रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
( १० )
रावण का प्रणिधि अकम्पन कहता है—
असाध्यः कुपितो रामो विक्रमेण महायशाः ।
आपगायास्तु पूर्णाया वेगं परिहरेच्छरैः ॥ २३ ॥
सताराग्रहनक्षत्रं नभश्चाप्यवसादयेत् ।
असौ रामस्तु सीदन्तीं श्रीमानभ्युद्धरेन्महीम् ॥ २४ ॥
भित्त्वा वेलां समुद्रस्य लोकानाप्लावयेद् विभुः ।
वेगं वापि समुद्रस्य वायुं वा विधमेच्छरैः ॥ २५ ॥
संहृत्य वा पुनर्लोकान् विक्रमेण महायशाः ।
शक्तः श्रेष्ठः स पुरुषः स्रष्टुं पुनरपि प्रजाः ॥ २६ ॥
नहि रामो दशग्रीव शक्यो जेतुं रणे त्वया ।
रक्षसां वापि लोकेन स्वर्गः पापजनैरिव ॥ २७॥(वा० रा० ६।३३।१)
कुपित होकर काल के तुल्य संहार करने में प्रवृत्त हुए राम को और तो और ब्रह्मा आदि भी पराक्रम से
नहीं रोक सकते । राम बाढ़ से लबालब भरी नदी का वेग बाणों से रोक सकते हैं, आकाश को भी त्रिविक्रमावतार
की तरह तारारहित कर सकते हैं, यज्ञवराह के तुल्य जलमग्न पृथ्वी का उद्धार कर सकते हैं, शरों से समुद्र के तट-
बन्धरूप मर्यादा को तोड़ कर सब लोकों को जलमग्न कर सकते हैं । शरों से समुद्र तथा वायु के वेग को रोक सकते
हैं । महायशा राम विक्रम द्वारा सब लोकों का संहार कर फिर सारी प्रजा की नई सृष्टि करने में समर्थ हैं । हे
दशकन्धर, तुम रण में राम को कदापि नहीं जीत सकते । तुम अकेले तो क्या सब राक्षसों के साथ भी उन्हें नहीं
जीत सकते ।
रावण द्वारा मायामृग बनने के लिए अनुरोध करने पर मारीच कहता है—
रामो विग्रहवान् धर्मः साधुः सत्यपराक्रमः ।
राजा सर्वस्य लोकस्य देवानामित्र वासवः ॥ १३ ॥
अप्रमेयं हि तत्तेजो यस्य सा जनकात्मजा ।
न त्वं समर्थस्तां हर्तुं रामचापाश्रयां वने ॥ १४ ॥
राम मूर्तिमान् धर्म हैं, सज्जनशिरोमणि हैं, उनका पराक्रम परम सत्य है जैसे देवताओं के इन्द्र राजा हैं
वैसे ही वे सब लोकों के राजा हैं । वह तेज असीम हैं जिनकी पत्नी जनकनन्दिनी जानकी हैं । रावण, राम के बाणों
से सुरक्षित उसे तुम हरने में सक्षम नहीं हो । उसे तुम्हें हरने का विचार नहीं करना चाहिये । ऐसा करना सर्वनाश
को निमन्त्रण देना है ।
ऋषियों ने, देवताओं और गन्धर्वों ने यज्ञ की पूर्णाहुति एवं मन्त्र-संस्कृत वसोर्धारा के समान प्रज्वलित
अग्नि में प्रवेश करती हुई सीता को देखा । धर्मात्मा राम बाष्पाकुललोचन होकर मुहूर्त भर ध्यानपरायण हुए ।
तदनन्तर ही राजराज वैश्रवण ( कुबेर ), पितरों सहित यमराज, सहस्रनयन देवराज, जलाधिप वरुण, वृषभध्वज
महादेव, ब्रह्मविदों में श्रेष्ठ लोकपितामह ब्रह्मा आदि देवगण सूर्यसंनिभ विमानों द्वारा लङ्कापुरी में राम के निकट आये
एवं प्राञ्जलि हो राम से बोले—आप सब लोकों के कर्ता हैं, ज्ञानवानों में श्रेष्ठ हैं, फिर अग्नि में प्रवेश कर रही सीता
की क्यों उपेक्षा कर रहे हैं ? यहाँ देवगण, इन्द्र आदि से भी राम को श्रेष्ठ कहा गया है । नागेश के अनुसार ‘विष्णु-
मुखा वै देवाः’ इस श्रुति से भी यह सिद्ध है । राम ने कहा मैं तो अपने को दशरथ का पुत्र मानव जानता हूँ । मैं
वास्तव में जो हूँ और जैसा हूँ वह आप बतायें ।
( ११ )
तत्पश्चात् ब्रह्माजी ने कहा—
भवान् नारायणो देवः श्रीमांश्चक्रायुधः प्रभुः ।
एकशृङ्गो वराहस्त्वं भूतभव्यसपत्नजित् ॥१३॥
अक्षरं ब्रह्म सत्यं च मध्ये चान्ते च राघव ।
लोकानां त्वं परो धर्मो विष्वक्सेनश्चतुर्भुजः ॥१४॥
शार्ङ्गधन्वा हृषीकेशः पुरुषः पुरुषोत्तमः ।
अजितः खड्गधृग् विष्णुः कृष्णश्चैव बृहद्बलः ॥१५॥
सेनानीर्ग्रामणीः सर्वं त्वं बुद्धिस्त्वं क्षमा दमः ।
प्रभवश्चाप्ययश्च त्वमुपेन्द्रो मधुसूदनः ॥१६॥
इन्द्रकर्मा महेन्द्रस्त्वं पद्मनाभो रणान्तकृत् ।
शरण्यं शरणं च त्वामाहुर्दिव्या महर्षयः ॥१७॥
सहस्रशृङ्गो वेदात्मा शतशीर्षो महर्षभः ।
त्वं त्रयाणां हि लोकानामादिकर्ता स्वयं प्रभुः ॥१८॥
सिद्धानामपि साध्यानामाश्चर्यश्चासि पूर्वजः ।
त्वं यज्ञस्त्वं वषट्कारस्त्वमोङ्कारः परात्परः ॥१९॥
प्रभवं निधनं चापि नो विदुः को भवानिति ।
दृश्यसे सर्वभूतेषु गोषु च ब्राह्मणेषु च ॥२०॥
दिक्षु सर्वासु गगने पर्वतेषु नदीषु च ।
सहस्रचरणः श्रीमान् शतशीर्षः सहस्रदृक् ॥२१॥
त्वं धारयसि भूतानि पृथिवीं सर्वपर्वतान् ।
अन्ते पृथिव्याः सलिले दृश्यसे त्वं महोरगः ॥२२॥
त्रीन् लोकान् धारयन् राम देवगन्धर्वदानवान् ।
अहं ते हृदयं राम जिह्वा देवी सरस्वती ॥२३॥
देवा रोमाणि गात्रेषु ब्रह्मणा निर्मिताः प्रभो
निमेषस्ते स्मृता रात्रिुरुन्मेषो दिवसस्तथा ॥२४॥
संस्कारास्त्वभवन् वेदा नैतदस्ति त्वया विना ।
जगत् सर्वं शरीरं ते स्थैर्यं ते वसुधातलम् ॥२५॥
अग्निः कोपः प्रसादस्ते सोमः श्रीवत्सलक्षणः ।
त्वया लोकास्त्रयः क्रान्ताः पुरा स्वैर्विक्रमैस्त्रिभिः ॥२६॥
महेन्द्रश्च कृतो राजा बलिं बध्वा सुदारुणम् ।
सीता लक्ष्मीर्भवान् विष्णुर्देवः कृष्णः प्रजापतिः ॥२७॥
वधार्थं रावणस्येह प्रविष्टो मानुषीं तनुम् ।
तदिदं नस्त्वया कार्यं कृतं धर्मभृतां वर ॥२८॥
निहतो रावणो राम प्रहृष्टो दिवमाक्रम ।
अमोघं देव वीर्यं ते न ते मोघाः पराक्रमाः ॥२९॥
( १२ )
अमोघं दर्शनं राम अमोघस्तव संस्तवः ।
अमोघास्ते भविष्यन्ति भक्तिमन्तो नरा भुवि ॥३०॥
ये त्वां देवं ध्रुवं भक्ताः पुराणं पुरुषोत्तमम् ।
प्राप्नुवन्ति तथा कामानिह लोके परत्र च ॥३१॥
अर्थात् आप भोक्ता और भोग्य रूप सकल प्रपञ्च के आश्रय साक्षात् नारायण हैं, सुदर्शनचक्रधारी श्री-
विष्णु हैं, एकशृङ्ग वराह तथा भूत और भव्य सकल शत्रुओं के विजेता हैं। आप ही आदि, अन्त और मध्य में
रहनेवाले सत्य अक्षर हैं। सब लोकों के आप ही परम धर्म हैं। आप ही चतुर्भुज विष्वक्सेन, शार्ङ्गधन्वा, सर्वेन्द्रिय-
नियामक हृषीकेश पुरुष एवं पुरुषोत्तम हैं। आप ही अजित खड्गधर विष्णु, बृहद्वल कृष्ण, सेनानी एवं ग्रामणी हैं।
आप ही बुद्धि, सत्त्व, क्षमा तथा दम हैं। जगत् की उत्पत्ति और प्रलय के आप ही एकमात्र कारण हैं एवं आप
ही मधुसूदन हैं। आप ही इन्द्रकर्मा इन्द्र की सृष्टि करनेवाले महेन्द्र हैं। रणान्तकृत् पद्मनाभ भी आप ही हैं। दिव्य
महर्षि आपको शरणयोग्य परम आश्रय एवं रक्षक कहते हैं। आप ही सहस्रशृङ्ग वेद एवं शतशीर्ष महान् धर्म हैं।
आप तीनों लोकों के आदिकर्ता स्वयंप्रभु हैं। आपका अन्य कोई प्रभु नहीं है। सिद्धों एवं साध्यों के आप ही आश्रय
एवं कारण हैं। आप ही यज्ञ हैं और आप ही वषट्कार हैं। आप ही ॐकार हैं। आप ही परात्पर परमेश्वर हैं।
आप की उत्पत्ति और निधन कोई नहीं जानता अर्थात् आप उत्पत्ति और लय से विरहित नित्य हैं। आप कौन हैं
यह कोई नहीं जानता, परन्तु आप अन्तर्यामी रूप से सब भूतों में, विशेष रूप से गौ एवं ब्राह्मणों में, दृष्टिगोचर
होते हैं। अत्यन्त अचेतन सभी दिशाओं में, आकाश में एवं पर्वतों और नदियों में अन्तर्यामी रूप से आप योगियों
के दृष्टिगोचर होते हैं। आप सहस्रचरण, शतशीर्ष तथा सहस्रदृक् हैं। महाविराट् रूप से संसार के सभी चरण, शीर्ष
और नेत्र आपके ही हैं। सभी भूतों पर्वतों सहित पृथिवी को आप ही धारण करते हैं। अन्त में पृथिवी के कारण-
रूप जल में, देव, गन्धर्व, दानव सहित तीनों लोकों को धारण करनेवाले महोरग शेष आप ही हैं। हे श्रीराम, मैं
(ब्रह्मा) आपका हृदय हूँ, सरस्वती आपकी जिह्वा हैं एवं मेरे द्वारा निर्मित सभी देव आपके गात्र के रोम हैं।
आपका नेत्रनिमीलन रात्रि है एवं नेत्रोन्मीलन दिन है। आपके ज्ञान-विज्ञान संस्कार ही वेद हैं। वस्तुतः आपके
बिना संसार कुछ भी नहीं है। सारा जगत् आपका वैराज शरीर है। आपकी स्थिरता वसुधातल है। आपका कोप
ही अग्नि है। आपका प्रसाद ही श्रीवत्सलक्षण सोम है। आपने अपने तीन पगों से तीनों लोकों को आक्रान्त कर,
दारुण बलि को बाँधकर, इन्द्र को राजा बनाया है। सीता लक्ष्मी हैं और आप प्रजापति विष्णु हैं। रावण के वधार्थ
ही आप मानव-देह में प्रविष्ट हुए हैं। हे देव, वह रावण-वधादि हम लोगों का (देववृन्द का) कार्य आपके द्वारा
सम्पन्न हो गया है। अब अप्प प्रसन्नतापूर्वक परम धाम में पधारिये। हे देव, आपका अमोघ वीर्य एवं अमोघ
पराक्रम है। आपका दर्शन और स्तवन भी अमोघ है। भूतलवर्ती आपके भक्त नर भी अमोघ (सर्वत्र साफल्यसम्पन्न)
होंगे। वे भक्त ऐहलौकिक सकल कामनाओं को प्राप्त करेंगे और अन्त में आपके पुराणपुरुषोत्तमरूप को प्राप्त
होंगे। देवाधिदेव महादेवजी की सन्निधि में इन्द्रादि दिक्पालों के समक्ष राम के सम्बन्ध में लोकपितामह ब्रह्माजी
की यह भूतार्थ व्याहृति है।
श्रीराम के अनन्त गुण हैं अनन्तगुणगणमण्डित परब्रह्म परमात्मा के अवतार राम का पाश्चात्य मति यदि
आकलन न कर सके तो इसमें आश्चर्य ही क्या ? परमतत्त्व राम को जानने के लिए मन की शुद्धि अपेक्षित है।
अशुद्ध मन में राम के यथार्थ ज्ञान की क्षमता नहीं। यद्यपि
“अजस्य गृह्णतो जन्म निरीहस्य हतद्विषः ।
स्वपतो जागरूकस्य याथाथ्र्यं वेद कस्तव ॥”
के अनुसार उनका यथार्थ ज्ञान प्रायः सभी के लिए कठिन है। फिर भी जो वेदशास्त्र के वचनों पर श्रद्धा करते हैं,
ऋषिमहर्षियों के वाक्यों पर विश्वास करते हैं श्रद्धा-विश्वासरूपी पार्वती-परमेश्वर की कृपा से उनके लिए यथार्थ
ज्ञान प्राप्त करना संभव है। ऋषिमूनियों के वचनों को झुठलाने में तत्पर वेदविरोधियों से उनमें अवश्य तारतम्य है।
राम का एक पत्नीव्रत
आनन्दरामायण के अनुसार राम की प्रतिज्ञा है सीता के सिवा अन्य स्त्री मेरे समक्ष माता कौशल्यातुल्य
है। अन्य पत्नी का परिग्रह मुझसे नहीं किया जा सकता, परिग्रह करना तो दूर मैं मन से भी अन्य स्त्री के परिग्रह
की बात नहीं सोच सकता—
अन्यत्सीतां विनान्या स्त्री कौशल्यासदृशी मम ।
न क्रियतेऽपरा पत्नी मनसापि न चिन्तये ॥
यज्ञार्थ आवश्यक होने पर राम ने सीता से भिन्न भार्या का वरण नहीं किया, इसलिए यज्ञों में पत्नी के
स्थान में सीता की काञ्चनी प्रतिमा ही उपयुक्त होती थी—
न सीतायाः परां भार्या वव्रे स रघुनन्दनः ।
यज्ञे यज्ञे च पत्न्यर्थं जानकी काञ्चनी भवत् ॥
श्रीसीता का परित्याग कर रावणरि श्रीराम ने अन्य नारी का वरण नहीं किया, किन्तु सीता की काञ्चनी
प्रतिकृति को पत्नी के रूप में अपने दक्षिणाङ्क में स्थापित कर प्रभूत यज्ञयाग किये। पतिदेव के श्रवणपथगामी उस
वृत्तान्त से सीता ने परित्याग-दुःख को, जो दुःख से भी हटाया नहीं जा सकता था, किसी प्रकार सहा अर्थात् उस
वृत्तान्त से उनका दुःख कुछ हल्का हो गया—
सीतां हित्वा दशमुखरिपुर्नोपयेमे यदन्यां तस्या एव प्रतिकृतिसखो यत्क्रतूनाजहार ।
वृत्तान्तेन श्रवणविषयप्रापिणा तेन भर्तुः सा दुवारं कथमपि परित्यागदुःखं विषेहे ॥
उत्तररामचरित में श्रीराम का स्मरण कर सीता के विह्वल होने पर श्रीसीता की सखी वासन्ती ने
कहा—सखि, तुम ऐसे निष्ठुर राम का स्मरण कर क्यों दीर्घ और उष्ण उच्छ्वास लेती हो। सीता ने कहा, सखि,
राम निष्ठुर नहीं है। मैं बहिरङ्ग दृष्टि से ही उनसे दूर हूँ वस्तुतः उनके हृदय की रानी मैं ही हूँ।
राम की हृदयसिंहासनाधीश्वरी सीता ही रही। इस सन्दर्भ में कुन्दमालाकार ने कितने सुन्दर शब्दों में
राम के भाव का चित्रण किया है—
त्वं देवि चित्तनिहिता गृहदेवता मे स्वप्नागता शयनमध्यसखी त्वमेव ।
दारान्तरग्रहणनिःस्पृहमानसस्य यागे तव प्रतिकृतिर्मम धर्मपत्नी ॥
अर्थात् हे देवि, चित्त में स्थापित ( सदा स्मृति में रमी हुई—अविस्मृत ) तुम्हीं मेरी गृहदेवी हो, स्वप्न
में आयी हुई तुम्हीं मेरी शय्या में सहचरी हो। अन्य पत्नी के परिग्रह की मुझे तनिक भी स्पृहा नहीं है। यज्ञयागों
में धर्मपत्नी की आवश्यकता होने पर तुम्हारी काञ्चनी प्रतिमा ही यज्ञ में मेरी धर्मपत्नी है ।
श्रीराम की नीतिमत्ता
वाल्मीकिरामायण के अनुसार राजतन्त्र होते हुए भी रघुवंशियों के राज्यकाल में लोकतन्त्र अक्षुण्ण था ।
इसी लिए महाराज दशरथ को राम को यौवराज्य देने के लिए जन-स्वीकृति अपेक्षित हुई थी—
समानिनाय मेदिन्यां प्रधानान् पृथिवीपतिः । ( वा० रा० २।१।४६ )
( १४ )
मन्त्री वही होते थे जो पौरों एवं जानपदों के विश्वासपात्र होते थे—
तस्मै मन्त्रः प्रयोक्तव्यो दण्डमाधित्सता सदा ।
पौरजानपदा यस्मिन् विश्वासं धर्मतो गताः ॥ ( म० भा० १२।८३।४५,४६ )
राजा की सभा में सभी जातियों के मुख्य लोग सभासद् होते थे—सभ्याः सर्वासु जातिषु । ( शुक्रनीति )
जातिजानपदान् धर्मान् श्रेणीधर्मांश्च धर्मवित् ।
समीक्ष्य कुलधर्मांश्च स्वधर्मं प्रतिपादयेत् ॥ ( मनु० ८।४१ )
के अनुसार राम जातिधर्म, देशधर्म, श्रेणीधर्म तथा कुलधर्मों को जानते एवं उनका पालन करते थे ।
भारतीय नीति एवं राजधर्म में राजा का आचरण ही आदर्श राज्य का आधार होता है । राजा चाहे व्यक्ति हो या
दल । वह अपने व्यवहार से समाज का उन्नायक होता है । अतएव राम ने अपने आचरण द्वारा प्रजा तथा समाज को
आदर्शरूप में ढाला था । यद्यपि वैयक्तिक आचरण निजी जीवन से ही सम्बद्ध होता है, परन्तु वस्तुतः राम का वैयक्तिक
जीवन भी समाज के लिए ही था । तभी तो वे लोकाराधन के लिए वैयक्तिक स्नेह, दया, सौख्य तथा जानकी तक
को त्यागने को तैयार थे ।
तुलसी प्रजा सुभाग से भूप भानुसम होय ।
बरसत हरषत लोग सब करषत लखै न कोय ॥
सूर्य धरती से कब कितना रस खींचते हैं यह कोई नहीं देखता, भानुजनित मेघ से रसमय जल बरसता
देखकर सभी हर्षित होते हैं वैसे ही रामराज्य में कर के रूप में बहुत परिमित धन लिया जाता था, यज्ञ-यागों में प्रभूत
धन दान दिया जाता था ।
कालिदास के अनुसार 'सहस्रगुणमुत्स्रष्टुमादत्ते हि रसं रविः ।' हजारों गुना अधिक बनाकर देने के
लिए जैसे सूर्य पृथिवी से अप्रत्यक्ष रसादान करते हैं वैसे राजा हजारों गुना अधिक देने के लिए प्रजा से सीमित
अप्रत्यक्ष कर ग्रहण करते थे ।
तुलसी के अनुसार "श्रुतिपालक धर्मधुरन्धर' रामने विधान नहीं बनाया, किन्तु आदर्श आचरण उपस्थित
किया । तुलसी के रामने राजधर्म का सर्वस्व यही कहा था—
मुखिया मुख सों चाहिअइ खान पान कहुं एक ।
पालइ पोसइ सकल अँग तुलसी सहित विवेक ॥
प्रजा के विभिन्न वर्गों का उनकी स्थिति, क्षमता और संस्कार के अनुसार पालन-पोषण करना राजा का
कर्तव्य है, परन्तु विवेक के साथ । मुख द्वारा भक्षित अन्न रसरूप से हस्त, पाद, नेत्र, श्रोत्र, हृदय, मन, बुद्धि आदि
सबको प्रभावित करता है । परन्तु सबकी योग्यता तथा आवश्यकता एक सी नहीं है । 'हाथी को मन भर चींटी को
कन भर' की कहावत प्रसिद्ध ही है । धर्मनियन्त्रित विवेकी राजा ही विभिन्न परिस्थितियों, व्यक्तियों एवं श्रेणियों के
साथ यथोचित कुशलता के साथ व्यवहार कर सकता है । भारतीय राजा उतना शासक नहीं होता था जितना प्रजा
को हित का परामर्श दाता । श्रीराम प्रजा को आत्मीयता की दृष्टि से उपदेश करते हैं राजा के रुआव में नहीं—
जो अनीति कुछ भाषौं भाई । तो मोहि बरजउ भय बिसराई ॥
यहां 'राजा करे सो न्याय' को कोई स्थान नहीं । ऐसा राजा ही प्रजा के हृदयसिंहासन का अधीश्वर
होता है ।
( १५ )
रामराज्य में सभी सुखी और सभी शोकरहित थे—
हरषित भये गये सब सोका ।
राम ने अपने राज्य को 'आब्रह्मन् ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी' के अनुसार बनाया था, जिसमें वसिष्ठादि ब्रह्मवर्चसी
ब्राह्मण थे, राम, लक्ष्मण, भरत तथा शत्रुघ्न जैसे शूरवीर राजन्य थे । उस राष्ट्र में पर्याप्त दूध देनेवाली गायें और
महान् भार वहन करनेवाले बैल उत्पन्न होते थे । तीव्रगामी घोड़े एवं साध्वी सती पुरन्ध्रियाँ होती थीं । राष्ट्र के रथी
विजेता होते थे। राष्ट्र के यजमान सभा में बैठने योग्य सभ्य युवक उत्पन्न करनेवाले होते थे । समय-समय पर वृष्टि
होती थी । औषधियाँ फलदायिनी परिपाक को प्राप्त होती थीं । राष्ट्र के योग-क्षेम की पूर्ण व्यवस्था थी । राम गौओं
और ब्राह्मणों के रक्षणार्थ तथा देश के हितार्थ अपने अप्रमेय गुरु के अनुसार सदा ही महत् कर्म की साधना में
उद्यत रहे—
गोब्राह्मणहितार्थाय देशस्य च हिताय वै ।
तव चैवाप्रमेयस्य वचनं कर्तुमुद्यतः ॥
रामराज्य में भौतिक आदि ताप किसी को नहीं व्यापते थे—
दैहिक दैविक भौतिक तापा । रामराज्य नहि काहुहि व्यापा ॥ (रामचरितमानस ७।२०।१)
उच्च धर्मनिष्ठता एवं ब्रह्मनिष्ठता का ही परिणाम था कि किसी की अपमृत्यु नहीं होती थी । किसी को
कोई पीड़ा नहीं होती थी । सब सुन्दर और नीरोग होते थे । कोई दुःखी, दरिद्र एवं दीन नहीं होता था । कोई मूर्ख
एवं दुर्लक्षणवाला भी नहीं होता था—
अलप मृत्यु नहि कबनेउ पीरा । सब सुन्दर सब निरूजसरीरा ॥
नहिं दरिद्र कोउ दुःखी न दीना । नहि कोउ अबुध न लच्छनहीना ॥
सब उदार सब पर उपकारी । विप्रचरनसेवक नर नारी ॥
एकनारिव्रत रत सब झारी । ते मन बच क्रम पति हितकारी ॥
वाल्मीकिरामायण के अनुसार राम का मन्त्रिमण्डल था, जिसमें विनयशील, सलज्ज, कार्यकुशल, जितेन्द्रिय,
अस्त्रशस्त्रकुशल, सुदृढ़, पराक्रमी, यशस्वी तथा सावधान मन्त्री थे ।
सीताराम का महत्त्व
पद्मपुराण के अनुसार श्रीहरि का एक-एक नाम समस्त वेदों के समान परमपावन है और हरि के सहस्र
नामों के तुल्य एक श्रीरामनाम है । तभी तो भगवान् शिव पार्वती से कहते हैं—हे वरानने ! मैं मनोरम राम में राम,
राम, राम जपता हुआ सदा रमण करता हूँ । राम का एक-एक नाम हरि के सहस्र नामों के तुल्य हैं ।
जैसे सच्चिदानन्दघनमूत्ति राम हैं वैसी ही राम की ह्लादिनी, सन्धिनी और संविन्मूत्ति जनकनन्दिनी
जानकी हैं । आह्लादिनी आदि शक्तियों से विशिष्ट ही परिपूर्ण ब्रह्म होता है । उसी तरह सर्वालङ्कारों से अलङ्कृता
सुवर्णवर्णा द्विभुजा चिद्रूपिणी कमलधारिणी श्रीजनकनन्दिनी सीता से आश्लिष्ट होकर ही श्रीरामचन्द्र परात्पर
परब्रह्म हैं ।
सकल सत्शास्त्रों का तात्पर्य सीता में पर्यवसित है, क्योंकि सीतोपनिषद् के अनुसार सीता ब्रह्मसत्तासामान्य-
रूपा है । तभी तो श्रीपराशरभट्ट स्वामी कहते हैं—केवल श्रीसूक्त तथा रामतापनी उपनिषद् ही हाथ उठाकर आपको
ही जगत् की एकमात्र नियन्त्री नहीं कहते हैं, किन्तु रामायण महान् आर्ष ग्रन्थ भी आपके चरित्र का प्रतिपादन कर के
ही जीवनधारण करता है । जितने स्मृतियों के प्रणेता मनु आदि हैं वे सभी पुराणों के सहित वेदों को आपकी महिमा
में प्रमाण मानते हैं ।
( १६ )
भक्त वैष्णवाचार्य तो मुक्तकण्ठ से स्पष्ट कहते हैं—हे माता मैथिली, लङ्का में नित्य अभिनव अपराध
करनेवाली राक्षसियों का रोषपूर्ण हनुमान् से, अनेक हेतुदर्शक वचनों द्वारा बिना शरण से आये ही, संरक्षण कर
आपने राघवेन्द्र श्रीराम की गोष्ठी (संसद्) को लघु बना दिया, क्योंकि राघवेन्द्र रामचन्द्र भगवान् ने तो जयन्त तथा
विभीषण का ही संरक्षण शरण में आनेपर ही किया, किन्तु आपने तो अपने परमोत्कृष्ट क्षमागुण के प्राबल्य से शरण
में आये बिना, अहैतुकी कृपा से, उन कई राक्षसियों का संरक्षण किया—आपकी वह आकस्मिकी क्षमा हमें महान्
अपराधों से क्षमा कर सुखी करे ।
संमोहनतन्त्र के अनुसार गौर तेज (महालक्ष्मीस्वरूपा जनकनन्दिनी जानकी) के बिना श्याम तेज
(नीलसरोरुह-द्युति विष्णुरूप भगवान् श्रीराम) के पूजन, भजन तथा ध्यान से पूर्ण सिद्धि मिलना तो दूर पातक ही
हाथ लगता है ।
ब्रह्माजी श्रीराघवेन्द्र रामचन्द्रजी से कहते हैं—
सीता लक्ष्मोर्भवान् विष्णुर्देवः कृष्णः प्रजापतिः ।
वधार्थं रावणस्येह प्रविष्टो मानुषीं तनुम् ॥ (वा० रा० ६।११७)
विष्णुपुराण के अनुसार जैसे विष्णु सर्वगत हैं वैसे ही उनकी अनपायिनी शक्ति भी सर्वगत एवं नित्य ही
है । विष्णु अर्थ हैं तो भगवती वाणी हैं, भगवती नीति हैं तो भगवान् नय हैं, विष्णु बोध हैं तो लक्ष्मी बुद्धि हैं एवं
भगवान् धर्म हैं तो भगवती सत्क्रिया हैं ।
आगे विष्णुपुराण में कहा गया है—
महालक्ष्मी ही विष्णु के राघव हो जाने पर सीता बन जाती हैं, कृष्ण होने पर रुक्मिणी बन जाती हैं,
जगत्स्वामी विष्णु जब-जब अवतार लेते हैं, महालक्ष्मी उनकी सहायिनी होकर प्रकट होती हैं। अन्य अवतारों में भी
विष्णु के अनुरूप ये बन जाती हैं । मनुष्य बनने पर मानुषी बन जाती हैं । सर्वथा विष्णु के अनुरूप ही अपना
स्वरूप बना लेती हैं ।
आगे लक्ष्मीजी को सम्बोधित कर कहा गया है—माँ, लक्ष्मीजी, आप सब लोगों की माता हैं और
देवाधिदेव हरि पिता हैं । आपसे और भगवान् विष्णु से सारा जगत् व्याप्त है ।
स्कन्दपुराण में भी कहा गया है—
कमलेयं जगन्माता लीलामानुषविग्रहा ।
देवत्वे देवदेहेयं मनुष्यत्वे च मानुषी ॥
विष्णोर्देहानुरूपा वै करोत्येषाऽऽत्मनस्तनुम् ।
श्रीराम कहते हैं—अनन्या हि मया सीता भास्करस्य प्रभा यथा । अर्थात् सीता मुझसे वैसे ही अभिन्न है
जैसे कि भास्कर से उनकी प्रभा अभिन्न है । श्रीसीताजी भी कहती हैं—
अनन्या राघवेणाहं भास्करेण प्रभा यथा ।
जैसे भास्कर से प्रभा अभिन्न है वैसे ही मैं श्रीराघवेन्द्र से अभिन्न हूँ।
श्रीराम के लोकोत्तर गुण
उत्तररामचरित के अनुसार लोकोत्तर ईश्वरों के चरित्र वज्र से भी कठोर एवं कुसुम से भी कोमल होते
हैं । उन्हें कौन जान सकता है । राम कहते हैं—सीते, मैं लक्ष्मण और तुमको भी त्याग सकता हूँ, परन्तु मैं प्रतिज्ञा
का, विशेषतः ब्राह्मणों के प्रति की गयी प्रतिज्ञा का, त्याग नहीं कर सकता हूँ ।
( १७ )
सत्यपराक्रम राम देते ही हैं, प्रतिग्रह नहीं करते हैं। सत्य ही बोलते हैं, अमृत नहीं बोलते हैं।
राम के क्रोध और प्रसाद निरर्थक नहीं होते, उनके क्रोध और प्रसाद अमोघ हैं। वे वध्य व्यक्ति का
अवश्य वध करते हैं और निर्दोष अवध्य के प्रति कभी भी कुपित नहीं होते ।
राम की धर्म में तत्परता, मुख में मधुरता स्तुत्य थी। दान में उनका समुत्साह तथा मित्र के प्रति
अवञ्चकता भी लोकोत्तर थी। गुरु के प्रति वे विनयी थे। उनके चित्त में गम्भीरता, आचार में पवित्रता, गुणों में
अभिरुचि, शास्त्रों में अभिज्ञता, रूप में सुन्दरता एवं हरि में भक्ति भी अत्यन्त उत्कृष्ट थी, इसी लिए ऋषियों की दृष्टि
में राम से भिन्न कोई भी काव्यों के यश का भाजन हो ही नहीं सकता ।
मृदुता, करुणा, श्रुत (परम्परा से वेदादि शास्त्रज्ञान), शील, इन्द्रियनिग्रह, मनोनियह ये छः गुण राघवेन्द्र
राम को शोभित करते हैं ।
शोभा, कान्ति, छवि, वर्ण, लक्षण, लावण्य, आभिजात्य, सौभाग्य, राग आदि रूप के सभी भेद राम के
सम्बन्ध से ही शोभित होते हैं ।
अङ्गों की रेखाओं की स्पष्टता रूप है, गौरत्वादि धर्मविशेष वर्ण है, चाकचिक्यादिरूप कान्ति प्रभा है,
चक्षुओं को बाँधनेवाला स्मितमुखत्वादि ही राग है, कुसुम के समान कोमल स्पर्शविशेष आभिजात्य है, कटाक्षादि
विलास हैं एवं तरलता लावण्य है।
गर्भिणी स्त्री जैसे गर्भस्थ शिशु की हितदृष्टि से ही सब कार्य करती है वैसे ही राजा की सम्पूर्ण चेष्टाएँ
प्रजाहित की दृष्टि से ही होती हैं। फिर लोकदृष्टि से कुछ असम्मत भी क्यों न हो । ताटका (ताड़का) के मारने में
राम को स्त्री-वध के सम्बन्ध में अधिक संकोच था ।
तभी विश्वामित्र ने कहा था—
तुम्हें स्त्रीवधके लिए घृणा नहीं करनी चाहिये, क्योंकि चातुर्वर्ण्य के रक्षण के लिए राजपुत्र को ऐसी
आततायी स्त्री का भी वध करना चाहिये। प्रजारक्षणार्थ राजा को नृशंस, अनृशंस, क्रूर, अक्रूर, पातकयुक्त, सदोष
सब कुछ करना पड़ सकता है। जैसे हाथी के पैर में सबका पैर आ जाता है, वैसे ही राजधर्म में सब धर्म आ जाते
हैं। प्रजा एवं प्रजाकल्याणकारी वर्णाश्रमधर्म की रक्षा करना राजा का प्रधान कर्म है और सब धर्म-कर्म उसी के
अङ्गोपाङ्ग हैं । प्रधान के अविरुद्ध ही अन्य धर्मों का महत्त्व है ।
रामचन्द्र परम ब्रह्मण्य थे। वाल्मीकिरामायण में उन्हें ब्राह्मणों का उपासक कहा गया है। फिर भी
ब्राह्मण द्वारा आहत निरपराध श्वान को न्याय देने का जब प्रश्न आया तब राम को न्याय का पक्ष ही लेना पड़ा,
क्योंकि उनकी दृष्टि में न्याय सबसे बड़ा था । इसी तरह २१ बार पृथ्वी को निःक्षत्र करनेवाले ब्राह्मण परशुराम का
उग्र रूप जब राम के क्षात्र तेज को अभिभूत करने लगा तब राम ने बड़ी बुद्धिमानी से अपनी ब्रह्मण्यता की रक्षा
करते हुए क्षात्रधर्म की भी रक्षा की और कहा—
भार्गव ! क्षात्रधर्मयुक्त होने पर भी मुझे आपने वीर्यहीन एवं असमर्थ समझकर क्षात्र तेज का अपमान
किया है। अतः अब आप मेरा पराक्रम देखिये । यह कहकर राम ने उनसे धनुष लेकर क्षण में उसे चढ़ाकर कहा—
आप ब्राह्मण होने से मेरे पूज्य हैं और विश्वामित्र की भगिनी सत्यवती के पौत्र हैं, इसलिए मैं आपके लिए प्राणहर
बाण छोड़ नहीं सकता, किन्तु आपकी दिव्यगति अथवा तपोबल से अर्जित लोकों को नष्ट करूँगा ।
किन्तु जहाँ धर्मोल्लङ्घन का प्रश्न राम के सामने आया वहाँ राम ने जैसे ही धर्मविमुख शम्बूक शूद्र का
वधकर ब्राह्मण-शिशु को पुनर्जीवित किया वैसे ही धर्मविमुख ब्राह्मण रावण का वधकर सम्पूर्ण मानवता को जीवन
प्रदान किया ।
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( १८ )
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माता-पिता की आज्ञा के पालन के प्रसङ्ग में श्रीराम ने अखण्डभूमण्डल के राज्य को तृणवत् त्यागकर
सहर्ष वनवास स्वीकार किया । बड़े से बड़े आदरणीय कुलपूज्य महर्षि जाबालि से भी जब राम को लौटाने की दृष्टि
से ही उनके द्वारा कही गयी वेदशास्त्रविरुद्ध माता-पिता के श्राद्ध, तर्पण, यज्ञ, होम तथा परलोक के अपलाप से युक्त
नास्तिकता की बात सुनी तो क्षुब्ध हो उठे और उनके कथन का युक्तियुक्त खण्डन करके यहाँ तक कह दिया कि इस
प्रकार की बुद्धि से व्यवहार करनेवाले तथा धर्ममार्ग से हटे हुए आप जैसे नास्तिक को मेरे पिता ने याजक बनाया,
मैं उनके उस कार्य की निन्दा करता हूँ ।
अपने प्रिय भ्राता लक्ष्मण ने भी जब कैकेयी की उचित निन्दा की तो राम ने स्पष्ट कह दिया—तात,
मेरी मध्यमा अम्बा कैकेयी की निन्दा मत करो, भरत की ही चर्चा करो ।
यद्यपि वाली ने राम का कोई अपराध नहीं किया था तो भी सुग्रीव का अपराध करने से ही राम ने
उसे अपना ही अपराधी माना और उसके वध के अनेक हेतुओं में राम ने उसका भी उल्लेख किया है ।
राम धनुर्वेदविदों में सर्वश्रेष्ठ थे एवं अतिरथियों में भी उनकी धाक थी । वे शत्रुसेना पर आक्रमण
और प्रहार करने में दक्ष और सैन्यसंचालन में विशेष निपुण थे । संग्राम में क्रुद्ध देवता एवं दानव भी उनका कुछ
बिगाड़ नहीं सकते थे । इतने पर भी वे दूसरों की असूया नहीं करते थे और न ही क्रुद्ध होते थे । घमण्ड एवं
परोत्कर्ष की असहिष्णुता उनमें नहीं थी । फिर भी उनकी युद्धकुशलता और दृढ़ प्रहार शत्रुओं पर अपना इतना
गहरा प्रभाव डालते थे कि वे सदा आतंकित रहते थे । तभी तो मारीच राम से इतना प्रभावित था कि रत्न, रथ
आदि शब्दों के रकार सुनकर राम समझकर भयभीत हो जाता था ।
रावण के गुप्तचर भी यह अनुभव करते हैं कि राम के कुपित होने पर उन्हें कोई वश में नहीं कर
सकता । वे सम्पूर्ण लोकों का संहार करके नये सिरे से प्रजासृष्टि करने में समर्थ हैं । सब देवगण एवं असुर मिलकर
भी उनका वध नहीं कर सकते । राम के अनुसार शत्रु भी यदि शरण में आये, हाथ जोड़ कर दया की याचना करे
तो आनृशंस्य की दृष्टि से कभी भी उसपर प्रहार नहीं करना चाहिये । आर्त हो यदि वह शत्रु के शरण में आया
हो तो शत्रु को अपने प्राणों का त्याग कर भी उसकी रक्षा ही करनी चाहिये ।
महर्षि वसिष्ठ एवं विश्वामित्र तथा अगस्त्य से राम को उत्तमोत्तम शस्त्रास्त्र प्राप्त थे । वे चाहते तो उन्हें
उपयोग में लाकर अनायास हो सबका संहार कर सकते थे, किन्तु राम ने कभी भी उन शस्त्रास्त्रों का प्रयोग नहीं
किया । मेघनाद छलपूर्वक ऐसे दिव्यास्त्रों का प्रयोग कर वानरों, मनुष्यों तथा राम और लक्ष्मण दोनों को परेशान
करता था । एक बार लक्ष्मण ने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करने की आज्ञा चाही, पर राम ने कहा एक के लिए पृथिवी
भर के अयुद्धयमान, प्रच्छन्न, प्राञ्जलि शरणागत, पलायमान एवं मत्त सबको मारना उचित नहीं है । इन्द्रजित् को
मारने के लिए मैं प्रयत्न करता हूँ ।
इतना ही क्यों राम ने तो श्रान्त, विरथ तथा निःशस्त्र रावण को भी अवसर दिया कि वह स्वस्थ, रथी,
धन्वी होकर आये तब उससे युद्ध किया जाये । तभी मारीच जैसे राक्षस ने भी राम को निर्दोष विग्रहवान् धर्म ही
बतलाया था ।
राम धर्म के मूर्तिमान् रूप हैं । साधु एवं सत्यपराक्रमी हैं । रावणवध के बाद विभीषण ने पहले शोक
व्यक्त करते हुए रावण के गुणों का वर्णन किया, परन्तु अन्त में जब उसकी अन्त्येष्टि का प्रसङ्ग आया तब उसके
सीताहरण आदि दुष्कृत्यों का स्मरण करके अन्त्येष्टि करना उन्होंने अस्वीकार कर दिया । तब राम ने कहा—
मरने तक ही बैर रहता है । हमारा प्रयोजन सिद्ध हो चुका है । अब यह जैसा तुम्हारा भाई है वैसा ही
मेरा भी है । तुम इसका दाहादि संस्कार करो । राम ने उसकी प्रशंसा भी की। रावण अधर्मी, असत्यवादी होने
पर भी संग्राम में तेजस्वी, बलवान् तथा शूरवीर रहा है । इन्द्रादि देवता भी इसे परास्त नहीं कर सके थे । इसने
( १९ )
अनेकों दान, यज्ञ एवं श्रेष्ठ कर्म भी किये हैं। विराध के इच्छानुसार राम ने विराध का अवट (गर्त) में निक्षेप कर
तथा कबन्ध के इच्छानुसार उसका दाह कर दोनों को कृतार्थ किया था।
लङ्का जैसे वैभवशाली राष्ट्र को जीतकर भी राम ने उसके वैभव पर दृष्टि नहीं डाली। रावण के भाई
विभीषण को ही लङ्का सौंप दी। इसी लिए रामायण की रामाभिरामी टीका में कहा गया है—
त्यक्त्वा जीर्णदुकूलवद् वसुमतीं बद्धोऽम्बुधिर्बिन्दुवद्
बाणाग्रेण जरत्कपोतक इव व्यापादितो रावणः ।
लङ्का कापि विभीषणाय सहसा मुद्रेव हस्तेऽर्पिता
श्रुत्वैवं रघुनायकस्य चरितं को वा नरो नाचति ॥
राम दो बार बाण नहीं चलाते और दो बार नहीं बोलते अर्थात् एक ही बाण से सब अभीष्टों की सिद्धि
हो जाती थी। श्रीभागवत के अनुसार एक ही बाण से राम ने रावण का वध किया था—
इस तरह धनुष पर सन्धान किये हुए बाण का प्रक्षेप करते हुए राम ने उस बाण से वज्रतुल्य रावण के
हृदय को छिन्न-भिन्न कर डाला। वह दसों मुखों से रुधिर वमन करता हुआ वैसे ही विमान से गिर पड़ा जैसे
सुकृत-क्षय होने पर लोगों के हाहाकार के बीच सुकृती विमान से गिर पड़ता है।
राम की ऐतिहासिकता
हिन्दूजाति के धार्मिक, सांस्कृतिक एवं पारिवारिक जीवन पर मर्यादापुरुषोत्तम राम का अमिट प्रभाव
है। हिन्दू-परिवार में जन्म एवं विवाह के अवसरों पर रामजन्म सम्बन्धी एवं रामविवाहसम्बन्धी गीत गाये जाते हैं।
शरीर की अन्तिम यात्रा 'रामनाम सत्य है' की ध्वनि के साथ होती है। भारत के कोने-कोने में राम के मन्दिर
हैं। लाखों व्यक्ति प्रतिदिन रामायण का पाठ करते हैं। अयोध्या, रामेश्वर, पञ्चवटी, चित्रकूट आदि तीर्थों की यात्रा
करते हैं। करोड़ों हिन्दुओं के ही नहीं श्याम, थाईलैण्ड आदि देशों के निवासियों के नाम भी रामायण से सम्बन्धित
होते हैं। राम प्रत्येक हिन्दू के जीवन में रम रहे हैं। ईश्वर के नामों में सर्वप्रसिद्ध नाम राम ही है। भारत के
बच्चे-बच्चे की जिह्वा पर रामनाम रहता है। काशी में जीवों की मुक्ति के लिए भगवान् शिव रामनाम का उपदेश
करते हैं। फिर भी राम की ऐतिहासिकता पर शङ्का करना केवल मतिविभ्रम ही है।
वस्तुतः परम्पराप्राप्त इतिहास, तज्जीवनवृत्तसम्बन्धी प्रामाणिक पुस्तकें तथा तत्कालीन या कालान्तरवर्ती
पुस्तकों में तत्सम्बन्धी चर्चाएँ उसके द्वारा लिखित पुस्तकें या तन्निर्मित मन्दिर, सेतु तथा तत्सम्बन्धित शिलालेख,
ताम्रलेख या मुद्राएँ किसी के ऐतिहासिक होने में प्रमाण कही जाती हैं।
राम के जीवन की प्रमुख घटनाएँ लोक-परम्परा में अत्यन्त प्रसिद्ध हैं। भारत में उनका नाम प्रत्येक
जिह्वा पर है। संसार के इतिहास में ऐसी प्रसिद्धि किसी की भी नहीं है जैसी राम की है। भारत में ही नहीं
सुदूरदेशों में भी राम के चरित्रों के आधार पर उनकी लीलाएँ तथा नाटक होते है। चौबीस हजार श्लोकों की
वाल्मीकिरामायण में उनके जीवनवृत्त का ही वर्णन है।
महर्षि मार्कण्डेय ने वनवास के समय युधिष्ठिर से कहा था, आपकी यह विपत्ति देखकर मुझे रामचन्द्र का
स्मरण हो आया। पिता की आज्ञा से धनुष हाथ में लेकर घूमते हुए ऋष्यमूक पर्वत पर मैंने उन्हें देखा था। उन्होंने
यह नहीं कहा कि मैंने केवल सुना है। गीता में कृष्ण कहते हैं कि शस्त्रधारियों में मैं राम हूँ। शङ्कराचार्य की राम-
पद की व्याख्या में दाशरथि राम कहा गया है। लगभग सभी पुराणों तथा काव्यों में, श्रीमद्भागवत भागवतों का
परमादरणीय ग्रन्थ है, प्रतिवर्ष उसके हजारों सप्ताह होते हैं, उसमें भी रामायण एवं राम की विशद चर्चा है।
( २० )
श्रीराम की नीति
शुक्रनीति के अनुसार रामसदृश कोई भी नीतिमान् नहीं हुआ । उनकी नीतिमत्ता से ही बानरों तथा
भालुओं ने भी उनकी सुभृत्यता स्वीकार की थी । श्रीराम जैसे न्यायनिष्ठ के प्रभाव से ही वानर और भालु भी
राम के साथी हो गये ।
ब्रह्मचर्य एवं तपस्या से राजा राष्ट्र की रक्षा करता है । इसके उदाहरण श्रीराम हैं ।
नहि तद् भविता राष्ट्रं यत्र रामो न भूपतिः ।
तद् वनं भविता राष्ट्रं यत्र रामो निवत्स्यति ॥
जहाँ राम राजा नहीं वह देश राष्ट्र नहीं है, जहाँ राम निवास करेंगे वह वन भी राष्ट्र हो जायेगा ।
भगवान् के भक्त उनका मङ्गलाशासन करते हैं—
मङ्गलं कोसलेन्द्राय महनीयगुणात्मने ।
चक्रवर्तितनूजाय सार्वभौमाय मङ्गलम् ॥
भगवान् मङ्गलों के भी मङ्गल हैं । ब्राह्मण, गौ, अग्नि, हिरण्य, सर्पि, जल तथा राजा गरुड़पुराण
( २०५।७४,७५ ) के अनुसार मङ्गल हैं तथा सिंह, साँड़, हाथी, कलश, व्यजन, वैजयन्ती, भेरी एवं दीप भी
मङ्गल हैं । दधि, दूर्वा आदि मङ्गलों के भी मङ्गल, देवताओं के दैवत जो परन्तप एवं परमतेज हैं उन महनीयगुणागार
चक्रवर्त्तित्सुत सार्वभौम कोसलेन्द्र के लिए मङ्गलाशासन करना महत्वपूर्ण है । राम से बढ़कर सन्मार्गस्थित संसार
में कोई है ही नहीं—
नहि रामात् परो लोके विद्यते सत्पथे स्थितः ।
श्रीराम धर्मज्ञ, सत्यसन्ध, प्रजाहितनिरत, यशस्वी, ज्ञानसम्पन्न, सर्वपोषक, रिपुसूदन, सर्वजीवलोक के
रक्षक, तत्तद्वर्णाश्रममर्यादाओं का पालन कर के धर्म का पालन करनेवाले, अपने यज्ञ, अध्ययन, दान आदि एवं
युद्धादि रूप धर्म का सादर अनुष्ठान करनेवाले तथा स्वभक्त जनों के अवश्यम्भावी अनिष्टों को भी मिटाकर मोक्ष
प्रदान कर रक्षण करनेवाले हैं । रघुवंश, भट्टिकाव्य आदि सैकड़ों काव्यों, नाटकों में राम की चर्चा है ही । ऐसे बहु-
चर्चित राम को अनैतिहासिक कहना अनभिज्ञता का ही परिचय देना है । भागवत आदि पुराणों के अनुसार रामसेतु
एवं रामेश्वर की स्थापना भी राम के ऐतिहासिक होने में ज्वलन्त प्रमाण हैं ।
नीति, प्रीति, परमार्थ तथा स्वार्थ के रहस्यज्ञ श्रीराम
वस्तुतः नीति, प्रीति, परमार्थ एवं स्वार्थ के परमरहस्य को एकमात्र राम ही जानते थे । भगवती सीता
के वनवास में नीति, प्रीति, परमार्थ एवं स्वार्थ का यथार्थसामञ्जस्य हुआ है ।
नीति—लोकतन्त्रात्मक शासन की यही विशेषता होती है कि शासन की सम्पूर्ण गतिविधि जनसमूह की
इच्छा का अनुसरण करनेवाली होनी चाहिये । अपने या भाई-भतीजों के स्वार्थ वश शासन कभी जनसामान्य की
इच्छा को नहीं ठुकरा सकता । धर्मनियन्त्रित राजतन्त्र में भी लोकतन्त्र के ये गुण बहुत उत्कृष्टरूप में व्यक्त होते हैं ।
राम ने अपनी प्रतिज्ञा में इन्हीं भावों को व्यक्त किया था । स्नेह, दया, सुख कि बहुना अपनी हृदयेश्वरी जनक-
नन्दिनी को भी त्यागना पड़े तो मुझे व्यथा न होगी ।
यद्यपि श्रीजनकन्दिनी महारानी सीता के विरोध में बहुमत नहीं था, कुछ ही लोगों को इस बात पर
आपत्ति थी कि रावण की लङ्का में कई महीनों तक रहनेवाली सीता को राम ने राजमहलों में क्यों रख दिया । इस
प्रकार तो हमारे घर की स्त्रियाँ भी बाहर रहकर घरों में पुनः रहने लग जायेंगी जिससे मर्यादा का अवश्य ही भङ्ग
हो जायगा। उनको यह नहीं विदित था कि श्रीसीता अनन्त ब्रह्माण्डों की जननी, आनन्दसिन्धु रामचन्द्र के माधुर्य-
सारसर्वस्व की अधिष्ठात्री महाशक्ति हैं। उन्होंने लङ्का का अन्न-जल-फल ग्रहण किये बिना ही, इन्द्रप्रदत्त विशिष्ट चरु को
एक ही बार ग्रहण कर, लङ्का में काल यापन किया था। वे भानु की प्रभा, चन्द्र की चन्द्रिका एवं गङ्गा की पवित्रता
के तुल्य आनन्दसिन्धु भगवान् राम की माधुर्यसारसर्वस्वरूपा ही थीं। पुनश्च देवताओं, ऋषियों, वानरों एवं राक्षसों
के सामने श्रीसीताजी ने अग्नि-प्रवेश किया और सबके समक्ष साक्षात् वैश्वानर अग्नि ने उनके पावित्र्य को प्रमाणित
किया था। श्रीब्रह्मा एवं श्रीशिव ने उनके पावित्र्य को परिपुष्ट किया था। तथापि उसका वर्णन श्रीराम के पक्ष की
ओर से होने में शासकीय प्रचारमात्र समझा जा सकता था। अतः श्रीराम ने बहुमत नहीं वरन् अल्पमत का भी आदर
करते हुए श्रीसीता को अरण्यवास दिया और निष्पक्ष वीतराग महर्षियों को अवसर दिया कि वे दूध का दूध और
पानी का पानी के समान अपनी ऋतम्भरा प्रज्ञा द्वारा प्रजा के संमुख सत्य वस्तुस्थिति रखें, और हुआ भी ऐसा ही।
जिस वन में सीता को निर्वासित किया गया था वहीं कुछ दूर पर महर्षि वाल्मीकि का आश्रम था। उनके कुछ ब्रह्म-
चारी छात्र समिद्, कुश आदि लेने के प्रसङ्ग से उधर पहुँचे हुए थे। उन्होंने ही उस अलौकिक दिव्य महाशक्ति के
दर्शन एवं रोदन की सूचना महर्षि को दी। महर्षि प्राचेतस वाल्मीकि ने अपने ध्यानयोग से वस्तुस्थिति को समझ
कर सीता से कहा पुत्रि ! तुम्हारे पिता जनक मेरे मित्र हैं, तुम्हारे श्वसुर चक्रवर्ती दशरथ भी मेरे शिष्य थे, अतः
तुम पितृगृहतुल्य मेरे आश्रम में चलकर रहो। श्रीसीता महर्षि के पीछे-पीछे चलकर आश्रम में आयीं, महर्षि ने आश्रम
की ऋषिपत्नियों को, उनकी देख-रेख, रक्षण-पोषण आदि के लिए नियुक्त किया। वहीं उनके लव-कुश नामक दो
पुत्ररत्नों का जन्म हुआ, जिनका संस्कार, शिक्षण-रक्षण सब महर्षियों की ही देख-रेख में हुआ।
धर्मधुरन्धर चक्रवर्ती राघवेन्द्र श्रीरामचन्द्र द्वारा निर्वासित सीता को अपने आश्रम में आश्रय देते हुए ही
महर्षि ने अपने उत्तरदायित्व को खूब समझ लिया था और उस मिथ्याभिशाप को समूल उन्मूलन कर देने के लिए वे
कृतसंकल्प थे। विश्वविधाता ब्रह्मा भी यह सब महर्षि वाल्मीकि के द्वारा ही कराना चाहते थे। तमसा-तट पर
विहरणपरायण क्रौञ्चयुग में से एक क्रौञ्च के व्याध द्वारा मारे जाने पर क्रौञ्ची का करुण क्रन्दन-सुनकर महान्
क्लेशानूभूति करनेवाले महर्षि के सामने सीता के करुण-क्रन्दन का दृश्य आ गया। पहले से ही करुणरसपूरित वाल्मीकि
का हृदय इस दृश्य से आहत होकर छलक पड़ा और वही शोक करुणरसमय श्लोक बनकर महर्षि के मुखारबिन्द से
विश्वकल्याण के लिए प्रस्फुटित हो आया।
महर्षि ने सीतापुत्र लव-कुश का यथावत् संस्कार किया और वेदों तथा धनुर्वेद, गान्धर्ववेद आदि उपवेदों
का भी साङ्गोपाङ्ग शिक्षण दिया। तत्पश्चात् वेदों के उपबृंहरण के लिए ही रामायण का अध्यापन कराया और
तन्त्री (वीणा) के ताल स्वर के साथ संगीत के रूप में रामायण का अभ्यास कराया। वे दोनों ही बालक दीप से
उद्भूत दो दीपों के समान ही सर्वथा श्रीराम के ही अनुरूप थे। सीताराममय दिव्य दम्पती की दिव्यदीप्ति एवं
प्रभाव से वे युक्त थे ।. वे स्वरसम्पदा से युक्त वीणा-वादनपूर्वक जब रामायण का गायन करते थे तो सभी सुननेवाले
मोहित हो जाते थे। उनका रामायण-गान सुनकर ऋषिगण भी मुग्ध हो जाते थे एवं प्रेमविह्वल होकर कोई अपना
कमण्डलु, कोई मेखला, कोई वृषी आदि पुरस्कार के रूप में उन बालकों को देने लगते थे। श्रीराम के अश्वमेध-यज्ञ
में निमन्त्रित होकर महर्षि प्राचेतस एवं उनके सब आश्रमवासी ऋषि नैमिषारण्य पधारे हुए थे। महर्षि दोनों बालकों
(लव-कुश) को फल-मूल-भोजन कराकर कुछ साथ के लिए भी दे देते थे और कहते थे कि जाकर अवधवासियों को
रामायण सुनाओ और भूख लगने पर अपना ही फल खाना, प्यास लगने पर अपने आप ही नदी या कूप से जल
निकाल कर पीना एवं किसी के कुछ देने पर भी लेना नहीं, परन्तु जो श्रद्धा से सुने उसे रामायण सुनाना।
महर्षि के आदेशानुसार दोनों बालकों ने अयोध्याकाण्ड का ही प्रसङ्ग अवधवासियों को सुनाना प्रारम्भ
किया। जो भी इस प्रसङ्ग को सुनता था मन्त्रमुग्ध हो जाता था, आँखों देखी पुरानी घटनाओं का प्रत्यक्ष चित्रण
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उनके सामने उपस्थित हो जाता था। कितना सुन्दर, सत्य, सरल एवं हृदयस्पर्शी था वह चरित्र-चित्रण ? उसे
सुनकर सबको आश्चर्य होता था। लोग बालकों के गान से प्रभावित होकर उन्हें बहुत कुछ देना चाहते थे, किन्तु वे
बालक कुछ लेते न थे । यह समाचार भगवान् राम के दरबार में भी जा पहुँचा। वहाँ भी सबको उस आश्चर्यजनक
चरित्रचित्रण के श्रवण-रसास्वादन की उत्सुकता हुई । अश्विनीकुमारों के तुल्य सुभग सीतापुत्रों ने राजर्षि-कुमारों के
रूप में वहाँ भी अपने मधुर स्वर, संगीत-सौष्ठव तथा सौम्य सुन्दर दिव्य आकृति से सभी को प्रभावित कर दिया ।
उनके रामायण-गान से राम, भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न, वसिष्ठादि महर्षि एवं अमात्यवर्ग आदि सभी मोहित हो उठे ।
श्रीरामचन्द्र ने रामायण-गान के अन्त में लक्ष्मण को आदेश दिया कि इन बालकों को शतभार सुवर्ण एवं रत्न प्रदान
किये जायँ, परन्तु उन्होंने तो परमनिःस्पृहरूप से स्पष्ट कहा कि हम लोग कन्द-मूल-फलाशी, वल्कलवसनधारी आश्रम-
वासी हैं, हमें आपके सुवर्ण-रत्नों की अपेक्षा नहीं है। यदि आप लोगों की इच्छा हो तो हम लोग रामायण श्रवण
करा सकते हैं फिर विशेष रूप से रामायण श्रवण का प्रबन्ध किया गया । संसार के सभी गण्य-मान्य ऋषि-महर्षि,
राजर्षि, चातुर्वर्ण्य प्रजा के विशेष प्रतिनिधि एवं देव, असुर, गन्धर्व सभी वहाँ उपस्थित हुए । लोकोत्तर सौन्दर्य,
अद्भुत वेदवेदाङ्ग-पाण्डित्य, दिव्य-वीणावादन और मनोहर स्वर से गायन, परम निःस्पृहता एवं अद्भुत त्याग ने सबके
मन को वश में कर लिया।
ऊँचे से ऊँचे गुण भी सस्पृहता से फीके पड़ जाते हैं । सस्पृह की अच्छी से अच्छी बातों पर भी लोगों को
आदर एवं विश्वास नहीं होता, परन्तु जो वक्ता निःस्पृह एवं त्यागी होता है उसी का जनता पर समुचित प्रभाव
पड़ता है । फिर भी यहाँ तो कहना ही क्या है ? निःस्पृह परमविरक्त महर्षि की ऋतम्भरा प्रज्ञा द्वारा प्रत्यक्ष दृष्ट
“सत्य शिव सुन्दर” रामायण महाकाव्य का निःस्पृह राजर्षिकुमारों द्वारा गायन सुनकर सबको वर्णित घटना के
सम्बन्ध में पूर्ण विश्वास हो गया। स्थाली-पुलाक-न्याय से सम्पूर्ण चरित्र की सत्यता में सबको विश्वास हो गया ।
अयोध्याकाण्ड की सत्य घटनाओं को सुनकर अरण्य, किष्किन्धा, सुन्दर एवं लङ्का काण्डों के चरित्र-श्रवण की सबको
उत्कट उत्कण्ठा हुई । सीताचरित्र की जिज्ञासा भी जागरूक थी ही । सभी ने सत्य घटनाओं को मन्त्रमुग्ध की भाँति
सुना और श्रद्धा तथा विश्वास से भगवती सीता के परम पवित्र चरित्र की प्रशंसा की । उसमें प्रधानरूप से सीता-
चरित्र का वर्णन था, परन्तु पतिव्रता सीता का चरित्र जबतक उनके पति भगवान् के चरित्र का वर्णन न होता,
तबतक वह अपूर्ण ही रहता, अतः उसमें रामचरित का भी वर्णन किया गया ।
यह वर्णन राजकीय प्रचारमात्र न था, न किसी राज्याश्रित कवि की काव्य-कल्पना थी, किन्तु यह थी
राज्याश्रय से दूर रहकर, राजान्न से बचकर, कन्द-मूल, फल तथा वल्कल वसन पर निर्भर रहनेवाले तपोनिष्ठ,
समाधिसम्पन्न, त्रिकालज्ञ महर्षि प्राचेतस वाल्मीकि की समाधिभाषा, जिसका गान कर रहे थे उन महर्षि के ही परम-
प्रिय शिष्य, परम विद्वान्, परमत्य़ागी, वनवासिनी, वनदेवी के पुत्र लव और कुश । ऐसी स्थिति में जनता का
सुस्थिर विश्वास क्यों न होता और कुटिल हृदयों के भी काले कल्मष उससे क्यों न घुल जाते । सभी के हृदय पिघल
गये, कण्ठ गद्गद हो गये, अङ्ग रोमाञ्च से कण्टकित हो उठे, आँखों से आनन्दाश्रु एवं शोकाश्रु की धाराएँ बह
निकलीं । राम भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न एवं माताएँ परिवार के अन्य लोग प्रेम-समुद्र में निमग्न हो गये । वसिष्ठादि
महर्षिगण भी प्रेमोद्रेक में अधीर हो उठे ! महाशक्ति भगवती चिदानन्दस्वरूपा सीता के उज्ज्वल चरित्र ने सबके
अन्तःकरण एवं अन्तरात्मा को उद्योतित कर दिया । महर्षि वाल्मीकि की रामायण से सबको स्पष्ट विदित हुआ कि
सीता के असाधारण तेज के सामने रावण का प्रभाव सर्वथा नगण्य था । श्रीसीता अपने अखण्ड-पातिव्रत्य तेज के
प्रताप से रावण की लङ्का में रहती हुई भी रावण को तृणतुल्य समझती थीं और रावण के साथ बात करते समय
सिँही के समान निर्भीकतापूर्वक वाणी में श्रीसीता ने कहा था, दुष्ट रावण, सावधान, मेरे भगवान् राम का सन्देश
एवं आदेश न होने और अपनी तपस्या के पालन करने के अभिप्राय से मैं तुझे अपने तेज से भस्म नहीं कर रही हूँ ।
ऐसे अवसरों पर रावण में श्रीसीता के सामने स्थित रहने की हिम्मत नहीं रहती थी। यह कोई कवि-
कल्पना नहीं अपितु तु महर्षि की समाधिभाषा की सत्य वाणी है।
वहीं कुछ क्षणों के पश्चात् जब राक्षसियों ने सीता को यह समाचार सुनाया कि हे सीते ! जो वानर
आपके पास आया था, वह पकड़ लिया गया और उसकी पूंछ में घृत और तेल में सने वस्त्र लपेट कर आग लगा दी
गयी । जब सीता ने यह समाचार सुना तो उन्होंने अग्नि से कहा, अग्निदेव ! यदि मैंने समुचित रूप से पति-शुश्रूषा,
तपस्या तथा पातिव्रत्य धर्म का पालन किया है तो तुम हनुमान् के लिए शीतल हो जाओ ।
सीता के आदेशानुसार दहनशील अग्निदेव परम शीतल हो गये । श्रीहनुमान् को आश्चर्य हो रहा था
कि मेरी पुच्छाग्नि से सम्पूर्ण लङ्का भस्मीभूत हो रही है, परन्तु मेरी पूंछ में तो उष्णता का लेश भी नहीं प्रतीत
होता है। प्रत्युत दहनशील अग्निदेव मुझे हिम से अधिक सुशीतल प्रतीत हो रहे हैं। हनुमान् ने यह निश्चय
किया था कि यह महाशक्ति सीता के तप एवं त्याग तथा पातिव्रत्य का ही प्रभाव है। जो सीता अपने प्रभाव से
दाहक अग्नि को ठंडा कर सकती थी वह अपने तेज से रावण की अवश्य ही भस्म कर सकती थी।
साध्वी सीता के विरोधी कुटिल समाज ने भी उनका भक्त होकर पश्चात्ताप की अश्रुधाराओं से अपने
कल्मषों को धो डाला। यह भी महर्षि वाल्मीकि की लोकोत्तर सुमधुर कृति की कुशलता। वे अपने उद्देश्य में पूर्ण
सफल हुए और यह थी श्रीरामचन्द्र की नीति जिसके फलस्वरूप ये घटनाएं घटित हुईं। जो काम किसी दण्डविधान
से कभी भी सम्भव नहीं था वह उनकी नीति से अनायास सुसम्पन्न हुआ। फिर तो वसिष्ठजी ने भी अपनी तपस्या
एवं योगबल के प्रभाव से सत्य-वस्तुका साक्षात्कार करके जनता को सीताचरित्र की निर्मलता का ज्ञान कराया।
त्रिजटा एवं विभीषण की पत्नी ने भी सीता के परम-पवित्र चरित्र का बखान किया। अन्त में परमानन्द सच्चिन्मयी
पराम्बा सीता का अपने परम दिव्यरूप से महामहिम वैभवशालिनी माता धरादेवी के अङ्क में प्रत्यक्ष प्राकट्य भी
सबकी भ्रान्तियों को मिटाकर उनकी परम उपास्यता का प्रमाण बना।
श्रीसीता रामचन्द्र की छाया थी। रामरूप भानु की प्रभा एवं रामरूप चन्द्र की चन्द्रिका थी। रामरूप
ईश्वर की महाशक्तिरूपा प्रकृति थीं। आनन्दसिन्धु श्रीराम के, माधुर्यसारसर्वस्व की अधिष्ठात्री महालक्ष्मी थी।
बहिराङ्ग दृष्टि से ही राम-सीता का विप्रयोग सम्भव था, अन्तरङ्ग दृष्टि से तो यह विप्रयोग कभी सम्भव न था।
इसी लिए जैसे लङ्का में सीता की छाया ही रह सकी थी वैसे वनवास में भी छाया मात्र ही थी। वस्तुतः तो अमृत
से जैसे उसकी मधुरिमा का पार्थक्य असम्भव है, वैसे ही आनन्दसिन्धु राम की माधुर्यसार-सर्वस्वभूता सीता का भी
पार्थक्य असम्भव ही था। परन्तु वह काल्पनिक विप्रयोग भो राम के लिए असह्य वेदना का विषय था। अपने हाथों
को राम निष्करुण कहते थे।
हे हस्त ! तुम आसन्नप्रसवा सीता के निर्वासन में दक्ष राम के हस्त हो, अतः तुममें करुणा कैसे हो
सकती हैं।
परन्तु स्नेह एवं प्रेम के उद्वेग में राम ने कर्तव्य से विचलित न होने की प्रतिज्ञा ले रखी थी। वे किसी
भी स्नेह, दया या सुख के मोह में पड़कर लोकाराधन, प्रजारञ्जन, के कार्य से कैसे विमुख हो सकते थे एवं उन्होंने
सीता का भी इसी में हित समझा था और वह हुआ भी। इस कठोरता का आश्रयण किये बिना महर्षि वाल्मीकि का
समागम नहीं हो सकता था। और न ही उनके द्वारा विश्वपावन रामायण-महाकाव्य का निर्माण ही सम्पन्न हो पाता।
इसके अतिरिक्त सीता के सुपुत्र लव-कुश इस प्रकार के संस्कारी विद्वान्, बलवान्, धनुष्मान्, कीर्तिमान् तथा प्रति-
भावान् नहीं बन सकते थे। सीता का कष्ट राम का ही कष्ट था। स्वयं राम ने ही सीता को वनवास देकर स्वयं को
कष्ट में डालकर सीता के निर्मल, निष्कलङ्क, परमपवित्र उज्ज्वल चरित्र को संसार के सामने उपस्थित किया था।
परम सानुक्रोश होते हुए भी राम निरनुक्रोश से बन गये थे।
( २४ )
वस्तुतः जगज्जननी राम के हृदय को पहचानती थीं । पहले उन्होंने वन में छोड़कर लौटते हुए लक्ष्मण
से कहा था—
वाच्यस्त्वया मद्वचनात् स राजा वह्नौ विशुद्धामपि यत्समक्षम् ।
मां लोकवादश्रवणादहासीः श्रुतस्य किं तत् सदृशं कुलस्य ॥ (रघुवंश १४।६१)
हे लक्ष्मण ! तुम मेरी तरफ से उस राजा से यह कहना कि आपके सामने ही मेरी अग्निपरीक्षा एवं
अग्निशुद्धि हुई थी, फिर भी आपने लोकापवाद-श्रवण के कारण जो मेरा परित्याग किया है क्या यह आपके कुल एवं
शास्त्रानुशीलन के सदृश है ? परन्तु दूसरे ही क्षण सीता ने कहा नहीं-नहीं प्रभो ! आप तो प्राणिमात्र के हितैषी एवं
कल्याण की कामना करनेवाले हैं, फिर मेरे सम्बन्ध में आपकी अन्यथाबुद्धि कैसे हो सकती है । वज्रोपम, असह्य
श्रीचरणविप्रयोगरूप दुःख तो मेरे ही पूर्वजन्मों के कर्मों का फल है ।
पतिव्रतामुकुटशिरोमणि सीताजी ने आगे कहा कि मैं प्रसव के पश्चात् सूर्य में दृष्टि लगाकर ऐसी तपस्या
करूंगी जिससे जन्मान्तर में भी आप ही मेरे भर्त्ता हों और फिर कभी ऐसा विप्रयोग न हो ।
श्रीराम ने सीता को वन भेजकर स्वयं तपस्या करते हुए ग्यारह हजार वर्षों तक अखण्ड ब्रह्मचर्य व्रत का
पालन करते हुए यागादि के लिए विहित होने पर भी दूसरा परिणय नहीं किया । सुवर्णमयी सीता को ही अपने
दक्षिणाङ्क में बैठाकर अश्वमेधादि बड़े-बड़े यज्ञों का अनुष्ठान किया था ।
इस प्रकार श्रीराम ने नीति के साथ ही साथ पूर्णरूप से प्रीति का परिपालन किया था । श्रीराम ने
अनन्त अद्भुत अनुराग के साथ ही सीता को वनवास देकर, सीता को भी अवसर दिया कि वे महर्षियों के मुखार-
विन्द से अध्यात्म-चर्चा श्रवण कर सकें और समाधिनिष्ठ होकर आध्यात्मिक उच्च-स्थिति की परमार्थ-साधना में
प्रतिष्ठित हों और स्वयं भी विषयविमुख होकर ब्रह्मनिष्ठा का सम्पादन कर सकें । इस प्रकार प्रजारञ्जन के साथ-साथ
परमार्थ साधन भी सम्पन्न हो ।
सीता के निर्मल चरित्र की एक झलक
वाल्मीकिरामायण उत्तरकाण्ड के ९४वें सर्ग के अनुसार राम ने अश्वमेध यज्ञ के प्रसङ्ग से महामुनि, राजा,
नैगम, वैदिक, शब्दविद्, वृद्ध, द्विजाति सब श्रेणियों के विशेषज्ञों को निमन्त्रित कर उनकी महती सभा में कुश
और लव को रामायण का गान करने के लिए आमन्त्रित किया । कुश और लव के अतिमानुष मधुर गन्धर्वस्वर से सभी
श्रोता मन्त्र-मुग्ध हो गये, मुनिगण एवं पार्थिव-गण बारम्बार चक्षु से पान करते हुए से उन दोनों बालकों, कुश और
लव को बारम्बार देखते हुए आपस में कह रहे थे कि ये दोनों इस तरह राम के समान लगते हैं जैसे सूर्यबिम्ब से
दूसरा सूर्यबिम्ब ही उदित हुआ हो । यदि ये दोनों बालक जटा और वल्कलधारी न होते तो राघवेन्द्र श्रीराम और
इन दोनों बालकों में कोई भेद अवगत न होता ।
उत्तरकाण्ड के ९५ वें सर्ग में कहा गया है कि राम ने बहुत दिनों तक परम शुभ गीत को मुनियों,
राजाओं एवं सुग्रीव, हनुमान् आदि के साथ सुना और उस गानप्रसङ्ग में ही कुश और लव को सीता के पुत्र रूप
में जान लिया ।
उपर्युक्त प्रकरणों से यह स्पष्ट हो जाता है कि वाल्मीकिरामायण का निर्माणकाल राम का सिंहासनारूढ़
होने का ही काल था, क्योंकि राम द्वारा किये गये अश्वमेध यज्ञ के अवसर पर ही कुश और लव द्वारा इसका गान
हुआ था, अतः पूर्ण निश्चय के साथ कहा जा सकता है कि "इसका निर्माण काल ई० पू० दूसरी शती कदापि नहीं
हो सकता ।"
( २५ )
इसी सर्ग में यह भी उल्लेख है कि उसी महापरिषद् में शुद्ध आचरणवाले विश्वासपात्र दूतों को बुलाकर
राम ने उनसे कहा "भगवान् वाल्मीकि के समीप जाकर यह कहो कि यदि सीता शुद्ध आचरणवाली हैं, पापरहिता
हैं, तो मुनि की अनुमति से अपनी आत्मशुद्धि को प्रमाणित करें, यदि मुनि की इच्छा हो तथा सीता प्रत्यय-विश्वास
देना चाहती हों तो उनके मनोगत भावों को जानकर बताओ । कल प्रातःकाल जनकात्मजा मैथिली अपनी और मेरी
शुद्धि के लिए सभा में सबके समक्ष शपथ करें ।" उन दूतों ने जाकर अमितप्रभ महर्षि वाल्मीकि से राम का संदेश
कहा । मुनि ने सुनकर और राम की इच्छा को जानकर कहा कि ठीक है, राम जैसा कहते हैं वैसा ही होगा । सीता
वैसा ही करेगी, क्योंकि स्त्री का परम देवता पति ही है। राजदूतों ने आकर राम को मुनि का कथन सुनाया । राम
प्रसन्न हुए और एकत्रित ऋषियों एवं राजाओं से उन्होंने कहा, शिष्यों सहित सभी ऋषि तथा अपने परिकरों सहित
नृपतिगण तथा और भी जो चाहते हों सभी आकर सीता का शपथ (पातिव्रत्य तथा शुद्धि का प्रमाण) देखें । महात्मा
राघव के उक्त वचन सुनकर महर्षियों तथा राजाओं में महान् साधुवाद हुआ । प्रभावशाली नृपतिगण तथा मुनि
श्रेष्ठगण राघव की भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे ।
इसी काण्ड के ९६वें सर्ग के अनुसार रात बीतते ही राम ने वसिष्ठ, विश्वामित्र, वामदेव, काबालि, कश्यप,
दीर्घतमा, दुर्वासा, पुलस्त्य, शक्ति, भार्गव, दीर्घायु मार्कण्डेय, महायशा मौद्गल्य, गर्ग, च्यवन, शतानन्द, भरद्वाज,
अग्निपुत्र सुप्रभ, नारद, पर्वत, गौतम आदि मुनिवरों को बुलवाया । महावीर्य राक्षस तथा महाबलो वानर तथा अन्य
सभी लोग कौतूहल वश आये, सहस्रों क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र तथा नाना देशों के ब्राह्मण पतिव्रता का शपथ देखने के
लिये आये । सबके आने की बात जानकर सीता के साथ मुनिवर वाल्मीकि वहाँ आये । ऋषि के पीछे-पीछे राम का
मन में ध्यान करती हुई अवाङ्मुखी, कृताञ्जलि, वाष्पकलायुक्त सीता आयी । ब्रह्मा का अनुगमन करती हुई श्रुति के
समान मुनि के पीछे आती हुई सीता को देखकर जनसमूह में महान् साधुवाद हुआ । सीता और राम के जन्म से
लेकर होनेवाली विशाल दुःखपरम्परा का चिन्तन कर सभी के अन्तःकरण क्षुब्ध हो उठे । कोई राम का एवं कोई
सीता का साधुवाद करने लगे । कोई दर्शक दोनों का साधुवाद करने लगे । उस समय उस महान् जनौघ में सीता को
साथ लिये हुए वाल्मीकि ने कहा—'दाशरथे ! सीता सव्रता एवं धर्मचारिणी है। अपवादभय से आप के द्वारा मेरे
आश्रम के समीप परित्यक्ता होकर मेरे आश्रम में रही । सीता आप के समक्ष अपने सतीत्व का प्रमाण प्रत्यय देगी ।
ये दोनों बालक कुश और लव जानकी से ही उत्पन्न तुम्हारे पुत्र हैं । मैं प्रचेता का दसवाँ पुत्र हूँ । मैं कभी अनृत
वाक्य का स्मरण नहीं करता । बहुत वर्षों तक मैंने तपश्चर्या की है। यदि मैथिली दुष्टा हो तो मैं उन तपश्चर्याओं का
फल न पाऊँ । मनसा, वाचा और कर्मणा मुझसे कभी किल्विष नहीं हुआ । यदि मैथिली निष्पाप है तो मैं उसका फल
भोगूँगा । पञ्च ज्ञानेन्द्रियों सहित मन से चिन्तन करके सीता को अत्यन्त शुद्धआचरणवाली एवं निष्पाप जानकर ही
मैंने वन में उसे अपने आश्रम में रखा है । यद्यपि आप भी सीता को शुद्ध मानते हैं तो भी सीता आपके समक्ष
प्रत्यय देगी ।
सर्ग ९८ में उल्लेख है, राम ने कहा—ब्रह्मन्, आप के अकल्मष वचनों में मुझे पूर्ण विश्वास है । देवताओं
के समक्ष जानकी ने पहले भी लङ्का में शपथ दिया है तो भी लोकापवाद-भय से, मैंने जानकी को निष्पाप जानते हुए
भी उसका त्याग किया था । ये कुश और लव मेरे पुत्र हैं, यह भी मैं जानता हूँ । सीताशपथ के प्रसङ्ग में मेरा
आशय जानकर ही सभी देवगण आये हैं । लोकपितामह ब्रह्मा को आगे कर आदित्य, वसु, रुद्र, विश्वेदेव, मरुद्गण
तथा साध्य देव एवं सभी परम महर्षि, नाग, सुपर्ण ओर सिद्धगण भी आये हुए हैं । राघव ने सबको देख देखकर
कहा—ऋषि के निष्कल्मष वाक्यों में हमें सीता के प्रति पूर्ण प्रत्यय है और संसार में परमपवित्र सीता में मेरी स्थिर
प्रीति है । उस समय दिव्य शीतल, मन्द, सुगन्ध वायु जनौघ को आह्लादित करने लगा । सभी राष्ट्रों से आये हुए
मानवों ने सत्ययुगीय उस अद्भुत शीतल, मन्द, सुगन्ध दिव्य वायु का अनुभव किया । काषायवासिनी सीता ने चतुर्दश-
( २६ )
भुवनस्थ जनसमुदाय को देखकर अवाङ्मुखी, अधोदृष्टि तथा प्राञ्जलि-बद्ध होकर कहा—हे अग्निदेव ! मैंने राघव से
अन्य किसी का कभी मन से भी चिन्तन नहीं किया है, यह सत्य है तो माधवी, धरित्री देवी, मुझे अवकाश प्रदान
करें। इस तरह सीता शपथ कर ही रही थी कि एक अत्यन्त अद्भुत चमत्कार हुआ। भूतल से एक अत्यन्त उत्तम
दिव्य सिंहासन प्रकट हुआ। जिसे अमितविक्रमवाले दिव्यरत्नभूषित नागों ने अपने फणों पर धारण कर रखा था।
धारणी देवी ने मैथिली का स्वागत और अभिनन्दन करके अपनी बाहुओं में ग्रहण कर दिव्य आसन पर बैठाया। उस
दिव्य आसन पर समासीन होकर रसातल में प्रविष्ट होती हुई सीता पर देवताओं द्वारा महान् जयजयकार तथा
साधुवाद के साथ अविच्छिन्नरूप से दिव्य पुष्पवृष्टि हुई।
"सीते ! साधु, साधु—तुम्हारा शील लोकोत्तर है" इस प्रकार अन्तरिक्षस्थ देवताओं की बहुविध वाणियाँ
प्रकट हुईं।
यज्ञवाट के सभी मुनि तथा नृपतिगण विस्मित हुए। अन्तरिक्ष एवं भूमि के सभी स्थावर, जङ्गम तथा
महाकाय दानव एवं पाताल के पन्नगेन्द्र विस्मयान्वित होकर कोई प्रहृष्ट होकर 'जय-जय' एवं 'साधु-साधु' नाद करने
लगे। कोई ध्यानपरायण हो गये और कोई राम एवं सीता को देखते हुए, निश्चेष्ट से हो गये। सीता
के रसातल-प्रवेश से वानर, राक्षस, मानव सभी संतप्त हुए। श्रीराम अत्यन्त संतप्त हुए। ब्रह्माजी ने देवताओं के
साथ आकर राम और सीता के दिव्य वैष्णव माहात्म्य का वर्णन करते हुए श्रीराम को सान्त्वना प्रदान की।
अवतारवाद के सम्बन्ध में पाश्चात्यों की भ्रान्तियों का उन्मूलन
शतपथ ब्राह्मण में कहा गया है कि मनु ने अवनेजन के लिए दोनों हाथों में जल लिया तो उसमें एक
मत्स्य आ गया और उसने मनु से कहा—"मेरी रक्षा करो, मैं प्रजासहित तुम्हें प्रलय के महौघ से पार करूँगा।"
मनु ने कहा—"कैसे तुम्हारी रक्षा हो ?" मत्स्य ने कहा—"जब तक मत्स्य छोटे रहते हैं तभी तक उनके नाश का
भय रहता है। एक मत्स्य ही दूसरे मत्स्य को निगल जाता है, अतः कुम्भ में रखकर मेरा पालन करो।" मनु ने कुम्भ
में मत्स्य को रखा जब वह अधिक बढ़ गया तो उसने कहा—"बड़ा सरोवर बनाकर उसमें मुझे रखो।" मनुजी ने
वैसा ही किया। जब उससे भी अधिक बढ़ गया तब उसने कहा—"अब मुझे समुद्र में डाल दो।" तब मनु ने उसे
समुद्र में डाल दिया। मत्स्य अत्यधिक बढ़ गया और उसने मनु से कहा—"अमुक समय में महौघ आयेगा तब नौका
की रचना कर उसमें आरूढ़ होना। मैं पार करूँगा।"
मत्स्य के कथनानुसार महाघ आया। मनु ने पृथ्वा को नाव बनाकर उसमें स्थान प्राप्त किया और उसी
मत्स्य के शृङ्ग में नाव बांध दी। उसी मत्स्य के द्वारा मनु उत्तर गिरिराज हिमालय में पहुँचे। तत्पश्चात्
महामत्स्य ने कहा—"मैंने तुम्हें पार कर दिया। नाव को वृक्ष में बाँध दो।" यह मत्स्यावतार का वर्णन है।"
कूर्मावतार का वर्णन—देवताओं की प्रार्थना से कूर्मराज ने अपने पृष्ठ पर मन्दराचल को धारण किया था
जिसको मन्थान दण्ड बनाकर देवताओं एवं असुरों ने समुद्र-मन्थन किया था।
इसी प्रकार महाभारत में परशुराम, राम, बलराम आदि अवतारों का वर्णन है।
“जन्माद्यस्य यतः” (ब्र० सू० १।१।२) इत्यादि ब्रह्मसूत्रों से सम्पूर्ण जगत् के अभिन्न निमित्तोपादान
कारण को ब्रह्म कहा गया है। उपनिषदों, मन्त्रों, ब्राह्मणों एवं आरण्यकों में जहाँ कहीं भी जिसमें उक्त लक्षण घटता
हो वह चाहे जिस नाम से व्यपदिष्ट हो उसे ब्रह्म ही समझना चाहिये। इसी लिए "आकाशस्तल्लिङ्गात्” (ब्र० सू०
१।१।२२) इत्यादि सूत्रों में आकाश, प्राण तथा आदित्यमण्डलस्थ पुरुष को ब्रह्म ही कहा गया है, क्योंकि श्रुतिप्रमाण
से उनमें जगत्कारणता सिद्ध है। इस दृष्टि से प्रकृत में विष्णु और प्रजापति अभिन्न ही तत्त्व हैं।
अतएव वाल्मीकिरामायण में प्रजापति नाम का निर्देश न होकर ब्रह्मा का उल्लेख हुआ है। दक्षादि प्रजा-
पति अवान्तर प्रजापति हैं। मुख्य प्रजापति ब्रह्म ही है। वही विश्व की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय का हेतु है।
वह यद्यपि एक ही है तो भी कार्यभेद से उसके पृथक्-पृथक् भी नाम होते हैं । उत्पादक ब्रह्मा, पालक विष्णु एवं
संहारक रुद्र या शिव कहे जाते हैं । इस दृष्टि से प्रजापति, ईश्वर या महाविराट् त्रिमूति होता है । त्रिमूर्ति
में भी विष्णु की प्रधानता होने से इन शब्दों द्वारा विष्णु का ही उल्लेख हुआ है । स्वयम्भू ब्रह्मा का देवताओं के
साथ आविर्भाव हुआ और उन्होंने वाराह रूप धारण कर पृथ्वी का उद्धार किया । पूर्वापर के सभी ग्रन्थों के
समन्वित निष्कर्ष से यह सिद्धान्त सिद्ध होता है कि भगवान् विष्णु ही शतपथब्राह्मण आदि में प्रजापति, ब्रह्म आदि
शब्दों से उक्त हैं और उन्हीं से मत्स्य, कूर्म, वराह आदि अवतार हुए ।
महाभारत एवं विष्णुपुराण का समन्वय करने से भी यही निष्कर्ष निकलता है कि महाभारत का प्रजापति
वेदान्तवेद्य ब्रह्म ही हैं। वही विष्णु भी हैं। 'अहं प्रजापतिर्ब्रह्मा' इत्यादि श्लोक का अर्थ यों है—'मैं सृष्टिकर्ता प्रजा-
पति ब्रह्म हूँ मुझसे पर ( उत्कृष्ट ) कोई भी प्रमाण ज्ञात नहीं है। मैंने ही मत्स्यरूप से महान् भय से तुम देवताओं की
रक्षा की थी।' विष्णुपुराण के वचन का अर्थ निम्नोक्त है । जगत् का प्रलय होने पर 'तोयान्तःस्थां महीं ज्ञात्वा'
अनुमान से पृथ्वी को जल के भीतर जानकर उसका उद्धार करने की कामना से प्रजापति ने पूर्व कल्पों के समान ही
मत्स्य, कूर्म आदि के समान वराहरूप धारण किया ।
पूर्वोक्त दृष्टि से ही विष्णुपुराण में विष्णु तथा ब्रह्मस्वरूप नारायण एवं ब्रह्मा के साथ अभिन्नता कही
गयी है । अतएव मत्स्य, कूर्म आदि विष्णु के ही अवतार हैं । पाश्चात्य विज्ञ कहते हैं कि विष्णु का महत्त्व बढ़ जाने
से प्रजापति के अवतार मत्स्य, कूर्म आदि विष्णु के माने जाने लगे । पर यह कल्पना सर्वथा निराधार है । किसी की
इच्छा या भावना से विष्णु का महत्त्व घटता अथवा बढ़ता नहीं है । विष्णुपुराण, हरिवंशपुराण तथा महाभारत में
विष्णु का खूब महत्त्व भी कहा गया है और उन्हीं ग्रन्थों में प्रजापति के अवतारों में मत्स्य, कूर्म आदि का वर्णन भी
है । अतः कब से क्यों किस प्रमाण से विष्णु का महत्त्व बढ़ा ? यह कहना और सिद्ध करना असम्भव ही है । महा-
भारत तथा हरिवंश में पाश्चात्य तथा तदनुयायियों ने भी वराह तथा विष्णु का सम्बन्ध माना है । वस्तुतः हेमाद्रि,
पराशरमाधव, मिताक्षरा, निर्णयसिन्धु आदि में जैसे मन्त्र, ब्राह्मण, आरण्यक, विविध-स्मृतियों, पुराणों और आगमों का
समन्वय करके ही निष्कृष्ट अर्थ निकाला जाता है, वैसे ही अवतारों और राम-कथाओं के सम्बन्ध में भी सबका समन्वय
करके ही किसी निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है । जब महाभारत, हरिवंश तथा विष्णुपुराण जैसे प्रामाणिक ग्रन्थों में
प्रजापति और विष्णु को एक मानकर मत्स्य आदि अवतारों तथा राम और कृष्ण को विष्णु के अवतार कहा हो जा
रहा है तब हठधर्मी के कारण वाल्मीकिरामायण में राम को अवतार बतलानेवाले अंशों को क्षेपक कहने में क्या तुक है ?
पाश्चात्य तथा तदनुयायी कहते हैं "वामनावतार और नृसिंहावतार प्रारम्भ से विष्णु से ही सम्बन्ध रखते
हैं । वामनावतार का उल्लेख तैत्तिरीयसंहिता, शतपथब्राह्मण, तैत्तिरीयब्राह्मण एवं ऐतरेयब्राह्मण में हुआ है । यह
अवतार ऋग्वेद की एक कथा से विकसित माना जाता है और शतपथब्राह्मण, महाभारत के नारायणीयोपाख्यान तथा
हरिवंशपुराण में इसका विष्णु के अन्य अवतारों के साथ उल्लेख हुआ है । नृसिंहावतार की कथा पहले पहल तैत्तिरीय
आरण्यक के परिशिष्ट में मिलती है । नारायणीयोपाख्यान तथा हरिवंशपुराण में इसका उल्लेख है । परशुराम विष्णु
के अवतार का प्रारम्भिक कथाओं में उल्लेख नहीं है । उदाहरणार्थ ( म० भा० ३।११५।११७ ) किन्तु नारायणीय
उपाख्यान ( म० भा० १२।३२६।७७ ), हरिवंश ( १।४१।११२-१२० ) तथा विष्णुपुराण ( १।६।१४१ ) में उनको
विष्णु का अवतार माना गया है ।"
वस्तुतः उक्त सभी ग्रन्थ प्रामाणिक हैं । उनमें कहीं भी किसी अवतार की चर्चा है तो वह प्रामाणिक है ।
निष्कर्षरूप में सभी विष्णु के अवतार हैं, पर इन पृथक्-पृथक् उक्तियों से अवतारों के विकास की बात सिद्ध नहीं
होती । अतः पाश्चात्य विद्वानों का यह निष्कर्ष कि "ब्राह्मणों में तथा अन्य प्राचीन साहित्यों में अवतारवाद विद्यमान
है, किन्तु उक्त ग्रन्थों के रचनाकाल में न तो अवतारों की कोई विशेष पूजा की जाती थी और न उनमें विष्णु का
प्राधान्य ही था।" यह मन्तव्य सर्वथा असंगत है। प्रजापति तथा विष्णु का विभिन्न यज्ञों में देवताओं के रूप में उल्लेख
है ही। कई स्थलों में इन्द्र और विष्णु का साथ-साथ देवतात्व है और कहीं विष्णु का ही प्राधान्य है। विष्णु पूजा
की श्रेष्ठता से ही उनसे अभिन्न अवतारों और पूजा की सर्वश्रेष्ठता सिद्ध होती है। वस्तुतः जैसे अग्निहोत्र, ज्योतिष्टोम
आदि कर्मों का ज्ञान और अनुष्ठान किसी एक ग्रन्थ पर आश्रित नहीं होता, वह तो मन्त्र, ब्राह्मण और कल्पसूत्र
तीनों का समन्वय कर के ही समझा जा सकता है। केवल मन्त्र या केवल ब्राह्मण के आधार पर उनका अनुष्ठान नहीं
हो सकता । इतना ही क्यों, तीनों के आधार पर बनी हुई परम्पराप्राप्त पद्धतियों के आधार पर ही ज्योतिष्टोमादि
का प्रयोग हो सकता है। इसी तरह मन्त्रों, ब्राह्मणों, आरण्यकों, उपनिषदों तथा रामायण, भारत, पुराणों एवं आगमों
के आधार पर बने पूजाविधानों के आधार पर ही राम, कृष्ण आदि की आराधनाएँ होती हैं, पर इसका यह अर्थ
कदापि नहीं है कि इनकी पूजा पहले नहीं होती थी, विकासक्रम से बाद में चल पड़ी ।
“अतएव कृष्णावतार के साथ-साथ अवतारवाद के विकास में एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन प्रारम्भ हुआ। उस
समय से लेकर अवतारवाद भक्तिभाव से ओत-प्रोत होने लगा ।” पाश्चात्यशिक्षादीक्षितों का यह कथन निराधार है;
क्योंकि महाभारत, हरिवंश, विष्णुपुराण, श्रीमद्भागवत आदि ग्रन्थों से ही कृष्णावतार की सामग्री प्राप्त होती है और
उन्हीं ग्रन्थों में विष्णु, राम आदि की भक्ति की भी चर्चा है । रामतापनीय, गोपालतापनीय आदि उपनिषदों में भी
राम, कृष्ण आदि अवतारों की भक्ति एवं पूजा आदि का उल्लेख है ।
यह कहना भी सर्वथा निराधार है कि “वासुदेव कृष्ण भागवतों के इष्टदेव थे। प्रारम्भ में उनका विष्णु
से कोई सम्बन्ध नहीं था ।” यह भी कहना गलत है कि “तीसरी शती ई० पू० वासुदेव और कृष्ण की अभिन्नता की
भावना उत्पन्न हुई। बौद्ध-धर्म तथा भागवत-सम्प्रदाय का भक्तिमार्ग दोनों समानरूप से ब्राह्मणसाहित्य, कर्मकाण्ड
तथा यज्ञप्रधान धर्म की प्रतिक्रिया के रूप में उत्पन्न और विकसित हुए । इसके फलस्वरूप धर्म के क्षेत्र में ब्राह्मणों का
एकाधिकार लुप्त हो गया था । बौद्ध धर्म का अधिकाधिक प्रसार देखकर ब्राह्मणों ने भागवतों को अपनी ओर आकर्षित
करने के लिए उनके इष्टदेव वासुदेव कृष्ण को विष्णु नारायण का अवतार मान लिया । इससे अवतारवाद को बहुत
प्रोत्साहन मिला । साथ ही साथ विष्णु का भी महत्त्व बढ़ने लगा । इस तरह अवतारवाद की सारी भावना धीरे-धीरे विष्णु
नारायण में केन्द्रित होने लगी और वैदिक साहित्य के अन्य अवतारों के कार्य विष्णु में ही आरोपित हुए", क्योंकि उक्त
कल्पना को सिद्ध करनेवाला कोई प्रमाण नहीं है। बौद्ध-धर्म वैदिकधर्मका प्रतिक्रियारूप था। इसमें तो प्रमाण बौद्ध-
ग्रन्थ ही हैं। बुद्ध तथा बौद्धों ने प्रत्यक्ष तथा अनुमान दो ही प्रमाण माने हैं। आगम प्रमाण नहीं माना । फलतः
उनके मत में वेदों की मान्यता नहीं है। बौद्ध बुद्ध को ही सर्वज्ञ मानकर बुद्ध-वचन को ही धर्म में प्रमाण मानते हैं।
सुतरां वे लोग वैदिक नित्यात्मवाद तथा यज्ञ, याग आदि विशेषतः पश्वादिसमवेत यज्ञ के विरोधी थे । वे जन्मना
जाति नहीं मानते थे, इसलिए ब्राह्मण जाति का भी उनकी दृष्टि में कोई महत्त्व नहीं था । परन्तु भागवत भी ऐसे थे,
यह नहीं कहा जा सकता, क्योंकि भगवान् वासुदेव ने महाभारत तथा गीता में वेद का, आत्मा का तथा वैदिक धर्मों
का महत्त्व वर्णन किया है। ऐसी स्थिति में कृष्णभक्त वेद, यज्ञ आदि के विरोधी कैसे हो सकते थे ?
श्रीनारायणीयोपाख्यान, श्रीमद्भागवत तथा सर्वोपरि रामायण में वेद, यज्ञों और ब्राह्मणों का महत्त्व विशद
रूप में वर्णित है, अतः भागवतों के भक्ति-सम्प्रदाय को बौद्धों के समान वेद, यज्ञ तथा ब्राह्मणों का विरोधी समझना
निरी भ्रान्ति ही है । साथ ही भागवतों के उक्त ग्रन्थों में ही जब वासुदेव कृष्ण को विष्णु का अवतार माना गया है
तब तो कृष्ण और वासुदेव की भिन्नता की कल्पना को कोई स्थान ही नहीं मिलता । ब्राह्मणों ने भागवतों को आकर्षित
करने के लिए ही वासुदेव को विष्णु का अवतार मान लिया, इस कल्पना का भी कोई आधार नहीं है । उल्टे
“विष्णुर्गोपा अदाभ्य” इत्यादि रूप से वेदों में ही विष्णु को गोप (कृष्ण) कहा गया है। “गोपवेषस्य विष्णोः”
मेघदूत में कालिदास ने भी विष्णु को गोपवेषधारी कहा है। वस्तुतः ‘विष्णुपुराण आदि ग्रन्थ ब्राह्मणसम्प्रदाय की
( २९ )
स्वार्थपूर्ण कल्पना नहीं हैं,' किन्तु महर्षि व्यास द्वारा वेदार्थ का उपबृंहण या वेद के भाष्यरूप में ही निर्मित हैं—
“इतिहासपुराणाभ्यां वेदार्थमुपबृंहयेत्” ।
वस्तुस्थितिमूलक होने के कारण ही पुराणों में वेदविरोधी बुद्ध को भी विष्णु का अवतार माना गया है ।
फिर जब वेदस्वरूप तैत्तिरीय आरण्यक में वासुदेव और विष्णु की एकता का प्रमाण मिलता है तब तो भिन्नता का
प्रश्न ही नहीं उठना चाहिये । विष्णु का महत्त्व भी अनादि ही है । वह किसी के संसर्ग से बढ़ने लगा, यह कल्पना भी
निर्मूल है ।
पाश्चात्यशिक्षादीक्षितों का यह भी कहना कि “इधर अवतारवाद की भावना फैलती जा रही थी उधर कई
शतियों से राम का आदर्श चरित्र भारतीय जनता के सामने आ रहा था । रामायण की लोकप्रियता के साथ-साथ
राम का महत्त्व भी बढ़ रहा था । उनकी वीरता के वर्णन में अलौकिकता की मात्रा बढ़ने लगी । रावण पाप और
दुष्टता का प्रतीक बन गया और राम पुण्यवान् और सदाचारी थे, अतः इस विकास की स्वाभाविक परिणति यह हुई कि
कृष्ण की तरह राम भी विष्णु के अवतारों में गिने जाने लगे । राम तथा विष्णु की अभिन्नता की धारणा कब उत्पन्न
हुई इसका ठीक समय निर्धारित करना असम्भव है । फिर भी अवतारवाद वाल्मीकिरामायण उत्तरकाण्ड में इतना
व्याप्त है कि इसे उत्तरकाण्ड की अधिकांश सामग्री के पूर्व का मानना चाहिये । अतः बहुत संभव है कि पहली शती
ई० पू० से ही रामावतार की भावना प्रचलित होने लगी थी । रामायण के प्रक्षेपों के अतिरिक्त महाभारत तथा वायु,
ब्रह्माण्ड, विष्णु, मत्स्य, हरिवंश आदि प्राचीनतम पुराणों में अवतारों को तालिका में दाशरथि राम का भी नाम आया
है ।” सरासर धोखा देना है ।
वस्तुतः यह कथन नितान्त भ्रम एवं दुरभिसन्धि पूर्ण है, कारण, वेदों तथा उपनिषदों में अनादिकाल से ही
राम के अवतार का तथा उनकी उपासना का वर्णन है । जब मन्त्रों, ब्राह्मणों, उपनिषदों और ब्रह्मसूत्रों में परमात्मा
का सगुण साकार होना वस्तुस्थिति है तब अवतार केवल भावना की वस्तु कैसे कहा जा सकता है ?
पाश्चात्य वातावरण में पले हुओं का कथन केवल प्रतिज्ञामात्र है, उसमें कोई हेतु नहीं है । हेतु के बिना
अनुमान अकिञ्चित्कर ही होता है। जैसे धूम का अग्नि से कार्यकारणभाव होने से निश्चित व्याप्ति है, तभी धूम से
वह्नि का अनुमान होता है । इस प्रकार राम विष्णु के अवतार नहीं हैं, इसकी किसी हेतु के साथ व्याप्ति नहीं
है। विष्णु और राम दोनों ही पाश्चात्यों एवं उनके अनुयायियों के लिए अप्रत्यक्ष ही हैं। फिर, उनका भेद या
अभेद भी अप्रत्यक्ष ही है । अप्रत्यक्ष साध्य के साथ साधन की व्याप्ति का प्रत्यक्ष कैसे हो सकता है ? जिन ग्रन्थों के
आधार पर विष्णु एवं राम का अस्तित्व सिद्ध होता है, उन्हीं से ही उनका अभेद सिद्ध होता है । अतएव जब
प्रामाणिक वेदों, आर्ष रामायण, महाभारत इतिहासों से राम की ब्रह्मरूपता सिद्ध है, तब तो तद्विरुद्ध नगण्य जनों
की निराधार कल्पना का कोई महत्त्व हो ही नहीं सकता । प्रामाणिक आधार के बिना केवल वीरता एवं लोकप्रियता
के कारण ही किसी को अवतार नहीं माना जाता । सिद्धान्ततः महाभारत, भागवत तथा अन्य पुराणों की अपेक्षा
भी रामायण अति प्राचीन तथा प्रामाणिक सद्ग्रन्थ है । अतएव कृष्ण से प्रथम ही राम का अवतार प्रसिद्ध है ।
इसी लिए संसार में राम का नाम सर्वाधिक प्रसिद्ध है । भारत में तो बच्चे-बच्चे आस्तिक नास्तिक सभी की जिह्वा
पर राम का नाम प्रख्यात है । कृष्ण की कथाओं में भी आता है कि कृष्ण की माता यशोदा कृष्ण को राम की कथा
सुना रही थीं, जब सीताहरण की बात आयी तो सोते-सोते कृष्ण बोल पड़े “सौमित्रे क्व धनुर्धनुर्धनुरिति ।” वस्तुतः
जब वेद, उपनिषद् तथा रामायण से अवतारवाद सिद्ध है, तब वह भावनामात्र कैसे हो सकता है ? यदि वेद आदि
प्रमाण नहीं तो पाश्चात्य कल्पक जैसे लोगों के नगण्य वचनों का ही क्या प्रामाण्य हो सकता है ? कुछ व्यक्तियों की
तुच्छ कल्पनाओं के बल पर वेद, उपनिषद्, महर्षियों के रामायण, महाभारत, विष्णुपुराण तथा श्रीमद्भागवत को
झूठा मान लेना सर्वथा अनुचित है ।