सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 22, कुल 1049 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 22

( १७ )
सत्यपराक्रम राम देते ही हैं, प्रतिग्रह नहीं करते हैं। सत्य ही बोलते हैं, अमृत नहीं बोलते हैं।
राम के क्रोध और प्रसाद निरर्थक नहीं होते, उनके क्रोध और प्रसाद अमोघ हैं। वे वध्य व्यक्ति का
अवश्य वध करते हैं और निर्दोष अवध्य के प्रति कभी भी कुपित नहीं होते ।
राम की धर्म में तत्परता, मुख में मधुरता स्तुत्य थी। दान में उनका समुत्साह तथा मित्र के प्रति
अवञ्चकता भी लोकोत्तर थी। गुरु के प्रति वे विनयी थे। उनके चित्त में गम्भीरता, आचार में पवित्रता, गुणों में
अभिरुचि, शास्त्रों में अभिज्ञता, रूप में सुन्दरता एवं हरि में भक्ति भी अत्यन्त उत्कृष्ट थी, इसी लिए ऋषियों की दृष्टि
में राम से भिन्न कोई भी काव्यों के यश का भाजन हो ही नहीं सकता ।
मृदुता, करुणा, श्रुत (परम्परा से वेदादि शास्त्रज्ञान), शील, इन्द्रियनिग्रह, मनोनियह ये छः गुण राघवेन्द्र
राम को शोभित करते हैं ।
शोभा, कान्ति, छवि, वर्ण, लक्षण, लावण्य, आभिजात्य, सौभाग्य, राग आदि रूप के सभी भेद राम के
सम्बन्ध से ही शोभित होते हैं ।
अङ्गों की रेखाओं की स्पष्टता रूप है, गौरत्वादि धर्मविशेष वर्ण है, चाकचिक्यादिरूप कान्ति प्रभा है,
चक्षुओं को बाँधनेवाला स्मितमुखत्वादि ही राग है, कुसुम के समान कोमल स्पर्शविशेष आभिजात्य है, कटाक्षादि
विलास हैं एवं तरलता लावण्य है।
गर्भिणी स्त्री जैसे गर्भस्थ शिशु की हितदृष्टि से ही सब कार्य करती है वैसे ही राजा की सम्पूर्ण चेष्टाएँ
प्रजाहित की दृष्टि से ही होती हैं। फिर लोकदृष्टि से कुछ असम्मत भी क्यों न हो । ताटका (ताड़का) के मारने में
राम को स्त्री-वध के सम्बन्ध में अधिक संकोच था ।
तभी विश्वामित्र ने कहा था—
तुम्हें स्त्रीवधके लिए घृणा नहीं करनी चाहिये, क्योंकि चातुर्वर्ण्य के रक्षण के लिए राजपुत्र को ऐसी
आततायी स्त्री का भी वध करना चाहिये। प्रजारक्षणार्थ राजा को नृशंस, अनृशंस, क्रूर, अक्रूर, पातकयुक्त, सदोष
सब कुछ करना पड़ सकता है। जैसे हाथी के पैर में सबका पैर आ जाता है, वैसे ही राजधर्म में सब धर्म आ जाते
हैं। प्रजा एवं प्रजाकल्याणकारी वर्णाश्रमधर्म की रक्षा करना राजा का प्रधान कर्म है और सब धर्म-कर्म उसी के
अङ्गोपाङ्ग हैं । प्रधान के अविरुद्ध ही अन्य धर्मों का महत्त्व है ।
रामचन्द्र परम ब्रह्मण्य थे। वाल्मीकिरामायण में उन्हें ब्राह्मणों का उपासक कहा गया है। फिर भी
ब्राह्मण द्वारा आहत निरपराध श्वान को न्याय देने का जब प्रश्न आया तब राम को न्याय का पक्ष ही लेना पड़ा,
क्योंकि उनकी दृष्टि में न्याय सबसे बड़ा था । इसी तरह २१ बार पृथ्वी को निःक्षत्र करनेवाले ब्राह्मण परशुराम का
उग्र रूप जब राम के क्षात्र तेज को अभिभूत करने लगा तब राम ने बड़ी बुद्धिमानी से अपनी ब्रह्मण्यता की रक्षा
करते हुए क्षात्रधर्म की भी रक्षा की और कहा—
भार्गव ! क्षात्रधर्मयुक्त होने पर भी मुझे आपने वीर्यहीन एवं असमर्थ समझकर क्षात्र तेज का अपमान
किया है। अतः अब आप मेरा पराक्रम देखिये । यह कहकर राम ने उनसे धनुष लेकर क्षण में उसे चढ़ाकर कहा—
आप ब्राह्मण होने से मेरे पूज्य हैं और विश्वामित्र की भगिनी सत्यवती के पौत्र हैं, इसलिए मैं आपके लिए प्राणहर
बाण छोड़ नहीं सकता, किन्तु आपकी दिव्यगति अथवा तपोबल से अर्जित लोकों को नष्ट करूँगा ।
किन्तु जहाँ धर्मोल्लङ्घन का प्रश्न राम के सामने आया वहाँ राम ने जैसे ही धर्मविमुख शम्बूक शूद्र का
वधकर ब्राह्मण-शिशु को पुनर्जीवित किया वैसे ही धर्मविमुख ब्राह्मण रावण का वधकर सम्पूर्ण मानवता को जीवन
प्रदान किया ।