रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 900, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्रीराम ने कहा था कि हे धर्मज्ञ भरत ! इन अनेक कारणों से महाराज कैकेयी के इच्छानुसार तुम्हें राज्य
देने के लिए बाध्य थे, अतः तुम राज्य स्वीकार कर के सत्यवादी पिताजी को ऋण से मुक्त करो ।
फिर आप कहते हैं कि "सेवक को जैसे सुरापायी स्वामी के आज्ञानुसार किसी का सिर नहीं तोड़ देना
चाहिये, किन्तु स्वामी का नशा उतारने का प्रयास करना चाहिये । वैसे काम, क्रोध, लोभ एवं ममता के आवेश
से उन्मादी महाराज दशरथ की आज्ञा न मानकर उनको उन दोषों से मुक्त करने का प्रयत्न करना चाहिये ।"
परन्तु आपका यह कहना ही उन्मत्त-प्रलाप है, क्योंकि श्रीराम ने तो वैसा नहीं किया । क्या उन्होंने अनुचित
किया था ? क्यों श्रीराम धर्मज्ञ, विज्ञानवान्, प्रतिभावान् नहीं थे ? क्या वे कर्तव्याकर्तव्य के निर्धारण में सक्षम
नहीं थे ?
उल्टा वे तो आपके विपरीत कहते हैं कि महाराज दशरथ राजा हैं, गुरु हैं, पिता हैं, वृद्ध हैं वे चाहे
क्रोध से, चाहे हर्ष से एवं चाहे काम से जो भी आज्ञा देते हैं धर्म की दृष्टि से कौन अनुशंसवृत्तिवाला पुत्र उसका
पालन न करेगा—
"गुरुश्च राजा च पिता च वृद्धः क्रोधात् प्रहर्षादथवापि कामात् ॥
यद् व्यादिशेत् कार्यमवेक्ष्य धर्मं कस्तं न कुर्यादनृशंसवृत्तिः ॥" (वा०रा० २।२१।५९)
श्रीराम ने कौशल्या और लक्ष्मण के सामने कहा था जीवलोक में धर्म, अर्थ, काम एवं अभीष्ट अभ्युदय
की सिद्धि में जो भी अपेक्षित होते हैं वे सभी धर्म के पालन से वैसे ही वशीभूत हो जाते हैं, जैसे पुत्रसहित भार्या
अपने पति के वश में रहती है । जिस धर्म में सब असंकीर्ण होकर रहते हैं उस धर्म का ही उपक्रम ( आरम्भ )
श्रेष्ठ है—
"धर्मार्थकामाः खलु जीवलोके समीक्षिता धर्मफलोदयेषु ।
ये तत्र सर्वे स्युरसंशयं मे भार्यैव वश्याभिमता सपुत्रा ॥
यस्मिंस्तु सर्वे स्युरसंनिविष्टा धर्मो यतः स्यात्तदुपक्रमेत ॥" (वा०रा० २।२१।५७, ५८)
जाबालि भी श्रीराम को पिता के आज्ञा-पालन से विरत करने आये थे । उस समय राम ने कहा था
लोक में सत्य ही ईश्वर है । सत्य में ही सब धर्म सदा आश्रित रहते हैं । अर्थात् बिना सत्य के अग्निहोत्र, दर्शपूर्णमास,
चातुर्मास्य, ज्योतिष्टोम आदि कोई धर्म सम्पन्न नहीं होता है । क्योंकि सब में सत्य का पालन अनिवार्य है । अतएव
संसार की सभी वस्तुएँ सत्यमूलक ही हैं । वे भी सत्य में ही प्रतिष्ठित हैं, अतः सत्यपरायण होना उचित है । तस्मात्
सत्य से उत्कृष्ट पद कुछ भी नहीं है । अतएव मैं पिता के निर्देश का पालन क्यों न करूँ । मैं किसी भी लोभ से,
मोह से तथा अज्ञान् से सत्य के सेतु का भेदन नहीं कर सकता—
"सत्यमेवेश्वरो लोके सत्ये धर्मः सदाश्रितः ।
सत्यमूलानि सर्वाणि सत्यान्नास्ति परं पदम् ॥
वेदाः सत्यप्रतिष्ठानास्तस्मात्सत्यपरो भवेत् ।
सोऽहं पितुनिर्देशं तु किमर्थं नानुपालये ॥
नैव लोभान्न मोहाद्वा न चाज्ञानात्तमोन्वितः ।
सेतुं सत्यस्य भेत्स्यामि गुरोः सत्यप्रतिश्रवः ॥" (वा०रा० २।१०९।१३-१७)
वे राजा दशरथ मेरे पिता हैं, जनयिता हैं । उन्होंने मेरे लिए जो भी आज्ञा दी है, वह मिथ्या कदापि
न होगी—