिपादित है ।” ३
उपर्युक्त विचार भारतीय ग्रन्थों की वस्तुस्थिति न जानने का ही दुष्परिणाम है। बुल्के की दृष्टि से विष्णु
या उनका उत्कर्ष या अवतार कोई वास्तविक वस्तु नहीं है, किन्तु विचारविकास का ही सब परिणाम है। परन्तु
वस्तुस्थिति ठीक इससे विपरीत है। वेद अनादि अपौरुषेय प्रमाणभूत ग्रन्थ हैं। जैसे रूप-ज्ञान में नेत्र स्वतन्त्र प्रमाण
हैं, वैसे ही धर्म, ब्रह्म और ज्ञान के लिए स्वतन्त्र एवं एकमात्र वेद ही प्रमाण हैं ( देखें वेदप्रामाण्यवाद )।
विष्णु कौन हैं ? प्रजापति कौन हैं ? उनका कौन-कौन अवतार कब-कब हुआ यह सब किसने देखा ?
इत्यादि प्रश्नों का उत्तर प्रत्यक्ष तथा अनुमान के आधार पर नहीं दिया जा सकता। आधुनिक इतिहास इस सम्बन्ध में
कुछ बताने में समर्थ नहीं है। मन्त्र, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद् सब वेद हैं, अपौरुषेय हैं। रामायण, महाभारत,
पुराण, उपपुराण, मन्वादि धर्मशास्त्र, दर्शन सब वेदमूलक होने के कारण ही प्रमाण होते हैं। उन सब का समन्वय
है; वे विशृङ्खलित नहीं हैं। जैसे किसी संविधान की एक धारा का अन्य धाराओं के साथ विरोध नहीं होता, साथ
ही उनका समन्वय भी अभीष्ट होता है उसी तरह इन सभी ग्रन्थों का समन्वय अभीष्ट होता है। रामायण, महाभारत
आदि सभी ग्रन्थों का वेद के साथ समन्वय होता है। वेद में भी आपाततः प्रतीत विरोधों को ऋषियों ने समन्वित
कर उनका वास्तविक अविरोध ही बताया है। किसी शाखा में पञ्चाग्नि में ६ अग्नियों का निर्देश है तो किसी में
५ ही अग्नियों का विधान है। गुणोपसंहारानुपसंहार प्रकरण द्वारा महर्षि व्यास ने ऐसे विरोधाभासों का समाधान
१. दे० गौ० रा० १।४६; प० रा० १।४१ ।
२. दे० रा० १।४५।२७–३२ ।
३. रामकथा, पृष्ठ १४५–१४७ दे० मत्स्य, कूर्म तथा वराह पुराण ।